| |
|

This overlay will guide you through the buttons:

अथ ब्रह्मवर्गः
वंशः. (6) - सन्तति (स्त्री) , गोत्र (नपुं) , जनन (नपुं) , कुल (नपुं) , अभिजन (पुं) , अन्वय (पुं)
संततिर्गोत्रजननकुलान्यभिजनान्वयौ ॥ २.६.८०८ ॥
वंशः. (6) - सन्तति (स्त्री) , गोत्र (नपुं) , जनन (नपुं) , कुल (नपुं) , अभिजन (पुं) , अन्वय (पुं)
वंशः. (3) - वंश (पुं) , अन्ववाय (पुं) , सन्तान (पुं) ब्राह्मणादिवर्णचतुष्टयवाचकः. (1) - वर्ण (पुं)
वंशोऽन्ववायः संतानो वर्णाः स्युर्ब्राह्मणादयः॥ २.६.८०९ ॥
वंशः. (3) - वंश (पुं) , अन्ववाय (पुं) , सन्तान (पुं) ब्राह्मणादिवर्णचतुष्टयवाचकः. (1) - वर्ण (पुं)
विप्रक्षत्रियविट्शूद्राणां सामान्यनाम. (1) - चातुर्वर्ण्य (नपुं)
विप्रक्षत्रियविट् शूद्राश्चातुर्वर्ण्यमिति स्मृतम्॥ २.६.८१० ॥
विप्रक्षत्रियविट्शूद्राणां सामान्यनाम. (1) - चातुर्वर्ण्य (नपुं)
राजवंशोत्पन्नः. (2) - राजबीजिन् (पुं) , राजवंश्य (पुं) कुलोत्पन्नः. (2) - बीज्य (पुं) , कुलसम्भव (पुं)
राजबीजी राजवंश्यो बीज्यस्तु कुलसंभवः॥ २.६.८११ ॥
राजवंशोत्पन्नः. (2) - राजबीजिन् (पुं) , राजवंश्य (पुं) कुलोत्पन्नः. (2) - बीज्य (पुं) , कुलसम्भव (पुं)
कुलीनः. (6) - महाकुल (पुं) , कुलीन (वि) , आर्य (पुं) , सभ्य (पुं) , सज्जन (पुं) , साधु (वि)
महाकुलकुलीनार्यसभ्यसज्जनसाधवः॥ २.६.८१२ ॥
कुलीनः. (6) - महाकुल (पुं) , कुलीन (वि) , आर्य (पुं) , सभ्य (पुं) , सज्जन (पुं) , साधु (वि)
ब्रह्मचर्याश्रमी. (1) - ब्रह्मचारिन् (पुं) गृहस्थाश्रमी. (1) - गृहिन् (पुं) वानप्रस्थाश्रमी. (1) - वानप्रस्थ (पुं) संन्यासाश्रमी. (1) - भिक्षु (पुं)
ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो भिक्षुश्चतुष्टये॥ २.६.८१३ ॥
ब्रह्मचर्याश्रमी. (1) - ब्रह्मचारिन् (पुं) गृहस्थाश्रमी. (1) - गृहिन् (पुं) वानप्रस्थाश्रमी. (1) - वानप्रस्थ (पुं) संन्यासाश्रमी. (1) - भिक्षु (पुं)
ब्रह्मचर्यादिचतुष्टयस्य नाम. (1) - आश्रम (पुं-नपुं) ब्राह्मणः. (4) - द्विजाति (पुं) , अग्रजन्मन् (पुं) , भूदेव (पुं) , वाडव (पुं)
आश्रमोऽस्त्री द्विजात्यग्रजन्मभूदेववाडवाः॥ २.६.८१४ ॥
ब्रह्मचर्यादिचतुष्टयस्य नाम. (1) - आश्रम (पुं-नपुं) ब्राह्मणः. (4) - द्विजाति (पुं) , अग्रजन्मन् (पुं) , भूदेव (पुं) , वाडव (पुं)
ब्राह्मणः. (2) - विप्र (पुं) , ब्राह्मण (पुं) यागादिषट्कर्मयुक्तविप्रः. (1) - षट्कर्मन् (पुं)
विप्रश्च ब्राह्मणोऽसौ षट्कर्मा यागादिभिर्वृतः॥ २.६.८१५ ॥
ब्राह्मणः. (2) - विप्र (पुं) , ब्राह्मण (पुं) यागादिषट्कर्मयुक्तविप्रः. (1) - षट्कर्मन् (पुं)
विद्वान्. (7) - विद्वस् (पुं) , विपश्चित् (पुं) , दोषज्ञ (पुं) , सत् (पुं) , सुधी (पुं) , कोविद (पुं) , बुध (पुं)
विद्वान्विपश्चिद्दोषज्ञः सन्सुधीः कोविदो बुधः॥ २.६.८१६ ॥
विद्वान्. (7) - विद्वस् (पुं) , विपश्चित् (पुं) , दोषज्ञ (पुं) , सत् (पुं) , सुधी (पुं) , कोविद (पुं) , बुध (पुं)
विद्वान्. (7) - धीर (पुं) , मनीषिन् (पुं) , ज्ञ (पुं) , प्राज्ञ (पुं) , सङ्ख्यावत् (पुं) , पण्डित (पुं) , कवि (पुं)
धीरो मनीषी ज्ञः प्राज्ञः संख्यावान्पण्डितः कविः॥ २.६.८१७ ॥
विद्वान्. (7) - धीर (पुं) , मनीषिन् (पुं) , ज्ञ (पुं) , प्राज्ञ (पुं) , सङ्ख्यावत् (पुं) , पण्डित (पुं) , कवि (पुं)
विद्वान्. (6) - धीमत् (पुं) , सूरिन् (पुं) , कृतिन् (पुं) , कृष्टि (पुं) , लब्धवर्ण (पुं) , विचक्षण (पुं)
धीमान्सूरिः कृती कृष्टिर्लब्धवर्णो विचक्षणः॥ २.६.८१८ ॥
विद्वान्. (6) - धीमत् (पुं) , सूरिन् (पुं) , कृतिन् (पुं) , कृष्टि (पुं) , लब्धवर्ण (पुं) , विचक्षण (पुं)
विद्वान्. (2) - दूरदर्शिन् (पुं) , दीर्घदर्शिन् (पुं) सम्पूर्णशाखाध्यायिः. (2) - श्रोत्रिय (पुं) , छान्दस (पुं)
दूरदर्शी दीर्घदर्शी श्रोत्रियच्छान्दसौ समौ॥ २.६.८१९ ॥
विद्वान्. (2) - दूरदर्शिन् (पुं) , दीर्घदर्शिन् (पुं) सम्पूर्णशाखाध्यायिः. (2) - श्रोत्रिय (पुं) , छान्दस (पुं)
मीमांसाशास्त्रवेत्ता. (2) - मीमांसक (वि) , जैमिनीय (पुं) वेदान्तशास्त्रज्ञः. (2) - वेदान्तिन् (पुं) , ब्रह्मवादिन् (पुं)
