Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

Shri Ram-Sita-Laxman going to the forest as hermits and leaving the city when residents are asleep.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत। बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत ॥ ७९ ॥

Chapter : 14 Number : 84

Chaupai / चोपाई

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े ॥ कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए ॥

Chapter : 14 Number : 84

गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे ॥ जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे ॥

Chapter : 14 Number : 84

दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी ॥ सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई ॥

Chapter : 14 Number : 84

बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी ॥ सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी ॥

Chapter : 14 Number : 84

Doha / दोहा

दो. मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन। सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन ॥ ८० ॥

Chapter : 14 Number : 85

Chaupai / चोपाई

एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई ॥

Chapter : 14 Number : 85

राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू ॥ कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू ॥

Chapter : 14 Number : 85

गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे ॥ रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।

Chapter : 14 Number : 85

एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना ॥ पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू ॥

Chapter : 14 Number : 85

Doha / दोहा

दो. -सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि। रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि ॥ ८१ ॥

Chapter : 14 Number : 86

Chaupai / चोपाई

जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई ॥ तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी ॥

Chapter : 14 Number : 86

जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई ॥ सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू ॥

Chapter : 14 Number : 86

पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी ॥ एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा ॥

Chapter : 14 Number : 86

नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा ॥ अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ ॥

Chapter : 14 Number : 86

Doha / दोहा

दो. -पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ। गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ ॥ ८२ ॥

Chapter : 14 Number : 87

Chaupai / चोपाई

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए ॥ चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई ॥

Chapter : 14 Number : 87

चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा ॥ कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं ॥

Chapter : 14 Number : 87

लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी ॥ घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी ॥

Chapter : 14 Number : 87

घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता ॥ बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं ॥

Chapter : 14 Number : 87

Doha / दोहा

दो. हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर। पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर ॥ ८३ ॥

Chapter : 14 Number : 88

Chaupai / चोपाई

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े ॥ नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी ॥

Chapter : 14 Number : 88

बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही ॥ सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी ॥

Chapter : 14 Number : 88

सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं ॥ जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू ॥

Chapter : 14 Number : 88

चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई ॥ राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही ॥

Chapter : 14 Number : 88

Doha / दोहा

दो. बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ। तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ ॥ ८४ ॥

Chapter : 14 Number : 89

Chaupai / चोपाई

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी ॥ करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई ॥

Chapter : 14 Number : 89

कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए ॥ किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे ॥

Chapter : 14 Number : 89

सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई ॥ लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई ॥

Chapter : 14 Number : 89

जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती ॥ खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता ॥

Chapter : 14 Number : 89

Doha / दोहा

दो. राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ ॥ सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ ॥ ८५ ॥

Chapter : 14 Number : 90

Chaupai / चोपाई

जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू ॥ रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं ॥

Chapter : 14 Number : 90

मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू ॥ एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू ॥

Chapter : 14 Number : 90

निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना ॥ जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा ॥

Chapter : 14 Number : 90

एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा ॥ बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना ॥

Chapter : 14 Number : 90

Doha / दोहा

दो. राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि। मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि ॥ ८६ ॥

Chapter : 14 Number : 91

Chaupai / चोपाई

सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई ॥ उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी ॥

Chapter : 14 Number : 91

लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा ॥ गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला ॥

Chapter : 14 Number : 91

कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा ॥ सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई ॥

Chapter : 14 Number : 91

मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ ॥ सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू ॥

Chapter : 14 Number : 91

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