Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

Conversation between Shri Ram and Sage Valmiki.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Chaupai / चोपाई

देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए ॥ राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन ॥

Chapter : 21 Number : 129

सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले ॥ खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥

Chapter : 21 Number : 129

Doha / दोहा

दो. सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन। सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन ॥ १२४ ॥

Chapter : 21 Number : 130

Chaupai / चोपाई

मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा ॥ देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने ॥

Chapter : 21 Number : 130

मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए ॥ सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए ॥

Chapter : 21 Number : 130

बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी ॥ तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई ॥

Chapter : 21 Number : 130

तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा ॥ अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी ॥

Chapter : 21 Number : 130

Doha / दोहा

दो. तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ। मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ ॥ १२५ ॥

Chapter : 21 Number : 131

Chaupai / चोपाई

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे ॥ अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई ॥

Chapter : 21 Number : 131

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं ॥ मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू ॥

Chapter : 21 Number : 131

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ ॥ तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला ॥

Chapter : 21 Number : 131

सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी ॥ कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू ॥

Chapter : 21 Number : 131

Chanda / छन्द

छं. श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की ॥ जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी। सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी ॥

Chapter : 21 Number : 132

Sortha / सोरठा

सो. राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर। अबिगत अकथ अपार नेति नित निगम कह ॥ १२६ ॥

Chapter : 21 Number : 133

Chaupai / चोपाई

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे ॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा ॥

Chapter : 21 Number : 133

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन ॥

Chapter : 21 Number : 133

चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी ॥ नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा ॥

Chapter : 21 Number : 133

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ॥ तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा ॥

Chapter : 21 Number : 133

Doha / दोहा

दो. पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ। जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ ॥ १२७ ॥

Chapter : 21 Number : 134

Chaupai / चोपाई

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने ॥ बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी ॥

Chapter : 21 Number : 134

सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता ॥ जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना ॥

Chapter : 21 Number : 134

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे ॥ लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे ॥

Chapter : 21 Number : 134

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी ॥ तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक ॥

Chapter : 21 Number : 134

Doha / दोहा

दो. जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु। मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु ॥ १२८ ॥

Chapter : 21 Number : 135

Chaupai / चोपाई

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा ॥ तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं ॥

Chapter : 21 Number : 135

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी ॥ कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा ॥

Chapter : 21 Number : 135

चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥ मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा ॥

Chapter : 21 Number : 135

तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना ॥ तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी ॥

Chapter : 21 Number : 135

Doha / दोहा

दो. सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ ॥ १२९ ॥

Chapter : 21 Number : 136

Chaupai / चोपाई

काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥ जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ॥

Chapter : 21 Number : 136

सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी ॥ कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी ॥

Chapter : 21 Number : 136

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥ जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी ॥

Chapter : 21 Number : 136

जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी ॥ जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ॥

Chapter : 21 Number : 136

Doha / दोहा

दो. स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात। मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात ॥ १३० ॥

Chapter : 21 Number : 137

Chaupai / चोपाई

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं ॥ नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका ॥

Chapter : 21 Number : 137

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा ॥ राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही ॥

Chapter : 21 Number : 137

जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई ॥ सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई ॥

Chapter : 21 Number : 137

सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना ॥ करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा ॥

Chapter : 21 Number : 137

Doha / दोहा

दो. जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ॥ १३१ ॥

Chapter : 21 Number : 138

Chaupai / चोपाई

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए ॥ कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक ॥

Chapter : 21 Number : 138

चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ॥ सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू ॥

Chapter : 21 Number : 138

नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी ॥ सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि ॥

Chapter : 21 Number : 138

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं ॥ चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू ॥

Chapter : 21 Number : 138

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