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अथ क्षत्रियवर्गः
क्षत्रियः. (5) - मूर्धाभिषिक्त (पुं) , राजन्य (पुं) , बाहुज (पुं) , क्षत्रिय (पुं) , विराज् (पुं)
मूर्धाभिषिक्तो राजन्यो बाहुजः क्षत्रियो विराट् । ॥ २.७.९३३ ॥
क्षत्रियः. (5) - मूर्धाभिषिक्त (पुं) , राजन्य (पुं) , बाहुज (पुं) , क्षत्रिय (पुं) , विराज् (पुं)
राजा. (7) - राज् (पुं) , राज् (पुं) , पार्थिव (पुं) , क्ष्माभृत् (पुं) , नृप (पुं) , भूप (पुं) , महीक्षित् (पुं)
राजा राट् पार्थिवक्ष्माभृन्नृपभूपमहीक्षितः॥ २.७.९३४ ॥
राजा. (7) - राज् (पुं) , राज् (पुं) , पार्थिव (पुं) , क्ष्माभृत् (पुं) , नृप (पुं) , भूप (पुं) , महीक्षित् (पुं)
सर्वसंनिहितनृपवशकारी. (1) - अधीश्वर (पुं)
राजा तु प्रणताशषसामन्तः स्यादधीश्वरः॥ २.७.९३५ ॥
सर्वसंनिहितनृपवशकारी. (1) - अधीश्वर (पुं)
चक्रवर्ती. (2) - चक्रवर्तिन् (पुं) , सार्वभौम (पुं)
चक्रवर्ती सार्वभौमो नृपोऽन्यो मण्डलेश्वरः॥ २.७.९३६ ॥
चक्रवर्ती. (2) - चक्रवर्तिन् (पुं) , सार्वभौम (पुं)
मण्डलेश्वरः. (1) - मण्डलेश्वर (पुं)
येनेष्टं राजसूयेन मण्डलस्येश्वरश्च यः॥ २.७.९३७ ॥
मण्डलेश्वरः. (1) - मण्डलेश्वर (पुं)
सम्राट्. (1) - सम्राट् (पुं) राजसमूहः. (1) - राजक (नपुं)
शास्ति यश्चाज्ञया राज्ञः स सम्राडथ राजकम्॥ २.७.९३८ ॥
सम्राट्. (1) - सम्राट् (पुं) राजसमूहः. (1) - राजक (नपुं)
क्षत्रियसमूहः. (1) - राजन्यक (नपुं)
राजन्यकं च नृपतिक्षत्रियाणां गणे क्रमात्॥ २.७.९३९ ॥
क्षत्रियसमूहः. (1) - राजन्यक (नपुं)
मन्त्री. (3) - मन्त्रिन् (पुं) , धीसचिव (पुं) , अमात्य (पुं) सहायकारिः. (1) - कर्मसचिव (पुं)
मन्त्री धीसचिवोऽमात्योऽन्ये कर्मसचिवास्ततः॥ २.७.९४० ॥
मन्त्री. (3) - मन्त्रिन् (पुं) , धीसचिव (पुं) , अमात्य (पुं) सहायकारिः. (1) - कर्मसचिव (पुं)
प्रधानोद्योगस्थाः. (2) - महामात्र (पुं) , प्रधान (नपुं) धर्माध्यक्षः. (2) - पुरोधस् (पुं) , पुरोहित (पुं)
महामात्रा प्रधानानि पुरोधास्तु पुरोहितः॥ २.७.९४१ ॥
प्रधानोद्योगस्थाः. (2) - महामात्र (पुं) , प्रधान (नपुं) धर्माध्यक्षः. (2) - पुरोधस् (पुं) , पुरोहित (पुं)
न्यायाधीशः. (2) - प्राड्विवाक (पुं) , अक्षदर्शक (पुं)
द्रष्टरि व्यवहाराणां प्राड्विवाकाक्षदर्शकौ॥ २.७.९४२ ॥
न्यायाधीशः. (2) - प्राड्विवाक (पुं) , अक्षदर्शक (पुं)
द्वारपालकः. (5) - प्रतीहार (पुं) , द्वारपाल (पुं) , द्वाःस्थ (पुं) , द्वास्थित (पुं) , दर्शक (पुं)
प्रतीहारो द्वारपालद्वास्थद्वास्थितदर्शकाः॥ २.७.९४३ ॥
द्वारपालकः. (5) - प्रतीहार (पुं) , द्वारपाल (पुं) , द्वाःस्थ (पुं) , द्वास्थित (पुं) , दर्शक (पुं)
राज्ञः रक्षिगणम्. (2) - रक्षिवर्ग (पुं) , अनीकस्थ (पुं) अधिकारी. (2) - अध्यक्ष (पुं) , अधिकृत (पुं)
रक्षिवर्गस्त्वनीकस्थोऽथाध्यक्षाधिकृतौ समौ॥ २.७.९४४ ॥
राज्ञः रक्षिगणम्. (2) - रक्षिवर्ग (पुं) , अनीकस्थ (पुं) अधिकारी. (2) - अध्यक्ष (पुं) , अधिकृत (पुं)
एकग्रामाधिकारी. (1) - स्थायुक (पुं) बहुग्रामाधिकृतः. (1) - गोप (पुं)
स्थायुकोऽधिकृतो ग्रामे गोपो ग्रामेषु भूरिषु॥ २.७.९४५ ॥
एकग्रामाधिकारी. (1) - स्थायुक (पुं) बहुग्रामाधिकृतः. (1) - गोप (पुं)
सुवर्णाधिकृतः. (2) - भौरिक (पुं) , कनकाध्यक्ष (पुं) रूप्याधिकृतः. (2) - रूप्याध्यक्ष (पुं) , नैष्किक (पुं)
भौरिकः कनकाध्यक्षो रूप्याध्यक्षस्तु नैष्किकः॥ २.७.९४६ ॥
सुवर्णाधिकृतः. (2) - भौरिक (पुं) , कनकाध्यक्ष (पुं) रूप्याधिकृतः. (2) - रूप्याध्यक्ष (पुं) , नैष्किक (पुं)
अन्तःपुराधिकृतः. (1) - अन्तर्वंशिक (पुं)
अन्तःपुरे त्वधिकृतः स्यादन्तर्वंशिको जनः॥ २.७.९४७ ॥
अन्तःपुराधिकृतः. (1) - अन्तर्वंशिक (पुं)
अन्तःपुरस्य रक्षाधिकारी. (4) - सौविदल्ल (पुं) , कञ्चुकिन् (पुं) , स्थापत्य (पुं) , सौविद (पुं)
सौविदल्लाः कञ्चुकिनः स्थापत्याः सौविदाश्च ते॥ २.७.९४८ ॥
अन्तःपुरस्य रक्षाधिकारी. (4) - सौविदल्ल (पुं) , कञ्चुकिन् (पुं) , स्थापत्य (पुं) , सौविद (पुं)
अन्तःपुरचारिणनपुंसकाः. (2) - शण्ढ (पुं) , वर्षवर (पुं) सेवकः. (3) - सेवक (पुं) , अर्थिन् (पुं) , अनुजीविन् (पुं)
शण्ढो वर्षवरस्तुल्यौ सेवकार्थ्यनुजीविनः॥ २.७.९४९ ॥
अन्तःपुरचारिणनपुंसकाः. (2) - शण्ढ (पुं) , वर्षवर (पुं) सेवकः. (3) - सेवक (पुं) , अर्थिन् (पुं) , अनुजीविन् (पुं)
स्वदेशाव्यवहितदेशराजा. (1) - शत्रु (पुं) शत्रुराज्याव्यवहितराजा. (1) - मित्र (नपुं)
विषयानन्तरो राजा शत्रुर्मित्रमतः परम्॥ २.७.९५० ॥
स्वदेशाव्यवहितदेशराजा. (1) - शत्रु (पुं) शत्रुराज्याव्यवहितराजा. (1) - मित्र (नपुं)
शत्रुमित्राभ्यां परतरः राजा. (1) - उदासीन (पुं) पृष्ठतो वर्तमानः राजा. (1) - पार्ष्णिग्राह (पुं)
उदासीनः परतरः पार्ष्णिग्राहस्तु पृष्ठतः॥ २.७.९५१ ॥
शत्रुमित्राभ्यां परतरः राजा. (1) - उदासीन (पुं) पृष्ठतो वर्तमानः राजा. (1) - पार्ष्णिग्राह (पुं)
शत्रुः. (7) - रिपु (पुं) , वैरिन् (पुं) , सपत्न (पुं) , अरि (पुं) , द्विषत् (पुं) , द्वेषण (पुं) , दुर्हृद् (पुं)
रिपौ वैरिसपत्नारिद्विषद्द्वेषणदुर्हृदः॥ २.७.९५२ ॥
शत्रुः. (7) - रिपु (पुं) , वैरिन् (पुं) , सपत्न (पुं) , अरि (पुं) , द्विषत् (पुं) , द्वेषण (पुं) , दुर्हृद् (पुं)
शत्रुः. (7) - द्विष् (पुं) , विपक्ष (पुं) , अहित (पुं) , अमित्र (नपुं) , दस्यु (पुं) , शात्रव (पुं) , शत्रु (पुं)
द्विड् विपक्षाहितामित्रदस्युशात्रवशत्रवः॥ २.७.९५३ ॥
शत्रुः. (7) - द्विष् (पुं) , विपक्ष (पुं) , अहित (पुं) , अमित्र (नपुं) , दस्यु (पुं) , शात्रव (पुं) , शत्रु (पुं)
शत्रुः. (5) - अभिघातिन् (पुं) , पर (पुं) , अराति (पुं) , प्रत्यर्थिन् (पुं) , परिपन्थिन् (पुं)
अभिघातिपरारातिप्रत्यर्थिपरिपन्थिनः॥ २.७.९५४ ॥
शत्रुः. (5) - अभिघातिन् (पुं) , पर (पुं) , अराति (पुं) , प्रत्यर्थिन् (पुं) , परिपन्थिन् (पुं)
तुल्यवयस्कः. (3) - वयस्य (पुं) , स्निग्ध (पुं) , सवयस् (पुं) मित्रम्. (3) - मित्र (पुं) , सखि (पुं) , सुहृद् (पुं)
वयस्यः स्निग्धः सवया अथ मित्रं सखा सुहृत्॥ २.७.९५५ ॥
तुल्यवयस्कः. (3) - वयस्य (पुं) , स्निग्ध (पुं) , सवयस् (पुं) मित्रम्. (3) - मित्र (पुं) , सखि (पुं) , सुहृद् (पुं)
सख्यधर्मः. (2) - सख्य (नपुं) , साप्तपदीन (नपुं) अनुसरणम्. (2) - अनुरोध (पुं) , अनुवर्तन (नपुं)
सख्यं साप्तपदीनं स्यादनुरोधोऽनुवर्तनम्॥ २.७.९५६ ॥
सख्यधर्मः. (2) - सख्य (नपुं) , साप्तपदीन (नपुं) अनुसरणम्. (2) - अनुरोध (पुं) , अनुवर्तन (नपुं)
चारपुरुषः. (5) - यथार्हवर्ण (पुं) , प्रणिधि (पुं) , अपसर्प (पुं) , चर (पुं) , स्पश (पुं)
यथार्हवर्णः प्रणिधिरपसर्पश्चरः स्पशः॥ २.७.९५७ ॥
चारपुरुषः. (5) - यथार्हवर्ण (पुं) , प्रणिधि (पुं) , अपसर्प (पुं) , चर (पुं) , स्पश (पुं)
चारपुरुषः. (2) - चार (पुं) , गूढपुरुष (पुं) विश्वासाधारः. (2) - आप्त (पुं) , प्रत्ययित (वि)
चारश्च गूढपुरुषश्चाप्तप्रत्ययितौ समौ॥ २.७.९५८ ॥
चारपुरुषः. (2) - चार (पुं) , गूढपुरुष (पुं) विश्वासाधारः. (2) - आप्त (पुं) , प्रत्ययित (वि)
ज्यौतिषिकः. (4) - सांवत्सर (पुं) , ज्यौतिषिक (पुं) , दैवज्ञ (पुं) , गणक (पुं)
सांवत्सरो ज्यौतिषिको दैवज्ञगणकावपि॥ २.७.९५९ ॥
ज्यौतिषिकः. (4) - सांवत्सर (पुं) , ज्यौतिषिक (पुं) , दैवज्ञ (पुं) , गणक (पुं)
ज्यौतिषिकः. (4) - मौहूर्तिक (पुं) , मौहूर्त (पुं) , ज्ञानिन् (पुं) , कार्तान्तिक (पुं)
स्युर्मौहूर्तिकमौहूर्तज्ञानिकार्तान्तिका अपि॥ २.७.९६० ॥
ज्यौतिषिकः. (4) - मौहूर्तिक (पुं) , मौहूर्त (पुं) , ज्ञानिन् (पुं) , कार्तान्तिक (पुं)
तत्वार्थज्ञाता. (2) - तान्त्रिक (पुं) , ज्ञातसिद्धान्त (पुं) सदान्नादिदानकर्तुः गृहस्थः. (2) - सत्रिन् (पुं) , गृहपति (पुं)
तान्त्रिको ज्ञातसिद्धान्तः सत्री गृहपतिः समौ॥ २.७.९६१ ॥
तत्वार्थज्ञाता. (2) - तान्त्रिक (पुं) , ज्ञातसिद्धान्त (पुं) सदान्नादिदानकर्तुः गृहस्थः. (2) - सत्रिन् (पुं) , गृहपति (पुं)
लेखकः. (4) - लिपिकार (पुं) , अक्षरचण (पुं) , अक्षरचुञ्चु (पुं) , लेखक (पुं)
लिपिकारोऽक्षरचरणोऽक्षरचुञ्चुश्च लेखके॥ २.७.९६२ ॥
