Ram Charita Manas

Uttara Kanda

Forgiveness of Guru's crime from Shiva, Shapanugrah and further story of Kakbhushundi

ॐ श्री परमात्मने नमः


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ॐ श्री गणेशाय नमः

Doha / दोहा

दो. -सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु । पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु ॥ १०८(क) ॥

Chapter : 16 Number : 114

जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु । निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु ॥ १०८(ख) ॥

Chapter : 16 Number : 114

तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान । तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान ॥ १०८(ग) ॥

Chapter : 16 Number : 114

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल । साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल ॥ १०८(घ) ॥

Chapter : 16 Number : 114

Chaupai / चोपाई

एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना ॥ बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी ॥

Chapter : 16 Number : 114

जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा ॥ तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी ॥

Chapter : 16 Number : 114

छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी ॥ मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि ॥

Chapter : 16 Number : 114

जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई ॥ कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना ॥

Chapter : 16 Number : 114

रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ ॥ पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें ॥

Chapter : 16 Number : 114

सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥ अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना ॥

Chapter : 16 Number : 114

इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला ॥ जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई ॥

Chapter : 16 Number : 114

अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥ औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी ॥

Chapter : 16 Number : 114

Doha / दोहा

दो. सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि । मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि ॥ १०९(क) ॥

Chapter : 16 Number : 115

प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल । पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल ॥ १०९(ख) ॥

Chapter : 16 Number : 115

जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान । जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान ॥ १०९(ग) ॥

Chapter : 16 Number : 115

सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस । एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस ॥ १०९(घ) ॥

Chapter : 16 Number : 115

Chaupai / चोपाई

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ ॥ एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ ॥

Chapter : 16 Number : 115

चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई ॥ खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला ॥

Chapter : 16 Number : 115

प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा ॥ मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी ॥

Chapter : 16 Number : 115

कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी ॥ प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई ॥

Chapter : 16 Number : 115

भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता ॥ जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ ॥

Chapter : 16 Number : 115

बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा ॥ सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा ॥

Chapter : 16 Number : 115

छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी ॥ राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं ॥

Chapter : 16 Number : 115

जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई ॥ निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई ॥

Chapter : 16 Number : 115

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