Ram Charita Manas

Sundara-Kanda

Shri Rama thinks about how to cross the might sea. Ravana's messenger Shuk comes to shri rama camp to discuss and takes back his message.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Chaupai / चोपाई

सुनु कपीस लंकापति बीरा । केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा ॥ संकुल मकर उरग झष जाती । अति अगाध दुस्तर सब भाँती ॥

Chapter : 17 Number : 52

कह लंकेस सुनहु रघुनायक । कोटि सिंधु सोषक तव सायक ॥ जद्यपि तदपि नीति असि गाई । बिनय करिअ सागर सन जाई ॥

Chapter : 17 Number : 52

Doha / दोहा

दो. प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि । बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ॥ ५० ॥

Chapter : 17 Number : 53

Chaupai / चोपाई

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई । करिअ दैव जौं होइ सहाई ॥ मंत्र न यह लछिमन मन भावा । राम बचन सुनि अति दुख पावा ॥

Chapter : 17 Number : 53

नाथ दैव कर कवन भरोसा । सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा ॥ कादर मन कहुँ एक अधारा । दैव दैव आलसी पुकारा ॥

Chapter : 17 Number : 53

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा । ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा ॥ अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई । सिंधु समीप गए रघुराई ॥

Chapter : 17 Number : 53

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई । बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ॥ जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए । पाछें रावन दूत पठाए ॥

Chapter : 17 Number : 53

Doha / दोहा

दो. सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह । प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ॥ ५१ ॥

Chapter : 17 Number : 54

Chaupai / चोपाई

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ । अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ ॥ रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने । सकल बाँधि कपीस पहिं आने ॥

Chapter : 17 Number : 54

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर । अंग भंग करि पठवहु निसिचर ॥ सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए । बाँधि कटक चहु पास फिराए ॥

Chapter : 17 Number : 54

बहु प्रकार मारन कपि लागे । दीन पुकारत तदपि न त्यागे ॥ जो हमार हर नासा काना । तेहि कोसलाधीस कै आना ॥

Chapter : 17 Number : 54

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए । दया लागि हँसि तुरत छोडाए ॥ रावन कर दीजहु यह पाती । लछिमन बचन बाचु कुलघाती ॥

Chapter : 17 Number : 54

Doha / दोहा

दो. कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार । सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार ॥ ५२ ॥

Chapter : 17 Number : 55

Chaupai / चोपाई

तुरत नाइ लछिमन पद माथा । चले दूत बरनत गुन गाथा ॥ कहत राम जसु लंकाँ आए । रावन चरन सीस तिन्ह नाए ॥

Chapter : 17 Number : 55

बिहसि दसानन पूँछी बाता । कहसि न सुक आपनि कुसलाता ॥ पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी । जाहि मृत्यु आई अति नेरी ॥

Chapter : 17 Number : 55

करत राज लंका सठ त्यागी । होइहि जब कर कीट अभागी ॥ पुनि कहु भालु कीस कटकाई । कठिन काल प्रेरित चलि आई ॥

Chapter : 17 Number : 55

जिन्ह के जीवन कर रखवारा । भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा ॥ कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी । जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी ॥

Chapter : 17 Number : 55

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