Ram Charita Manas

Lanka-Kanda

Ravana awakening Kumbhakarna, Kumbhakarna advising Ravana and dialogue between Vibhishana and Kumbhakarna.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Chaupai / चोपाई

यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ॥ ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा ॥

Chapter : 17 Number : 65

जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥ कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई ॥

Chapter : 17 Number : 65

कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥ तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महामहा जोधा संघारे ॥

Chapter : 17 Number : 65

दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी ॥ अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा ॥

Chapter : 17 Number : 65

Sortha/ सोरठा

दो. सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान। जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥ ६२ ॥

Chapter : 17 Number : 66

Chaupai / चोपाई

भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥ अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजहु राम होइहि कल्याना ॥

Chapter : 17 Number : 66

हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक ॥ अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥

Chapter : 17 Number : 66

कीन्हेहु प्रभू बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक ॥ नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबहा ॥

Chapter : 17 Number : 66

अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई। लोचन सूफल करौ मैं जाई ॥ स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥

Chapter : 17 Number : 66

Doha/ दोहा

दो. राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक। रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥ ६३ ॥

Chapter : 17 Number : 67

Chaupai / चोपाई

महिष खाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्राघात समाना ॥ कुंभकरन दुर्मद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा ॥

Chapter : 17 Number : 67

देखि बिभीषनु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ ॥ अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो ॥

Chapter : 17 Number : 67

तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा ॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥

Chapter : 17 Number : 67

सुनु सुत भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन ॥ धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन। भयहु तात निसिचर कुल भूषन ॥

Chapter : 17 Number : 67

बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेहु राम सोभा सुख सागर ॥

Chapter : 17 Number : 67

Doha/ दोहा

दो. बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर। जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर। ६४ ॥

Chapter : 17 Number : 68

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