मीमांसको जैमिनीये वेदान्ती ब्रह्मवादिनि॥ २.६.८२० ॥
मीमांसाशास्त्रवेत्ता. (2) - मीमांसक (वि) , जैमिनीय (पुं) वेदान्तशास्त्रज्ञः. (2) - वेदान्तिन् (पुं) , ब्रह्मवादिन् (पुं)
सप्तपदार्थवादिनः. (2) - वैशेषिक (पुं) , औलूक्य (पुं) शून्यमतावलम्बी नास्तिकः. (2) - सौगत (पुं) , शून्यवादिन् (पुं)
वैशेषिके स्यादौलूक्यः सौगतः शून्यवादिनि॥ २.६.८२१ ॥
सप्तपदार्थवादिनः. (2) - वैशेषिक (पुं) , औलूक्य (पुं) शून्यमतावलम्बी नास्तिकः. (2) - सौगत (पुं) , शून्यवादिन् (पुं)
न्यायशास्त्रज्ञः. (2) - नैयायिक (पुं) , अक्षपाद (पुं) स्याद्वादिः. (2) - स्याद्वादिन् (पुं) , आर्हक (पुं)
नैयायिकस्त्वक्षपादः स्यात्स्याद्वादिक आर्हकः॥ २.६.८२२ ॥
न्यायशास्त्रज्ञः. (2) - नैयायिक (पुं) , अक्षपाद (पुं) स्याद्वादिः. (2) - स्याद्वादिन् (पुं) , आर्हक (पुं)
देहात्मवादिनश्चार्वाकः. (2) - चार्वाक (पुं) , लौकायतिक (पुं) साङ्ख्यशास्त्रज्ञः. (2) - साङ्ख्य (पुं) , कापिल (पुं)
चार्वाकलौकायतिकौ सत्कार्ये सांख्यकापिलौ॥ २.६.८२३ ॥
देहात्मवादिनश्चार्वाकः. (2) - चार्वाक (पुं) , लौकायतिक (पुं) साङ्ख्यशास्त्रज्ञः. (2) - साङ्ख्य (पुं) , कापिल (पुं)
अध्यापकः. (2) - उपाध्याय (पुं) , अध्यापक (पुं) संस्कारादिकर्तुर्गुरुः. (1) - गुरु (पुं)
उपाध्यायोऽध्यापकोऽथ स्यान्निषेकादिकृद्गुरुः॥ २.६.८२४ ॥
अध्यापकः. (2) - उपाध्याय (पुं) , अध्यापक (पुं) संस्कारादिकर्तुर्गुरुः. (1) - गुरु (पुं)
मन्त्रव्याख्याकर्ता. (2) - मन्त्रव्याख्याकृत् (पुं) , आचार्य (पुं) यागे यजमानः. (1) - व्रतिन् (पुं)
मन्त्रव्याख्याकृदाचार्य आदेष्टा त्वध्वरे व्रती॥ २.६.८२५ ॥
मन्त्रव्याख्याकर्ता. (2) - मन्त्रव्याख्याकृत् (पुं) , आचार्य (पुं) यागे यजमानः. (1) - व्रतिन् (पुं)
यागे यजमानः. (2) - यष्टृ (पुं) , यजमान (पुं) सोमयाजिः. (1) - दीक्षित (पुं)
यष्टा च यजमानश्च स सोमवति दीक्षितः॥ २.६.८२६ ॥
यागे यजमानः. (2) - यष्टृ (पुं) , यजमान (पुं) सोमयाजिः. (1) - दीक्षित (पुं)
यजनशीलः. (2) - इज्याशील (पुं) , यायजूक (पुं) विधिवद् होता. (1) - यज्वन् (पुं)
इज्याशीलो यायजूको यज्वा तु विधिनेष्टवान्॥ २.६.८२७ ॥
यजनशीलः. (2) - इज्याशील (पुं) , यायजूक (पुं) विधिवद् होता. (1) - यज्वन् (पुं)
बृहस्पतियागकर्ता. (1) - स्थपति (पुं) सोमयाजिः. (2) - सोमपीथिन् (पुं) , सोमप (पुं)
स गीर्पतीष्टया स्थपतिः सोमपीथी तु सोमपाः॥ २.६.८२८ ॥
बृहस्पतियागकर्ता. (1) - स्थपति (पुं) सोमयाजिः. (2) - सोमपीथिन् (पुं) , सोमप (पुं)
विश्वजिदादियज्ञकर्ता. (1) - सर्ववेदस् (पुं)
सर्ववेदाः स येनेष्टो यागः सर्वस्वदक्षिणः॥ २.६.८२९ ॥
विश्वजिदादियज्ञकर्ता. (1) - सर्ववेदस् (पुं)
साङ्गवेदाध्येता. (1) - अनूचान (पुं)
अनूचानः प्रवचने साङ्गेऽधीती गुरोस्तु यः॥ २.६.८३० ॥
साङ्गवेदाध्येता. (1) - अनूचान (पुं)
गुरुकुलवासान्निवृत्तः. (1) - समावृत्त (पुं) अवभृतस्नातकः. (1) - सुत्वन् (पुं)
लब्धानुज्ञः समावृत्तः सुत्वा त्वभिषवे कृते॥ २.६.८३१ ॥
गुरुकुलवासान्निवृत्तः. (1) - समावृत्त (पुं) अवभृतस्नातकः. (1) - सुत्वन् (पुं)
शिष्यः. (3) - छात्र (पुं) , अन्तेवासिन् (पुं) , शिष्य (पुं) प्रथमारब्धवेदाः. (2) - शैक्ष (पुं) , प्राथमकल्पिक (पुं)
छात्रान्तेवासिनौ शिष्ये शैक्षाः प्राथमकल्पिकाः॥ २.६.८३२ ॥
शिष्यः. (3) - छात्र (पुं) , अन्तेवासिन् (पुं) , शिष्य (पुं) प्रथमारब्धवेदाः. (2) - शैक्ष (पुं) , प्राथमकल्पिक (पुं)
समशाखाध्येता. (1) - सब्रह्मचारिन् (पुं)
एकब्रह्मव्रताचारा मिथः सब्रह्मचारिणः॥ २.६.८३३ ॥
समशाखाध्येता. (1) - सब्रह्मचारिन् (पुं)
सहाध्यायी. (2) - सतीर्थ्य (पुं) , एकगुरु (पुं) अग्न्युपासकः. (1) - अग्निचित् (पुं)
सतीर्थ्यास्त्वेकगुरवश्चितवानग्निमग्निचित्॥ २.६.८३४ ॥
सहाध्यायी. (2) - सतीर्थ्य (पुं) , एकगुरु (पुं) अग्न्युपासकः. (1) - अग्निचित् (पुं)
परम्परोपदेशः. (2) - ऐतिह्य (नपुं) , इतिह (अव्य)
पारम्पर्योपदेशे स्यादैतिह्यमितिहाव्ययम्॥ २.६.८३५ ॥
परम्परोपदेशः. (2) - ऐतिह्य (नपुं) , इतिह (अव्य)
