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 ॥ । अथ संकीर्णवर्गः ॥
क्रिया. (2) - कर्मन् (नपुं), क्रिया (स्त्री)क्रियासातत्यः. (1) - अपरस्पर (वि)
 कर्म क्रिया तत्सातत्ये गम्ये स्युरपरस्पराः ॥ ३.२.२३० ॥
क्रिया. (2) - कर्मन् (नपुं), क्रिया (स्त्री)क्रियासातत्यः. (1) - अपरस्पर (वि)
साकल्यवचनम्. (1) - पारायण (वि)आसङ्गवचनम्. (1) - तुरायण (वि)
 साकल्यासंगवचने पारायणपरायणे ॥ ३.२.२३१ ॥
साकल्यवचनम्. (1) - पारायण (वि)आसङ्गवचनम्. (1) - तुरायण (वि)
स्वातन्त्र्यम्. (2) - यदृच्छा (स्त्री), स्वैरिता (स्त्री)
 यदृच्छा स्वैरिता हेतुशून्या त्वास्था विलक्षणम् ॥ ३.२.२३२ ॥
स्वातन्त्र्यम्. (2) - यदृच्छा (स्त्री), स्वैरिता (स्त्री)
कामक्रोधाद्यभावः. (3) - शमथ (पुं), शम (पुं), शान्ति (स्त्री)तपःक्लेशसहनम्. (3) - दान्ति (स्त्री), दमथ (पुं), दम (पुं)
 शमथस्तु शमः शान्तिर्दान्तिस्तु दमथो दमः ॥ ३.२.२३३ ॥
कामक्रोधाद्यभावः. (3) - शमथ (पुं), शम (पुं), शान्ति (स्त्री)तपःक्लेशसहनम्. (3) - दान्ति (स्त्री), दमथ (पुं), दम (पुं)
प्रशस्तकर्मः. (2) - अवदान (नपुं), कर्मवृत्त (नपुं)फलेच्छायुक्तदानम्. (2) - काम्यदान (नपुं), प्रवारण (नपुं)
 अवदानं कर्म वृत्तं काम्यदानं प्रवारणम् ॥ ३.२.२३४ ॥
प्रशस्तकर्मः. (2) - अवदान (नपुं), कर्मवृत्त (नपुं)फलेच्छायुक्तदानम्. (2) - काम्यदान (नपुं), प्रवारण (नपुं)
वशीकरणम्. (2) - वशक्रिया (स्त्री), संवनन (नपुं)ओषधीनां मूलैरुच्चाटनकर्मः. (2) - मूलकर्मन् (नपुं), कार्मण (नपुं)
 वशक्रिया संवननं मूलकर्म तु कार्मणम् ॥ ३.२.२३५ ॥
वशीकरणम्. (2) - वशक्रिया (स्त्री), संवनन (नपुं)ओषधीनां मूलैरुच्चाटनकर्मः. (2) - मूलकर्मन् (नपुं), कार्मण (नपुं)
कम्पनम्. (2) - विधूनन (नपुं), विधुवन (नपुं)प्रीणनम्. (3) - तर्पण (नपुं), प्रीणन (नपुं), अवन (नपुं)
 विधूननं विधुवनं तर्पणं प्रीणनावनम् ॥ ३.२.२३६ ॥
कम्पनम्. (2) - विधूनन (नपुं), विधुवन (नपुं)प्रीणनम्. (3) - तर्पण (नपुं), प्रीणन (नपुं), अवन (नपुं)
वधोद्यतनिवारणम्. (3) - पर्याप्ति (स्त्री), परित्राण (नपुं), हस्तधारण (नपुं)
 पर्याप्तिः स्यात्परित्राणं हस्तधारणमित्यपि ॥ ३.२.२३७ ॥
वधोद्यतनिवारणम्. (3) - पर्याप्ति (स्त्री), परित्राण (नपुं), हस्तधारण (नपुं)
सूचीक्रिया. (3) - सेवन (नपुं), सीवन (नपुं), स्यूति (स्त्री)द्विधाभावः. (3) - विदर (पुं), स्फुटन (नपुं), भिद् (स्त्री)
 सेवनं सीवनं स्यूतिर्विदरः स्फुटनं भिदा ॥ ३.२.२३८ ॥
सूचीक्रिया. (3) - सेवन (नपुं), सीवन (नपुं), स्यूति (स्त्री)द्विधाभावः. (3) - विदर (पुं), स्फुटन (नपुं), भिद् (स्त्री)
शापवचनम्. (2) - आक्रोशन (नपुं), अभीषङ्ग (पुं)अनुभवः. (2) - संवेद (पुं), वेदना (स्त्री-नपुं)
 आक्रोशनमभीषङ्गः संवेदो वेदना न ना ॥ ३.२.२३९ ॥
शापवचनम्. (2) - आक्रोशन (नपुं), अभीषङ्ग (पुं)अनुभवः. (2) - संवेद (पुं), वेदना (स्त्री-नपुं)
सर्वतोव्याप्तिः. (2) - सम्मूर्च्छन (नपुं), अभिव्याप्ति (स्त्री)याचनम्. (4) - याञ्चा (स्त्री), भिक्षा (स्त्री), अर्थना (स्त्री), अर्दना (स्त्री)
