Ram Charita Manas

Aranyaka Kanda

Shri Rama laments over Maa Sita kidnapping, Jatayu's explains the movement of Ravana and receives salvation in the arms of shri rama.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम। सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम ॥ २९(ख) ॥

Chapter : 13 Number : 36

Chaupai / चोपाई

रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी ॥ जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली ॥

Chapter : 13 Number : 36

निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं ॥ गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी ॥

Chapter : 13 Number : 36

अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ ॥ आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना ॥

Chapter : 13 Number : 36

हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता ॥ लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती ॥

Chapter : 13 Number : 36

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ॥ खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥

Chapter : 13 Number : 36

कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी ॥ बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा ॥

Chapter : 13 Number : 36

श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं ॥ सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू ॥

Chapter : 13 Number : 36

किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ॥ एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी ॥

Chapter : 13 Number : 36

पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी ॥ आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा ॥

Chapter : 13 Number : 36

Doha / दोहा

दो. कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर ॥ निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर ॥ ३० ॥

Chapter : 13 Number : 37

Chaupai / चोपाई

तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा ॥ नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही ॥

Chapter : 13 Number : 37

लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई ॥ दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना ॥

Chapter : 13 Number : 37

राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता ॥ जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा ॥

Chapter : 13 Number : 37

सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगेँ ॥ जल भरि नयन कहहिँ रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई ॥

Chapter : 13 Number : 37

परहित बस जिन्ह के मन माहीँ। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीँ ॥ तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा ॥

Chapter : 13 Number : 37

Doha / दोहा

दो. सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ ॥ जौँ मैँ राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ ॥ ३१ ॥

Chapter : 13 Number : 38

गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा ॥ स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी ॥

Chapter : 13 Number : 38

Chanda / छन्द

छं. जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही ॥

Chapter : 13 Number : 39

पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं ॥ १ ॥

Chapter : 13 Number : 39

बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं। गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥

Chapter : 13 Number : 39

जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥ २।

Chapter : 13 Number : 39

जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं ॥ करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं ॥

Chapter : 13 Number : 39

सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई। मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई ॥ ३ ॥

Chapter : 13 Number : 39

जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा ॥

Chapter : 13 Number : 39

सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी ॥ ४ ॥

Chapter : 13 Number : 39

Doha / दोहा

दो. अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम। तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम ॥ ३२ ॥

Chapter : 13 Number : 40

Chaupai / चोपाई

कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ॥ गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी ॥

Chapter : 13 Number : 40

सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥ पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई ॥

Chapter : 13 Number : 40

संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन ॥ आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता ॥

Chapter : 13 Number : 40

दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा ॥ सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही ॥

Chapter : 13 Number : 40

Doha / दोहा

दो. मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव। मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव ॥ ३३ ॥

Chapter : 13 Number : 41

Chaupai / चोपाई

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ॥ पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ॥

Chapter : 13 Number : 41

कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा ॥ रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई ॥

Chapter : 13 Number : 41

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