आद्यज्ञानम्. (1) - उपज्ञा (स्त्री) ज्ञात्वा प्रथमारम्भः. (1) - उपक्रम (पुं)
उपज्ञा ज्ञानमाद्यं स्याज्ज्ञात्वारम्भ उपक्रमः॥ २.६.८३६ ॥
आद्यज्ञानम्. (1) - उपज्ञा (स्त्री) ज्ञात्वा प्रथमारम्भः. (1) - उपक्रम (पुं)
यज्ञः. (7) - यज्ञ (पुं) , सव (पुं) , अध्वर (पुं) , याग (पुं) , सप्ततन्तु (पुं) , मख (पुं) , क्रतु (पुं)
यज्ञः सवोऽध्वरो यागः सप्ततन्तुर्मखः क्रतुः॥ २.६.८३७ ॥
यज्ञः. (7) - यज्ञ (पुं) , सव (पुं) , अध्वर (पुं) , याग (पुं) , सप्ततन्तु (पुं) , मख (पुं) , क्रतु (पुं)
ब्रह्मयज्ञः. (1) - पाठ (पुं) देवयज्ञः. (1) - होम (पुं) मनुष्ययज्ञः. (1) - अतिथीनां सपर्या (स्त्री) पितृयज्ञः. (1) - तर्पण (नपुं) भूतयज्ञः. (1) - बलि (पुं)
पाठो होमश्चातिथीनां सपर्या तर्पणं बलिः॥ २.६.८३८ ॥
ब्रह्मयज्ञः. (1) - पाठ (पुं) देवयज्ञः. (1) - होम (पुं) मनुष्ययज्ञः. (1) - अतिथीनां सपर्या (स्त्री) पितृयज्ञः. (1) - तर्पण (नपुं) भूतयज्ञः. (1) - बलि (पुं)
पाठादयः. (1) - पञ्चमहायज्ञ (पुं)
एते पञ्चमहायज्ञा ब्रह्मयज्ञादिनामकाः॥ २.६.८३९ ॥
पाठादयः. (1) - पञ्चमहायज्ञ (पुं)
सभा. (6) - समज्या (स्त्री) , परिषद् (स्त्री) , गोष्ठी (स्त्री) , सभा (स्त्री) , समिति (स्त्री) , संसद् (स्त्री)
समज्या परिषद्गोष्ठी सभासमितिसंसदः॥ २.६.८४० ॥
सभा. (6) - समज्या (स्त्री) , परिषद् (स्त्री) , गोष्ठी (स्त्री) , सभा (स्त्री) , समिति (स्त्री) , संसद् (स्त्री)
सभा. (3) - आस्थानी (स्त्री) , आस्थान (नपुं) , सदस् (स्त्री-नपुं)
आस्थानी क्लीबमास्थानं स्त्रीनपुंसकयोः सदः॥ २.६.८४१ ॥
सभा. (3) - आस्थानी (स्त्री) , आस्थान (नपुं) , सदस् (स्त्री-नपुं)
हविर्गेहपूर्वभागे निर्मितप्रकोष्टः. (1) - प्राग्वंश (पुं) विधिदर्शिनः. (1) - सदस्य (पुं)
प्राग्वंशः प्राग् हविर्गेहात्सदस्या विधिदर्शिनः॥ २.६.८४२ ॥
हविर्गेहपूर्वभागे निर्मितप्रकोष्टः. (1) - प्राग्वंश (पुं) विधिदर्शिनः. (1) - सदस्य (पुं)
सामाजिकाः. (4) - सभासद् (पुं) , सभास्तार (पुं) , सभ्य (पुं) , सामाजिक (पुं)
सभासदः सभास्ताराः सभ्याः सामाजिकाश्च ते॥ २.६.८४३ ॥
सामाजिकाः. (4) - सभासद् (पुं) , सभास्तार (पुं) , सभ्य (पुं) , सामाजिक (पुं)
यजुर्वेदकर्मकर्ता. (1) - अध्वर्यु (पुं) सामवेदकर्मकर्ता. (1) - उद्गातृ (पुं) ऋग्वेदकर्मकर्ता. (1) - होतृ (पुं)
अध्वर्यूद्गातृहोतारो यजुःसामर्ग्विदः क्रमात्॥ २.६.८४४ ॥
यजुर्वेदकर्मकर्ता. (1) - अध्वर्यु (पुं) सामवेदकर्मकर्ता. (1) - उद्गातृ (पुं) ऋग्वेदकर्मकर्ता. (1) - होतृ (पुं)
ऋत्विक्. (2) - ऋत्विज् (पुं) , याजक (पुं)
आग्नीग्राद्या धनैर्वार्या ऋत्विजो याजकाश्च ते॥ २.६.८४५ ॥
ऋत्विक्. (2) - ऋत्विज् (पुं) , याजक (पुं)
यज्ञवेदिः. (1) - वेदि (पुं) यागार्थं संस्कृतभूमिः. (2) - स्थण्डिल (नपुं) , चत्वर (नपुं)
वेदिः परिष्कृता भुमिः समे स्थण्डिलचत्वरे॥ २.६.८४६ ॥
यज्ञवेदिः. (1) - वेदि (पुं) यागार्थं संस्कृतभूमिः. (2) - स्थण्डिल (नपुं) , चत्वर (नपुं)
यूपकटकः. (2) - चषाल (पुं) , यूपकटक (पुं) यज्ञशालापरितनिबिडवेष्टनम्. (1) - कुम्बा (स्त्री)
चषालो यूपकटकः कुम्बा सुगहना वृतिः॥ २.६.८४७ ॥
यूपकटकः. (2) - चषाल (पुं) , यूपकटक (पुं) यज्ञशालापरितनिबिडवेष्टनम्. (1) - कुम्बा (स्त्री)
यूपाग्रम्. (2) - यूपाग्र (नपुं) , तर्मन् (नपुं) अरणिः. (1) - अरणि (स्त्री-पुं)
यूपाग्रं तर्म निर्मन्थ्यदारुणि त्वरणिर्द्वयोः॥ २.६.८४८ ॥
यूपाग्रम्. (2) - यूपाग्र (नपुं) , तर्मन् (नपुं) अरणिः. (1) - अरणि (स्त्री-पुं)
यागवेदिकायाम् दक्षिणभागे स्थिताग्निः. (1) - दक्षिणाग्नि (पुं) गार्हपत्याग्निः. (1) - गार्हपत्य (पुं) आहवनीयाग्निः. (1) - आहवनीय (पुं)
दक्षिणाग्निर्गार्हपत्याहवनीयौ त्रयोऽग्नयः॥ २.६.८४९ ॥
यागवेदिकायाम् दक्षिणभागे स्थिताग्निः. (1) - दक्षिणाग्नि (पुं) गार्हपत्याग्निः. (1) - गार्हपत्य (पुं) आहवनीयाग्निः. (1) - आहवनीय (पुं)
दक्षिणगार्हपत्याहवनीयाग्नयः. (1) - त्रेता (स्त्री) संस्कृताग्निः. (1) - प्रणीत (पुं)
अग्नित्रयमिदं त्रेता प्रणीतः संस्कृतोऽनलः॥ २.६.८५० ॥
दक्षिणगार्हपत्याहवनीयाग्नयः. (1) - त्रेता (स्त्री) संस्कृताग्निः. (1) - प्रणीत (पुं)
