Ram Charita Manas

Sundara-Kanda

Hanuman proceeds to lanka, meets demoness sursa and injures the water demoness who catches shadow.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Chaupai / चोपाई

जामवंत के बचन सुहाए । सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कंद मूल फल खाई ॥

Chapter : 2 Number : 1

जब लगि आवौं सीतहि देखी । होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥

Chapter : 2 Number : 1

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर । कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ॥ बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥

Chapter : 2 Number : 1

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता । चलेउ सो गा पाताल तुरंता ॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना । एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥

Chapter : 2 Number : 1

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी । तैं मैनाक होहि श्रमहारी ॥

Chapter : 2 Number : 1

Doha / दोहा

दो. हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम । राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥ १ ॥

Chapter : 2 Number : 2

Chaupai / चोपाई

जात पवनसुत देवन्ह देखा । जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥ सुरसा नाम अहिन्ह कै माता । पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥

Chapter : 2 Number : 2

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा । सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥ राम काजु करि फिरि मैं आवौं । सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ॥

Chapter : 2 Number : 2

तब तव बदन पैठिहउँ आई । सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ॥ कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना । ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥

Chapter : 2 Number : 2

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा । कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥ सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ । तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ॥

Chapter : 2 Number : 2

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा । तासु दून कपि रूप देखावा ॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा । अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥

Chapter : 2 Number : 2

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा । मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥ मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा । बुधि बल मरमु तोर मै पावा ॥

Chapter : 2 Number : 2

Doha / दोहा

दो. राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान । आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥ २ ॥

Chapter : 2 Number : 3

Chaupai / चोपाई

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई । करि माया नभु के खग गहई ॥ जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं । जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥

Chapter : 2 Number : 3

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई । एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥ सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा । तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥

Chapter : 2 Number : 3

ताहि मारि मारुतसुत बीरा । बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥ तहाँ जाइ देखी बन सोभा । गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥

Chapter : 2 Number : 3

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