Ram Charita Manas

Sundara-Kanda

Vibhishana seeks the embrace of shri rama who accepts him in his army.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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संस्कृत्म
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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि । मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ॥ ४१ ॥

Chapter : 16 Number : 44

Chaupai / चोपाई

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं । आयूहीन भए सब तबहीं ॥ साधु अवग्या तुरत भवानी । कर कल्यान अखिल कै हानी ॥

Chapter : 16 Number : 44

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा । भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा ॥ चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं । करत मनोरथ बहु मन माहीं ॥

Chapter : 16 Number : 44

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता । अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ॥ जे पद परसि तरी रिषिनारी । दंडक कानन पावनकारी ॥

Chapter : 16 Number : 44

जे पद जनकसुताँ उर लाए । कपट कुरंग संग धर धाए ॥ हर उर सर सरोज पद जेई । अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई ॥

Chapter : 16 Number : 44

Doha / दोहा

दो. जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ । ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ॥ ४२ ॥

Chapter : 16 Number : 45

Chaupai / चोपाई

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा । आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा ॥ कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा । जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा ॥

Chapter : 16 Number : 45

ताहि राखि कपीस पहिं आए । समाचार सब ताहि सुनाए ॥ कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । आवा मिलन दसानन भाई ॥

Chapter : 16 Number : 45

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा । कहइ कपीस सुनहु नरनाहा ॥ जानि न जाइ निसाचर माया । कामरूप केहि कारन आया ॥

Chapter : 16 Number : 45

भेद हमार लेन सठ आवा । राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ॥ सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी । मम पन सरनागत भयहारी ॥

Chapter : 16 Number : 45

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना । सरनागत बच्छल भगवाना ॥

Chapter : 16 Number : 45

Doha / दोहा

दो. सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि । ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥ ४३ ॥

Chapter : 16 Number : 46

Chaupai / चोपाई

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू । आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ॥ सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥

Chapter : 16 Number : 46

पापवंत कर सहज सुभाऊ । भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ॥ जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई । मोरें सनमुख आव कि सोई ॥

Chapter : 16 Number : 46

निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥ भेद लेन पठवा दससीसा । तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ॥

Chapter : 16 Number : 46

जग महुँ सखा निसाचर जेते । लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते ॥ जौं सभीत आवा सरनाई । रखिहउँ ताहि प्रान की नाई ॥

Chapter : 16 Number : 46

Doha / दोहा

दो. उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत । जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत ॥ ४४ ॥

Chapter : 16 Number : 47

Chaupai / चोपाई

सादर तेहि आगें करि बानर । चले जहाँ रघुपति करुनाकर ॥ दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता । नयनानंद दान के दाता ॥

Chapter : 16 Number : 47

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी । रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ॥ भुज प्रलंब कंजारुन लोचन । स्यामल गात प्रनत भय मोचन ॥

Chapter : 16 Number : 47

सिंघ कंध आयत उर सोहा । आनन अमित मदन मन मोहा ॥ नयन नीर पुलकित अति गाता । मन धरि धीर कही मृदु बाता ॥

Chapter : 16 Number : 47

नाथ दसानन कर मैं भ्राता । निसिचर बंस जनम सुरत्राता ॥ सहज पापप्रिय तामस देहा । जथा उलूकहि तम पर नेहा ॥

Chapter : 16 Number : 47

Doha / दोहा

दो. श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर । त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ॥ ४५ ॥

Chapter : 16 Number : 48

Chaupai / चोपाई

अस कहि करत दंडवत देखा । तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा ॥ दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा । भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ॥

Chapter : 16 Number : 48

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी । बोले बचन भगत भयहारी ॥ कहु लंकेस सहित परिवारा । कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ॥

Chapter : 16 Number : 48

खल मंडलीं बसहु दिनु राती । सखा धरम निबहइ केहि भाँती ॥ मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती । अति नय निपुन न भाव अनीती ॥

Chapter : 16 Number : 48

बरु भल बास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥ अब पद देखि कुसल रघुराया । जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया ॥

Chapter : 16 Number : 48

Doha / दोहा

दो. तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम । जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ॥ ४६ ॥

Chapter : 16 Number : 49

Chaupai / चोपाई

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना । लोभ मोह मच्छर मद माना ॥ जब लगि उर न बसत रघुनाथा । धरें चाप सायक कटि भाथा ॥

Chapter : 16 Number : 49

ममता तरुन तमी अँधिआरी । राग द्वेष उलूक सुखकारी ॥ तब लगि बसति जीव मन माहीं । जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं ॥

Chapter : 16 Number : 49

अब मैं कुसल मिटे भय भारे । देखि राम पद कमल तुम्हारे ॥ तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला । ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ॥

Chapter : 16 Number : 49

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ । सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ ॥ जासु रूप मुनि ध्यान न आवा । तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ॥

Chapter : 16 Number : 49

Doha / दोहा

दो. -अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज । देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज ॥ ४७ ॥

Chapter : 16 Number : 50

Chaupai / चोपाई

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ । जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ ॥ जौं नर होइ चराचर द्रोही । आवे सभय सरन तकि मोही ॥

Chapter : 16 Number : 50

तजि मद मोह कपट छल नाना । करउँ सद्य तेहि साधु समाना ॥ जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा ॥

Chapter : 16 Number : 50

सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥ समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ॥

Chapter : 16 Number : 50

अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें ॥ तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें । धरउँ देह नहिं आन निहोरें ॥

Chapter : 16 Number : 50

Doha / दोहा

दो. सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम । ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ॥ ४८ ॥

Chapter : 16 Number : 51

Chaupai / चोपाई

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें । तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें ॥ राम बचन सुनि बानर जूथा । सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ॥

Chapter : 16 Number : 51

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी । नहिं अघात श्रवनामृत जानी ॥ पद अंबुज गहि बारहिं बारा । हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ॥

Chapter : 16 Number : 51

सुनहु देव सचराचर स्वामी । प्रनतपाल उर अंतरजामी ॥ उर कछु प्रथम बासना रही । प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥

Chapter : 16 Number : 51

अब कृपाल निज भगति पावनी । देहु सदा सिव मन भावनी ॥ एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा । मागा तुरत सिंधु कर नीरा ॥

Chapter : 16 Number : 51

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं । मोर दरसु अमोघ जग माहीं ॥ अस कहि राम तिलक तेहि सारा । सुमन बृष्टि नभ भई अपारा ॥

Chapter : 16 Number : 51

Doha / दोहा

दो. रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड । जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड ॥ ४९(क) ॥

Chapter : 16 Number : 52

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ । सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ ॥ ४९(ख) ॥

Chapter : 16 Number : 52

Chaupai / चोपाई

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना । ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ॥ निज जन जानि ताहि अपनावा । प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ॥

Chapter : 16 Number : 52

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी । सर्बरूप सब रहित उदासी ॥ बोले बचन नीति प्रतिपालक । कारन मनुज दनुज कुल घालक ॥

Chapter : 16 Number : 52

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