अग्निनाम. (3) - समूह्य (पुं) , परिचाय्य (पुं) , उपचाय्य (पुं)
समूह्यः परिचाय्योपचाय्यावग्नौ प्रयोगिणः॥ २.६.८५१ ॥
अग्निनाम. (3) - समूह्य (पुं) , परिचाय्य (पुं) , उपचाय्य (पुं)
दक्षिणाग्नित्वेन संस्कृत गार्हपत्याग्निः. (1) - आनाय्य (पुं)
यो गार्हपत्यादानीय दक्षिणाग्निः प्रणीयते॥ २.६.८५२ ॥
दक्षिणाग्नित्वेन संस्कृत गार्हपत्याग्निः. (1) - आनाय्य (पुं)
अग्नेः प्रिया. (3) - आग्नायी (स्त्री) , स्वाहा (स्त्री) , हुतभुक्प्रिया (स्त्री)
तस्मिन्नानाय्योऽथाग्नायी स्वाहा च हुतभुक्प्रिया॥ २.६.८५३ ॥
अग्नेः प्रिया. (3) - आग्नायी (स्त्री) , स्वाहा (स्त्री) , हुतभुक्प्रिया (स्त्री)
अग्निसमिन्धने प्रयुक्ता ऋक्. (2) - सामिधेनी (स्त्री) , धाय्या (स्त्री)
ऋक्सामिधेनी धाय्या च या स्यादग्निसमिन्धने॥ २.६.८५४ ॥
अग्निसमिन्धने प्रयुक्ता ऋक्. (2) - सामिधेनी (स्त्री) , धाय्या (स्त्री)
गायत्रीच्छन्दः. (1) - गायत्री (स्त्री) हव्यपाकः. (1) - चरु (पुं)
गायत्रीप्रमुखं छन्दो हव्यपाके चरुः पुमान्॥ २.६.८५५ ॥
गायत्रीच्छन्दः. (1) - गायत्री (स्त्री) हव्यपाकः. (1) - चरु (पुं)
पक्वक्षीरे दधियोजना. (1) - आमिक्षा (स्त्री)
आमिक्षा सा शृतोष्णे या क्षीरे स्याद्दधियोगतः॥ २.६.८५६ ॥
पक्वक्षीरे दधियोजना. (1) - आमिक्षा (स्त्री)
अग्निसंरक्षणाय रचितमृगत्वचव्यजनम्. (1) - धवित्र (नपुं)
धवित्रं व्यजनं तद्यद्रचितं मृगचर्मणा॥ २.६.८५७ ॥
अग्निसंरक्षणाय रचितमृगत्वचव्यजनम्. (1) - धवित्र (नपुं)
दधिमिशृतघृतम्. (1) - पृषदाज्य (नपुं) क्षीरान्नम्. (2) - परमान्न (नपुं) , पायस (पुं-नपुं)
पृषदाज्यं सदध्याज्ये परमान्नं तु पायसम्॥ २.६.८५८ ॥
दधिमिशृतघृतम्. (1) - पृषदाज्य (नपुं) क्षीरान्नम्. (2) - परमान्न (नपुं) , पायस (पुं-नपुं)
देवान्नम्. (1) - हव्य (नपुं) पित्रन्नम्. (1) - कव्य (नपुं) स्रुवादियज्ञपात्राणि. (1) - पात्र (नपुं)
हव्यकव्ये दैवपित्र्ये अन्ने पात्रं स्रुवादिकम्॥ २.६.८५९ ॥
देवान्नम्. (1) - हव्य (नपुं) पित्रन्नम्. (1) - कव्य (नपुं) स्रुवादियज्ञपात्राणि. (1) - पात्र (नपुं)
यज्ञपात्रम्. (5) - ध्रुवा (स्त्री) , उपभृत् (स्त्री) , जहू (स्त्री) , स्रुव (पुं) , स्रुच् (स्त्री)
ध्रुवोपभृज्जुहूर्ना तु स्रुवो भेदाः स्रुचः स्त्रियः॥ २.६.८६० ॥
यज्ञपात्रम्. (5) - ध्रुवा (स्त्री) , उपभृत् (स्त्री) , जहू (स्त्री) , स्रुव (पुं) , स्रुच् (स्त्री)
क्रतावभिमन्त्रितपशुः. (1) - उपाकृत (पुं)
उपाकृतः पशुरसौ योऽभिमन्त्र्य क्रतौ हतः॥ २.६.८६१ ॥
क्रतावभिमन्त्रितपशुः. (1) - उपाकृत (पुं)
यज्ञार्थं पशुहननम्. (3) - परम्पराक (नपुं) , शमन (पुं) , प्रोक्षण (नपुं)
परम्पराकम् शमनं प्रोक्षणं च वधार्थकम्॥ २.६.८६२ ॥
यज्ञार्थं पशुहननम्. (3) - परम्पराक (नपुं) , शमन (पुं) , प्रोक्षण (नपुं)
यज्ञहतपशुः. (3) - प्रमीत (वि) , उपसम्पन्न (वि) , प्रोक्षित (वि)
वाच्यलिङ्गाः प्रमीतोपसंपन्नप्रोक्षिता हते॥ २.६.८६३ ॥
यज्ञहतपशुः. (3) - प्रमीत (वि) , उपसम्पन्न (वि) , प्रोक्षित (वि)
हविः. (2) - सांनाय्य (नपुं) , हविस् (नपुं) अग्नावर्पितम्. (2) - हुत (वि) , वषट्कृत (वि)
सांनाय्यं हविरग्नौ तु हुतं त्रिषु वषट् कृतम्॥ २.६.८६४ ॥
हविः. (2) - सांनाय्य (नपुं) , हविस् (नपुं) अग्नावर्पितम्. (2) - हुत (वि) , वषट्कृत (वि)
अवभृतस्नानम्. (1) - अवभृथ (पुं) क्रतुद्रव्यादिः. (1) - यज्ञिय (वि)
दीक्षान्तोऽवभृतो यज्ञे तत्कर्मार्हं तु यज्ञियम्॥ २.६.८६५ ॥
अवभृतस्नानम्. (1) - अवभृथ (पुं) क्रतुद्रव्यादिः. (1) - यज्ञिय (वि)
यज्ञकर्मः. (1) - इष्ट (नपुं) पूर्तकर्मः. (1) - पूर्त (नपुं)
त्रिष्वथ क्रतुकर्मेष्टं पूर्तं खातादि कर्म यत्॥ २.६.८६६ ॥
यज्ञकर्मः. (1) - इष्ट (नपुं) पूर्तकर्मः. (1) - पूर्त (नपुं)
यज्ञशेषः. (1) - अमृत (नपुं) भोजनशेषः. (1) - विघस (पुं)
अमृतं विघसो यज्ञशेषभोजनशेषयोः॥ २.६.८६७ ॥
यज्ञशेषः. (1) - अमृत (नपुं) भोजनशेषः. (1) - विघस (पुं)
दानम्. (5) - त्याग (पुं) , विहापित (नपुं) , दान (नपुं) , उत्सर्जन (नपुं) , विसर्जन (नपुं)
त्यागो विहापितं दानमुत्सर्जनविसर्जने॥ २.६.८६८ ॥
