Ram Charita Manas

Kishkinda Kanda

Sugriva narrating his story of how he lost his kingdom, Rama vows to kill Bali, characterization of a friend by Shri Rama.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ ॥ पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ ॥ ४ ॥

Chapter : 3 Number : 6

Chaupai / चोपाई

कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा ॥ कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी ॥

Chapter : 3 Number : 6

मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा ॥ गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता ॥

Chapter : 3 Number : 6

राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी ॥ मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा ॥

Chapter : 3 Number : 6

कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा ॥ सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई ॥

Chapter : 3 Number : 6

Doha / दोहा

दो. सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव। कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ॥ ५ ॥

Chapter : 3 Number : 7

Chaupai / चोपाई

नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई ॥ मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ ॥

Chapter : 3 Number : 7

अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा ॥ धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा ॥

Chapter : 3 Number : 7

गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई ॥ परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा ॥

Chapter : 3 Number : 7

मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी ॥ बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई ॥

Chapter : 3 Number : 7

मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई ॥ बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा ॥

Chapter : 3 Number : 7

रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी ॥ ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला ॥

Chapter : 3 Number : 7

इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीँ ॥ सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला ॥

Chapter : 3 Number : 7

Doha / दोहा

दो. सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान। ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान ॥ ६ ॥

Chapter : 3 Number : 8

Chaupai / चोपाई

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना ॥

Chapter : 3 Number : 8

जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई ॥ कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा ॥

Chapter : 3 Number : 8

देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई ॥ बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ॥

Chapter : 3 Number : 8

आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई ॥ जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई ॥

Chapter : 3 Number : 8

सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी ॥ सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें ॥

Chapter : 3 Number : 8

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