Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

Reaching Prayag, Conversation with Sage Bhardwaj . Resdients of Yamunatir shower their loves and service towards Shri Rama, Laxmana and Maa Sita.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ। सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ ॥ १०४ ॥

Chapter : 18 Number : 110

Chaupai / चोपाई

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू ॥ प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई ॥

Chapter : 18 Number : 110

सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी ॥ चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु ॥

Chapter : 18 Number : 110

छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा ॥ सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा ॥

Chapter : 18 Number : 110

संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा ॥ चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा ॥

Chapter : 18 Number : 110

Doha / दोहा

दो. सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम। बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम ॥ १०५ ॥

Chapter : 18 Number : 111

Chaupai / चोपाई

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ ॥ अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा ॥

Chapter : 18 Number : 111

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई ॥ करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा ॥

Chapter : 18 Number : 111

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी ॥ मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा ॥

Chapter : 18 Number : 111

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए ॥ मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई ॥

Chapter : 18 Number : 111

Doha / दोहा

दो. दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि। लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि ॥ १०६ ॥

Chapter : 18 Number : 112

Chaupai / चोपाई

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे ॥ कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के ॥

Chapter : 18 Number : 112

सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए ॥ भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे ॥

Chapter : 18 Number : 112

आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू ॥ सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू ॥

Chapter : 18 Number : 112

लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी ॥ अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू ॥

Chapter : 18 Number : 112

Doha / दोहा

दो. करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार ॥

Chapter : 18 Number : 113

Chaupai / चोपाई

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने ॥ तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा ॥

Chapter : 18 Number : 113

सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू ॥ मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं ॥

Chapter : 18 Number : 113

यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी ॥ भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए ॥

Chapter : 18 Number : 113

राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू ॥ देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई ॥

Chapter : 18 Number : 113

Doha / दोहा

दो. राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ। चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ ॥ १०८ ॥

Chapter : 18 Number : 114

Chaupai / चोपाई

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं ॥ मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं ॥

Chapter : 18 Number : 114

साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए ॥ सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा ॥

Chapter : 18 Number : 114

मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे ॥ करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई ॥

Chapter : 18 Number : 114

ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई ॥ होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई ॥

Chapter : 18 Number : 114

Doha / दोहा

दो. बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम ॥ १०९ ॥

Chapter : 18 Number : 115

Chaupai / चोपाई

सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी ॥ लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई ॥

Chapter : 18 Number : 115

अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं ॥ जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने ॥

Chapter : 18 Number : 115

सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई ॥ सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं ॥

Chapter : 18 Number : 115

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