दानम्. (5) - त्याग (पुं) , विहापित (नपुं) , दान (नपुं) , उत्सर्जन (नपुं) , विसर्जन (नपुं)
दानम्. (4) - विश्राणन (नपुं) , वितरण (नपुं) , स्पर्शन (नपुं) , प्रतिपादन (नपुं)
विश्राणनं वितरणं स्पर्शनं प्रतिपादनम्॥ २.६.८६९ ॥
दानम्. (4) - विश्राणन (नपुं) , वितरण (नपुं) , स्पर्शन (नपुं) , प्रतिपादन (नपुं)
दानम्. (4) - प्रादेशन (नपुं) , निर्वपण (नपुं) , अपवर्जन (नपुं) , अंहति (स्त्री)
प्रादेशनं निर्वपणमपवर्जनमंहतिः॥ २.६.८७० ॥
दानम्. (4) - प्रादेशन (नपुं) , निर्वपण (नपुं) , अपवर्जन (नपुं) , अंहति (स्त्री)
मृताहे दानम्. (1) - और्ध्वदेहिक (वि)
म्र्तार्थं तदहे दानं त्रिषु स्यादौर्ध्वदेहिकम्॥ २.६.८७१ ॥
मृताहे दानम्. (1) - और्ध्वदेहिक (वि)
पितॄनुद्धिश्यक्रियमाणः दानम्. (2) - पितृदान (नपुं) , निवाप (पुं) श्राद्धकर्मः. (1) - श्राद्ध (नपुं)
पितृदानं निवापः स्याच्छ्राद्धं तत्कर्म शस्त्रतः॥ २.६.८७२ ॥
पितॄनुद्धिश्यक्रियमाणः दानम्. (2) - पितृदान (नपुं) , निवाप (पुं) श्राद्धकर्मः. (1) - श्राद्ध (नपुं)
अमावास्याश्राद्धम्. (1) - अन्वाहार्य (नपुं) अह्नो़ष्टमभागः. (1) - कुतप (पुं-नपुं)
अन्वाहार्यं मासिकेंऽशोऽष्टमोऽह्नः कुतपोऽस्त्रियाम्॥ २.६.८७३ ॥
अमावास्याश्राद्धम्. (1) - अन्वाहार्य (नपुं) अह्नो़ष्टमभागः. (1) - कुतप (पुं-नपुं)
धर्माद्यन्वेषणम्. (4) - पर्येषणा (स्त्री) , परीष्टि (स्त्री) , अन्वेषणा (स्त्री) , गवेषणा (स्त्री)
पर्येषणा परीष्टिश्चान्वेषणा च गवेषणा॥ २.६.८७४ ॥
धर्माद्यन्वेषणम्. (4) - पर्येषणा (स्त्री) , परीष्टि (स्त्री) , अन्वेषणा (स्त्री) , गवेषणा (स्त्री)
गुर्वाद्यारादनम्. (2) - सनि (स्त्री) , अध्येषणा (स्त्री) याचनम्. (4) - याञ्चा (स्त्री) , अभिशस्ति (स्त्री) , याचना (स्त्री) , अर्थना (स्त्री)
सनिस्त्वध्येषणा याञ्चाऽभिशस्तिर्याचनार्थना॥ २.६.८७५ ॥
गुर्वाद्यारादनम्. (2) - सनि (स्त्री) , अध्येषणा (स्त्री) याचनम्. (4) - याञ्चा (स्त्री) , अभिशस्ति (स्त्री) , याचना (स्त्री) , अर्थना (स्त्री)
अर्घ्यार्थजलम्. (1) - अर्घ्य (वि) पाद्यजलम्. (1) - पाद्य (वि)
षट्तु त्रिष्वर्घ्यमर्घार्थे पाद्यं पादाय वारिणि॥ २.६.८७६ ॥
अर्घ्यार्थजलम्. (1) - अर्घ्य (वि) पाद्यजलम्. (1) - पाद्य (वि)
आतिथ्यर्थः. (1) - आतिथ्य (वि)
क्रमादातिथ्यातिथेये अतिथ्यर्थेऽत्र साधुनि॥ २.६.८७७ ॥
आतिथ्यर्थः. (1) - आतिथ्य (वि)
अतिथिः. (3) - आवेशिक (वि) , आगन्तु (वि) , अतिथि (पुं)
स्युरावेशिक आगन्तुरतिथिर्ना गृहागते॥ २.६.८७८ ॥
अतिथिः. (3) - आवेशिक (वि) , आगन्तु (वि) , अतिथि (पुं)
अभ्यागतः. (2) - प्राघूर्णिक (पुं) , प्राघूणक (पुं) उत्थानपूर्वकसत्कारः. (2) - अभ्युत्थान (नपुं) , गौरव (नपुं)
प्राघूर्णिकः प्राघूणकश्चाभ्युत्थानं तु गौरवम्॥ २.६.८७९ ॥
अभ्यागतः. (2) - प्राघूर्णिक (पुं) , प्राघूणक (पुं) उत्थानपूर्वकसत्कारः. (2) - अभ्युत्थान (नपुं) , गौरव (नपुं)
पूजा. (6) - पूजा (स्त्री) , नमस्या (स्त्री) , अपचिति (स्त्री) , सपर्या (स्त्री) , अर्चा (स्त्री) , अर्हणा (स्त्री)
पूजा नमस्यापचितिः सपर्यार्चार्हणाः समाः॥ २.६.८८० ॥
पूजा. (6) - पूजा (स्त्री) , नमस्या (स्त्री) , अपचिति (स्त्री) , सपर्या (स्त्री) , अर्चा (स्त्री) , अर्हणा (स्त्री)
उपासनम्. (4) - वरिवस्या (स्त्री) , शुश्रूषा (स्त्री) , परिचर्या (स्त्री) , उपासना (स्त्री-नपुं)
वरिवस्या तु शुश्रूषा परिचर्याप्युपासना॥ २.६.८८१ ॥
उपासनम्. (4) - वरिवस्या (स्त्री) , शुश्रूषा (स्त्री) , परिचर्या (स्त्री) , उपासना (स्त्री-नपुं)
अटनम्. (3) - व्रज्या (स्त्री) , अटाट्या (स्त्री) , पर्यटन (नपुं) योगमार्गे स्थितः. (1) - चर्या (स्त्री)
व्रज्याटाट्या पर्यटनं चर्या त्वीर्यापथे स्थितिः॥ २.६.८८२ ॥
अटनम्. (3) - व्रज्या (स्त्री) , अटाट्या (स्त्री) , पर्यटन (नपुं) योगमार्गे स्थितः. (1) - चर्या (स्त्री)
आचमनम्. (2) - उपस्पर्श (पुं) , आचमन (नपुं) मौनम्. (2) - मौन (नपुं) , अभाषण (नपुं)
उपस्पर्शस्त्वाचमनमथ मौनमभाषणम्॥ २.६.८८३ ॥
आचमनम्. (2) - उपस्पर्श (पुं) , आचमन (नपुं) मौनम्. (2) - मौन (नपुं) , अभाषण (नपुं)
