Ram Charita Manas

Sundara-Kanda

Hanuman destroys ashoka vatika and kills Akshaya Kumara. Ravana sends Indrajit to capture hanuman who uses brahmastara to tie him.

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु । रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु ॥ १७ ॥

Chapter : 8 Number : 19

Chaupai / चोपाई

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा । फल खाएसि तरु तोरैं लागा ॥ रहे तहाँ बहु भट रखवारे । कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥

Chapter : 8 Number : 19

नाथ एक आवा कपि भारी । तेहिं असोक बाटिका उजारी ॥ खाएसि फल अरु बिटप उपारे । रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ॥

Chapter : 8 Number : 19

सुनि रावन पठए भट नाना । तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना ॥ सब रजनीचर कपि संघारे । गए पुकारत कछु अधमारे ॥

Chapter : 8 Number : 19

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा । चला संग लै सुभट अपारा ॥ आवत देखि बिटप गहि तर्जा । ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥

Chapter : 8 Number : 19

Doha / दोहा

दो. कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि । कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि ॥ १८ ॥

Chapter : 8 Number : 20

Chaupai / चोपाई

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना । पठएसि मेघनाद बलवाना ॥ मारसि जनि सुत बांधेसु ताही । देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ॥

Chapter : 8 Number : 20

चला इंद्रजित अतुलित जोधा । बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा ॥ कपि देखा दारुन भट आवा । कटकटाइ गर्जा अरु धावा ॥

Chapter : 8 Number : 20

अति बिसाल तरु एक उपारा । बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा ॥ रहे महाभट ताके संगा । गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा ॥

Chapter : 8 Number : 20

तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा । भिरे जुगल मानहुँ गजराजा । मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई । ताहि एक छन मुरुछा आई ॥

Chapter : 8 Number : 20

उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया । जीति न जाइ प्रभंजन जाया ॥

Chapter : 8 Number : 20

Doha / दोहा

दो. ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार । जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार ॥ १९ ॥

Chapter : 8 Number : 21

Chaupai / चोपाई

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा । परतिहुँ बार कटकु संघारा ॥ तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ । नागपास बाँधेसि लै गयऊ ॥

Chapter : 8 Number : 21

जासु नाम जपि सुनहु भवानी । भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ॥ तासु दूत कि बंध तरु आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥

Chapter : 8 Number : 21

कपि बंधन सुनि निसिचर धाए । कौतुक लागि सभाँ सब आए ॥ दसमुख सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥

Chapter : 8 Number : 21

कर जोरें सुर दिसिप बिनीता । भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥ देखि प्रताप न कपि मन संका । जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ॥

Chapter : 8 Number : 21

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