लेखकः. (4) - लिपिकार (पुं) , अक्षरचण (पुं) , अक्षरचुञ्चु (पुं) , लेखक (पुं)
लिपिः. (2) - लिपि (स्त्री) , लिबि (स्त्री)
लिखिताक्षरविन्यासे (संस्थाने) लिपिर्लिब्(भ्)इरुभे स्त्रियौ॥ २.७.९६३ ॥
लिपिः. (2) - लिपि (स्त्री) , लिबि (स्त्री)
दूतः. (2) - सन्देशहर (पुं) , दूत (पुं) दूतकर्मः. (1) - दूत्य (नपुं)
स्यात्संदेशहरो दूतो दूत्यं तद्भावकर्मणी॥ २.७.९६४ ॥
दूतः. (2) - सन्देशहर (पुं) , दूत (पुं) दूतकर्मः. (1) - दूत्य (नपुं)
पान्थः. (5) - अध्वनीन (पुं) , अध्वग (पुं) , अध्वन्य (पुं) , पान्थ (पुं) , पथिक (पुं)
अध्वनीनोऽध्वगोऽध्वन्यः पान्थः पथिक इत्यपि॥ २.७.९६५ ॥
पान्थः. (5) - अध्वनीन (पुं) , अध्वग (पुं) , अध्वन्य (पुं) , पान्थ (पुं) , पथिक (पुं)
राजा. (1) - स्वामिन् (पुं) मन्त्री. (1) - अमात्य (पुं) मित्रम्. (1) - सुहृद् (पुं) भण्डारम्. (1) - कोश (पुं) स्वभूमिः. (1) - राष्ट्र (नपुं) पर्वतादयः. (1) - दुर्ग (नपुं) सेना. (1) - बल (पुं)
स्वाम्यमात्यसुहृत्कोशराष्ट्रदुर्गबलानि च॥ २.७.९६६ ॥
राजा. (1) - स्वामिन् (पुं) मन्त्री. (1) - अमात्य (पुं) मित्रम्. (1) - सुहृद् (पुं) भण्डारम्. (1) - कोश (पुं) स्वभूमिः. (1) - राष्ट्र (नपुं) पर्वतादयः. (1) - दुर्ग (नपुं) सेना. (1) - बल (पुं)
राज्याङ्गाः. (2) - राज्याङ्ग (नपुं) , प्रकृति (स्त्री)
राज्याङ्गानि प्रकृतयः पौराणां श्रेनयोऽपि च॥ २.७.९६७ ॥
राज्याङ्गाः. (2) - राज्याङ्ग (नपुं) , प्रकृति (स्त्री)
राज्यगुणः. (6) - सन्धि (पुं) , विग्रह (पुं) , यान (नपुं) , आसन (नपुं) , द्वैध (नपुं) , आश्रय (पुं)
संधिर्ना विग्रहो यानमासनं द्वैधमाश्रयः॥ २.७.९६८ ॥
राज्यगुणः. (6) - सन्धि (पुं) , विग्रह (पुं) , यान (नपुं) , आसन (नपुं) , द्वैध (नपुं) , आश्रय (पुं)
राजशक्तिः. (3) - प्रभाव (पुं) , उत्साह (पुं) , मन्त्रजा (स्त्री)
षड्गुणा: शक्तयस्तिस्रः प्रभावोत्साहमन्त्रजाः॥ २.७.९६९ ॥
राजशक्तिः. (3) - प्रभाव (पुं) , उत्साह (पुं) , मन्त्रजा (स्त्री)
अष्टवर्गाणां क्षयः. (1) - क्षय (पुं) अष्टवर्गाणां स्थितिः. (1) - स्थान (नपुं) अष्टवर्गाणां वृद्धिः. (1) - वृद्धि (स्त्री)
क्षयः स्थानं च वृद्धिश्च त्रिवर्गो नीतिवेदिनाम्॥ २.७.९७० ॥
अष्टवर्गाणां क्षयः. (1) - क्षय (पुं) अष्टवर्गाणां स्थितिः. (1) - स्थान (नपुं) अष्टवर्गाणां वृद्धिः. (1) - वृद्धि (स्त्री)
कोशदण्डजतेजः. (2) - प्रताप (पुं) , प्रभाव (पुं)
स प्रतापः प्रभावश्च यत्तेजः कोशदण्डजम्॥ २.७.९७१ ॥
कोशदण्डजतेजः. (2) - प्रताप (पुं) , प्रभाव (पुं)
उपायाः. (4) - भेद (पुं) , दण्ड (पुं) , सामन् (नपुं) , दान (नपुं)
भेदो दण्डः साम दानमित्युपायचतुष्टयम्॥ २.७.९७२ ॥
उपायाः. (4) - भेद (पुं) , दण्ड (पुं) , सामन् (नपुं) , दान (नपुं)
दण्डः. (3) - साहस (नपुं) , दम (पुं) , दण्ड (पुं) सामः. (2) - सामन् (नपुं) , सान्त्व (नपुं)
साहसं तु समो (दमो) दण्डः साम सान्त्वमथो समौ॥ २.७.९७३ ॥
दण्डः. (3) - साहस (नपुं) , दम (पुं) , दण्ड (पुं) सामः. (2) - सामन् (नपुं) , सान्त्व (नपुं)
भेदः. (2) - भेद (पुं) , उपजाप (पुं) धर्माद्यैः परीक्षणम्. (1) - उपधा (स्त्री)
भेदोपजापावुपधा धर्माद्यैर्यत्परीक्षणम्॥ २.७.९७४ ॥
भेदः. (2) - भेद (पुं) , उपजाप (पुं) धर्माद्यैः परीक्षणम्. (1) - उपधा (स्त्री)
द्वाभ्यामेव कृत मन्त्रः. (1) - अषडक्षीण (वि)
पञ्च त्रिष्वषडक्षीणो यस्तृतीयाद्यगोचरः॥ २.७.९७५ ॥
द्वाभ्यामेव कृत मन्त्रः. (1) - अषडक्षीण (वि)
विजनः. (5) - विविक्त (वि) , विजन (वि) , छन्न (वि) , निःशलाक (वि) , रहस् (नपुं)
विविक्तविजनच्छन्ननिःशलाकास्तथा रहः॥ २.७.९७६ ॥
विजनः. (5) - विविक्त (वि) , विजन (वि) , छन्न (वि) , निःशलाक (वि) , रहस् (नपुं)
विजनः. (2) - रहस् (अव्य) , उपांशु (अव्य) रहस्यम्. (1) - रहस्य (वि)
रहश्चोपांशु चालिङ्गे रहस्यं तद्भवे त्रिषु॥ २.७.९७७ ॥
विजनः. (2) - रहस् (अव्य) , उपांशु (अव्य) रहस्यम्. (1) - रहस्य (वि)
विश्वासः. (2) - विस्रम्भ (पुं) , विश्वास (पुं) भ्रंशः. (1) - भ्रेष (पुं)
समौ विस्रम्भविश्वासौ भ्रेषो भ्रंशो यथोचितात्॥ २.७.९७८ ॥
विश्वासः. (2) - विस्रम्भ (पुं) , विश्वास (पुं) भ्रंशः. (1) - भ्रेष (पुं)
नीतिः. (5) - अभ्रेष (पुं) , न्याय (पुं) , कल्प (पुं) , देशरूप (नपुं) , समञ्जस (नपुं)
अभ्रेषान्यायकल्पास्तु देशरूपं समञ्जसम्॥ २.७.९७९ ॥
नीतिः. (5) - अभ्रेष (पुं) , न्याय (पुं) , कल्प (पुं) , देशरूप (नपुं) , समञ्जस (नपुं)
न्यायादनपेतद्रव्यम्. (5) - युक्त (वि) , औपयिक (वि) , लभ्य (वि) , भजमान (वि) , अभिनीत (वि)
युक्तमौपयिकं लभ्यं भजमानाभिनीतवत्॥ २.७.९८० ॥
न्यायादनपेतद्रव्यम्. (5) - युक्त (वि) , औपयिक (वि) , लभ्य (वि) , भजमान (वि) , अभिनीत (वि)
न्यायादनपेतद्रव्यम्. (1) - न्याय्य (वि) युक्तायुक्तपरीक्षणम्. (2) - सम्प्रधारणा (स्त्री) , समर्थन (नपुं)
न्याय्यं च त्रिषु षट् संप्रधारणा तु समर्थनम्॥ २.७.९८१ ॥
न्यायादनपेतद्रव्यम्. (1) - न्याय्य (वि) युक्तायुक्तपरीक्षणम्. (2) - सम्प्रधारणा (स्त्री) , समर्थन (नपुं)
आज्ञा. (4) - अववाद (पुं) , निर्देश (पुं) , निदेश (पुं) , शासन (नपुं)
अववादस्तु निर्देशो निदेशः शासनं च सः॥ २.७.९८२ ॥
आज्ञा. (4) - अववाद (पुं) , निर्देश (पुं) , निदेश (पुं) , शासन (नपुं)
आज्ञा. (2) - शिष्टि (स्त्री) , आज्ञा (स्त्री) मर्यादा. (4) - संस्था (स्त्री) , मर्यादा (स्त्री) , धारणा (स्त्री) , स्थिति (स्त्री)
शिष्टिश्चाज्ञा च संस्था तु मर्यादा धारणा स्थितिः॥ २.७.९८३ ॥
आज्ञा. (2) - शिष्टि (स्त्री) , आज्ञा (स्त्री) मर्यादा. (4) - संस्था (स्त्री) , मर्यादा (स्त्री) , धारणा (स्त्री) , स्थिति (स्त्री)
अपराधः. (3) - आगस् (नपुं) , अपराध (पुं) , मन्तु (पुं) बन्धनम्. (2) - उद्दान (नपुं) , बन्धन (नपुं)
सुधरणा सुधारा स्त्री सुस्थितिः सुदशोन्नतिः॥ २.७.९८४ ॥
अपराधः. (3) - आगस् (नपुं) , अपराध (पुं) , मन्तु (पुं) बन्धनम्. (2) - उद्दान (नपुं) , बन्धन (नपुं)
द्विगुणदण्डः. (1) - द्विपाद्य (पुं) बलिः. (3) - भागधेय (पुं) , कर (पुं) , बलि (पुं)
आगोऽपराधो मन्तुश्च समे तूद्दानबन्धने॥ २.७.९८५ ॥
द्विगुणदण्डः. (1) - द्विपाद्य (पुं) बलिः. (3) - भागधेय (पुं) , कर (पुं) , बलि (पुं)
देवताभ्यो दीयमानः. (2) - प्राभृत (नपुं) , प्रदेशन (नपुं)
द्विपाद्यो द्विगुणो दण्डो भागधेयः करो बलिः॥ २.७.९८६ ॥
देवताभ्यो दीयमानः. (2) - प्राभृत (नपुं) , प्रदेशन (नपुं)
उपहारः. (4) - उपायन (नपुं) , उपग्राह्य (नपुं) , उपहार (पुं) , उपदा (स्त्री)
घट्टादिदेयं शुल्कोऽस्त्री प्राभृतं तु प्रदेशनम्॥ २.७.९८७ ॥
उपहारः. (4) - उपायन (नपुं) , उपग्राह्य (नपुं) , उपहार (पुं) , उपदा (स्त्री)
अवश्यं दीयमानद्रव्यम्. (2) - सुदाय (पुं) , हरण (नपुं)
उपायनमुपग्राह्यमुपहारस्तथोपदा॥ २.७.९८८ ॥
अवश्यं दीयमानद्रव्यम्. (2) - सुदाय (पुं) , हरण (नपुं)
वर्तमानकालः. (2) - तत्काल (पुं) , तदात्व (नपुं)
यौतकादि तु यद्देयं सुदायो हरणं च तत्॥ २.७.९८९ ॥
वर्तमानकालः. (2) - तत्काल (पुं) , तदात्व (नपुं)
सद्योजायमानफलम्. (1) - सान्दृष्टिक (नपुं) भाविनः फलम्. (1) - उदर्क (पुं)
तत्कालस्तु तदात्वं स्यादुत्तरः काल आयतिः॥ २.७.९९० ॥
सद्योजायमानफलम्. (1) - सान्दृष्टिक (नपुं) भाविनः फलम्. (1) - उदर्क (पुं)
अग्न्यादिकृतभयम्. (1) - अदृष्ट (नपुं) स्वपरसैन्याद्भयम्. (1) - दृष्ट (नपुं)
सांदृष्टिकं फलं सद्यः उदर्कः फलमुत्तरम्॥ २.७.९९१ ॥
अग्न्यादिकृतभयम्. (1) - अदृष्ट (नपुं) स्वपरसैन्याद्भयम्. (1) - दृष्ट (नपुं)
स्वपक्षप्रभवभयम्. (1) - अहिभय (नपुं)
अदृष्टं वह्नितोयादि दृष्टं स्वपरचक्रजम्॥ २.७.९९२ ॥
स्वपक्षप्रभवभयम्. (1) - अहिभय (नपुं)
राज्ञां छत्रचामरादिव्यापारः. (2) - प्रक्रिया (स्त्री) , अधिकार (पुं) चामरम्. (2) - चामर (नपुं) , प्रकीर्णक (नपुं)
महीभुजामहिभयं स्वपक्षप्रभवं भयम्॥ २.७.९९३ ॥
राज्ञां छत्रचामरादिव्यापारः. (2) - प्रक्रिया (स्त्री) , अधिकार (पुं) चामरम्. (2) - चामर (नपुं) , प्रकीर्णक (नपुं)
राजासनम्. (2) - नृपासन (नपुं) , भद्रासन (नपुं) सुवर्णकृतराजासनम्. (1) - सिंहासन (नपुं)