वाल्मीकिः. (3) - प्राचेतस् (पुं) , आदिकवि (पुं) , मैत्रावरुणि (पुं)
प्राचेतसश्चादिकविः स्यान्मैत्रावरुणिश्च सः॥ २.६.८८४ ॥
वाल्मीकिः. (3) - प्राचेतस् (पुं) , आदिकवि (पुं) , मैत्रावरुणि (पुं)
वाल्मीकिः. (1) - वाल्मीकि (पुं) विश्वामित्रः. (3) - गाधेय (पुं) , विश्वामित्र (पुं) , कौशिक (पुं)
वाल्मीकश्चाथ गाधेयो विश्वामित्रश्च कौशिकः॥ २.६.८८५ ॥
वाल्मीकिः. (1) - वाल्मीकि (पुं) विश्वामित्रः. (3) - गाधेय (पुं) , विश्वामित्र (पुं) , कौशिक (पुं)
व्यासः. (4) - व्यास (पुं) , द्वैपायन (पुं) , पाराशर्य (पुं) , सत्यवतीसुत (पुं)
व्यासो द्वैपायनः पाराशर्यः सत्यवतीसुतः॥ २.६.८८६ ॥
व्यासः. (4) - व्यास (पुं) , द्वैपायन (पुं) , पाराशर्य (पुं) , सत्यवतीसुत (पुं)
क्रमः. (4) - आनुपूर्वी (स्त्री) , आवृत्त (वि) , परिपाटी (स्त्री) , अनुक्रम (पुं)
आनुपूर्वी स्त्रियां वावृत्परिपाठी अनुक्रमः॥ २.६.८८७ ॥
क्रमः. (4) - आनुपूर्वी (स्त्री) , आवृत्त (वि) , परिपाटी (स्त्री) , अनुक्रम (पुं)
क्रमः. (1) - पर्याय (पुं) क्रमोल्लङ्घनम्. (3) - अतिपात (पुं) , पर्यय (पुं) , उपात्यय (पुं)
पर्यायश्चातिपातस्तु स्यात्पर्यय उपात्ययः॥ २.६.८८८ ॥
क्रमः. (1) - पर्याय (पुं) क्रमोल्लङ्घनम्. (3) - अतिपात (पुं) , पर्यय (पुं) , उपात्यय (पुं)
व्रतम्. (2) - नियम (पुं) , व्रत (पुं-नपुं) उपवासादिव्रतम्. (1) - पुण्यक (नपुं)
नियमो व्रतमस्त्री तच्चोपवासादि पुण्यकम्॥ २.६.८८९ ॥
व्रतम्. (2) - नियम (पुं) , व्रत (पुं-नपुं) उपवासादिव्रतम्. (1) - पुण्यक (नपुं)
उपवासः. (2) - औपवस्त (नपुं) , उपवास (पुं) प्रकृतिपुरुषभेदज्ञानम्. (2) - विवेक (पुं) , पृथगात्मता (स्त्री)
औपवस्तं तूपवासः विवेकः पृथगात्मता॥ २.६.८९० ॥
उपवासः. (2) - औपवस्त (नपुं) , उपवास (पुं) प्रकृतिपुरुषभेदज्ञानम्. (2) - विवेक (पुं) , पृथगात्मता (स्त्री)
ब्रह्मवर्चसम्. (2) - ब्रह्मवर्चस (नपुं) , वृत्ताध्ययनर्द्धि (स्त्री)
स्याद्ब्रह्मवर्चसं वृत्ताध्ययनर्द्धिरथाञ्जलिः॥ २.६.८९१ ॥
ब्रह्मवर्चसम्. (2) - ब्रह्मवर्चस (नपुं) , वृत्ताध्ययनर्द्धि (स्त्री)
वेदपाठकाले कृताञ्जलिः. (1) - ब्रह्माञ्जलि (पुं) मुखनिर्गतबिन्धुः. (1) - ब्रह्मबिन्दु (पुं)
पाठे ब्रह्माञ्जलिः पाठे विप्रुषो ब्रह्मबिन्दवः॥ २.६.८९२ ॥
वेदपाठकाले कृताञ्जलिः. (1) - ब्रह्माञ्जलि (पुं) मुखनिर्गतबिन्धुः. (1) - ब्रह्मबिन्दु (पुं)
ध्यानयोगासनम्. (1) - ब्रह्मासन (नपुं) विधानशास्त्रम्. (3) - कल्प (पुं) , विधि (पुं) , क्रम (पुं)
ध्यानयोगासने ब्रह्मासनं कल्पे विधिक्रमौ॥ २.६.८९३ ॥
ध्यानयोगासनम्. (1) - ब्रह्मासन (नपुं) विधानशास्त्रम्. (3) - कल्प (पुं) , विधि (पुं) , क्रम (पुं)
आद्यविधिः. (1) - मुख्य (पुं) गौणविधिः. (1) - अनुकल्प (पुं)
मुख्यः स्यात्प्रथमः कल्पोऽनुकल्पस्तु ततोऽधमः॥ २.६.८९४ ॥
आद्यविधिः. (1) - मुख्य (पुं) गौणविधिः. (1) - अनुकल्प (पुं)
वेदपाठारम्भविधिः. (1) - उपाकरण (नपुं)
संस्कारपूर्वं ग्रहणं स्यादुपाकरणं श्रुतेः॥ २.६.८९५ ॥
वेदपाठारम्भविधिः. (1) - उपाकरण (नपुं)
अभिवादनम्. (2) - पादग्रहण (नपुं) , अभिवादन (नपुं)
समे तु पादग्रहणमभिवादनमित्युभे॥ २.६.८९६ ॥
अभिवादनम्. (2) - पादग्रहण (नपुं) , अभिवादन (नपुं)
संन्यासी. (5) - भिक्षु (पुं) , परिव्राज् (पुं) , कर्मन्दिन् (पुं) , पाराशरिन् (पुं) , मस्करिन् (पुं)
भिक्षुः परिव्राट् कर्मन्दी पाराशर्यपि मस्करी॥ २.६.८९७ ॥
संन्यासी. (5) - भिक्षु (पुं) , परिव्राज् (पुं) , कर्मन्दिन् (पुं) , पाराशरिन् (पुं) , मस्करिन् (पुं)
तपस्वी. (3) - तपस्विन् (पुं) , तापस (पुं) , पारिकाङ्क्षिन् (पुं) मौनव्रतिः. (2) - वाचंयम (पुं) , मुनि (पुं)
तपस्वी तापसः पारिकाङ्क्षी वाचंयमो मुनिः॥ २.६.८९८ ॥
तपस्वी. (3) - तपस्विन् (पुं) , तापस (पुं) , पारिकाङ्क्षिन् (पुं) मौनव्रतिः. (2) - वाचंयम (पुं) , मुनि (पुं)
तपःक्लेशसहः. (2) - तपःक्लेशसह (वि) , दान्त (पुं) ब्रह्मचारिः. (2) - वर्णिन् (पुं) , ब्रह्मचारिन् (पुं)
तपःक्लेशसहो दान्तो वर्णिनो ब्रह्मचारिणः॥ २.६.८९९ ॥