 संमूर्च्छनमभिव्याप्तिर्याञ्चा भिक्षार्थनार्दना ॥ ३.२.२४० ॥
सर्वतोव्याप्तिः. (2) - सम्मूर्च्छन (नपुं), अभिव्याप्ति (स्त्री)याचनम्. (4) - याञ्चा (स्त्री), भिक्षा (स्त्री), अर्थना (स्त्री), अर्दना (स्त्री)
कर्तनम्. (2) - वर्धन (नपुं), छेदन (नपुं)आलिङ्गनकुशलप्रश्नादिनानन्दनम्. (2) - आनन्दन (नपुं), सभाजन (नपुं)
 वर्धनं छेदनेऽथ द्वे आनन्दनसभाजने ॥ ३.२.२४१ ॥
कर्तनम्. (2) - वर्धन (नपुं), छेदन (नपुं)आलिङ्गनकुशलप्रश्नादिनानन्दनम्. (2) - आनन्दन (नपुं), सभाजन (नपुं)
आलिङ्गनकुशलप्रश्नादिनानन्दनम्. (1) - आप्रच्छन्न (नपुं)गुरुपरम्परागतसदुपदेशः. (2) - आम्नाय (पुं), सम्प्रदाय (पुं)अपचयः. (2) - क्षय (पुं), क्षिया (स्त्री)
 आप्रच्छन्नमथाम्नायः संप्रदायः क्षये क्षिया ॥ ३.२.२४२ ॥
आलिङ्गनकुशलप्रश्नादिनानन्दनम्. (1) - आप्रच्छन्न (नपुं)गुरुपरम्परागतसदुपदेशः. (2) - आम्नाय (पुं), सम्प्रदाय (पुं)अपचयः. (2) - क्षय (पुं), क्षिया (स्त्री)
ग्राहणम्. (2) - ग्रह (पुं), ग्राह (पुं)इच्छा. (2) - वश (पुं), कान्त (वि)रक्षणम्. (2) - रक्ष्ण (पुं), त्राण (नपुं)शब्दकरणम्. (2) - रण (पुं), क्वण (पुं)
 ग्रहे ग्राहो वशः कान्तौ रक्ष्णस्त्राणे रणः कणे ॥ ३.२.२४३ ॥
ग्राहणम्. (2) - ग्रह (पुं), ग्राह (पुं)इच्छा. (2) - वश (पुं), कान्त (वि)रक्षणम्. (2) - रक्ष्ण (पुं), त्राण (नपुं)शब्दकरणम्. (2) - रण (पुं), क्वण (पुं)
वेधनम्. (2) - व्यध (पुं), वेध (पुं)पचनम्. (2) - पचा (स्त्री), पाक (पुं)आह्वानम्. (2) - हव (पुं), हूति (स्त्री)वेष्टनसम्भक्तिः. (2) - वर (पुं), वृत्ति (स्त्री)
 व्यधो वेधे पचा पाके हवो हूतौ वरो वृत्तौ ॥ ३.२.२४४ ॥
वेधनम्. (2) - व्यध (पुं), वेध (पुं)पचनम्. (2) - पचा (स्त्री), पाक (पुं)आह्वानम्. (2) - हव (पुं), हूति (स्त्री)वेष्टनसम्भक्तिः. (2) - वर (पुं), वृत्ति (स्त्री)
दाहः. (2) - ओष (पुं), प्लोष (पुं)नीतिः. (2) - नय (पुं), नाय (पुं)जीर्णत्वम्. (2) - ज्यानि (स्त्री), जीर्ण (पुं)भ्रमणम्. (2) - भ्रम (पुं), भ्रमि (स्त्री)
 ओषः प्लोषे नयो नाये ज्यानिर्जीर्णौ भ्रमो भ्रमौ ॥ ३.२.२४५ ॥
दाहः. (2) - ओष (पुं), प्लोष (पुं)नीतिः. (2) - नय (पुं), नाय (पुं)जीर्णत्वम्. (2) - ज्यानि (स्त्री), जीर्ण (पुं)भ्रमणम्. (2) - भ्रम (पुं), भ्रमि (स्त्री)
वृद्धिः. (2) - स्फाति (स्त्री), वृद्धि (स्त्री)कीर्तिः. (2) - प्रथा (स्त्री), ख्याति (स्त्री)स्पर्शनम्. (2) - स्पृष्टि (स्त्री), पृक्ति (स्त्री)प्रस्रवणम्. (2) - स्नव (पुं), स्रव (पुं)
 स्फातिर्वृद्धौ प्रथा ख्यातौ स्पृष्टिः पृक्तौ स्नवः स्रवे ॥ ३.२.२४६ ॥
वृद्धिः. (2) - स्फाति (स्त्री), वृद्धि (स्त्री)कीर्तिः. (2) - प्रथा (स्त्री), ख्याति (स्त्री)स्पर्शनम्. (2) - स्पृष्टि (स्त्री), पृक्ति (स्त्री)प्रस्रवणम्. (2) - स्नव (पुं), स्रव (पुं)
धनसम्पत्तिः. (2) - विधा (स्त्री), समृद्धि (स्त्री)स्फुरणम्. (2) - स्फुरण (नपुं), स्फुरणा (स्त्री)प्रमाज्ञानम्. (2) - प्रमिति (स्त्री), प्रमा (स्त्री)
 एधा समृद्धौ स्फुरणे स्फुरणा प्रमितौ प्रमा ॥ ३.२.२४७ ॥
