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ॐ श्री गणेशाय नमः

कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई ॥ बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई ॥
फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी ॥ सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि ॥
दो. बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात। कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात ॥ ६८ ॥
लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी ॥ राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना ॥
तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी ॥ सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा ॥
तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू ॥ सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी ॥
बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही ॥ अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा ॥
दो. सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार। चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार ॥ ६९ ॥

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