प्रक्रिया त्वधिकारः स्याच्चामरं तु प्रकीर्णकम्॥ २.७.९९४ ॥
राजासनम्. (2) - नृपासन (नपुं) , भद्रासन (नपुं) सुवर्णकृतराजासनम्. (1) - सिंहासन (नपुं)
छत्रम्. (2) - छत्र (नपुं) , आतपत्र (नपुं) नृपच्छत्रम्. (1) - नृपलक्ष्म (नपुं)
नृपासनं यत्तद्भद्रासनं सिंहासनं तु तत्॥ २.७.९९५ ॥
छत्रम्. (2) - छत्र (नपुं) , आतपत्र (नपुं) नृपच्छत्रम्. (1) - नृपलक्ष्म (नपुं)
पूर्णघटम्. (2) - भद्रकुम्भ (पुं) , पूर्णकुम्भ (पुं) सुवर्णजलपात्रम्. (2) - भृङ्गार (पुं) , कनकालुका (स्त्री)
हैमं छत्रं त्वातपत्रं राज्ञस्तु नृपलक्ष्म तत्॥ २.७.९९६ ॥
पूर्णघटम्. (2) - भद्रकुम्भ (पुं) , पूर्णकुम्भ (पुं) सुवर्णजलपात्रम्. (2) - भृङ्गार (पुं) , कनकालुका (स्त्री)
सैन्यवासस्थानम्. (2) - निवेश (पुं) , शिबिर (नपुं) सैन्यरक्षणप्रहरिकादिः. (2) - सज्जन (नपुं) , उपरक्षण (नपुं)
भद्रकुम्भः पूर्णकुम्भो भृङ्गारः कनकालुका॥ २.७.९९७ ॥
सैन्यवासस्थानम्. (2) - निवेश (पुं) , शिबिर (नपुं) सैन्यरक्षणप्रहरिकादिः. (2) - सज्जन (नपुं) , उपरक्षण (नपुं)
हस्त्यश्वरथपादातसेना. (1) - सेनाङ्ग (नपुं)
निवेशः शिबिरं षण्ढे सज्जनं तूपरक्षणम्॥ २.७.९९८ ॥
हस्त्यश्वरथपादातसेना. (1) - सेनाङ्ग (नपुं)
हस्तिः. (6) - दन्तिन् (पुं) , दन्तावल (पुं) , हस्तिन् (पुं) , द्विरद (पुं) , अनेकप (पुं) , द्विप (पुं)
हस्त्यश्वरथपादातं सेनाङ्गं स्याच्चतुष्टयम्॥ २.७.९९९ ॥
हस्तिः. (6) - दन्तिन् (पुं) , दन्तावल (पुं) , हस्तिन् (पुं) , द्विरद (पुं) , अनेकप (पुं) , द्विप (पुं)
हस्तिः. (6) - मतङ्गज (पुं) , गज (पुं) , नाग (पुं) , कुञ्जर (पुं) , वारण (पुं) , करिन् (पुं)
दन्ती दन्तावलो हस्ती द्विरदोऽनेकपो द्विपः॥ २.७.१००० ॥
हस्तिः. (6) - मतङ्गज (पुं) , गज (पुं) , नाग (पुं) , कुञ्जर (पुं) , वारण (पुं) , करिन् (पुं)
हस्तिः. (3) - इभ (पुं) , स्तम्बेरम (पुं) , पद्मिन् (पुं) यूथमुख्यहस्तिः. (2) - यूथनाथ (पुं) , यूथप (पुं)
मतङ्गजो गजो नागः कुञ्जरो वारणः करी॥ २.७.१००१ ॥
हस्तिः. (3) - इभ (पुं) , स्तम्बेरम (पुं) , पद्मिन् (पुं) यूथमुख्यहस्तिः. (2) - यूथनाथ (पुं) , यूथप (पुं)
अन्तर्मदहस्तिः. (2) - मदोत्कट (पुं) , मदकल (पुं) करिपोतः. (2) - कलभ (पुं) , करिशावक (पुं)
इभः स्तम्बेरभः पद्मी यूथनाथस्तु यूथपः॥ २.७.१००२ ॥
अन्तर्मदहस्तिः. (2) - मदोत्कट (पुं) , मदकल (पुं) करिपोतः. (2) - कलभ (पुं) , करिशावक (पुं)
मत्तगजः. (3) - प्रभिन्न (पुं) , गर्जित (पुं) , मत्त (पुं)
मदोत्कटो मदकलः कलभः करिशावकः॥ २.७.१००३ ॥
मत्तगजः. (3) - प्रभिन्न (पुं) , गर्जित (पुं) , मत्त (पुं)
हस्तिवृन्दम्. (2) - हास्तिक (नपुं) , गजता (स्त्री) हस्तिनी. (3) - करिणी (स्त्री) , धेनुका (स्त्री) , वशा (स्त्री)
प्रभिन्नो गर्जितो मत्तः समावुद्वान्तनिर्मदौ॥ २.७.१००४ ॥
हस्तिवृन्दम्. (2) - हास्तिक (नपुं) , गजता (स्त्री) हस्तिनी. (3) - करिणी (स्त्री) , धेनुका (स्त्री) , वशा (स्त्री)
गजगण्डः. (2) - गण्ड (पुं) , कट (पुं) मदजलम्. (2) - मद (पुं) , दान (नपुं) शुण्डानिर्गतजलम्. (2) - वमथु (पुं) , करशीकर (पुं)
हास्तिकं गजता वृन्दे करिणी धेनुका वशा॥ २.७.१००५ ॥
गजगण्डः. (2) - गण्ड (पुं) , कट (पुं) मदजलम्. (2) - मद (पुं) , दान (नपुं) शुण्डानिर्गतजलम्. (2) - वमथु (पुं) , करशीकर (पुं)
गजमस्तकौ. (3) - कुम्भ (पुं) , पिण्ड (पुं) , शिरस् (नपुं) गजमस्तकमध्यभागः. (1) - विदु (पुं)
गण्डः कटो मदो दानं वमथुः करशीकरः॥ २.७.१००६ ॥
गजमस्तकौ. (3) - कुम्भ (पुं) , पिण्ड (पुं) , शिरस् (नपुं) गजमस्तकमध्यभागः. (1) - विदु (पुं)
गजललाटम्. (1) - अवग्रह (पुं) गजनेत्रगोलकम्. (1) - ईषिका (स्त्री)
कुम्भौ तु पिण्डौ शिरसस्तयोर्मध्ये विदुः पुमान्॥ २.७.१००७ ॥
गजललाटम्. (1) - अवग्रह (पुं) गजनेत्रगोलकम्. (1) - ईषिका (स्त्री)
गजापाङ्गदेशः. (1) - निर्याण (नपुं) गजकर्णमूलम्. (1) - चूलिका (स्त्री)
अवग्रहो ललाटं स्यादीषिका त्वक्षिकूटकम्॥ २.७.१००८ ॥
गजापाङ्गदेशः. (1) - निर्याण (नपुं) गजकर्णमूलम्. (1) - चूलिका (स्त्री)
गजकुम्भाधोभागः. (1) - वाहित्थ (नपुं) वाहित्थाधोभागदन्तमध्यम्. (1) - प्रतिमान (नपुं)
अपाङ्गदेशो निर्याणं कर्णमूलं तु चूलिका॥ २.७.१००९ ॥
गजकुम्भाधोभागः. (1) - वाहित्थ (नपुं) वाहित्थाधोभागदन्तमध्यम्. (1) - प्रतिमान (नपुं)
गजस्कन्धदेशः. (2) - आसन (नपुं) , स्कन्धदेश (पुं) गजमुखादिस्थबिन्दुसमूहः. (2) - पद्मक (नपुं) , बिन्दुजालक (नपुं)
अधः कुम्भस्य वाहित्थं प्रतिमानमधोऽस्य यत्॥ २.७.१०१० ॥
गजस्कन्धदेशः. (2) - आसन (नपुं) , स्कन्धदेश (पुं) गजमुखादिस्थबिन्दुसमूहः. (2) - पद्मक (नपुं) , बिन्दुजालक (नपुं)
गजपार्श्वभागः. (2) - पार्श्वभाग (पुं) , पक्षभाग (पुं) अग्रभागः. (1) - दन्तभाग (पुं)
आसनं स्कन्धदेशः स्यात्पद्मकं बिन्दुजालकम्॥ २.७.१०११ ॥
गजपार्श्वभागः. (2) - पार्श्वभाग (पुं) , पक्षभाग (पुं) अग्रभागः. (1) - दन्तभाग (पुं)
गजजङ्घापूर्वभागः. (1) - गात्र (नपुं) गजजङ्घापरोभागः. (1) - आवर (नपुं)
पार्श्वभागः पक्षभागो दन्तभागस्तु योऽग्रतः॥ २.७.१०१२ ॥
गजजङ्घापूर्वभागः. (1) - गात्र (नपुं) गजजङ्घापरोभागः. (1) - आवर (नपुं)
गजतोदनदण्डः. (2) - तोत्र (नपुं) , वेणुक (नपुं) गजबन्धनस्तम्भः. (2) - आलान (नपुं) , बन्धस्तम्भ (पुं)
द्वौ पूर्वपश्चाज्जङ्घादिदेशौ गात्रावरे क्रमात्॥ २.७.१०१३ ॥
गजतोदनदण्डः. (2) - तोत्र (नपुं) , वेणुक (नपुं) गजबन्धनस्तम्भः. (2) - आलान (नपुं) , बन्धस्तम्भ (पुं)
गजशृङ्खला. (2) - अन्दुक (पुं) , निगड (पुं-नपुं) गजाङ्कुशः. (2) - अङ्कुश (पुं-नपुं) , सृणि (स्त्री)
तोत्रं वेणुकमालानं बन्धस्तम्भेऽथ शृङ्खले॥ २.७.१०१४ ॥
गजशृङ्खला. (2) - अन्दुक (पुं) , निगड (पुं-नपुं) गजाङ्कुशः. (2) - अङ्कुश (पुं-नपुं) , सृणि (स्त्री)
गजमध्यबन्धनचर्मरज्जुः. (3) - दूष्या (स्त्री) , कक्ष्या (स्त्री) , वरत्रा (स्त्री) गजसज्जीकरणम्. (2) - कल्पना (स्त्री) , सज्जना (स्त्री)
अन्दुको निगडोऽस्त्री स्यादङ्कुशोऽस्त्री सृणिः स्त्रियाम्॥ २.७.१०१५ ॥
गजमध्यबन्धनचर्मरज्जुः. (3) - दूष्या (स्त्री) , कक्ष्या (स्त्री) , वरत्रा (स्त्री) गजसज्जीकरणम्. (2) - कल्पना (स्त्री) , सज्जना (स्त्री)
गजपृष्टवर्ती चित्रकम्बलः. (5) - प्रवेणि (स्त्री) , आस्तरण (नपुं) , वर्ण (पुं) , परिस्तोम (पुं) , कुथ (स्त्री-पुं)
दूष्या (चूषा) कक्ष्या वरत्रा स्यात्कल्पना सज्जना समे॥ २.७.१०१६ ॥
गजपृष्टवर्ती चित्रकम्बलः. (5) - प्रवेणि (स्त्री) , आस्तरण (नपुं) , वर्ण (पुं) , परिस्तोम (पुं) , कुथ (स्त्री-पुं)
निर्बलहस्त्यश्वसमूहः. (1) - वीत (नपुं)
प्रवेण्यास्तरणं वर्णः परिस्तोमः कुथो द्वयोः॥ २.७.१०१७ ॥
निर्बलहस्त्यश्वसमूहः. (1) - वीत (नपुं)
गजबन्धनशाला. (2) - वारी (स्त्री) , गजबन्धनी (स्त्री)
वीतं त्वसारं हस्त्यश्वं वारी तु गजबन्धनी॥ २.७.१०१८ ॥
गजबन्धनशाला. (2) - वारी (स्त्री) , गजबन्धनी (स्त्री)
अश्वः. (6) - घोटक (पुं) , वीति (पुं) , तुरग (पुं) , तुरङ्ग (पुं) , अश्व (पुं) , तुरङ्गम (पुं)
घोटके वीति (पीति) तुरगतुरङ्गाश्वतुरङ्गमाः॥ २.७.१०१९ ॥
अश्वः. (6) - घोटक (पुं) , वीति (पुं) , तुरग (पुं) , तुरङ्ग (पुं) , अश्व (पुं) , तुरङ्गम (पुं)
अश्वः. (7) - वाजिन् (पुं) , वाह (पुं) , अर्वन् (पुं) , गन्धर्व (पुं) , हय (पुं) , सैन्धव (पुं) , सप्ति (पुं)
वाजिवाहार्वगन्धर्वहयसैन्धवसप्तयः॥ २.७.१०२० ॥
अश्वः. (7) - वाजिन् (पुं) , वाह (पुं) , अर्वन् (पुं) , गन्धर्व (पुं) , हय (पुं) , सैन्धव (पुं) , सप्ति (पुं)
कुलीनाश्वः. (2) - आजानेय (पुं) , कुलीन (पुं) सम्यग्गतिमान् वाजिः. (2) - विनीत (पुं) , साधुवाहिन् (पुं)
आजानेयाः कुलीनाः स्युर्विनीताः साधुवाहिनः॥ २.७.१०२१ ॥
कुलीनाश्वः. (2) - आजानेय (पुं) , कुलीन (पुं) सम्यग्गतिमान् वाजिः. (2) - विनीत (पुं) , साधुवाहिन् (पुं)
वनायुदेशवाजिः. (1) - वनायुज (पुं) पारसीदेशवाजिः. (1) - पारसीक (पुं) काम्बोजदेशवाजिः. (1) - काम्बोज (पुं) बाल्हिकदेशवाजिः. (1) - बाह्लिक (पुं)
वनायुजाः पारसीकाः काम्बोजाः बाह्लिका हयाः॥ २.७.१०२२ ॥