धनसम्पत्तिः. (2) - विधा (स्त्री), समृद्धि (स्त्री)स्फुरणम्. (2) - स्फुरण (नपुं), स्फुरणा (स्त्री)प्रमाज्ञानम्. (2) - प्रमिति (स्त्री), प्रमा (स्त्री)
प्रसवनम्. (2) - प्रसूति (स्त्री), प्रसव (पुं)क्षरणम्. (2) - श्च्योत (पुं), प्राधार (पुं)ग्लानिः. (2) - क्लमथ (पुं), क्लम (पुं)
 प्रसूतिः प्रसवे श्च्योते प्राधारः क्लमथः क्लमे ॥ ३.२.२४८ ॥
प्रसवनम्. (2) - प्रसूति (स्त्री), प्रसव (पुं)क्षरणम्. (2) - श्च्योत (पुं), प्राधार (पुं)ग्लानिः. (2) - क्लमथ (पुं), क्लम (पुं)
उत्कर्षः. (2) - उत्कर्ष (पुं), अतिशय (पुं)सन्धानम्. (2) - सन्धि (पुं), श्लेष (पुं)
 उत्कर्षोऽतिशये सन्धिः श्लेषे विषय आश्रये ॥ ३.२.२४९ ॥
उत्कर्षः. (2) - उत्कर्ष (पुं), अतिशय (पुं)सन्धानम्. (2) - सन्धि (पुं), श्लेष (पुं)
प्रेरणम्. (2) - क्षिपा (स्त्री), क्षेपण (नपुं)गिलनम्. (2) - गीर्णि (स्त्री), गिरि (स्त्री)भाराद्युद्यमनम्. (2) - गुरण (नपुं), उद्यम (पुं)
 क्षिपायां क्षेपणं गीर्णिर्गिरौ गुरणमुद्यमे ॥ ३.२.२५० ॥
प्रेरणम्. (2) - क्षिपा (स्त्री), क्षेपण (नपुं)गिलनम्. (2) - गीर्णि (स्त्री), गिरि (स्त्री)भाराद्युद्यमनम्. (2) - गुरण (नपुं), उद्यम (पुं)
उन्नयनम्. (2) - उन्नाय (पुं), उन्नय (पुं)सेवा. (2) - श्राय (पुं), श्रयण (नपुं)विजयः. (2) - जयन (नपुं), जय (पुं)
 उन्नाय उन्नये श्रायः श्रयणे जयने जयः ॥ ३.२.२५१ ॥
उन्नयनम्. (2) - उन्नाय (पुं), उन्नय (पुं)सेवा. (2) - श्राय (पुं), श्रयण (नपुं)विजयः. (2) - जयन (नपुं), जय (पुं)
गदनम्. (2) - निगाद (पुं), निगद (पुं)आनन्दः. (2) - माद (पुं), मद (पुं)उद्वेजनम्. (2) - उद्वेग (पुं), उद्भ्रम (पुं)
 निगादो निगदे मादो मद उद्वेग उद्भ्रमे ॥ ३.२.२५२ ॥
गदनम्. (2) - निगाद (पुं), निगद (पुं)आनन्दः. (2) - माद (पुं), मद (पुं)उद्वेजनम्. (2) - उद्वेग (पुं), उद्भ्रम (पुं)
कुङ्कुमादिमर्दनम्. (2) - विमर्दन (नपुं), परिमल (पुं)अङ्गीकारः. (2) - अभ्युपपत्ति (स्त्री), अनुग्रह (पुं)
 विमर्दनं परिमलोऽभ्युपपत्तिरनुग्रहः ॥ ३.२.२५३ ॥
कुङ्कुमादिमर्दनम्. (2) - विमर्दन (नपुं), परिमल (पुं)अङ्गीकारः. (2) - अभ्युपपत्ति (स्त्री), अनुग्रह (पुं)
निरोधः. (2) - निग्रह (पुं), निरोध (पुं)कलहाह्वानम्. (2) - अभियोग (पुं), अभिग्रह (पुं)
 निग्रहस्तद्विरुद्धः स्यादभियोगस्त्वभिग्रहः ॥ ३.२.२५४ ॥
निरोधः. (2) - निग्रह (पुं), निरोध (पुं)कलहाह्वानम्. (2) - अभियोग (पुं), अभिग्रह (पुं)
मुष्टिबन्धनम्. (2) - मुष्टिबन्ध (पुं), सङ्ग्राह (पुं)धाडकलुण्ठनादिः. (3) - डिम्ब (पुं), डमर (पुं), विप्लव (पुं)
 मुष्टिबन्धस्तु संग्राहो डिम्बे डमरविप्लवौ ॥ ३.२.२५५ ॥
मुष्टिबन्धनम्. (2) - मुष्टिबन्ध (पुं), सङ्ग्राह (पुं)धाडकलुण्ठनादिः. (3) - डिम्ब (पुं), डमर (पुं), विप्लव (पुं)
बन्धनम्. (3) - बन्धन (नपुं), प्रसिति (स्त्री), चार (पुं)सन्तप्तः. (3) - स्पर्श (पुं), स्प्रष्टृ (पुं), उपतप्तृ (पुं)
 बन्धनं प्रसितिश्चारः स्पर्शः स्प्रष्टोपतप्तरि ॥ ३.२.२५६ ॥
