Ram Charita Manas

Ayodhya-Kanda

Conversation between Shri Ram and his mother Queen Kausalya

ॐ श्री परमात्मने नमः


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संस्कृत्म
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ॐ श्री गणेशाय नमः

Chaupai / चोपाई

अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाई ॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ ॥

Chapter : 8 Number : 54

Doha / दोहा

दो. नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान। छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान ॥ ५१ ॥

Chapter : 8 Number : 55

Chaupai / चोपाई

रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा ॥ दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे ॥

Chapter : 8 Number : 55

बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता ॥ गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए ॥

Chapter : 8 Number : 55

प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई ॥ सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी ॥

Chapter : 8 Number : 55

कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी ॥ सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई ॥

Chapter : 8 Number : 55

Doha / दोहा

दो. जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति। जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति ॥ ५२ ॥

Chapter : 8 Number : 56

Chaupai / चोपाई

तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू ॥ पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ ॥

Chapter : 8 Number : 56

मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला ॥ सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला ॥

Chapter : 8 Number : 56

धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी ॥ पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू ॥

Chapter : 8 Number : 56

आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता ॥ जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें ॥

Chapter : 8 Number : 56

Doha / दोहा

दो. बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान। आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान ॥ ५३ ॥

Chapter : 8 Number : 57

Chaupai / चोपाई

बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके ॥ सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी ॥

Chapter : 8 Number : 57

कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू ॥ नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी ॥

Chapter : 8 Number : 57

धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी ॥ तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे ॥

Chapter : 8 Number : 57

राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा ॥ तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू ॥

Chapter : 8 Number : 57

Doha / दोहा

दो. निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ। सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ ॥ ५४ ॥

Chapter : 8 Number : 58

Chaupai / चोपाई

राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू ॥ लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू ॥

Chapter : 8 Number : 58

धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी ॥ राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू ॥

Chapter : 8 Number : 58

कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी ॥ बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी ॥

Chapter : 8 Number : 58

सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी ॥ तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका ॥

Chapter : 8 Number : 58

Doha / दोहा

दो. राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु। तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु ॥ ५५ ॥

Chapter : 8 Number : 59

Chaupai / चोपाई

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता ॥ जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौं कानन सत अवध समाना ॥

Chapter : 8 Number : 59

पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी ॥ अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू ॥

Chapter : 8 Number : 59

बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी ॥ जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू ॥

Chapter : 8 Number : 59

पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के ॥ ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ ॥

Chapter : 8 Number : 59

Doha / दोहा

दो. यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ। मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ ॥ ५६ ॥

Chapter : 8 Number : 60

Chaupai / चोपाई

देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई ॥ अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना ॥

Chapter : 8 Number : 60

अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई ॥ जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ ॥

Chapter : 8 Number : 60

सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता ॥ बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी ॥

Chapter : 8 Number : 60

दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा ॥ राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई ॥

Chapter : 8 Number : 60

Doha / दोहा

दो. समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ। जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ ॥ ५७ ॥

Chapter : 8 Number : 61

Chaupai / चोपाई

दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी ॥ बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता ॥

Chapter : 8 Number : 61

चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू ॥ की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना ॥

Chapter : 8 Number : 61

चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी ॥ मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं ॥

Chapter : 8 Number : 61

मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी ॥ तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी ॥

Chapter : 8 Number : 61

Doha / दोहा

दो. पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु ॥ ५८ ॥

Chapter : 8 Number : 62

Chaupai / चोपाई

मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई ॥ नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई ॥

Chapter : 8 Number : 62

कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली ॥ फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा ॥

Chapter : 8 Number : 62

पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा ॥ जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ ॥

Chapter : 8 Number : 62

सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा।चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी ॥

Chapter : 8 Number : 62

Doha / दोहा

दो. करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि। बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि ॥ ५९ ॥

Chapter : 8 Number : 63

Chaupai / चोपाई

बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी ॥ पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ ॥

Chapter : 8 Number : 63

कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू ॥ सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती ॥

Chapter : 8 Number : 63

सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी ॥ अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई ॥

Chapter : 8 Number : 63

जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा ॥ सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी ॥

Chapter : 8 Number : 63

Doha / दोहा

दो. कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष। लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष ॥ ६० ॥

Chapter : 8 Number : 64

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