वनायुदेशवाजिः. (1) - वनायुज (पुं) पारसीदेशवाजिः. (1) - पारसीक (पुं) काम्बोजदेशवाजिः. (1) - काम्बोज (पुं) बाल्हिकदेशवाजिः. (1) - बाह्लिक (पुं)
अश्वमेधीयवाजिः. (2) - ययु (पुं) , अश्वमेधीय (पुं) अधिकवेगवाजिः. (2) - जवन (पुं) , जवाधिक (पुं)
ययुरश्वोऽश्वमेधीयो जवनस्तु जवाधिकः॥ २.७.१०२३ ॥
अश्वमेधीयवाजिः. (2) - ययु (पुं) , अश्वमेधीय (पुं) अधिकवेगवाजिः. (2) - जवन (पुं) , जवाधिक (पुं)
भारवाह्यश्वः. (2) - पृष्ठ्य (पुं) , स्थौरिन् (पुं) शुक्लाश्वः. (2) - सित (पुं) , कर्क (पुं)
पृष्ठ्यः स्थौरी सितः कर्को रथ्यो वोढा रथस्य यः॥ २.७.१०२४ ॥
भारवाह्यश्वः. (2) - पृष्ठ्य (पुं) , स्थौरिन् (पुं) शुक्लाश्वः. (2) - सित (पुं) , कर्क (पुं)
अश्वबालः. (2) - बाल (पुं) , किशोर (पुं) अश्वा. (3) - वामी (स्त्री) , अश्वा (स्त्री) , वडवा (स्त्री)
बालः किशोरो वाम्यश्वा वडवा वाडवं गणे॥ २.७.१०२५ ॥
अश्वबालः. (2) - बाल (पुं) , किशोर (पुं) अश्वा. (3) - वामी (स्त्री) , अश्वा (स्त्री) , वडवा (स्त्री)
अश्वेन दिनैकाक्रमणदेशः. (1) - आश्वीन (वि)
त्रिष्वाश्वीनं यदश्वेन दिनेनैकेन गम्यते॥ २.७.१०२६ ॥
अश्वेन दिनैकाक्रमणदेशः. (1) - आश्वीन (वि)
अश्वमध्यम्. (1) - कश्य (नपुं) अश्वशब्दः. (2) - हेषा (स्त्री) , ह्रेषा (स्त्री)
कश्यं तु मध्यमश्वानां हेषा ह्रेषा च निस्वनः॥ २.७.१०२७ ॥
अश्वमध्यम्. (1) - कश्य (नपुं) अश्वशब्दः. (2) - हेषा (स्त्री) , ह्रेषा (स्त्री)
अश्वगलसमीपभागः. (2) - निगाल (पुं) , गलोद्देश (पुं) अश्ववृन्दम्. (2) - आश्वीय (नपुं) , आश्व (नपुं)
निगालस्तु गलोद्देशो वृन्दे त्वश्वीयमाश्ववत्॥ २.७.१०२८ ॥
अश्वगलसमीपभागः. (2) - निगाल (पुं) , गलोद्देश (पुं) अश्ववृन्दम्. (2) - आश्वीय (नपुं) , आश्व (नपुं)
अश्वगतिविशेषः. (5) - आस्कन्दित (नपुं) , धौरितक (नपुं) , रेचित (नपुं) , वल्गित (नपुं) , प्लुत (नपुं)
आस्कन्दितं धौरितकं रेचितम् वल्गितं प्लुतम्॥ २.७.१०२९ ॥
अश्वगतिविशेषः. (5) - आस्कन्दित (नपुं) , धौरितक (नपुं) , रेचित (नपुं) , वल्गित (नपुं) , प्लुत (नपुं)
आस्कन्दितादि पञ्चगतयः. (1) - धारा (स्त्री) अश्वनासिका. (2) - घोणा (स्त्री) , प्रोथ (पुं-नपुं)
गतयोऽमूः पञ्च धारा घोणा तु प्रोथमस्त्रियाम्॥ २.७.१०३० ॥
आस्कन्दितादि पञ्चगतयः. (1) - धारा (स्त्री) अश्वनासिका. (2) - घोणा (स्त्री) , प्रोथ (पुं-नपुं)
खलीनः. (2) - कविका (स्त्री) , खलीन (पुं-नपुं) मृगपादः. (2) - शफ (नपुं) , खुर (पुं)
कविका तु खलीनोऽस्त्री शफं क्लीबे खुरः पुमान्॥ २.७.१०३१ ॥
खलीनः. (2) - कविका (स्त्री) , खलीन (पुं-नपुं) मृगपादः. (2) - शफ (नपुं) , खुर (पुं)
मृगपुच्छः. (3) - पुच्छ (पुं-नपुं) , लूमन् (नपुं) , लाङ्गूल (नपुं) केशवल्लाङ्गूलम्. (2) - वालहस्त (पुं) , वालधि (पुं)
पुच्छोऽस्त्री लूमलाङ्गूले वालहस्तश्च वालधिः॥ २.७.१०३२ ॥
मृगपुच्छः. (3) - पुच्छ (पुं-नपुं) , लूमन् (नपुं) , लाङ्गूल (नपुं) केशवल्लाङ्गूलम्. (2) - वालहस्त (पुं) , वालधि (पुं)
श्रान्त्या भूमौ लुठिताश्वः. (2) - उपावृत्त (वि) , लुठित (वि)
त्रिषूपावृत्तलुठितौ परावृत्ते मुहुर्भुवि॥ २.७.१०३३ ॥
श्रान्त्या भूमौ लुठिताश्वः. (2) - उपावृत्त (वि) , लुठित (वि)
रथः. (3) - शताङ्ग (पुं) , स्यन्दन (पुं) , रथ (पुं)
याने चक्रिणि युद्धार्थे शताङ्गः स्यन्दनो रथः॥ २.७.१०३४ ॥
रथः. (3) - शताङ्ग (पुं) , स्यन्दन (पुं) , रथ (पुं)
क्रीडारथः. (1) - पुष्यरथ (पुं)
असौ पुष्परथश्चक्रयानं न समराय यत्॥ २.७.१०३५ ॥
क्रीडारथः. (1) - पुष्यरथ (पुं)
पुरुषस्कन्धवाह्ययानम्. (3) - कर्णीरथ (पुं) , प्रवहण (नपुं) , डयन (नपुं)
कर्णीरथः प्रवहणं डयनं च समं त्रयम्॥ २.७.१०३६ ॥
पुरुषस्कन्धवाह्ययानम्. (3) - कर्णीरथ (पुं) , प्रवहण (नपुं) , डयन (नपुं)
शकटम्. (2) - अनस् (नपुं) , शकट (पुं-नपुं) शकटिका. (2) - गन्त्री (स्त्री) , कम्बलिवाह्यक (नपुं)
क्लीबेऽनः शकटोऽस्त्री स्याद्गन्त्री कम्बलिवाह्यकम्॥ २.७.१०३७ ॥
शकटम्. (2) - अनस् (नपुं) , शकट (पुं-नपुं) शकटिका. (2) - गन्त्री (स्त्री) , कम्बलिवाह्यक (नपुं)
पालकी. (2) - शिबिका (स्त्री) , याप्ययान (नपुं) दोला. (2) - दोला (स्त्री) , प्रेङ्खा (स्त्री)
शिबिका याप्ययानं स्याद्दोला प्रेङ्खादिकाः स्त्रियाम्॥ २.७.१०३८ ॥
पालकी. (2) - शिबिका (स्त्री) , याप्ययान (नपुं) दोला. (2) - दोला (स्त्री) , प्रेङ्खा (स्त्री)
व्याघ्रचर्मवेष्टितरथः. (2) - द्वैप (वि) , वैयाघ्र (वि)
उभौ तु द्वैपवैयाघ्रौ द्वीपिचर्मावृते रथे॥ २.७.१०३९ ॥
व्याघ्रचर्मवेष्टितरथः. (2) - द्वैप (वि) , वैयाघ्र (वि)
शुक्लकम्बलवेष्टितरथः. (1) - पाण्डुकम्बलिन् (वि)
पाण्डुकम्बलसंवीतः स्यन्दनः पाण्डुकम्बली॥ २.७.१०४० ॥
शुक्लकम्बलवेष्टितरथः. (1) - पाण्डुकम्बलिन् (वि)
कम्बलाद्यावृतरथः. (1) - काम्बल (पुं)
रथे काम्बलवास्त्राद्याः कम्बलादिभिरावृते॥ २.७.१०४१ ॥
कम्बलाद्यावृतरथः. (1) - काम्बल (पुं)
रथसमूहः. (3) - रथ्या (स्त्री) , रथकट्या (स्त्री) , रथव्रज (पुं)
त्रिषु द्वैपादयो रथ्या रथकड्या रथव्रजे॥ २.७.१०४२ ॥
रथसमूहः. (3) - रथ्या (स्त्री) , रथकट्या (स्त्री) , रथव्रज (पुं)
रथादीनां मुखभागः. (2) - धू (स्त्री) , यानमुख (नपुं) रथावयवमात्रम्. (2) - रथाङ्ग (नपुं) , अपस्कर (पुं)
धूः स्त्री क्लीबे यानमुखं स्याद्रथाङ्गमपस्करः॥ २.७.१०४३ ॥
रथादीनां मुखभागः. (2) - धू (स्त्री) , यानमुख (नपुं) रथावयवमात्रम्. (2) - रथाङ्ग (नपुं) , अपस्कर (पुं)
चक्रम्. (2) - चक्र (नपुं) , रथाङ्ग (नपुं) चक्रान्तभागः. (2) - नेमि (स्त्री) , प्रधि (पुं)
चक्रं रथाङ्गं तस्यान्ते नेमिः स्त्री स्यात्प्रधिः पुमान्॥ २.७.१०४४ ॥
चक्रम्. (2) - चक्र (नपुं) , रथाङ्ग (नपुं) चक्रान्तभागः. (2) - नेमि (स्त्री) , प्रधि (पुं)
रथचक्रमध्यमण्डलाकारः. (2) - पिण्डिका (स्त्री) , नाभि (पुं) चक्रधारणकीलकम्. (2) - अक्षाग्रकीलक (पुं) , अणि (स्त्री-पुं)
पिण्डिका नाभिरक्षाग्रकीलके तु द्वयोरणिः॥ २.७.१०४५ ॥
रथचक्रमध्यमण्डलाकारः. (2) - पिण्डिका (स्त्री) , नाभि (पुं) चक्रधारणकीलकम्. (2) - अक्षाग्रकीलक (पुं) , अणि (स्त्री-पुं)
शस्त्राघादरक्षनार्थलोहादिमयावरणम्. (2) - रथगुप्ति (स्त्री) , वरूथ (पुं) युगकाष्ठबन्धनस्थानम्. (2) - कूबर (पुं) , युगन्धर (पुं)
रथगुप्तिर्वरूथो ना कूबरस्तु युगंधरः॥ २.७.१०४६ ॥
शस्त्राघादरक्षनार्थलोहादिमयावरणम्. (2) - रथगुप्ति (स्त्री) , वरूथ (पुं) युगकाष्ठबन्धनस्थानम्. (2) - कूबर (पुं) , युगन्धर (पुं)
रथस्याधस्थदारुः. (1) - अनुकर्ष (पुं) अन्यवृषयुग्मम्. (1) - प्रासङ्ग (पुं)
अनुकर्षी दार्वधःस्थं प्रासङ्गो ना युगाद्युगः॥ २.७.१०४७ ॥
रथस्याधस्थदारुः. (1) - अनुकर्ष (पुं) अन्यवृषयुग्मम्. (1) - प्रासङ्ग (पुं)
वाहनम्. (5) - वाहन (नपुं) , यान (नपुं) , युग्य (नपुं) , पत्र (नपुं) , धोरण (नपुं)
सर्वं स्याद्वाहनं यानं युग्यं पत्रं च धोरणम्॥ २.७.१०४८ ॥
वाहनम्. (5) - वाहन (नपुं) , यान (नपुं) , युग्य (नपुं) , पत्र (नपुं) , धोरण (नपुं)
परम्परावाहनम्. (1) - वैनीतक (पुं-नपुं)
परम्परावाहनं यत्तद्वैनीतकमस्त्रियाम्॥ २.७.१०४९ ॥
परम्परावाहनम्. (1) - वैनीतक (पुं-नपुं)
हस्तिपकः. (4) - आधोरण (पुं) , हस्तिपक (पुं) , हस्त्यारोह (पुं) , निषादिन् (पुं)
आधोरणा हस्तिपका हस्त्यारोहा निषादिनः॥ २.७.१०५० ॥
हस्तिपकः. (4) - आधोरण (पुं) , हस्तिपक (पुं) , हस्त्यारोह (पुं) , निषादिन् (पुं)
सारथिः. (6) - नियन्तृ (पुं) , प्राजितृ (पुं) , यन्तृ (पुं) , सूत (पुं) , क्षन्त्रृ (पुं) , सारथि (पुं)
नियन्ता प्राजिता यन्ता सूतः क्षत्ता च सारथिः॥ २.७.१०५१ ॥
सारथिः. (6) - नियन्तृ (पुं) , प्राजितृ (पुं) , यन्तृ (पुं) , सूत (पुं) , क्षन्त्रृ (पुं) , सारथि (पुं)
सारथिः. (2) - सव्येष्ठ (पुं) , दक्षिणस्थ (पुं)
सव्येष्ठदक्षिणस्थौ च संज्ञा रथकुटुम्बिनः॥ २.७.१०५२ ॥
सारथिः. (2) - सव्येष्ठ (पुं) , दक्षिणस्थ (पुं)
रथारूढयोद्धा. (2) - रथिन् (पुं) , स्यन्दनारोह (पुं) अश्वारोहः. (2) - अश्वारोह (पुं) , सादिन् (पुं)
रथिनः स्यन्दनारोहा अश्वारोहास्तु सादिनः॥ २.७.१०५३ ॥