बन्धनम्. (3) - बन्धन (नपुं), प्रसिति (स्त्री), चार (पुं)सन्तप्तः. (3) - स्पर्श (पुं), स्प्रष्टृ (पुं), उपतप्तृ (पुं)
अपकारः. (2) - निकार (पुं), विप्रकार (पुं)अभिप्रायानुरूपचेष्टा. (3) - आकार (पुं), इङ्ग (वि), इङ्गित (नपुं)
 निकारो विप्रकारः स्यादाकारस्त्विङ्ग इङ्गितम् ॥ ३.२.२५७ ॥
अपकारः. (2) - निकार (पुं), विप्रकार (पुं)अभिप्रायानुरूपचेष्टा. (3) - आकार (पुं), इङ्ग (वि), इङ्गित (नपुं)
प्रकृतेरन्यथाभावः. (4) - परिणाम (पुं), विकार (पुं), विकृति (स्त्री), विक्रिया (स्त्री)
 परिणामो विकारे द्वे समे विकृतिविक्रिये ॥ ३.२.२५८ ॥
प्रकृतेरन्यथाभावः. (4) - परिणाम (पुं), विकार (पुं), विकृति (स्त्री), विक्रिया (स्त्री)
अपहरणम्. (2) - अपहार (पुं), अपचय (पुं)राशीकरणम्. (2) - समाहार (पुं), समुच्चय (पुं)
 अपहारस्त्वपचयः समाहारः समुच्चयः ॥ ३.२.२५९ ॥
अपहरणम्. (2) - अपहार (पुं), अपचय (पुं)राशीकरणम्. (2) - समाहार (पुं), समुच्चय (पुं)
इन्द्रियाकर्षणम्. (2) - प्रत्याहार (पुं), उपादान (नपुं)क्रीडार्थसञ्चरणम्. (2) - विहार (पुं), परिक्रम (पुं)
 प्रत्याहार उपादानं विहारस्तु परिक्रमः ॥ ३.२.२६० ॥
इन्द्रियाकर्षणम्. (2) - प्रत्याहार (पुं), उपादान (नपुं)क्रीडार्थसञ्चरणम्. (2) - विहार (पुं), परिक्रम (पुं)
आभिमुख्येन ग्रहणम्. (2) - अभिहार (पुं), अभिग्रहण (नपुं)शस्त्रादेर्युक्त्या निःसरणम्. (2) - निहार (पुं), अभ्यवकर्षण (नपुं)
 अभिहारोऽभिग्रहणं निहारोऽभ्यवकर्षणम् ॥ ३.२.२६१ ॥
आभिमुख्येन ग्रहणम्. (2) - अभिहार (पुं), अभिग्रहण (नपुं)शस्त्रादेर्युक्त्या निःसरणम्. (2) - निहार (पुं), अभ्यवकर्षण (नपुं)
सदृशकरणम्. (2) - अनुहार (पुं), अनुकार (पुं)द्रव्यापगमः. (1) - व्यय (पुं)
 अनुहारोऽनुकारः स्यादर्थस्यापगमे व्ययः ॥ ३.२.२६२ ॥
सदृशकरणम्. (2) - अनुहार (पुं), अनुकार (पुं)द्रव्यापगमः. (1) - व्यय (पुं)
अविच्छेदेन जलादिप्रवृत्तिः. (2) - प्रवाह (पुं), प्रवृत्ति (स्त्री)बहिर्गमनम्. (1) - प्रवह (पुं)
 प्रवाहस्तु प्रवृत्तिः स्यात्प्रवहो गमनं बहिः ॥ ३.२.२६३ ॥
अविच्छेदेन जलादिप्रवृत्तिः. (2) - प्रवाह (पुं), प्रवृत्ति (स्त्री)बहिर्गमनम्. (1) - प्रवह (पुं)
संयमः. (6) - वियाम (पुं), वियम (पुं), याम (पुं), यम (पुं), संयाम (पुं), संयम (पुं)
 वियामो वियमो यामो यमः संयामसंयमौ ॥ ३.२.२६४ ॥
संयमः. (6) - वियाम (पुं), वियम (पुं), याम (पुं), यम (पुं), संयाम (पुं), संयम (पुं)
मारणादिक्रिया. (2) - हिंसाकर्मन् (नपुं), आभिचार (पुं)जागरणम्. (2) - जागर्या (स्त्री), जागरा (स्त्री-पुं)
 हिम्साकर्माभिचारः स्याज्जागर्या जांगरा द्वयोः ॥ ३.२.२६५ ॥
मारणादिक्रिया. (2) - हिंसाकर्मन् (नपुं), आभिचार (पुं)जागरणम्. (2) - जागर्या (स्त्री), जागरा (स्त्री-पुं)
विघ्नः. (3) - विघ्न (पुं), अन्तराय (पुं), प्रत्यूह (पुं)सन्निहिताश्रयः. (2) - उपघ्न (पुं), अन्तिकाश्रय (पुं)
 विघ्नोऽन्तरायः प्रत्यूहः स्यादुपघ्नोऽन्तिकाश्रये ॥ ३.२.२६६ ॥
विघ्नः. (3) - विघ्न (पुं), अन्तराय (पुं), प्रत्यूह (पुं)सन्निहिताश्रयः. (2) - उपघ्न (पुं), अन्तिकाश्रय (पुं)
