Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

Conversation between Shri Ram and Kekeyi

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Chaupai / चोपाई

करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ ॥ तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी ॥

Chapter : 6 Number : 42

मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन ॥ सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू ॥

Chapter : 6 Number : 42

देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना।सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू ॥

Chapter : 6 Number : 42

Doha / दोहा

दो. सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु। सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु ॥ ४० ॥

Chapter : 6 Number : 43

Chaupai / चोपाई

निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी ॥ जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना ॥

Chapter : 6 Number : 43

जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू ॥ सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई ॥

Chapter : 6 Number : 43

मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू ॥ बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन ॥

Chapter : 6 Number : 43

सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥ तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥

Chapter : 6 Number : 43

Doha / दोहा

दो. मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर। तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर ॥ ४१ ॥

Chapter : 6 Number : 44

Chaupai / चोपाई

भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा ॥

Chapter : 6 Number : 44

सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी ॥ तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं ॥

Chapter : 6 Number : 44

अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी ॥ थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी ॥

Chapter : 6 Number : 44

राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू ॥ जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ ॥

Chapter : 6 Number : 44

Doha / दोहा

दो. सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान ॥ ४२ ॥

Chapter : 6 Number : 45

Chaupai / चोपाई

रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई ॥ सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना ॥

Chapter : 6 Number : 45

तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता ॥ राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू ॥

Chapter : 6 Number : 45

पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई ॥ तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे ॥

Chapter : 6 Number : 45

लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे ॥ रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए ॥

Chapter : 6 Number : 45

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