Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

Conversation between King Bharata and Queen Kausalya and Dashrathji's funeral procession.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार ॥ १६३ ॥

Chapter : 27 Number : 171

Chaupai / चोपाई

भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई ॥ देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी ॥

Chapter : 27 Number : 171

मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई ॥ कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा ॥

Chapter : 27 Number : 171

कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही ॥ को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी ॥

Chapter : 27 Number : 171

पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु ॥ धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी ॥

Chapter : 27 Number : 171

Doha / दोहा

दो. मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि ॥ लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि ॥ १६४ ॥

Chapter : 27 Number : 172

Chaupai / चोपाई

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए ॥ भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई ॥

Chapter : 27 Number : 172

देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई ॥ माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे ॥

Chapter : 27 Number : 172

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥ जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि ॥

Chapter : 27 Number : 172

काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता ॥ जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ॥

Chapter : 27 Number : 172

Doha / दोहा

दो. पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर। बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। १६५ ॥

Chapter : 27 Number : 173

Chaupai / चोपाई

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू ॥ चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी ॥

Chapter : 27 Number : 173

सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा ॥ तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई ॥

Chapter : 27 Number : 173

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए ॥ यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें ॥

Chapter : 27 Number : 173

मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी ॥ जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना ॥

Chapter : 27 Number : 173

Doha / दोहा

दो. कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास। ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु ॥ १६६ ॥

Chapter : 27 Number : 174

Chaupai / चोपाई

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई ॥ भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए ॥

Chapter : 27 Number : 174

भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं ॥ छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी ॥

Chapter : 27 Number : 174

जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें ॥ जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें ॥

Chapter : 27 Number : 174

जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं ॥ ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता ॥

Chapter : 27 Number : 174

Doha / दोहा

दो. जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर। तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर ॥ १६७ ॥

Chapter : 27 Number : 175

Chaupai / चोपाई

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥ कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी ॥

Chapter : 27 Number : 175

लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा ॥ पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा ॥

Chapter : 27 Number : 175

जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे ॥ जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई ॥

Chapter : 27 Number : 175

तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं ॥ तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ ॥

Chapter : 27 Number : 175

Doha / दोहा

दो. मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ ॥ १६८ ॥

Chapter : 27 Number : 176

Chaupai / चोपाई

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे ॥ बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी ॥

Chapter : 27 Number : 176

भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू ॥ मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं ॥

Chapter : 27 Number : 176

अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए ॥ करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती ॥

Chapter : 27 Number : 176

बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए ॥ मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे ॥

Chapter : 27 Number : 176

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