उपभोगः. (2) - निर्वेश (पुं), उपभोग (पुं)परिजनादिना वेष्टनम्. (2) - परिसर्प (पुं), परिक्रिया (स्त्री)
 निर्वेश उपभोगः स्यात्परिसर्पः परिक्रिया ॥ ३.२.२६७ ॥
उपभोगः. (2) - निर्वेश (पुं), उपभोग (पुं)परिजनादिना वेष्टनम्. (2) - परिसर्प (पुं), परिक्रिया (स्त्री)
विश्लेषः. (2) - विधुर (नपुं), प्रविश्लेष (पुं)अभिप्रायः. (3) - अभिप्राय (पुं), छन्द (पुं), आशय (पुं)
 विधुरं तु प्रविश्लेषेऽभिप्रायश्छन्द आशयः ॥ ३.२.२६८ ॥
विश्लेषः. (2) - विधुर (नपुं), प्रविश्लेष (पुं)अभिप्रायः. (3) - अभिप्राय (पुं), छन्द (पुं), आशय (पुं)
सङ्क्षेपणम्. (2) - सङ्क्षेपण (नपुं), समसन (नपुं)विरोधनम्. (2) - पर्यवस्था (स्त्री), विरोधन (नपुं)
 संक्षेपणं समसनं पर्यवस्था विरोधनम् ॥ ३.२.२६९ ॥
सङ्क्षेपणम्. (2) - सङ्क्षेपण (नपुं), समसन (नपुं)विरोधनम्. (2) - पर्यवस्था (स्त्री), विरोधन (नपुं)
सर्वतो गमनम्. (2) - परिसर्या (स्त्री), परीसार (पुं)आसनम्. (3) - आस्या (स्त्री), आसना (स्त्री), स्थिति (स्त्री)
 परिसर्या परीसारः स्यादास्या त्वासना स्थितिः ॥ ३.२.२७० ॥
सर्वतो गमनम्. (2) - परिसर्या (स्त्री), परीसार (पुं)आसनम्. (3) - आस्या (स्त्री), आसना (स्त्री), स्थिति (स्त्री)
विस्तारः. (3) - विस्तार (पुं), विग्रह (पुं), व्यास (पुं)शब्दविस्तरः. (1) - विस्तर (पुं)
 विस्तारो विग्रहो व्यासः स च शब्दस्य विस्तरः ॥ ३.२.२७१ ॥
विस्तारः. (3) - विस्तार (पुं), विग्रह (पुं), व्यास (पुं)शब्दविस्तरः. (1) - विस्तर (पुं)
पादमर्दनादिः. (2) - संवाहन (नपुं), मर्दन (नपुं)तिरोधानम्. (2) - विनाश (पुं), अदर्शन (नपुं)
 संवाहनं मर्दनं स्याद्विनाशः स्याददर्शनम् ॥ ३.२.२७२ ॥
पादमर्दनादिः. (2) - संवाहन (नपुं), मर्दन (नपुं)तिरोधानम्. (2) - विनाश (पुं), अदर्शन (नपुं)
परिचयः. (2) - संस्तव (पुं), परिचय (पुं)व्रणादिविसरणम्. (2) - प्रसर (पुं), विसर्पण (नपुं)
 संस्तवः स्यात्परिचयः प्रसरस्तु विसर्पणम् ॥ ३.२.२७३ ॥
परिचयः. (2) - संस्तव (पुं), परिचय (पुं)व्रणादिविसरणम्. (2) - प्रसर (पुं), विसर्पण (नपुं)
धान्यादिसञ्चयः. (2) - नीवाक (पुं), प्रयाम (पुं)सन्निधानम्. (2) - सन्निधि (पुं), सन्निकर्षण (नपुं)
 नीवाकस्तु प्रयामः स्यात्संनिधिः संनिकर्षणम् ॥ ३.२.२७४ ॥
धान्यादिसञ्चयः. (2) - नीवाक (पुं), प्रयाम (पुं)सन्निधानम्. (2) - सन्निधि (पुं), सन्निकर्षण (नपुं)
छेदनम्. (3) - लव (पुं), अभिलाव (पुं), लवन (नपुं)धान्यादीनाम् बहुलीकरणम्. (3) - निष्पाव (पुं), पवन (नपुं), पव (पुं)
 लवोऽभिलाषो लवने निष्पावः पवने पवः ॥ ३.२.२७५ ॥
छेदनम्. (3) - लव (पुं), अभिलाव (पुं), लवन (नपुं)धान्यादीनाम् बहुलीकरणम्. (3) - निष्पाव (पुं), पवन (नपुं), पव (पुं)
अवसरः. (2) - प्रस्ताव (पुं), अवसर (पुं)सूत्रवेष्टनक्रिया. (2) - त्रसर (पुं), सूत्रवेष्टन (नपुं)
 प्रस्तावः स्यादपसरस्त्रसरः सूत्रवेष्टनम् ॥ ३.२.२७६ ॥
अवसरः. (2) - प्रस्ताव (पुं), अवसर (पुं)सूत्रवेष्टनक्रिया. (2) - त्रसर (पुं), सूत्रवेष्टन (नपुं)
