Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

Conversation between Shri Rama and Bharat.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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संस्कृत्म
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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत ॥ २९६ ॥

Chapter : 46 Number : 310

Chaupai / चोपाई

सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी ॥ कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा ॥

Chapter : 46 Number : 310

सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी ॥ भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला ॥

Chapter : 46 Number : 310

करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे ॥ छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ॥

Chapter : 46 Number : 310

हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई ॥ बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली ॥

Chapter : 46 Number : 310

Doha / दोहा

दो. निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु। करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु ॥ २९७ ॥

Chapter : 46 Number : 311

Chaupai / चोपाई

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी ॥ सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ॥

Chapter : 46 Number : 311

समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी ॥ स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई ॥

Chapter : 46 Number : 311

प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली ॥ जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू ॥

Chapter : 46 Number : 311

राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥ सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई ॥

Chapter : 46 Number : 311

Doha / दोहा

दो. कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर। दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर ॥ २९८ ॥

Chapter : 46 Number : 312

Chaupai / चोपाई

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई ॥ कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी ॥

Chapter : 46 Number : 312

तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए ॥ देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने ॥

Chapter : 46 Number : 312

को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी ॥ निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें ॥

Chapter : 46 Number : 312

सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी ॥ पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना ॥

Chapter : 46 Number : 312

Doha / दोहा

दो. यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर ॥ २९९ ॥

Chapter : 46 Number : 313

Chaupai / चोपाई

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ ॥ तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा ॥

Chapter : 46 Number : 313

देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥ बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू ॥

Chapter : 46 Number : 313

कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई ॥ राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं ॥

Chapter : 46 Number : 313

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥ अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी ॥

Chapter : 46 Number : 313

Doha / दोहा

दो. सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि। आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि ॥ ३०० ॥

Chapter : 46 Number : 314

Chaupai / चोपाई

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई ॥ सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की ॥

Chapter : 46 Number : 314

सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥ अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा ॥

Chapter : 46 Number : 314

अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी ॥ प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई ॥

Chapter : 46 Number : 314

कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी ॥ भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ ॥

Chapter : 46 Number : 314

Chanda / छन्द

छं. रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी। मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी ॥ भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से। तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से ॥

Chapter : 46 Number : 315

Sortha / सोरठा

सो. देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब। मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत ॥ ३०१ ॥

Chapter : 46 Number : 316

Chaupai / चोपाई

कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू ॥ काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ॥

Chapter : 46 Number : 316

प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला ॥ सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे ॥

Chapter : 46 Number : 316

भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं ॥ दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी ॥

Chapter : 46 Number : 316

दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं ॥ लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू ॥

Chapter : 46 Number : 316

Doha / दोहा

दो. भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ। लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ ॥ ३०२ ॥

Chapter : 46 Number : 317

Chaupai / चोपाई

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे ॥ सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री ॥

Chapter : 46 Number : 317

रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से ॥ भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई ॥

Chapter : 46 Number : 317

जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू ॥ महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी ॥

Chapter : 46 Number : 317

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी ॥ कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई ॥

Chapter : 46 Number : 317

Doha / दोहा

दो. भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि। उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि ॥ ३०३ ॥

Chapter : 46 Number : 318

Chaupai / चोपाई

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ ॥ कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को ॥

Chapter : 46 Number : 318

सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को ॥ देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की ॥

Chapter : 46 Number : 318

धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर ॥ देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू ॥

Chapter : 46 Number : 318

बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से ॥ तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ॥

Chapter : 46 Number : 318

Doha / दोहा

दो. करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात। गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात ॥ ३०४ ॥

Chapter : 46 Number : 319

Chaupai / चोपाई

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती ॥ समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की ॥

Chapter : 46 Number : 319

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू ॥ मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा ॥

Chapter : 46 Number : 319

तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी ॥ नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू ॥

Chapter : 46 Number : 319

जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू ॥ तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा ॥

Chapter : 46 Number : 319

Doha / दोहा

दो. राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम ॥ ३०५ ॥

Chapter : 46 Number : 320

Chaupai / चोपाई

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा ॥ मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू ॥

Chapter : 46 Number : 320

सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू ॥ साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी ॥

Chapter : 46 Number : 320

सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी ॥ बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई ॥

Chapter : 46 Number : 320

जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा ॥ होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए ॥

Chapter : 46 Number : 320

Doha / दोहा

दो. सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥ ३०६ ॥

Chapter : 46 Number : 321

Chaupai / चोपाई

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी ॥ सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी ॥

Chapter : 46 Number : 321

भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू ॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू ॥

Chapter : 46 Number : 321

कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी ॥ नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को ॥

Chapter : 46 Number : 321

अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई ॥ सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई ॥

Chapter : 46 Number : 321

Doha / दोहा

दो. देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ ॥ ३०७ ॥

Chapter : 46 Number : 322

Chaupai / चोपाई

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं ॥ कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई ॥

Chapter : 46 Number : 322

चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन ॥ प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी ॥

Chapter : 46 Number : 322

अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू ॥ मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता ॥

Chapter : 46 Number : 322

रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं ॥ सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा ॥

Chapter : 46 Number : 322

Doha / दोहा

दो. भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल ॥ ३०८ ॥

Chapter : 46 Number : 323

Chaupai / चोपाई

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई। मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू ॥

Chapter : 46 Number : 323

भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू ॥ सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन ॥

Chapter : 46 Number : 323

मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे ॥ सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू ॥

Chapter : 46 Number : 323

राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी ॥ एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई ॥

Chapter : 46 Number : 323

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