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ॐ श्री गणेशाय नमः

दो. कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ । नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ ॥ ३४ ॥
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा । गरजहिं भालु महाबल कीसा ॥ देखी राम सकल कपि सेना । चितइ कृपा करि राजिव नैना ॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा । भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ॥ हरषि राम तब कीन्ह पयाना । सगुन भए सुंदर सुभ नाना ॥
जासु सकल मंगलमय कीती । तासु पयान सगुन यह नीती ॥ प्रभु पयान जाना बैदेहीं । फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं ॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई । असगुन भयउ रावनहि सोई ॥ चला कटकु को बरनैं पारा । गर्जहि बानर भालु अपारा ॥
नख आयुध गिरि पादपधारी । चले गगन महि इच्छाचारी ॥ केहरिनाद भालु कपि करहीं । डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ॥
छं. चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे । मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे ॥ कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं । जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ॥ १ ॥
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई । गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई ॥ रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी । जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ॥ २ ॥
दो. एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर । जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ॥ ३५ ॥

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