रथारूढयोद्धा. (2) - रथिन् (पुं) , स्यन्दनारोह (पुं) अश्वारोहः. (2) - अश्वारोह (पुं) , सादिन् (पुं)
योद्धा. (3) - भट (पुं) , योध (पुं) , योद्धृ (पुं) सेनारक्षकः. (2) - सेनारक्ष (पुं) , सैनिक (पुं)
भटा योधाश्च योद्धारः सेनारक्षास्तु सैनिकाः॥ २.७.१०५४ ॥
योद्धा. (3) - भट (पुं) , योध (पुं) , योद्धृ (पुं) सेनारक्षकः. (2) - सेनारक्ष (पुं) , सैनिक (पुं)
सेनायां समवेतः. (2) - सैन्य (पुं) , सैनिक (पुं)
सेनायां समवेता ये सैन्यास्ते सैनिकाश्च ते॥ २.७.१०५५ ॥
सेनायां समवेतः. (2) - सैन्य (पुं) , सैनिक (पुं)
सहस्रभटनेता. (2) - साहस्र (पुं) , सहस्रिन् (पुं)
बलिनो ये सहस्रेण साहस्रास्ते सहस्रिणः॥ २.७.१०५६ ॥
सहस्रभटनेता. (2) - साहस्र (पुं) , सहस्रिन् (पुं)
सेनानियन्तः. (2) - परिधिस्थ (पुं) , परिचर (पुं) सैन्याधिपतिः. (2) - सेनानी (पुं) , वाहिनीपति (पुं)
परिधिस्थः परिचरः सेनानीर्वाहिनीपतिः॥ २.७.१०५७ ॥
सेनानियन्तः. (2) - परिधिस्थ (पुं) , परिचर (पुं) सैन्याधिपतिः. (2) - सेनानी (पुं) , वाहिनीपति (पुं)
चोलकादिसन्नाहः. (2) - कञ्चुक (पुं) , वारबाण (पुं-नपुं)
कञ्चुको वारबाणोऽस्त्री यत्तु मध्ये सकञ्चुकाः॥ २.७.१०५८ ॥
चोलकादिसन्नाहः. (2) - कञ्चुक (पुं) , वारबाण (पुं-नपुं)
दार्ढ्यार्थं कञ्चुकोपरि बद्धः. (2) - सारसन (नपुं) , अधिकाङ्ग (पुं) शिरस्त्राणः. (1) - शीर्षक (नपुं)
बध्नन्ति तत्सारसनमधिकाङ्गोऽथ शीर्षकम्॥ २.७.१०५९ ॥
दार्ढ्यार्थं कञ्चुकोपरि बद्धः. (2) - सारसन (नपुं) , अधिकाङ्ग (पुं) शिरस्त्राणः. (1) - शीर्षक (नपुं)
शिरस्त्राणः. (2) - शीर्षण्य (नपुं) , शिरस्त्र (नपुं) सन्नाहः. (3) - तनुत्र (नपुं) , वर्मन् (नपुं) , दंशन (नपुं)
शीर्षण्यं च शिरस्त्रेऽथ तनुत्रं वर्म दंशनम्॥ २.७.१०६० ॥
शिरस्त्राणः. (2) - शीर्षण्य (नपुं) , शिरस्त्र (नपुं) सन्नाहः. (3) - तनुत्र (नपुं) , वर्मन् (नपुं) , दंशन (नपुं)
सन्नाहः. (4) - उरःछद (पुं) , कङ्कटक (पुं) , जगर (पुं) , कवच (पुं-नपुं)
उरश्छदः कङ्कटको जागरः कवचोऽस्त्रियाम्॥ २.७.१०६१ ॥
सन्नाहः. (4) - उरःछद (पुं) , कङ्कटक (पुं) , जगर (पुं) , कवच (पुं-नपुं)
परिहितकवचः. (4) - आमुक्त (वि) , प्रतिमुक्त (वि) , पिनद्ध (वि) , अपिनद्ध (वि)
आमुक्तः प्रतिमुक्तश्च पिनद्धश्चापिनद्धवत्॥ २.७.१०६२ ॥
परिहितकवचः. (4) - आमुक्त (वि) , प्रतिमुक्त (वि) , पिनद्ध (वि) , अपिनद्ध (वि)
धृतकवचः. (5) - संनद्ध (वि) , वर्मित (वि) , सज्ज (वि) , दंशित (वि) , व्यूढकङ्कट (वि)
संनद्धो वर्मितः सज्जो दंशितो व्युढकङ्कटः॥ २.७.१०६३ ॥
धृतकवचः. (5) - संनद्ध (वि) , वर्मित (वि) , सज्ज (वि) , दंशित (वि) , व्यूढकङ्कट (वि)
धृतकवचगणः. (1) - कावचिक (नपुं)
त्रिष्वामुक्तादयो वर्मभृतां कावचिकं गणे॥ २.७.१०६४ ॥
धृतकवचगणः. (1) - कावचिक (नपुं)
पदातिः. (5) - पदाति (पुं) , पत्ति (पुं) , पदग (पुं) , पादातिक (पुं) , पदाजि (पुं)
पदातिपत्तिपदगपादातिकपदातयः॥ २.७.१०६५ ॥
पदातिः. (5) - पदाति (पुं) , पत्ति (पुं) , पदग (पुं) , पादातिक (पुं) , पदाजि (पुं)
पदातिः. (2) - पद्ग (पुं) , पदिक (पुं) पदातिसमूहः. (2) - पादात (पुं) , पत्तिसंहति (स्त्री)
पद्गश्च पदिकश्चाथ पादातं पत्तिसंहतिः॥ २.७.१०६६ ॥
पदातिः. (2) - पद्ग (पुं) , पदिक (पुं) पदातिसमूहः. (2) - पादात (पुं) , पत्तिसंहति (स्त्री)
आयुधजीविः. (4) - शस्त्राजीव (पुं) , काण्डपृष्ठ (पुं) , आयुधीय (पुं) , आयुधिक (पुं)
शस्त्राजीवे काण्डपृष्ठायुधीयायुधिकाः समाः॥ २.७.१०६७ ॥
आयुधजीविः. (4) - शस्त्राजीव (पुं) , काण्डपृष्ठ (पुं) , आयुधीय (पुं) , आयुधिक (पुं)
सम्यक्कृतशराभ्यासः. (3) - कृतहस्त (पुं) , सुप्रयोगविशिख (पुं) , कृतपुङ्ख (पुं)
कृतहस्तः सुप्रयोगविशिखः कृतपुङ्खवत्॥ २.७.१०६८ ॥
सम्यक्कृतशराभ्यासः. (3) - कृतहस्त (पुं) , सुप्रयोगविशिख (पुं) , कृतपुङ्ख (पुं)
लक्ष्यश्चुतसायकः. (1) - अपराद्धपृषत्क (पुं)
अपराद्धपृषत्कोऽसौ लक्ष्याद्यश्च्युतसायकः॥ २.७.१०६९ ॥
लक्ष्यश्चुतसायकः. (1) - अपराद्धपृषत्क (पुं)
धनुर्धरः. (6) - धन्विन् (पुं) , धनुष्मत् (पुं) , धानुष्क (पुं) , निषङ्गिन् (पुं) , अस्त्रिन् (पुं) , धनुर्धर (पुं)
धन्वी धनुष्मान्धानुष्को निषङ्ग्यस्त्री धनुर्धरः॥ २.७.१०७० ॥
धनुर्धरः. (6) - धन्विन् (पुं) , धनुष्मत् (पुं) , धानुष्क (पुं) , निषङ्गिन् (पुं) , अस्त्रिन् (पुं) , धनुर्धर (पुं)
बाणधारिः. (2) - काण्डवत् (पुं) , काण्डीर (पुं) शक्त्यायुधधारिः. (2) - शाक्तीक (पुं) , शक्तिहेतिक (पुं)
स्यात्काण्डवांस्तु काण्डीरः शाक्तीकः शक्तिहेतिकः॥ २.७.१०७१ ॥
बाणधारिः. (2) - काण्डवत् (पुं) , काण्डीर (पुं) शक्त्यायुधधारिः. (2) - शाक्तीक (पुं) , शक्तिहेतिक (पुं)
यष्टिहेतिकः. (1) - याष्टीक (पुं) पर्श्वधहेतिकः. (1) - पारश्वधिक (पुं)
याष्टीकपारश्वथिकौ यष्टिपर्श्वथहेतिकौ॥ २.७.१०७२ ॥
यष्टिहेतिकः. (1) - याष्टीक (पुं) पर्श्वधहेतिकः. (1) - पारश्वधिक (पुं)
खड्गधारिः. (2) - नैस्त्रिंशिक (पुं) , असिहेति (पुं) प्रासायुधिः. (1) - प्रासिक (पुं) कुन्तायुधिः. (1) - कौन्तिक (पुं)
नैस्त्रिंशिकोऽसिहेतिः स्यात्समौ प्रासिककौन्तिकौ॥ २.७.१०७३ ॥
खड्गधारिः. (2) - नैस्त्रिंशिक (पुं) , असिहेति (पुं) प्रासायुधिः. (1) - प्रासिक (पुं) कुन्तायुधिः. (1) - कौन्तिक (पुं)
फलकधारकः. (2) - चर्मिन् (पुं) , फलकपाणि (पुं) ध्वजधारिः. (2) - पताकिन् (पुं) , वैजयन्तिक (पुं)
चर्मी फलकपाणिः स्यात्पताकी वैजयन्तिकः॥ २.७.१०७४ ॥
फलकधारकः. (2) - चर्मिन् (पुं) , फलकपाणि (पुं) ध्वजधारिः. (2) - पताकिन् (पुं) , वैजयन्तिक (पुं)
सहायकः. (4) - अनुप्लव (पुं) , सहाय (पुं) , अनुचर (पुं) , अभिचर (पुं)
अनुप्लवः सहायश्चाऽनुचरोऽनुचरोऽभिचरः समाः॥ २.७.१०७५ ॥
सहायकः. (4) - अनुप्लव (पुं) , सहाय (पुं) , अनुचर (पुं) , अभिचर (पुं)
अग्रेसरः. (5) - पुरोग (पुं) , अग्रेसर (पुं) , प्रष्ठ (पुं) , अग्रतःसर (पुं) , पुरःसर (पुं)
पुरोगाऽग्रेसरप्रष्ठाऽग्रतःसरपुरःसराः॥ २.७.१०७६ ॥
अग्रेसरः. (5) - पुरोग (पुं) , अग्रेसर (पुं) , प्रष्ठ (पुं) , अग्रतःसर (पुं) , पुरःसर (पुं)
अग्रेसरः. (2) - पुरोगम (पुं) , पुरोगामिन् (पुं) शनैर्गमनशीलः. (2) - मन्दगामिन् (पुं) , मन्थर (पुं)
पुरोगमः पुरोगामी मन्दगामी तु मन्थरः॥ २.७.१०७७ ॥
अग्रेसरः. (2) - पुरोगम (पुं) , पुरोगामिन् (पुं) शनैर्गमनशीलः. (2) - मन्दगामिन् (पुं) , मन्थर (पुं)
अतिवेगगमनशीलः. (2) - जङ्घाल (पुं) , अतिजव (पुं) जङ्घाजीविः. (2) - जङ्घाकरिक (पुं) , जाङ्घिक (पुं)
जङ्घालोऽतिजवस्तुल्यौ जङ्घाकरिकजाङ्घिकौ॥ २.७.१०७८ ॥
अतिवेगगमनशीलः. (2) - जङ्घाल (पुं) , अतिजव (पुं) जङ्घाजीविः. (2) - जङ्घाकरिक (पुं) , जाङ्घिक (पुं)
त्वरितवन्मात्रः. (6) - तरस्विन् (पुं) , त्वरित (पुं) , वेगिन् (पुं) , प्रजविन् (पुं) , जवन (पुं) , जव (पुं)
तरस्वी त्वरितो वेगी प्रजस्वी जवनो जवः॥ २.७.१०७९ ॥
त्वरितवन्मात्रः. (6) - तरस्विन् (पुं) , त्वरित (पुं) , वेगिन् (पुं) , प्रजविन् (पुं) , जवन (पुं) , जव (पुं)
जेतुं शक्यः. (1) - जय्य (पुं) जेतुं योग्यः. (1) - जेय (पुं)
जय्यो यः शक्यते जेतुं जेयो जेतव्यमात्रके॥ २.७.१०८० ॥
जेतुं शक्यः. (1) - जय्य (पुं) जेतुं योग्यः. (1) - जेय (पुं)
जेता. (2) - जैत्र (पुं) , जेतृ (पुं)
जैत्रस्तु जेता यो गच्छत्यलं विद्विषतः प्रति॥ २.७.१०८१ ॥
जेता. (2) - जैत्र (पुं) , जेतृ (पुं)
ससामर्थ्यम् शत्रूणां सम्मुखं गतः. (3) - अभ्यमित्र्य (पुं) , अभ्यमित्रीय (पुं) , अभ्यमित्रीण (पुं)
सोऽभ्यमित्रोऽभ्यमित्रीयोऽप्यभ्यमित्रीण इत्यपि॥ २.७.१०८२ ॥
ससामर्थ्यम् शत्रूणां सम्मुखं गतः. (3) - अभ्यमित्र्य (पुं) , अभ्यमित्रीय (पुं) , अभ्यमित्रीण (पुं)
बलातिशयवान्. (3) - ऊर्जस्वल (पुं) , ऊर्जस्विन् (पुं) , ऊर्जातिशयान्वित (पुं)
ऊर्जस्वलः स्यादूर्जस्वी य ऊर्जोऽतिशयान्वितः॥ २.७.१०८३ ॥
बलातिशयवान्. (3) - ऊर्जस्वल (पुं) , ऊर्जस्विन् (पुं) , ऊर्जातिशयान्वित (पुं)
विपुलोरः. (2) - उरस्वत् (पुं) , उरसिल (पुं) रथस्वामिः. (3) - रथिर (पुं) , रथिक (पुं) , रथिन् (पुं)
स्वादुरस्वानुरसिलो रथिको रथिरो रथी॥ २.७.१०८४ ॥
