Ram Charita Manas

Aranyaka Kanda

Rama Vow to kill demons, receives service and love of Sutikshna's. Conversation and meeting with Agastya.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह ॥ ९ ॥

Chapter : 6 Number : 13

Chaupai / चोपाई

मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना ॥ मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक ॥

Chapter : 6 Number : 13

प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा ॥ हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया ॥

Chapter : 6 Number : 13

सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई ॥ मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं ॥

Chapter : 6 Number : 13

नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा ॥ एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥

Chapter : 6 Number : 13

होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन ॥ निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी ॥

Chapter : 6 Number : 13

दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा ॥ कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई ॥

Chapter : 6 Number : 13

अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई ॥ अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा ॥

Chapter : 6 Number : 13

मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा ॥ तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए ॥

Chapter : 6 Number : 13

मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा ॥ भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा ॥

Chapter : 6 Number : 13

मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें ॥ आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा ॥

Chapter : 6 Number : 13

परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी ॥ भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई ॥

Chapter : 6 Number : 13

मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला ॥ राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा ॥

Chapter : 6 Number : 13

Doha / दोहा

दो. तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार। निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार ॥ १० ॥

Chapter : 6 Number : 14

Chaupai / चोपाई

कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी ॥ महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी ॥

Chapter : 6 Number : 14

श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं ॥ पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं ॥

Chapter : 6 Number : 14

मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः ॥ निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः ॥

Chapter : 6 Number : 14

अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं ॥ हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं ॥

Chapter : 6 Number : 14

संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः ॥ भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः ॥

Chapter : 6 Number : 14

निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं ॥ अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं ॥

Chapter : 6 Number : 14

भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः ॥ अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः ॥

Chapter : 6 Number : 14

अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः ॥ धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः ॥

Chapter : 6 Number : 14

जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी ॥ तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी ॥

Chapter : 6 Number : 14

जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी ॥ जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना।

Chapter : 6 Number : 14

अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे ॥ सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए ॥

Chapter : 6 Number : 14

परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही ॥ मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा ॥

Chapter : 6 Number : 14

तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई ॥ अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना ॥

Chapter : 6 Number : 14

Doha / दोहा

दो. अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम। मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम ॥ ११ ॥

Chapter : 6 Number : 15

Chaupai / चोपाई

एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा ॥ बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ ॥

Chapter : 6 Number : 15

अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं ॥ देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई ॥

Chapter : 6 Number : 15

पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा ॥ तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ ॥

Chapter : 6 Number : 15

नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा ॥ राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही ॥

Chapter : 6 Number : 15

सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए ॥ मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई ॥

Chapter : 6 Number : 15

सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी ॥ पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा ॥

Chapter : 6 Number : 15

जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा ॥

Chapter : 6 Number : 15

Doha / दोहा

दो. मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर। सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर ॥ १२ ॥

Chapter : 6 Number : 16

Chaupai / चोपाई

तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही ॥ तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ ॥

Chapter : 6 Number : 16

अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही ॥ मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी ॥

Chapter : 6 Number : 16

तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी ॥ ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया ॥

Chapter : 6 Number : 16

जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना ॥ ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला ॥

Chapter : 6 Number : 16

ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं ॥ यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता ॥

Chapter : 6 Number : 16

अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा ॥ जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता ॥

Chapter : 6 Number : 16

अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ ॥ संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई ॥

Chapter : 6 Number : 16

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