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ॐ श्री गणेशाय नमः

पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान ॥ १२(ख) ॥
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा ॥ मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा ॥
कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला ॥ लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंघर देख अखारा ॥
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी ॥ मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका ॥
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा ॥ प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना ॥
दो. छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान। सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान ॥ १३(क) ॥
अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग ॥ १३(ख) ॥
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा ॥ सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी ॥
दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई ॥ सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही ॥

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