विपुलोरः. (2) - उरस्वत् (पुं) , उरसिल (पुं) रथस्वामिः. (3) - रथिर (पुं) , रथिक (पुं) , रथिन् (पुं)
यथेष्टं गमनशिलः. (2) - कामङ्गामिन् (पुं) , अनुकामीन (पुं) अतिगमनशीलः. (1) - अत्यन्तीन (पुं)
कामगाम्यनुकामीनो ह्यत्यन्तीनस्तथा भृशम्॥ २.७.१०८५ ॥
यथेष्टं गमनशिलः. (2) - कामङ्गामिन् (पुं) , अनुकामीन (पुं) अतिगमनशीलः. (1) - अत्यन्तीन (पुं)
शूरः. (3) - शूर (पुं) , वीर (पुं) , विक्रान्त (पुं) जयशीलः. (3) - जेतृ (पुं) , जिष्णु (पुं) , जित्वर (पुं)
शूरो वीरश्च विक्रान्तो जेता जिष्णुश्च जित्वरः॥ २.७.१०८६ ॥
शूरः. (3) - शूर (पुं) , वीर (पुं) , विक्रान्त (पुं) जयशीलः. (3) - जेतृ (पुं) , जिष्णु (पुं) , जित्वर (पुं)
युद्धकुशलः. (1) - सांयुगीन (पुं)
सांयुगीनो रणे साधुः शस्त्रजीवाऽऽदयस्त्रिषु॥ २.७.१०८७ ॥
युद्धकुशलः. (1) - सांयुगीन (पुं)
सेना. (6) - ध्वजिनी (स्त्री) , वाहिनी (स्त्री) , सेना (स्त्री) , पृतना (स्त्री) , अनीकिनी (स्त्री) , चमू (स्त्री)
ध्वजिनी वाहिनी सेना पृतनाऽनीकिनी चमूः॥ २.७.१०८८ ॥
सेना. (6) - ध्वजिनी (स्त्री) , वाहिनी (स्त्री) , सेना (स्त्री) , पृतना (स्त्री) , अनीकिनी (स्त्री) , चमू (स्त्री)
सेना. (5) - वरूथिनी (स्त्री) , बल (पुं) , सैन्य (पुं) , चक्र (पुं) , अनीक (पुं-नपुं)
वरूथिनी बलं सैन्यं चक्रं चाऽनीकमस्त्रियाम्॥ २.७.१०८९ ॥
सेना. (5) - वरूथिनी (स्त्री) , बल (पुं) , सैन्य (पुं) , चक्र (पुं) , अनीक (पुं-नपुं)
सैन्यव्यूहः. (2) - व्यूह (पुं) , बलविन्यास (पुं)
व्यूहस्तु बलविन्यासो भेदादण्डाऽऽदयो युधि॥ २.७.१०९० ॥
सैन्यव्यूहः. (2) - व्यूह (पुं) , बलविन्यास (पुं)
व्यूहपृष्टभागः. (2) - प्रत्यासार (पुं) , व्यूहपार्ष्णि (पुं) सैन्यपृष्टानीकः. (1) - प्रतिग्रह (पुं)
प्रत्यासारो व्यूहपार्ष्णिः सैन्यपृष्ठे प्रतिग्रहः॥ २.७.१०९१ ॥
व्यूहपृष्टभागः. (2) - प्रत्यासार (पुं) , व्यूहपार्ष्णि (पुं) सैन्यपृष्टानीकः. (1) - प्रतिग्रह (पुं)
पत्तिसेना. (1) - पत्ति (पुं)
एकेभैकरथा त्र्यश्वा पत्तिः पञ्चपदातिका॥ २.७.१०९२ ॥
पत्तिसेना. (1) - पत्ति (पुं)
सेनामुखनामकसेना. (1) - सेनामुख (नपुं) गुल्मसेना. (1) - गुल्म (पुं) गणसेना. (1) - गण (पुं) वाहिनीसेना. (1) - वाहिनी (स्त्री) पृतनासेना. (1) - पृतना (स्त्री) चमूसेना. (1) - चमू (स्त्री)
पत्त्यङ्गैस्त्रिगुणैः सर्वैः क्रमादाख्या यथोत्तरम्॥ २.७.१०९३ ॥
सेनामुखनामकसेना. (1) - सेनामुख (नपुं) गुल्मसेना. (1) - गुल्म (पुं) गणसेना. (1) - गण (पुं) वाहिनीसेना. (1) - वाहिनी (स्त्री) पृतनासेना. (1) - पृतना (स्त्री) चमूसेना. (1) - चमू (स्त्री)
अनीकिनीसेना. (1) - अनीकिनी (स्त्री) अक्षौहिणीसेना. (1) - अक्षौहिणी (स्त्री) धनसमृद्धिः. (1) - सम्पद् (स्त्री)
सेनामुखं गुल्मगणौ वाहिनी पृतना चमूः॥ २.७.१०९४ ॥
अनीकिनीसेना. (1) - अनीकिनी (स्त्री) अक्षौहिणीसेना. (1) - अक्षौहिणी (स्त्री) धनसमृद्धिः. (1) - सम्पद् (स्त्री)
धनसमृद्धिः. (3) - सम्पत्ति (स्त्री) , श्री (स्त्री) , लक्ष्मी (स्त्री) आपत्. (3) - विपत्ति (स्त्री) , विपद् (स्त्री) , आपद् (स्त्री)
अनीकिनी दशाऽनीकिन्यक्षौहिण्यथ संपदि॥ २.७.१०९५ ॥
धनसमृद्धिः. (3) - सम्पत्ति (स्त्री) , श्री (स्त्री) , लक्ष्मी (स्त्री) आपत्. (3) - विपत्ति (स्त्री) , विपद् (स्त्री) , आपद् (स्त्री)
आयुधम्. (2) - आयुध (नपुं) , प्रहरण (नपुं) शस्त्रायुधम्. (1) - शस्त्र (पुं-नपुं) अस्त्रायुधम्. (1) - अस्त्र (पुं-नपुं)
संपत्तिः श्रीश्च लक्ष्मीश्च विपत्त्यां विपदापदौ॥ २.७.१०९६ ॥
आयुधम्. (2) - आयुध (नपुं) , प्रहरण (नपुं) शस्त्रायुधम्. (1) - शस्त्र (पुं-नपुं) अस्त्रायुधम्. (1) - अस्त्र (पुं-नपुं)
धनुः. (6) - धनुस् (पुं-नपुं) , चाप (पुं-नपुं) , धन्वन् (नपुं) , शरासन (नपुं) , कोदण्ड (नपुं) , कार्मुक (नपुं)
आयुधं तु प्रहरणं शस्त्रमस्त्रमथाऽस्त्रियौ॥ २.७.१०९७ ॥
धनुः. (6) - धनुस् (पुं-नपुं) , चाप (पुं-नपुं) , धन्वन् (नपुं) , शरासन (नपुं) , कोदण्ड (नपुं) , कार्मुक (नपुं)
धनुः. (1) - इष्वास (पुं) कर्णधनुः. (1) - कालपृष्ठ (नपुं)
धनुश्चापौ धन्वशरासनकोदण्डकार्मुकम्॥ २.७.१०९८ ॥
धनुः. (1) - इष्वास (पुं) कर्णधनुः. (1) - कालपृष्ठ (नपुं)
अर्जुनधनुः. (2) - गाण्डीव (पुं-नपुं) , गाण्डिव (पुं-नपुं)
इष्वासोऽप्यथ कर्णस्य कालपृष्ठं शरासनम्॥ २.७.१०९९ ॥
अर्जुनधनुः. (2) - गाण्डीव (पुं-नपुं) , गाण्डिव (पुं-नपुं)
धनुषः अन्त्यभागः. (2) - कोटि (स्त्री) , अटनी (स्त्री) ज्याघातवारणः. (2) - गोधा (स्त्री) , तल (नपुं)
कपिध्वजस्य गाण्डीवगाण्डिवौ पुंनपुंसकौ॥ २.७.११०० ॥
धनुषः अन्त्यभागः. (2) - कोटि (स्त्री) , अटनी (स्त्री) ज्याघातवारणः. (2) - गोधा (स्त्री) , तल (नपुं)
धनुर्मध्यम्. (2) - लस्तक (पुं) , धनुर्मध्य (नपुं) ज्या. (4) - मोर्वी (स्त्री) , ज्या (स्त्री) , शिञ्जिनी (स्त्री) , गुण (पुं)
कोटिरस्याऽटनी गोधातले ज्याघातवारणे॥ २.७.११०१ ॥
धनुर्मध्यम्. (2) - लस्तक (पुं) , धनुर्मध्य (नपुं) ज्या. (4) - मोर्वी (स्त्री) , ज्या (स्त्री) , शिञ्जिनी (स्त्री) , गुण (पुं)
धन्विनां स्थानभेदः. (2) - प्रत्यालीढ (नपुं) , आलीढ (नपुं)
लस्तकस्तु धनुर्मध्यं मोर्वी ज्या शिञ्जिनी गुणः॥ २.७.११०२ ॥
धन्विनां स्थानभेदः. (2) - प्रत्यालीढ (नपुं) , आलीढ (नपुं)
लक्ष्यम्. (3) - लक्ष (नपुं) , लक्ष्य (नपुं) , शरव्य (नपुं)
स्यात्प्रत्यालीढमालीढमित्यादि स्थानपञ्चकम्॥ २.७.११०३ ॥
लक्ष्यम्. (3) - लक्ष (नपुं) , लक्ष्य (नपुं) , शरव्य (नपुं)
शरक्षेपाभ्यासः. (2) - शराभ्यास (पुं) , उपासन (नपुं)
लक्ष्यं लक्षं शरव्यं च शराभ्यास उपासनम्॥ २.७.११०४ ॥
शरक्षेपाभ्यासः. (2) - शराभ्यास (पुं) , उपासन (नपुं)
बाणः. (6) - पृषत्क (पुं) , बाण (पुं) , विशिख (पुं) , अजिह्मग (पुं) , खग (पुं) , आशुग (पुं)
पृषत्कबाणविशिखा अजिह्मगखगाऽऽशुगाः॥ २.७.११०५ ॥
बाणः. (6) - पृषत्क (पुं) , बाण (पुं) , विशिख (पुं) , अजिह्मग (पुं) , खग (पुं) , आशुग (पुं)
बाणः. (6) - कलम्ब (पुं) , मार्गण (पुं) , शर (पुं) , पत्रिन् (पुं) , रोप (पुं) , इषु (स्त्री-पुं)
कलम्बमार्गणशराः पत्री रोप इषुर्द्वयोः॥ २.७.११०६ ॥
बाणः. (6) - कलम्ब (पुं) , मार्गण (पुं) , शर (पुं) , पत्रिन् (पुं) , रोप (पुं) , इषु (स्त्री-पुं)
सर्वलोहमयशरः. (2) - प्रक्ष्वेडन (पुं) , नाराच (पुं) शरपक्षः. (2) - पक्ष (पुं) , वाज (पुं)
प्रक्ष्वेडनास्तु नाराचाः पक्षो वाजस्त्रिषूत्तरे॥ २.७.११०७ ॥
सर्वलोहमयशरः. (2) - प्रक्ष्वेडन (पुं) , नाराच (पुं) शरपक्षः. (2) - पक्ष (पुं) , वाज (पुं)
प्रक्षिप्तबाणः. (1) - निरस्त (वि) विषसम्बद्धबाणः. (2) - दिग्ध (वि) , लिप्तक (वि)
निरस्तः प्रहिते बाणे विषाऽक्ते दिग्धलिप्तकौ॥ २.७.११०८ ॥
प्रक्षिप्तबाणः. (1) - निरस्त (वि) विषसम्बद्धबाणः. (2) - दिग्ध (वि) , लिप्तक (वि)
शराधारः. (5) - तूण (पुं) , उपासङ्ग (पुं) , तूणीर (पुं) , निषङ्ग (पुं) , इषुधि (स्त्री-पुं)
तूणोपासङ्गतूणीरनिषङ्गा इषुधिर्द्वयोः॥ २.७.११०९ ॥
शराधारः. (5) - तूण (पुं) , उपासङ्ग (पुं) , तूणीर (पुं) , निषङ्ग (पुं) , इषुधि (स्त्री-पुं)
शराधारः. (1) - तूणी (स्त्री) खड्गः. (5) - खड्ग (पुं) , निस्त्रिंश (पुं) , चन्द्रहास (पुं) , असि (पुं) , रिष्टि (पुं)
तूण्यां खद्गे तु निस्त्रिंशचन्द्रहासाऽसिरिष्टयः॥ २.७.१११० ॥
शराधारः. (1) - तूणी (स्त्री) खड्गः. (5) - खड्ग (पुं) , निस्त्रिंश (पुं) , चन्द्रहास (पुं) , असि (पुं) , रिष्टि (पुं)
खड्गः. (4) - कौक्षेयक (पुं) , मण्डलाग्र (पुं) , करवाल (पुं) , कृपाण (पुं)
कौक्षेयको मण्डलाग्रः करवालः कृपाणवत्॥ २.७.११११ ॥
खड्गः. (4) - कौक्षेयक (पुं) , मण्डलाग्र (पुं) , करवाल (पुं) , कृपाण (पुं)
खड्गाद्यायुधमुष्टिः. (1) - त्सरु (पुं) खड्गमुष्टिनिबन्धनम्. (1) - मेखला (स्त्री)
त्सरुः खड्गादिमुष्टौ स्यान्मेखला तन्निबन्धनम्॥ २.७.१११२ ॥
खड्गाद्यायुधमुष्टिः. (1) - त्सरु (पुं) खड्गमुष्टिनिबन्धनम्. (1) - मेखला (स्त्री)
फलकः. (3) - फलक (पुं-नपुं) , फल (नपुं) , चर्मन् (नपुं) फलकमुष्टिः. (1) - सङ्ग्राह (पुं)
फलकोऽस्त्री फलं चर्म संग्राहो मुष्टिरस्य यः॥ २.७.१११३ ॥