प्रथमगर्भग्रहणम्. (2) - प्रजन (पुं), उपसर (पुं)प्रीत्या प्रार्थनम्. (2) - प्रश्रय (पुं), प्रणय (पुं)
 प्रजनः स्यादुपसरः प्रश्रयप्रणयौ समौ ॥ ३.२.२७७ ॥
प्रथमगर्भग्रहणम्. (2) - प्रजन (पुं), उपसर (पुं)प्रीत्या प्रार्थनम्. (2) - प्रश्रय (पुं), प्रणय (पुं)
बुद्धिसामर्थ्यम्. (2) - धीशक्ति (स्त्री), निष्क्रम (पुं)दुर्गप्रवेशनक्रिया. (2) - सङ्क्रम (पुं-नपुं), दुर्गसञ्चर (पुं)
 धीशक्तिर्निष्क्रमोऽस्त्री तु संक्रमो दुर्गसंचरः ॥ ३.२.२७८ ॥
बुद्धिसामर्थ्यम्. (2) - धीशक्ति (स्त्री), निष्क्रम (पुं)दुर्गप्रवेशनक्रिया. (2) - सङ्क्रम (पुं-नपुं), दुर्गसञ्चर (पुं)
कर्मारम्भे प्रथमप्रयोगः. (2) - प्रत्युत्क्रम (पुं), प्रयोगार्थ (पुं)आरम्भः. (2) - प्रक्रम (पुं), उपक्रम (पुं)
 प्रत्युत्क्रमः प्रयोगार्थः प्रक्रमः स्यादुपक्रमः ॥ ३.२.२७९ ॥
कर्मारम्भे प्रथमप्रयोगः. (2) - प्रत्युत्क्रम (पुं), प्रयोगार्थ (पुं)आरम्भः. (2) - प्रक्रम (पुं), उपक्रम (पुं)
आरम्भः. (3) - अभ्यादान (नपुं), उद्धात (पुं), आरम्भ (पुं)त्वरा. (2) - सम्भ्रम (पुं), त्वरा (स्त्री-पुं)
 स्यादभ्यादानमुद्धात आरम्भः संभ्रमस्त्वरा ॥ ३.२.२८० ॥
आरम्भः. (3) - अभ्यादान (नपुं), उद्धात (पुं), आरम्भ (पुं)त्वरा. (2) - सम्भ्रम (पुं), त्वरा (स्त्री-पुं)
रोधः. (2) - प्रतिबन्ध (पुं), प्रविष्टम्भ (पुं)अधोनयनम्. (2) - अवनाय (पुं), निपातन (नपुं)
 प्रतिबन्धः प्रविष्टम्भोऽवनायस्तु निपातनम् ॥ ३.२.२८१ ॥
रोधः. (2) - प्रतिबन्ध (पुं), प्रविष्टम्भ (पुं)अधोनयनम्. (2) - अवनाय (पुं), निपातन (नपुं)
अनुभवः. (2) - उपलम्भ (पुं), अनुभव (पुं)कुङ्कुमादिलेपनम्. (2) - समालम्भ (पुं), विलेपन (नपुं)
 उपलम्भस्त्वनुभवः समालम्भो विलेपनम् ॥ ३.२.२८२ ॥
अनुभवः. (2) - उपलम्भ (पुं), अनुभव (पुं)कुङ्कुमादिलेपनम्. (2) - समालम्भ (पुं), विलेपन (नपुं)
रागिणोर्वियोजनम्. (2) - विप्रलम्भ (पुं), विप्रयोग (पुं)अतिदानम्. (2) - विलम्भ (पुं), अतिसर्जन (नपुं)
 विप्रलम्भो विप्रयोगो विलम्भस्त्वतिसर्जनम् ॥ ३.२.२८३ ॥
रागिणोर्वियोजनम्. (2) - विप्रलम्भ (पुं), विप्रयोग (पुं)अतिदानम्. (2) - विलम्भ (पुं), अतिसर्जन (नपुं)
अतिख्यातिः. (2) - विश्राव (पुं), प्रतिख्याति (स्त्री)अवेक्षणम्. (2) - अवेक्षा (स्त्री), प्रतिजागर (पुं)
 विश्रावस्तु प्रतिख्यातिरवेक्षा प्रतिजागरः ॥ ३.२.२८४ ॥
अतिख्यातिः. (2) - विश्राव (पुं), प्रतिख्याति (स्त्री)अवेक्षणम्. (2) - अवेक्षा (स्त्री), प्रतिजागर (पुं)
पठनम्. (3) - निपाठ (पुं), निपठ (पुं), पाठ (पुं)आर्द्रीभावः. (3) - तेम (पुं), स्तेम (पुं), समुन्दन (नपुं)
 निपाठनिपठौ पाठे तेमस्तेमौ समुन्दने ॥ ३.२.२८५ ॥
पठनम्. (3) - निपाठ (पुं), निपठ (पुं), पाठ (पुं)आर्द्रीभावः. (3) - तेम (पुं), स्तेम (पुं), समुन्दन (नपुं)
क्लेशः. (3) - आदीनव (पुं), आस्रव (पुं), क्लेश (पुं)सङ्गमम्. (3) - मेलक (पुं), सङ्ग (पुं), सङ्गम (पुं)
 आदीनवास्रवौ क्लेशे मेलके संगसंगमौ ॥ ३.२.२८६ ॥
क्लेशः. (3) - आदीनव (पुं), आस्रव (पुं), क्लेश (पुं)सङ्गमम्. (3) - मेलक (पुं), सङ्ग (पुं), सङ्गम (पुं)
