Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

Bharatji's visit to Prayag and conversation between Bharat and Bhardwaja.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग ॥ २०३ ॥

Chapter : 32 Number : 214

Chaupai / चोपाई

झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें ॥ भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू ॥

Chapter : 32 Number : 214

खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए ॥ सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने ॥

Chapter : 32 Number : 214

देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे ॥ सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ ॥

Chapter : 32 Number : 214

मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू ॥ अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी ॥

Chapter : 32 Number : 214

Doha / दोहा

दो. अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ॥ २०४ ॥

Chapter : 32 Number : 215

Chaupai / चोपाई

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ॥ सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें ॥

Chapter : 32 Number : 215

जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ ॥ चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई ॥

Chapter : 32 Number : 215

कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें ॥ भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी ॥

Chapter : 32 Number : 215

तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू ॥ बाद गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं ॥

Chapter : 32 Number : 215

Doha / दोहा

दो. तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल। भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल ॥ २०५ ॥

Chapter : 32 Number : 216

Chaupai / चोपाई

प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी ॥ कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा ॥

Chapter : 32 Number : 216

सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए ॥ दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे ॥

Chapter : 32 Number : 216

धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे ॥ आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे ॥

Chapter : 32 Number : 216

मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू ॥ सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई ॥

Chapter : 32 Number : 216

Doha / दोहा

दो. तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति। तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति ॥ २०६ ॥

Chapter : 32 Number : 217

Chaupai / चोपाई

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ ॥ तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई ॥

Chapter : 32 Number : 217

लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई ॥ राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई ॥

Chapter : 32 Number : 217

राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला ॥ सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी ॥

Chapter : 32 Number : 217

तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू ॥ करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू ॥

Chapter : 32 Number : 217

Doha / दोहा

दो. अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु। सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु ॥ २०७ ॥

Chapter : 32 Number : 218

Chaupai / चोपाई

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना ॥ यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता ॥

Chapter : 32 Number : 218

सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं ॥ लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती ॥

Chapter : 32 Number : 218

जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा ॥ तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें ॥

Chapter : 32 Number : 218

यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई ॥ तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू ॥

Chapter : 32 Number : 218

Doha / दोहा

दो. तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु। राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु ॥ २०८ ॥

Chapter : 32 Number : 219

Chaupai / चोपाई

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा ॥ उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना ॥

Chapter : 32 Number : 219

कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही ॥ निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू ॥

Chapter : 32 Number : 219

पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा ॥ राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ॥

Chapter : 32 Number : 219

भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी ॥ दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं ॥

Chapter : 32 Number : 219

Doha / दोहा

दो. जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ ॥ जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ ॥ २०९ ॥

Chapter : 32 Number : 220

Chaupai / चोपाई

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा ॥ तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ ॥ ॥

Chapter : 32 Number : 220

सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं ॥ सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा ॥

Chapter : 32 Number : 220

तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा ॥ भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ ॥

Chapter : 32 Number : 220

सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥ धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा ॥

Chapter : 32 Number : 220

Doha / दोहा

दो. पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन। करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन ॥ २१० ॥

Chapter : 32 Number : 221

Chaupai / चोपाई

मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू ॥ एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई ॥

Chapter : 32 Number : 221

तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ ॥ मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू ॥

Chapter : 32 Number : 221

नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू ॥ सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए ॥

Chapter : 32 Number : 221

राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू ॥ राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही ॥

Chapter : 32 Number : 221

Doha / दोहा

दो. अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात। बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात ॥ २११ ॥

Chapter : 32 Number : 222

Chaupai / चोपाई

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती ॥ एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं ॥

Chapter : 32 Number : 222

मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला ॥ कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु ॥

Chapter : 32 Number : 222

मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा ॥ मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ ॥

Chapter : 32 Number : 222

भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई ॥ तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी ॥

Chapter : 32 Number : 222

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