Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

King Bharat being felicitated by Bhardwaj.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु। कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु ॥ २१२ ॥

Chapter : 33 Number : 223

Chaupai / चोपाई

सुनि मुनि बचन भरत हिँय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू ॥ जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी ॥

Chapter : 33 Number : 223

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा ॥ भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए ॥

Chapter : 33 Number : 223

चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई ॥ भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए ॥

Chapter : 33 Number : 223

मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता ॥ सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई ॥

Chapter : 33 Number : 223

Doha / दोहा

दो. राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज। पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ॥ २१३ ॥

Chapter : 33 Number : 224

Chaupai / चोपाई

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी ॥ कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई ॥

Chapter : 33 Number : 224

मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू ॥ अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना ॥

Chapter : 33 Number : 224

भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे ॥ दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें ॥

Chapter : 33 Number : 224

सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं ॥ प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही ॥

Chapter : 33 Number : 224

Doha / दोहा

दो. बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह। बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह ॥ २१४ ॥

Chapter : 33 Number : 225

Chaupai / चोपाई

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका ॥ सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी ॥

Chapter : 33 Number : 225

आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना ॥ सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना।

Chapter : 33 Number : 225

असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से ॥ सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें ॥

Chapter : 33 Number : 225

रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी ॥ स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा ॥

Chapter : 33 Number : 225

Doha / दोहा

दो. संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार ॥ तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ॥ २१५ ॥

Chapter : 33 Number : 226

Chaupai / चोपाई

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा ॥ रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी ॥

Chapter : 33 Number : 226

पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें ॥ रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू ॥

Chapter : 33 Number : 226

नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया ॥ लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी ॥

Chapter : 33 Number : 226

राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं ॥ दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला ॥

Chapter : 33 Number : 226

Doha / दोहा

दो. किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात। तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात ॥ २१६ ॥

Chapter : 33 Number : 227

Chaupai / चोपाई

जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ॥ ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू ॥

Chapter : 33 Number : 227

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं ॥ बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ ॥

Chapter : 33 Number : 227

भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता ॥ सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं ॥

Chapter : 33 Number : 227

देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू ॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई ॥

Chapter : 33 Number : 227

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