फलकः. (3) - फलक (पुं-नपुं) , फल (नपुं) , चर्मन् (नपुं) फलकमुष्टिः. (1) - सङ्ग्राह (पुं)
मुद्गरः. (3) - द्रुघण (पुं) , मुद्गर (पुं) , घन (पुं) ह्रस्वखड्गः. (2) - ईली (स्त्री) , करवालिका (स्त्री)
द्रुघणो मुद्गरघनौ स्यादीली करवालिका॥ २.७.१११४ ॥
मुद्गरः. (3) - द्रुघण (पुं) , मुद्गर (पुं) , घन (पुं) ह्रस्वखड्गः. (2) - ईली (स्त्री) , करवालिका (स्त्री)
अश्मक्षेपसाधनम्. (2) - भिन्दिपाल (पुं) , सृग (पुं) लोहाङ्गी. (2) - परिघ (पुं) , परिघातन (पुं)
भिन्दिपालः सृगस्तुल्यौ परिघः परिघातिनः॥ २.७.१११५ ॥
अश्मक्षेपसाधनम्. (2) - भिन्दिपाल (पुं) , सृग (पुं) लोहाङ्गी. (2) - परिघ (पुं) , परिघातन (पुं)
कुठारः. (4) - कुठार (स्त्री-पुं) , स्वधिति (स्त्री-पुं) , परशु (स्त्री-पुं) , परश्वध (पुं)
द्वयोः कुठारः स्वधितिः परशुश्च परश्वधः॥ २.७.१११६ ॥
कुठारः. (4) - कुठार (स्त्री-पुं) , स्वधिति (स्त्री-पुं) , परशु (स्त्री-पुं) , परश्वध (पुं)
छुरिका. (4) - शस्त्री (स्त्री) , असिपुत्री (स्त्री) , छुरिका (स्त्री) , असिधेनुका (स्त्री)
स्याच्छ्स्त्री चाऽसिपुत्री च छुरिका चाऽसिधेनुका॥ २.७.१११७ ॥
छुरिका. (4) - शस्त्री (स्त्री) , असिपुत्री (स्त्री) , छुरिका (स्त्री) , असिधेनुका (स्त्री)
बाणाग्रायुधविशेषः. (2) - शल्य (पुं-नपुं) , शङ्कु (पुं) तोमरः. (2) - सर्वला (स्त्री) , तोमर (पुं-नपुं)
वा पुंसि शल्यं शङ्कुर्ना सर्वला तोमरोऽस्त्रियाम्॥ २.७.१११८ ॥
बाणाग्रायुधविशेषः. (2) - शल्य (पुं-नपुं) , शङ्कु (पुं) तोमरः. (2) - सर्वला (स्त्री) , तोमर (पुं-नपुं)
कुन्तः. (2) - प्रास (पुं) , कुन्त (पुं) खड्गादिप्रान्तभागः. (4) - कोण (पुं) , पाली (स्त्री) , अश्रि (स्त्री) , कोटि (स्त्री)
प्रासस्तु कुन्तः कोणस्तु स्त्रियः पाल्यश्रिकोटयः॥ २.७.१११९ ॥
कुन्तः. (2) - प्रास (पुं) , कुन्त (पुं) खड्गादिप्रान्तभागः. (4) - कोण (पुं) , पाली (स्त्री) , अश्रि (स्त्री) , कोटि (स्त्री)
चतुरङ्गसैन्यसन्नाहः. (3) - सर्वाभिसार (पुं) , सर्वौघ (पुं) , सर्वसन्नहन (नपुं)
सर्वाभिसारः सर्वौघः सर्वसन्नहनार्थकः॥ २.७.११२० ॥
चतुरङ्गसैन्यसन्नाहः. (3) - सर्वाभिसार (पुं) , सर्वौघ (पुं) , सर्वसन्नहन (नपुं)
प्रस्तानात्प्राग् शस्त्रवाहनादिपूजा. (1) - लोहाभिहार (पुं)
लोहाभिसारोऽस्त्रभृतां राज्ञानां नीराजनाविधिः॥ २.७.११२१ ॥
प्रस्तानात्प्राग् शस्त्रवाहनादिपूजा. (1) - लोहाभिहार (पुं)
शत्रौ ससैन्यगमनम्. (1) - अभिषेणन (नपुं)
यत्सेनयाऽभिगमनमरौ तदभिषेणनम्॥ २.७.११२२ ॥
शत्रौ ससैन्यगमनम्. (1) - अभिषेणन (नपुं)
प्रयाणम्. (6) - यात्रा (स्त्री) , व्रज्या (स्त्री) , अभिनिर्याण (नपुं) , प्रस्थान (नपुं) , गमन (नपुं) , गम (पुं)
यात्रा व्रज्याऽभिनिर्याणं प्रस्थानं गमनं गमः॥ २.७.११२३ ॥
प्रयाणम्. (6) - यात्रा (स्त्री) , व्रज्या (स्त्री) , अभिनिर्याण (नपुं) , प्रस्थान (नपुं) , गमन (नपुं) , गम (पुं)
सैन्यस्य सर्वतो व्याप्तिः. (2) - आसार (पुं) , प्रसरण (नपुं) प्रस्थितसैन्यः. (2) - प्रचक्र (नपुं) , चलित (नपुं)
स्यादासारः प्रसरणं प्रचक्रं चलितार्थकम्॥ २.७.११२४ ॥
सैन्यस्य सर्वतो व्याप्तिः. (2) - आसार (पुं) , प्रसरण (नपुं) प्रस्थितसैन्यः. (2) - प्रचक्र (नपुं) , चलित (नपुं)
निर्भीकयायिः. (1) - अभिक्रम (पुं)
अहितान्प्रत्यभीतस्य रणे यानमभिक्रमः॥ २.७.११२५ ॥
निर्भीकयायिः. (1) - अभिक्रम (पुं)
प्रातर्जागरणकारिः. (2) - वैतालिक (पुं) , बोधकर (पुं) घण्टिकावादयः. (2) - चाक्रिक (पुं) , घाण्टिक (पुं)
वैतालिका बोधकराश्चाक्रिका घाण्टिकार्थकाः॥ २.७.११२६ ॥
प्रातर्जागरणकारिः. (2) - वैतालिक (पुं) , बोधकर (पुं) घण्टिकावादयः. (2) - चाक्रिक (पुं) , घाण्टिक (पुं)
वंशपरम्पराशंसकाः. (2) - मागध (पुं) , मगध (पुं) राजादिस्तुतिपाठकः. (2) - वन्दिन् (पुं) , स्तुतिपाठक (पुं)
स्युर्मागधास्तु मगधा बन्दिनः स्तुतिपाठकाः॥ २.७.११२७ ॥
वंशपरम्पराशंसकाः. (2) - मागध (पुं) , मगध (पुं) राजादिस्तुतिपाठकः. (2) - वन्दिन् (पुं) , स्तुतिपाठक (पुं)
शपतवशात्सङ्ग्रामादपरावर्तिः. (1) - संशप्तक (पुं)
संशप्तकास्तु समयात् संग्रामादनिवर्तिनः॥ २.७.११२८ ॥
शपतवशात्सङ्ग्रामादपरावर्तिः. (1) - संशप्तक (पुं)
रजः. (4) - रेणु (स्त्री-पुं) , धूलि (स्त्री) , पांसु (पुं) , रजस् (नपुं)
रेणुर्द्वयोः स्त्रियां धूलिः पांसुर्ना न द्वयो रजः॥ २.७.११२९ ॥
रजः. (4) - रेणु (स्त्री-पुं) , धूलि (स्त्री) , पांसु (पुं) , रजस् (नपुं)
पिष्टस्य रजः. (2) - चूर्ण (नपुं) , क्षोद (पुं) अतिसङ्कुलसैन्याः. (2) - समुत्पिञ्ज (पुं) , पिञ्जल (पुं)
चूर्णे क्षोदः समुत्पिञ्जपिञ्जलौ भृशमाकुले॥ २.७.११३० ॥
पिष्टस्य रजः. (2) - चूर्ण (नपुं) , क्षोद (पुं) अतिसङ्कुलसैन्याः. (2) - समुत्पिञ्ज (पुं) , पिञ्जल (पुं)
पताका. (4) - पताका (स्त्री) , वैजयन्ती (स्त्री) , केतन (नपुं) , ध्वज (पुं-नपुं)
पताका वैजयन्ती स्यात्केतनं ध्वजमस्त्रियाम्॥ २.७.११३१ ॥
पताका. (4) - पताका (स्त्री) , वैजयन्ती (स्त्री) , केतन (नपुं) , ध्वज (पुं-नपुं)
भयङ्करयुद्धभूमिः. (1) - वीराशंसन (नपुं)
सा वीराशंसनं युद्धभूमिर्याऽतिभयप्रदा॥ २.७.११३२ ॥
भयङ्करयुद्धभूमिः. (1) - वीराशंसन (नपुं)
अहम्पूर्वमहम्पूर्वमिति. (1) - अहम्पूर्विका (स्त्री)
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्यहंपूर्विका स्त्रियाम्॥ २.७.११३३ ॥
अहम्पूर्वमहम्पूर्वमिति. (1) - अहम्पूर्विका (स्त्री)
आत्मनि शक्त्याविष्कारः. (1) - आहोपुरुषिका (स्त्री)
आहोपुरुषिका दर्पाद्या स्यात्संभावनाऽऽत्मनि॥ २.७.११३४ ॥
आत्मनि शक्त्याविष्कारः. (1) - आहोपुरुषिका (स्त्री)
परस्पराहङ्कारः. (1) - अहमहमिका (स्त्री)
अहमहमिका तु सा स्यात् परस्परं यो भवत्यहङ्कारः॥ २.७.११३५ ॥
परस्पराहङ्कारः. (1) - अहमहमिका (स्त्री)
सामर्थ्यम्. (7) - द्रविण (नपुं) , तरस् (नपुं) , सहस् (नपुं) , बल (नपुं) , शौर्य (नपुं) , स्थामन् (नपुं) , शुष्म (नपुं)
द्रविणं तरः सहोबलशौर्याणि स्थाम शुष्मं च॥ २.७.११३६ ॥
सामर्थ्यम्. (7) - द्रविण (नपुं) , तरस् (नपुं) , सहस् (नपुं) , बल (नपुं) , शौर्य (नपुं) , स्थामन् (नपुं) , शुष्म (नपुं)
सामर्थ्यम्. (3) - शक्ति (स्त्री) , पराक्रम (पुं) , प्राण (पुं) अतिपराक्रमः. (2) - विक्रम (पुं) , अतिशक्तिता (स्त्री)
शक्तिः पराक्रम्ः प्राणो विक्रमस्त्वतिशक्तिता॥ २.७.११३७ ॥
सामर्थ्यम्. (3) - शक्ति (स्त्री) , पराक्रम (पुं) , प्राण (पुं) अतिपराक्रमः. (2) - विक्रम (पुं) , अतिशक्तिता (स्त्री)
युद्धारम्भे अन्ते वा पानकर्मः. (1) - वीरपाण (नपुं)
वीरपाणं तु यत्पानं वृत्ते भाविनि वा रणे॥ २.७.११३८ ॥
युद्धारम्भे अन्ते वा पानकर्मः. (1) - वीरपाण (नपुं)
युद्धम्. (5) - युद्ध (नपुं) , आयोधन (नपुं) , जन्य (पुं) , प्रधन (नपुं) , प्रविदारण (नपुं)
युद्धमायोधनं जन्यं प्रघनं प्रविदारणम्॥ २.७.११३९ ॥
युद्धम्. (5) - युद्ध (नपुं) , आयोधन (नपुं) , जन्य (पुं) , प्रधन (नपुं) , प्रविदारण (नपुं)
युद्धम्. (5) - मृध (नपुं) , आस्कन्दन (नपुं) , सङ्ख्य (नपुं) , समीक (नपुं) , साम्परायिक (नपुं)
मृधमास्कन्दनं संख्यं समीकं सांपरायिकम्॥ २.७.११४० ॥
युद्धम्. (5) - मृध (नपुं) , आस्कन्दन (नपुं) , सङ्ख्य (नपुं) , समीक (नपुं) , साम्परायिक (नपुं)
युद्धम्. (5) - समर (पुं) , अनीक (पुं) , रण (पुं) , कलह (पुं) , विग्रह (पुं)
अस्त्रियां समराऽनीकरणाः कलहविग्रहौ॥ २.७.११४१ ॥
युद्धम्. (5) - समर (पुं) , अनीक (पुं) , रण (पुं) , कलह (पुं) , विग्रह (पुं)
युद्धम्. (5) - सम्प्रहार (पुं) , अभिसम्पात (पुं) , कलि (पुं) , संस्फोट (पुं) , संयुग (पुं)
संप्रहाराऽभिसंपात कलिसंस्फोट संयुगाः॥ २.७.११४२ ॥
युद्धम्. (5) - सम्प्रहार (पुं) , अभिसम्पात (पुं) , कलि (पुं) , संस्फोट (पुं) , संयुग (पुं)
युद्धम्. (5) - अभ्यामर्द (पुं) , समाघात (पुं) , सङ्ग्राम (पुं) , अभ्यागम (पुं) , आहव (पुं)
अभ्यामर्द समाघात संग्रामाऽभ्यागमाऽऽहवाः॥ २.७.११४३ ॥
युद्धम्. (5) - अभ्यामर्द (पुं) , समाघात (पुं) , सङ्ग्राम (पुं) , अभ्यागम (पुं) , आहव (पुं)
