Ram Charita Manas

Uttara Kanda

Bharat getting married. Conversation between King Bharat-Hanuman, great joy in Ayodhya.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग । जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग ॥

Chapter : 2 Number : 2

Chaupai / चोपाई

सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर । प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर ॥

Chapter : 2 Number : 2

कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ। आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ ॥

Chapter : 2 Number : 2

भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार। जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार ॥

Chapter : 2 Number : 2

रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा ॥ कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ ॥

Chapter : 2 Number : 2

अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी ॥ कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा ॥

Chapter : 2 Number : 2

जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी ॥ जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ॥

Chapter : 2 Number : 2

मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ॥ बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना ॥

Chapter : 2 Number : 2

Doha / दोहा

दो. राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत । बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत ॥ १(क) ॥

Chapter : 2 Number : 3

Chaupai / चोपाई

बैठि देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात। राम राम रघुपति जपत स्त्रवत नयन जलजात ॥ १(ख) ॥

Chapter : 2 Number : 3

देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ ॥ मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी ॥

Chapter : 2 Number : 3

जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती ॥ रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता ॥

Chapter : 2 Number : 3

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत ॥ सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा ॥

Chapter : 2 Number : 3

को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए ॥ मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना ॥

Chapter : 2 Number : 3

दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर ॥ मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता ॥

Chapter : 2 Number : 3

कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते ॥ बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता ॥

Chapter : 2 Number : 3

एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं ॥ नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ॥

Chapter : 2 Number : 3

तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा ॥ कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं ॥

Chapter : 2 Number : 3

Chanda / छन्द

छं. निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर् यो । सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकित तन चरनन्हि पर् यो ॥

Chapter : 2 Number : 4

रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो । काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो ॥

Chapter : 2 Number : 4

Doha / दोहा

दो. राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात । पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ॥ २(क) ॥

Chapter : 2 Number : 5

Sortha / सोरठा

सो. भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं । कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि ॥ २(ख) ॥

Chapter : 2 Number : 5

Chaupai / चोपाई

हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए ॥ पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई ॥

Chapter : 2 Number : 5

सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई ॥ समाचार पुरबासिंह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए ॥

Chapter : 2 Number : 5

दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला ॥ भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी ॥

Chapter : 2 Number : 5

जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं ॥ एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई ॥

Chapter : 2 Number : 5

अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी ॥ बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा ॥

Chapter : 2 Number : 5

Doha / दोहा

दो. हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत । चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत ॥ ३(क) ॥

Chapter : 2 Number : 6

बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान । देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान ॥ ३(ख) ॥

Chapter : 2 Number : 6

राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान । बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान ॥ ३(ग) ॥

Chapter : 2 Number : 6

Chaupai / चोपाई

इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर ॥ सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा ॥

Chapter : 2 Number : 6

जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना ॥ अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ॥

Chapter : 2 Number : 6

जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ॥ जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा ॥

Chapter : 2 Number : 6

अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी ॥ हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी ॥

Chapter : 2 Number : 6

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