तपःक्लेशसहः. (2) - तपःक्लेशसह (वि) , दान्त (पुं) ब्रह्मचारिः. (2) - वर्णिन् (पुं) , ब्रह्मचारिन् (पुं)
ऋषिः. (2) - ऋषि (पुं) , सत्यवाक् (पुं) समाप्तवेदाध्ययनाश्रमान्तरागतः. (2) - स्नातक (पुं) , आप्लुतव्रती (पुं)
ऋषयः सत्यवचसः स्नातकस्त्वाप्लुतो व्रती॥ २.६.९०० ॥
ऋषिः. (2) - ऋषि (पुं) , सत्यवाक् (पुं) समाप्तवेदाध्ययनाश्रमान्तरागतः. (2) - स्नातक (पुं) , आप्लुतव्रती (पुं)
निर्जितेन्द्रिययतिः. (2) - यतिन् (पुं) , यति (पुं)
ये निर्जितेन्द्रियग्रामा यतिनो यतयश्च ते॥ २.६.९०१ ॥
निर्जितेन्द्रिययतिः. (2) - यतिन् (पुं) , यति (पुं)
भूमिशायीव्रतिः. (1) - स्थण्डिलशायिन् (पुं)
यः स्थण्डिले व्रतवशाच्छेते स्थण्डिलशाय्यसौ॥ २.६.९०२ ॥
भूमिशायीव्रतिः. (1) - स्थण्डिलशायिन् (पुं)
भूमिशायीव्रतिः. (1) - स्थाण्डिल (पुं) निवृत्तरजस्तमोगुणाः. (2) - विरजस्तमस् (पुं) , द्वयातिग (पुं)
स्थाण्डिलश्चाथ विरजस्तमसः स्युर्द्वयातिगाः॥ २.६.९०३ ॥
भूमिशायीव्रतिः. (1) - स्थाण्डिल (पुं) निवृत्तरजस्तमोगुणाः. (2) - विरजस्तमस् (पुं) , द्वयातिग (पुं)
पवित्रः. (3) - पवित्र (पुं) , प्रयत (पुं) , पूत (पुं) दुःशास्त्रवर्तिः. (2) - पाषण्ड (पुं) , सर्वलिङ्गिन् (पुं)
पवित्रः प्रयतः पूतः पाषण्डाः सर्वलिङ्गिनः॥ २.६.९०४ ॥
पवित्रः. (3) - पवित्र (पुं) , प्रयत (पुं) , पूत (पुं) दुःशास्त्रवर्तिः. (2) - पाषण्ड (पुं) , सर्वलिङ्गिन् (पुं)
पलाशदण्डः. (1) - आषाढ (पुं) वैष्णवदण्डः. (2) - राम्भ (पुं) , वैणव (पुं)
पालाशो दण्ड आषाढो व्रते राम्भस्तु वैणवः॥ २.६.९०५ ॥
पलाशदण्डः. (1) - आषाढ (पुं) वैष्णवदण्डः. (2) - राम्भ (पुं) , वैणव (पुं)
कमण्डलुः. (2) - कमण्डलु (पुं-नपुं) , कुण्डी (स्त्री) व्रतीनामासनम्. (1) - वृषी (स्त्री)
अस्त्री कमण्डलुः कुण्डी व्रतिनामासनं बृषी॥ २.६.९०६ ॥
कमण्डलुः. (2) - कमण्डलु (पुं-नपुं) , कुण्डी (स्त्री) व्रतीनामासनम्. (1) - वृषी (स्त्री)
मृगचर्मः. (3) - अजिन (नपुं) , चर्मन् (नपुं) , कृत्ति (स्त्री) भिक्षाद्रव्यम्. (1) - भैक्ष (नपुं)
अजिनं चर्म कृत्तिः स्त्री भैक्षं भिक्षाकदम्बकम्॥ २.६.९०७ ॥
मृगचर्मः. (3) - अजिन (नपुं) , चर्मन् (नपुं) , कृत्ति (स्त्री) भिक्षाद्रव्यम्. (1) - भैक्ष (नपुं)
वेदाध्ययनम्. (2) - स्वाध्याय (पुं) , जप (पुं) सोमलताकण्डनम्. (3) - सुत्या (स्त्री) , अभिषव (पुं) , सवन (नपुं)
स्वाध्यायः स्याज्जपः सुत्याभिषवः सवनं च सा॥ २.६.९०८ ॥
वेदाध्ययनम्. (2) - स्वाध्याय (पुं) , जप (पुं) सोमलताकण्डनम्. (3) - सुत्या (स्त्री) , अभिषव (पुं) , सवन (नपुं)
अघमर्षणमन्त्रः. (1) - अघमर्षण (वि)
सर्वैनसामपध्वंसि जप्यं त्रिष्वघमर्षणम्॥ २.६.९०९ ॥
अघमर्षणमन्त्रः. (1) - अघमर्षण (वि)
दर्शयागः. (1) - दर्श (पुं) पौर्णमासयागः. (1) - पौर्णमास (पुं)
दर्शश्च पौर्णमासश्च यागौ पक्षान्तयोः पृथक्॥ २.६.९१० ॥
दर्शयागः. (1) - दर्श (पुं) पौर्णमासयागः. (1) - पौर्णमास (पुं)
नैत्यिककर्मः. (1) - यम (पुं)
शरीरसाधनापेक्षं नित्यं यत्कर्म तद्यमः॥ २.६.९११ ॥
नैत्यिककर्मः. (1) - यम (पुं)
नियमकर्मः. (1) - नियम (पुं)
नियमस्तु स यत्कर्म नित्यमागन्तुसाधनम्॥ २.६.९१२ ॥
नियमकर्मः. (1) - नियम (पुं)
मुण्डनम्. (4) - क्षौर (नपुं) , भद्राकरण (नपुं) , मुण्डन (नपुं) , वपन (वि)
क्षौरम् तु भद्राकरणं मुण्डनं वपनं त्रिषु॥ २.६.९१३ ॥
मुण्डनम्. (4) - क्षौर (नपुं) , भद्राकरण (नपुं) , मुण्डन (नपुं) , वपन (वि)
यज्ञोपवीतम्. (2) - उपवीत (नपुं) , यज्ञसूत्र (नपुं)
कक्षापटी च कौपीनं शाटी च स्त्रीति लक्ष्यतः॥ २.६.९१४ ॥
यज्ञोपवीतम्. (2) - उपवीत (नपुं) , यज्ञसूत्र (नपुं)
विपरीतधृतयज्ञोपवीतम्. (1) - प्राचीनावीत (नपुं) कण्डलम्बितयज्ञोपवीतम्. (1) - निवीत (नपुं)
उपवीतं ब्रह्मसूत्रं प्रोद्धृते दक्षिणे करे॥ २.६.९१५ ॥
विपरीतधृतयज्ञोपवीतम्. (1) - प्राचीनावीत (नपुं) कण्डलम्बितयज्ञोपवीतम्. (1) - निवीत (नपुं)
देवतीर्थम्. (1) - दैव (नपुं) कायतीर्थम्. (1) - काय (नपुं)
प्राचीनावीतमन्यस्मिन्निवीतं कण्ठलम्बितम्॥ २.६.९१६ ॥
देवतीर्थम्. (1) - दैव (नपुं) कायतीर्थम्. (1) - काय (नपुं)