अन्वेषणम्. (5) - संवीक्षन (नपुं), विचयन (नपुं), मार्गण (नपुं), मृगणा (स्त्री), मृग (पुं)
 संवीक्षनं विचयनं मार्गणं मृगणा मृगः ॥ ३.२.२८७ ॥
अन्वेषणम्. (5) - संवीक्षन (नपुं), विचयन (नपुं), मार्गण (नपुं), मृगणा (स्त्री), मृग (पुं)
आलिङ्गनम्. (4) - परिरम्भ (पुं), परिष्वङ्ग (पुं), संश्लेष (पुं), उपगूहन (नपुं)
 परिरम्भः परिष्वङ्गः संश्लेष उपगूहनम् ॥ ३.२.२८८ ॥
आलिङ्गनम्. (4) - परिरम्भ (पुं), परिष्वङ्ग (पुं), संश्लेष (पुं), उपगूहन (नपुं)
वीक्षणम्. (5) - निर्वर्णन (नपुं), निध्यान (नपुं), दर्शन (नपुं), आलोकन (नपुं), ईक्षण (नपुं)
 निर्वर्णनं तु निध्यानं दर्शनालोकनेक्षणम् ॥ ३.२.२८९ ॥
वीक्षणम्. (5) - निर्वर्णन (नपुं), निध्यान (नपुं), दर्शन (नपुं), आलोकन (नपुं), ईक्षण (नपुं)
निराकरणम्. (4) - प्रत्याख्यान (नपुं), निरसन (नपुं), प्रत्यादेश (पुं), निराकृति (पुं)
 प्रत्याख्यानं निरसनं प्रत्यादेशो निराकृतिः ॥ ३.२.२९० ॥
निराकरणम्. (4) - प्रत्याख्यान (नपुं), निरसन (नपुं), प्रत्यादेश (पुं), निराकृति (पुं)
पर्यायेण प्रहरकादावुपशायः. (2) - उपशाय (पुं), विशाय (पुं)
 उपशायो विशायश्च पर्यायशयनार्थकौ ॥ ३.२.२९१ ॥
पर्यायेण प्रहरकादावुपशायः. (2) - उपशाय (पुं), विशाय (पुं)
जुगुप्सनम्. (4) - अर्तन (नपुं), ऋतीया (स्त्री), हृणीया (स्त्री), घृणा (स्त्री)
 अर्तनं च ऋतीया च हृणीया च घृणार्थकाः ॥ ३.२.२९२ ॥
जुगुप्सनम्. (4) - अर्तन (नपुं), ऋतीया (स्त्री), हृणीया (स्त्री), घृणा (स्त्री)
व्यतिक्रमः. (4) - व्यत्यास (पुं), विपर्यास (पुं), व्यत्यय (पुं), विपर्यय (पुं)
 स्याद्व्यत्यासो विपर्यासो व्यत्ययश्च विपर्यये ॥ ३.२.२९३ ॥
व्यतिक्रमः. (4) - व्यत्यास (पुं), विपर्यास (पुं), व्यत्यय (पुं), विपर्यय (पुं)
अतिक्रमः. (4) - पर्यय (पुं), अतिक्रम (पुं), अतिपात (पुं), उपात्यय (पुं)
 पर्ययोऽतिक्रमस्तस्मिन्नतिपात उपात्ययः ॥ ३.२.२९४ ॥
अतिक्रमः. (4) - पर्यय (पुं), अतिक्रम (पुं), अतिपात (पुं), उपात्यय (पुं)
भृत्यादिप्रेषणम्. (1) - प्रतिशासन (नपुं)
 प्रेषणं यत्समाहूय तत्र स्यात्प्रतिशासनम् ॥ ३.२.२९५ ॥
भृत्यादिप्रेषणम्. (1) - प्रतिशासन (नपुं)
यज्ञे स्तावकद्विजावस्थानभूमिः. (1) - संस्ताव (पुं)
 स संस्तावः क्रतुषु या स्तुतिभूमिर्द्विजन्मनाम् ॥ ३.२.२९६ ॥
यज्ञे स्तावकद्विजावस्थानभूमिः. (1) - संस्ताव (पुं)
काष्ठं यत्र काष्ठे निधाय तक्ष्यते सः. (1) - उद्घन (पुं)
 निधाय तक्ष्यते यत्र काष्ठे काष्ठं स उद्धनः ॥ ३.२.२९७ ॥
काष्ठं यत्र काष्ठे निधाय तक्ष्यते सः. (1) - उद्घन (पुं)
तृणादिगुच्छोन्मूलनसाधनम्. (2) - स्तम्बघ्न (पुं), स्तम्बघन (पुं)
 स्तम्बघ्नस्तु स्तम्बघनः स्तम्बो येन निहन्यते ॥ ३.२.२९८ ॥
तृणादिगुच्छोन्मूलनसाधनम्. (2) - स्तम्बघ्न (पुं), स्तम्बघन (पुं)
भ्रमरसूच्यादिः. (1) - आविध (पुं)तुल्यारोहपरिणाहवृक्षादिः. (1) - निघ (पुं)
 आविधो विध्यते येन तत्र विष्वक्समे निघः ॥ ३.२.२९९ ॥
भ्रमरसूच्यादिः. (1) - आविध (पुं)तुल्यारोहपरिणाहवृक्षादिः. (1) - निघ (पुं)
धान्यानामूर्ध्वक्षेपणम्. (2) - उत्कार (पुं), निकार (पुं)