युद्धम्. (6) - समुदाय (पुं) , संयत् (स्त्री) , समिति (स्त्री) , आजि (स्त्री) , समित् (स्त्री) , युध् (स्त्री)
समुदायः स्त्रियः संयत्समित्याऽऽजिसमिद्युधः॥ २.७.११४४ ॥
युद्धम्. (6) - समुदाय (पुं) , संयत् (स्त्री) , समिति (स्त्री) , आजि (स्त्री) , समित् (स्त्री) , युध् (स्त्री)
बाहुयुद्धम्. (2) - नियुद्ध (नपुं) , बाहुयुद्ध (नपुं) रणव्याकुलता. (2) - तुमुल (नपुं) , रणसङ्कुल (नपुं)
नियुद्धं बाहुयुद्धेऽथ तुमुलं रणसंकुले॥ २.७.११४५ ॥
बाहुयुद्धम्. (2) - नियुद्ध (नपुं) , बाहुयुद्ध (नपुं) रणव्याकुलता. (2) - तुमुल (नपुं) , रणसङ्कुल (नपुं)
योधानां सिंहनादः. (2) - क्ष्वेडा (स्त्री) , सिंहनाद (पुं) हस्तिसङ्घः. (2) - घटना (स्त्री) , घटा (स्त्री)
क्ष्वेदा तु सिंहनादः स्यात् करिणां घटना घटा॥ २.७.११४६ ॥
योधानां सिंहनादः. (2) - क्ष्वेडा (स्त्री) , सिंहनाद (पुं) हस्तिसङ्घः. (2) - घटना (स्त्री) , घटा (स्त्री)
स्पर्धया योधनामाह्वानम्. (2) - क्रन्दन (नपुं) , योधसंराव (पुं) हस्तिगर्जनम्. (2) - बृंहित (नपुं) , करिगर्जित (नपुं)
क्रंदनं योधसंरावो बृंहितं करिगजिऋतम्॥ २.७.११४७ ॥
स्पर्धया योधनामाह्वानम्. (2) - क्रन्दन (नपुं) , योधसंराव (पुं) हस्तिगर्जनम्. (2) - बृंहित (नपुं) , करिगर्जित (नपुं)
धनुषः शब्दः. (1) - विस्फार (पुं) युद्धपटहः. (2) - पटह (पुं) , आडम्बर (पुं)
विस्फारो धनुषः स्वानः पताहाऽऽदम्बरओ समौ॥ २.७.११४८ ॥
धनुषः शब्दः. (1) - विस्फार (पुं) युद्धपटहः. (2) - पटह (पुं) , आडम्बर (पुं)
बलात्कारः. (3) - प्रसभ (नपुं) , बलात्कार (पुं) , हठ (पुं) युद्धमर्यादायाश्चलनम्. (2) - स्खलित (नपुं) , छल (नपुं)
प्रसभं तु बलात्कारो हठोऽथ स्खलितं छलम्॥ २.७.११४९ ॥
बलात्कारः. (3) - प्रसभ (नपुं) , बलात्कार (पुं) , हठ (पुं) युद्धमर्यादायाश्चलनम्. (2) - स्खलित (नपुं) , छल (नपुं)
शुभाशुभसूचकः. (3) - अजन्य (नपुं) , उत्पात (पुं) , उपसर्ग (पुं)
अजन्यं क्लीबमुत्पात उपसगऋः समं त्रयम्॥ २.७.११५० ॥
शुभाशुभसूचकः. (3) - अजन्य (नपुं) , उत्पात (पुं) , उपसर्ग (पुं)
मूर्च्छा. (3) - मूर्छा (स्त्री) , कश्मल (नपुं) , मोह (पुं) परचक्र पीडनम्. (2) - अवमर्द (पुं) , पीडन (नपुं)
मूछाऋ तु कश्मलं मोहो।आप्यवमदऋस्तु पीदनम्॥ २.७.११५१ ॥
मूर्च्छा. (3) - मूर्छा (स्त्री) , कश्मल (नपुं) , मोह (पुं) परचक्र पीडनम्. (2) - अवमर्द (पुं) , पीडन (नपुं)
छलादाक्रमणम्. (2) - अभ्यवस्कन्दन (नपुं) , अभ्यासादन (नपुं) विजयः. (2) - विजय (पुं) , जय (पुं)
अभ्यवस्कन्दनं त्वभ्यासादनं विजयो जयः॥ २.७.११५२ ॥
छलादाक्रमणम्. (2) - अभ्यवस्कन्दन (नपुं) , अभ्यासादन (नपुं) विजयः. (2) - विजय (पुं) , जय (पुं)
वैरशोधनम्. (3) - वैरशुद्धि (स्त्री) , प्रतीकार (पुं) , वैरनिर्यातन (नपुं)
वैरशुद्धिः प्रतीकारो वैरनियऋआतनं च सा॥ २.७.११५३ ॥
वैरशोधनम्. (3) - वैरशुद्धि (स्त्री) , प्रतीकार (पुं) , वैरनिर्यातन (नपुं)
पलायनम्. (6) - प्रद्राव (पुं) , उद्द्राव (पुं) , सन्द्राव (पुं) , सन्दाव (पुं) , विद्रव (पुं) , द्रव (पुं)
प्रद्रावोद्द्रावसंद्राव संदावा विद्रवो द्रवः॥ २.७.११५४ ॥
पलायनम्. (6) - प्रद्राव (पुं) , उद्द्राव (पुं) , सन्द्राव (पुं) , सन्दाव (पुं) , विद्रव (पुं) , द्रव (पुं)
पलायनम्. (2) - अपक्रम (पुं) , अपयान (नपुं) पराजयः. (2) - भङ्ग (पुं) , पराजय (पुं)
अपक्रमोऽपयानं च रणे भंगः पराजयः॥ २.७.११५५ ॥
पलायनम्. (2) - अपक्रम (पुं) , अपयान (नपुं) पराजयः. (2) - भङ्ग (पुं) , पराजय (पुं)
निर्जितः. (2) - पराजित (वि) , पराभूत (वि) निलीनः. (2) - नष्ट (वि) , तिरोहित (वि)
पराजितपराभूतौ त्रिषु नष्टतिरोहितौ॥ २.७.११५६ ॥
निर्जितः. (2) - पराजित (वि) , पराभूत (वि) निलीनः. (2) - नष्ट (वि) , तिरोहित (वि)
मारणम्. (4) - प्रमापण (नपुं) , निबर्हण (नपुं) , निकारण (नपुं) , विशारण (नपुं)
प्रमापणं निबहऋणं निकारणं विशारणम्॥ २.७.११५७ ॥
मारणम्. (4) - प्रमापण (नपुं) , निबर्हण (नपुं) , निकारण (नपुं) , विशारण (नपुं)
मारणम्. (4) - प्रवासन (नपुं) , परासन (नपुं) , निषूदन (नपुं) , निहिंसन (नपुं)
प्रवासनं परासनं निषूदनं निहिंसनम्॥ २.७.११५८ ॥
मारणम्. (4) - प्रवासन (नपुं) , परासन (नपुं) , निषूदन (नपुं) , निहिंसन (नपुं)
मारणम्. (4) - निर्वासन (नपुं) , संज्ञपन (नपुं) , निर्ग्रन्थन (नपुं) , अपासन (नपुं)
निवाऋसनं संज्ञपनं निगऋन्थनमपासनम्॥ २.७.११५९ ॥
मारणम्. (4) - निर्वासन (नपुं) , संज्ञपन (नपुं) , निर्ग्रन्थन (नपुं) , अपासन (नपुं)
मारणम्. (4) - निस्तर्हण (नपुं) , निहनन (नपुं) , क्षणन (नपुं) , परिवर्जन (नपुं)
निस्तहऋणं निहननं क्षणनं परिवजऋनम्॥ २.७.११६० ॥
मारणम्. (4) - निस्तर्हण (नपुं) , निहनन (नपुं) , क्षणन (नपुं) , परिवर्जन (नपुं)
मारणम्. (4) - निर्वापण (नपुं) , विशसन (नपुं) , मारण (नपुं) , प्रतिघातन (नपुं)
निवाऋपणं विशसनं मारणं प्रतिघातनम्॥ २.७.११६१ ॥
मारणम्. (4) - निर्वापण (नपुं) , विशसन (नपुं) , मारण (नपुं) , प्रतिघातन (नपुं)
मारणम्. (4) - उद्वासन (नपुं) , प्रमथन (नपुं) , क्रथन (नपुं) , उज्जासन (नपुं)
उद्वासन प्रमथन क्रथनोज्जासनानि च॥ २.७.११६२ ॥
मारणम्. (4) - उद्वासन (नपुं) , प्रमथन (नपुं) , क्रथन (नपुं) , उज्जासन (नपुं)
मारणम्. (6) - आलम्भ (पुं) , पिञ्ज (पुं) , विशर (पुं) , घात (पुं) , उन्माथ (पुं) , वध (पुं)
आलम्भपिञ्जविशरघातोन्माथवधा अपि॥ २.७.११६३ ॥
मारणम्. (6) - आलम्भ (पुं) , पिञ्ज (पुं) , विशर (पुं) , घात (पुं) , उन्माथ (पुं) , वध (पुं)
मरणम्. (5) - पञ्चता (स्त्री) , कालधर्म (पुं) , दिष्टान्त (पुं) , प्रलय (पुं) , अत्यय (पुं)
स्यात् पञ्चता कालधर्मो दिष्टान्तः प्रलयोऽत्ययः॥ २.७.११६४ ॥
मरणम्. (5) - पञ्चता (स्त्री) , कालधर्म (पुं) , दिष्टान्त (पुं) , प्रलय (पुं) , अत्यय (पुं)
मरणम्. (5) - अन्त (पुं) , नाश (पुं) , मृत्यु (स्त्री-पुं) , मरण (नपुं) , निधन (पुं-नपुं)
अन्तो नाशो द्वयोर्मृत्युर्मरणं निधनोऽस्त्रियाम्॥ २.७.११६५ ॥
मरणम्. (5) - अन्त (पुं) , नाश (पुं) , मृत्यु (स्त्री-पुं) , मरण (नपुं) , निधन (पुं-नपुं)
मृतः. (5) - परासु (वि) , प्राप्तपञ्चत्व (वि) , परेत (वि) , प्रेत (वि) , संस्थित (वि)
परासुप्राप्तपंचत्वपरेतप्रेतसंस्थिताः॥ २.७.११६६ ॥
मृतः. (5) - परासु (वि) , प्राप्तपञ्चत्व (वि) , परेत (वि) , प्रेत (वि) , संस्थित (वि)
मृतः. (2) - मृत (वि) , प्रमीत (वि) चिता. (3) - चिता (स्त्री) , चित्या (स्त्री) , चिति (स्त्री)
मृतप्रमीतौ त्रिष्वेते, चिता चित्या चितिः स्त्रियाम्॥ २.७.११६७ ॥
मृतः. (2) - मृत (वि) , प्रमीत (वि) चिता. (3) - चिता (स्त्री) , चित्या (स्त्री) , चिति (स्त्री)
छिन्नशिरसः शरीरम्. (1) - कबन्ध (पुं-नपुं)
कबंधोऽस्त्री क्रिया युक्तमपमूर्धकलेवरम्॥ २.७.११६८ ॥
छिन्नशिरसः शरीरम्. (1) - कबन्ध (पुं-नपुं)
प्रेतभूमिः. (2) - श्मशान (नपुं) , पितृवन (नपुं) मृतशरीरम्. (2) - कुणप (नपुं) , शव (पुं-नपुं)
श्मशानं स्यात् पितृवनं कुणपः शवमस्त्रियाम्॥ २.७.११६९ ॥
प्रेतभूमिः. (2) - श्मशान (नपुं) , पितृवन (नपुं) मृतशरीरम्. (2) - कुणप (नपुं) , शव (पुं-नपुं)
बन्दिशाला. (3) - प्रग्रह (पुं) , उपग्रह (पुं) , वन्दी (स्त्री) बन्धनगृहम्. (2) - कारा (स्त्री) , बन्धनालय (पुं)
प्रग्रहोपग्रहौ बंद्यां, कारा स्यात् बंधनालये॥ २.७.११७० ॥
बन्दिशाला. (3) - प्रग्रह (पुं) , उपग्रह (पुं) , वन्दी (स्त्री) बन्धनगृहम्. (2) - कारा (स्त्री) , बन्धनालय (पुं)
पञ्चवायवः. (2) - असु (पुं-बहु) , प्राण (पुं) जीवनम्. (2) - जीव (पुं) , असुधारण (नपुं)
पूंसि भूग्न्यसवः प्राणाश्चैवं, जीवोऽसुधारणम्॥ २.७.११७१ ॥
पञ्चवायवः. (2) - असु (पुं-बहु) , प्राण (पुं) जीवनम्. (2) - जीव (पुं) , असुधारण (नपुं)
जीवावच्छिन्नकालः. (2) - आयुस् (नपुं) , जीवितकाल (पुं) मृतसञ्जीवनौषधः. (2) - जीवातु (पुं) , जीवनौषध (नपुं)
आयुर्जीवितकालो, ना जीवतुर्जीवनौषधम् ॥ २.७.११७२ ॥
जीवावच्छिन्नकालः. (2) - आयुस् (नपुं) , जीवितकाल (पुं) मृतसञ्जीवनौषधः. (2) - जीवातु (पुं) , जीवनौषध (नपुं)
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