Ram Charita Manas

Sundara-Kanda

Shuk discusses his meeting with ravana and give him Shri Rama message.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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संस्कृत्म
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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर । कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ॥ ५३ ॥

Chapter : 18 Number : 56

Chaupai / चोपाई

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें । मानहु कहा क्रोध तजि तैसें ॥ मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा । जातहिं राम तिलक तेहि सारा ॥

Chapter : 18 Number : 56

रावन दूत हमहि सुनि काना । कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना ॥ श्रवन नासिका काटै लागे । राम सपथ दीन्हे हम त्यागे ॥

Chapter : 18 Number : 56

पूँछिहु नाथ राम कटकाई । बदन कोटि सत बरनि न जाई ॥ नाना बरन भालु कपि धारी । बिकटानन बिसाल भयकारी ॥

Chapter : 18 Number : 56

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा । सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा ॥ अमित नाम भट कठिन कराला । अमित नाग बल बिपुल बिसाला ॥

Chapter : 18 Number : 56

Doha / दोहा

दो. द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि । दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि ॥ ५४ ॥

Chapter : 18 Number : 57

Chaupai / चोपाई

ए कपि सब सुग्रीव समाना । इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना ॥ राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं । तृन समान त्रेलोकहि गनहीं ॥

Chapter : 18 Number : 57

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर । पदुम अठारह जूथप बंदर ॥ नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं । जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं ॥

Chapter : 18 Number : 57

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा । आयसु पै न देहिं रघुनाथा ॥ सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला । पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला ॥

Chapter : 18 Number : 57

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा । ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा ॥ गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका । मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका ॥

Chapter : 18 Number : 57

Doha / दोहा

दो. -सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम । रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम ॥ ५५ ॥

Chapter : 18 Number : 58

Chaupai / चोपाई

राम तेज बल बुधि बिपुलाई । तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर ॥ तासु बचन सुनि सागर पाहीं । मागत पंथ कृपा मन माहीं ॥

Chapter : 18 Number : 58

सुनत बचन बिहसा दससीसा । जौं असि मति सहाय कृत कीसा ॥ सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई । सागर सन ठानी मचलाई ॥

Chapter : 18 Number : 58

मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई । रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ॥ सचिव सभीत बिभीषन जाकें । बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें ॥

Chapter : 18 Number : 58

सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी । समय बिचारि पत्रिका काढ़ी ॥ रामानुज दीन्ही यह पाती । नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ॥

Chapter : 18 Number : 58

बिहसि बाम कर लीन्ही रावन । सचिव बोलि सठ लाग बचावन ॥

Chapter : 18 Number : 58

Doha / दोहा

दो. -बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस । राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस ॥ ५६(क) ॥

Chapter : 18 Number : 59

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग । होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग ॥ ५६(ख) ॥

Chapter : 18 Number : 59

Chaupai / चोपाई

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई । कहत दसानन सबहि सुनाई ॥ भूमि परा कर गहत अकासा । लघु तापस कर बाग बिलासा ॥

Chapter : 18 Number : 59

कह सुक नाथ सत्य सब बानी । समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी ॥ सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा । नाथ राम सन तजहु बिरोधा ॥

Chapter : 18 Number : 59

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ । जद्यपि अखिल लोक कर राऊ ॥ मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही । उर अपराध न एकउ धरिही ॥

Chapter : 18 Number : 59

जनकसुता रघुनाथहि दीजे । एतना कहा मोर प्रभु कीजे । जब तेहिं कहा देन बैदेही । चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही ॥

Chapter : 18 Number : 59

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ । कृपासिंधु रघुनायक जहाँ ॥ करि प्रनामु निज कथा सुनाई । राम कृपाँ आपनि गति पाई ॥

Chapter : 18 Number : 59

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी । राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी ॥ बंदि राम पद बारहिं बारा । मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ॥

Chapter : 18 Number : 59

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