पितृतीर्थम्. (1) - पित्र्य (नपुं) ब्राह्मतीर्थम्. (1) - ब्राह्म (नपुं)
अङ्गुल्यग्रे तीर्थं दैवं स्वल्पाङ्गुल्योर्मूले कायम्॥ २.६.९१७ ॥
पितृतीर्थम्. (1) - पित्र्य (नपुं) ब्राह्मतीर्थम्. (1) - ब्राह्म (नपुं)
ब्रह्मभावः. (3) - ब्रह्मभूय (नपुं) , ब्रह्मत्व (नपुं) , ब्रह्मसायुज्य (नपुं)
मध्येऽङ्गुष्ठाङ्गुल्योः पित्र्यं मूले त्वङ्गुष्ठस्य ब्राह्मम्॥ २.६.९१८ ॥
ब्रह्मभावः. (3) - ब्रह्मभूय (नपुं) , ब्रह्मत्व (नपुं) , ब्रह्मसायुज्य (नपुं)
देवसायुज्यम्. (1) - देवभूय (नपुं) प्रायश्चित्तकर्मम्. (1) - कृच्छ्र (नपुं)
स्याद्ब्रह्मभूयं ब्रह्मत्वं ब्रह्मसायुज्यमित्यपि॥ २.६.९१९ ॥
देवसायुज्यम्. (1) - देवभूय (नपुं) प्रायश्चित्तकर्मम्. (1) - कृच्छ्र (नपुं)
प्रायोपवेशः. (1) - प्राय (पुं) उपासनाग्निनष्टः. (1) - वीरहन् (पुं)
देवभूयादिकं तद्वत्क्ॅह्छं सान्तपनादिकम्॥ २.६.९२० ॥
प्रायोपवेशः. (1) - प्राय (पुं) उपासनाग्निनष्टः. (1) - वीरहन् (पुं)
उपासनाग्निनष्टः. (1) - नष्टाग्नि (पुं) दम्भेनकृतमौनादिः. (1) - कुहना (स्त्री)
संन्यासवत्यनशने पुमान्प्रायोऽथ वीरहा॥ २.६.९२१ ॥
उपासनाग्निनष्टः. (1) - नष्टाग्नि (पुं) दम्भेनकृतमौनादिः. (1) - कुहना (स्त्री)
संस्कारहीनः. (2) - व्रात्य (पुं) , संस्कारहीन (पुं) वेदाध्ययनरहितः. (2) - अस्वाध्याय (पुं) , निराकृति (पुं)
नष्टाग्निः कुहना लोभान्मिथ्येर्यापथकल्पना॥ २.६.९२२ ॥
संस्कारहीनः. (2) - व्रात्य (पुं) , संस्कारहीन (पुं) वेदाध्ययनरहितः. (2) - अस्वाध्याय (पुं) , निराकृति (पुं)
कपटजटाधारिः. (2) - धर्मध्वजिन् (पुं) , लिङ्गवृत्ति (पुं)
व्रात्यः संस्कारहीनः स्यादस्वाध्यायो निराकृतिः॥ २.६.९२३ ॥
कपटजटाधारिः. (2) - धर्मध्वजिन् (पुं) , लिङ्गवृत्ति (पुं)
खण्डितब्रह्मचर्यः. (2) - अवकीर्णिन् (पुं) , क्षतव्रत (पुं)
धर्मध्वजी लिङ्गवृत्तिरवकीर्णी क्षतव्रतः॥ २.६.९२४ ॥
खण्डितब्रह्मचर्यः. (2) - अवकीर्णिन् (पुं) , क्षतव्रत (पुं)
सूर्यास्तेसुप्तः. (1) - अभिनिर्मुक्त (पुं)
सुप्ते यस्मिन्नस्तमेति सुप्ते यस्मिन्नुदेति च॥ २.६.९२५ ॥
सूर्यास्तेसुप्तः. (1) - अभिनिर्मुक्त (पुं)
सूर्योदयेसुप्तः. (1) - अभ्युदित (पुं)
अंशुमानभिनिर्मुक्ताभ्युदितौ च यथाक्रमम्॥ २.६.९२६ ॥
सूर्योदयेसुप्तः. (1) - अभ्युदित (पुं)
ज्येष्ठे़नूढे कृतदारपरिग्रहः. (1) - परिवेतृ (पुं)
परिवेत्तानुजोऽनूढे ज्येष्ठे दारपरिग्रहात्॥ २.६.९२७ ॥
ज्येष्ठे़नूढे कृतदारपरिग्रहः. (1) - परिवेतृ (पुं)
परिवेत्तुर्ज्येष्ठभ्राता. (1) - परिवित्ति (पुं) विवाहः. (2) - विवाह (पुं) , उपयम (पुं)
परिवित्तिस्तु तज्जायान्विवाहोपयमौ समौ॥ २.६.९२८ ॥
परिवेत्तुर्ज्येष्ठभ्राता. (1) - परिवित्ति (पुं) विवाहः. (2) - विवाह (पुं) , उपयम (पुं)
विवाहः. (4) - परिणय (पुं) , उद्वाह (पुं) , उपयाम (पुं) , पाणिपीडन (नपुं)
तथा परिणयोद्वाहोपयामाः पाणिपीडनम्॥ २.६.९२९ ॥
विवाहः. (4) - परिणय (पुं) , उद्वाह (पुं) , उपयाम (पुं) , पाणिपीडन (नपुं)
मैथुनम्. (5) - व्यवाय (पुं) , ग्राम्यधर्म (पुं) , मैथुन (नपुं) , निधुवन (नपुं) , रत (नपुं)
व्यवायो ग्राम्यधर्मो मैथुनं निधुवनं रतम्॥ २.६.९३० ॥
मैथुनम्. (5) - व्यवाय (पुं) , ग्राम्यधर्म (पुं) , मैथुन (नपुं) , निधुवन (नपुं) , रत (नपुं)
धर्मकामार्थत्रिवर्गः. (1) - त्रिवर्ग (पुं) धर्मार्थकाममोक्षचतुर्वर्गः. (1) - चतुर्वर्ग (पुं)
त्रिवर्गोधर्मकामार्थैश्चतुर्वर्गः समोक्षकैः॥ २.६.९३१ ॥
धर्मकामार्थत्रिवर्गः. (1) - त्रिवर्ग (पुं) धर्मार्थकाममोक्षचतुर्वर्गः. (1) - चतुर्वर्ग (पुं)
सबलचतुर्वर्गः. (1) - चतुर्भद्र (नपुं) वरपक्षीयः. (1) - जन्य (पुं)
सबलैस्तैश्चतुर्भद्रं जन्याः स्निग्धाः वरस्य ये ॥ २.६.९३२ ॥
सबलचतुर्वर्गः. (1) - चतुर्भद्र (नपुं) वरपक्षीयः. (1) - जन्य (पुं)
इति ब्रह्मवर्गः

Add to Playlist

Practice Later

No Playlist Found

Create a Verse Post


Shloka QR Code

🔗

🪔 Powered by Gyaandweep.com

namo namaḥ!

भाषा चुने (Choose Language)

नमो नमः

Practice 100+ Vedic scriptures and 1000s of chants — one verse at a time.

Sign In