Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

Conversation between sage Vashishtha and Bharat, preparations to go to Chitrakoot to bring Shri Rama.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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संस्कृत्म
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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु ॥ १६९ ॥

Chapter : 28 Number : 177

Chaupai / चोपाई

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा ॥ गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी ॥

Chapter : 28 Number : 177

चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए ॥ सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई ॥

Chapter : 28 Number : 177

एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही ॥ सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना ॥

Chapter : 28 Number : 177

जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा ॥ भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना ॥

Chapter : 28 Number : 177

Doha / दोहा

दो. सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम। दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम ॥ १७० ॥

Chapter : 28 Number : 178

Chaupai / चोपाई

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी ॥ सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए ॥

Chapter : 28 Number : 178

बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई ॥ भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे ॥

Chapter : 28 Number : 178

प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी ॥ भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा ॥

Chapter : 28 Number : 178

कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ ॥ बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी ॥

Chapter : 28 Number : 178

Doha / दोहा

दो. सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ॥ १७१ ॥

Chapter : 28 Number : 180

Chaupai / चोपाई

अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू ॥ तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं ॥

Chapter : 28 Number : 180

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना ॥ सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ॥

Chapter : 28 Number : 180

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ॥ सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ॥

Chapter : 28 Number : 180

सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥ सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ॥

Chapter : 28 Number : 180

Doha / दोहा

दो. सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग ॥ १७२ ॥

Chapter : 28 Number : 181

Chaupai / चोपाई

बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ॥

Chapter : 28 Number : 181

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी ॥ सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ॥

Chapter : 28 Number : 181

सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥ भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥

Chapter : 28 Number : 181

बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ॥

Chapter : 28 Number : 181

Doha / दोहा

दो. कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु। राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥ १७३ ॥

Chapter : 28 Number : 182

Chaupai / चोपाई

सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ॥ यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू ॥

Chapter : 28 Number : 182

राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा ॥ तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी ॥

Chapter : 28 Number : 182

नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना ॥ करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ॥

Chapter : 28 Number : 182

परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी ॥ तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ॥

Chapter : 28 Number : 182

Doha / दोहा

दो. अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥ १७४ ॥

Chapter : 28 Number : 183

Chaupai / चोपाई

अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ॥ सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू ॥

Chapter : 28 Number : 183

बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥ करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी ॥

Chapter : 28 Number : 183

सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं ॥ कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ॥

Chapter : 28 Number : 183

परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ॥ सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ॥

Chapter : 28 Number : 183

Doha / दोहा

दो. कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ॥ १७५ ॥

Chapter : 28 Number : 184

Chaupai / चोपाई

कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई ॥ सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी ॥

Chapter : 28 Number : 184

बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ॥ परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा ॥

Chapter : 28 Number : 184

लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई ॥ सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ॥

Chapter : 28 Number : 184

गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ॥ सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी ॥

Chapter : 28 Number : 184

Chanda / छन्द

छं. सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए। लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए ॥ सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की ॥

Chapter : 28 Number : 185

Sortha / सोरठा

सो. भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि। बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि ॥ १७६ ॥

Chapter : 28 Number : 186

Chaupai / चोपाई

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का ॥ मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा ॥

Chapter : 28 Number : 186

गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ॥ उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू ॥

Chapter : 28 Number : 186

तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई ॥ जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें ॥

Chapter : 28 Number : 186

अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू ॥ ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू ॥

Chapter : 28 Number : 186

Doha / दोहा

दो. पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु ॥ १७७ ॥

Chapter : 28 Number : 187

Chaupai / चोपाई

हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई ॥ मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं ॥

Chapter : 28 Number : 187

सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें ॥ बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू ॥

Chapter : 28 Number : 187

सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ॥ जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई ॥

Chapter : 28 Number : 187

जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू ॥ मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥

Chapter : 28 Number : 187

Doha / दोहा

दो. कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज ॥ १७८ ॥

Chapter : 28 Number : 188

Chaupai / चोपाई

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू ॥ मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥

Chapter : 28 Number : 188

मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू ॥ रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा ॥

Chapter : 28 Number : 188

मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू ॥ बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू ॥

Chapter : 28 Number : 188

राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे ॥ कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई ॥

Chapter : 28 Number : 188

Doha / दोहा

दो. कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥ १७९ ॥

Chapter : 28 Number : 189

Chaupai / चोपाई

कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे ॥ जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे ॥

Chapter : 28 Number : 189

लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा ॥ लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू ॥

Chapter : 28 Number : 189

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू ॥ एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका ॥

Chapter : 28 Number : 189

कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं ॥ मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई ॥

Chapter : 28 Number : 189

Doha / दोहा

दो. ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ॥ १८० ॥

Chapter : 28 Number : 190

Chaupai / चोपाई

कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई ॥ दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई ॥

Chapter : 28 Number : 190

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका ॥ उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही ॥

Chapter : 28 Number : 190

मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई ॥ मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं ॥

Chapter : 28 Number : 190

परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू ॥ संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू ॥

Chapter : 28 Number : 190

Doha / दोहा

दो. राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ॥ १८१।

Chapter : 28 Number : 191

Chaupai / चोपाई

गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना ॥ मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ ॥

Chapter : 28 Number : 191

परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं ॥ सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी ॥

Chapter : 28 Number : 191

डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू ॥ एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी ॥

Chapter : 28 Number : 191

जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा ॥ मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी ॥

Chapter : 28 Number : 191

Doha / दोहा

दो. आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ। देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ ॥ १८२ ॥

Chapter : 28 Number : 192

Chaupai / चोपाई

आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा ॥ एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं ॥

Chapter : 28 Number : 192

जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी ॥ तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी ॥

Chapter : 28 Number : 192

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ ॥ अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा ॥

Chapter : 28 Number : 192

तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी ॥ जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी ॥

Chapter : 28 Number : 192

Doha / दोहा

दो. जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस। आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस ॥ १८३ ॥

Chapter : 28 Number : 193

Chaupai / चोपाई

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे ॥ लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे ॥

Chapter : 28 Number : 193

मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी ॥ भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही ॥

Chapter : 28 Number : 193

तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू ॥ जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई ॥

Chapter : 28 Number : 193

सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता ॥ अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई ॥

Chapter : 28 Number : 193

Doha / दोहा

दो. अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ॥ १८४ ॥

Chapter : 28 Number : 194

Chaupai / चोपाई

भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा ॥ चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के ॥

Chapter : 28 Number : 194

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई ॥ धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं ॥

Chapter : 28 Number : 194

कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू ॥ जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी ॥

Chapter : 28 Number : 194

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू ॥

Chapter : 28 Number : 194

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