 उत्कारश्च निकारश्च द्वौ धान्योत्क्षेपणार्थकौ ॥ ३.२.३०० ॥
धान्यानामूर्ध्वक्षेपणम्. (2) - उत्कार (पुं), निकार (पुं)
निगरणम्. (1) - निगार (पुं)उद्गरणम्. (1) - उद्गार (पुं)विक्षवणम्. (1) - विक्षाव (पुं)उद्ग्रहणम्. (1) - उद्ग्राह (पुं)
 निगारोद्गारविक्षावोद्ग्राहास्तु गरणादिषु ॥ ३.२.३०१ ॥
निगरणम्. (1) - निगार (पुं)उद्गरणम्. (1) - उद्गार (पुं)विक्षवणम्. (1) - विक्षाव (पुं)उद्ग्रहणम्. (1) - उद्ग्राह (पुं)
उपरमणम्. (4) - आरति (स्त्री), अवरति (स्त्री), विरति (स्त्री), उपराम (पुं)मुखेन श्लेष्मनिरसनम्. (1) - निष्ठेव (स्त्री-पुं)
 आरत्यवरतिविरतय उपरामेऽथास्त्रियां तु निष्ठेवः ॥ ३.२.३०२ ॥
उपरमणम्. (4) - आरति (स्त्री), अवरति (स्त्री), विरति (स्त्री), उपराम (पुं)मुखेन श्लेष्मनिरसनम्. (1) - निष्ठेव (स्त्री-पुं)
मुखेन श्लेष्मनिरसनम्. (3) - निष्ठ्यूति (स्त्री), निष्ठेवन (नपुं), निष्ठीवन (नपुं)
 निष्ठयूतिर्निष्ठेवननिष्ठीवनमित्यभिन्नानि ॥ ३.२.३०३ ॥
मुखेन श्लेष्मनिरसनम्. (3) - निष्ठ्यूति (स्त्री), निष्ठेवन (नपुं), निष्ठीवन (नपुं)
वेगः. (2) - जवन (नपुं), जूति (स्त्री)समापनम्. (2) - साति (स्त्री), अवसान (नपुं)ज्वरणम्. (2) - ज्वर (पुं), जूर्ति (स्त्री)
 जवने जूतिः सातिस्त्ववसाने स्यादथ ज्वरे जूर्तिः ॥ ३.२.३०४ ॥
वेगः. (2) - जवन (नपुं), जूति (स्त्री)समापनम्. (2) - साति (स्त्री), अवसान (नपुं)ज्वरणम्. (2) - ज्वर (पुं), जूर्ति (स्त्री)
पशुप्रेरणम्. (2) - उदज (पुं), पशुप्रेरण (नपुं)आक्रोशनम्. (1) - अकरणि (स्त्री)
 उदजस्तु पशु प्रेरणमकरणिरित्यादयः शापे ॥ ३.२.३०५ ॥
पशुप्रेरणम्. (2) - उदज (पुं), पशुप्रेरण (नपुं)आक्रोशनम्. (1) - अकरणि (स्त्री)
औपगवानां समूहः. (1) - औपगवक (नपुं)
 गोत्रान्तेभ्यस्तस्य वृन्दमित्यौपगवकादिकम् ॥ ३.२.३०६ ॥
औपगवानां समूहः. (1) - औपगवक (नपुं)
अपूपानां समूहः. (1) - आपूपिक (नपुं)शष्कुलीनां समूहः. (1) - शाष्कुलिक (नपुं)
 आपूपिकं शाष्कुलिकमेवमाद्यमचेतसाम् ॥ ३.२.३०७ ॥
अपूपानां समूहः. (1) - आपूपिक (नपुं)शष्कुलीनां समूहः. (1) - शाष्कुलिक (नपुं)
माणवानां समूहः. (1) - माणव्य (नपुं)सहायानां समूहः. (1) - सहायता (स्त्री)
 माणवानां तु माणव्यं सहायानां सहायता ॥ ३.२.३०८ ॥
माणवानां समूहः. (1) - माणव्य (नपुं)सहायानां समूहः. (1) - सहायता (स्त्री)
हलानां समूहः. (1) - हल्या (स्त्री)ब्राह्मणानां समूहः. (1) - ब्राह्मण्य (नपुं)वाडवानां समूहः. (1) - वाडव्य (नपुं)
 हल्या हलानां ब्राह्मण्यवाडव्ये तु द्विजन्मनाम् ॥ ३.२.३०९ ॥
हलानां समूहः. (1) - हल्या (स्त्री)ब्राह्मणानां समूहः. (1) - ब्राह्मण्य (नपुं)वाडवानां समूहः. (1) - वाडव्य (नपुं)
पर्शुकानां समूहः. (1) - पार्श्व (नपुं)पृष्ठानां समूहः. (1) - पृष्ठ्य (नपुं)
 द्वे पर्शुकानां पृष्ठानां पार्श्वं पृष्ठ्यमनुक्रमात् ॥ ३.२.३१० ॥
पर्शुकानां समूहः. (1) - पार्श्व (नपुं)पृष्ठानां समूहः. (1) - पृष्ठ्य (नपुं)
खलानां समूहः. (2) - खलिनी (स्त्री), खल्या (स्त्री)माणवानां समूहः. (1) - मानुष्यक (नपुं)
 खलानां खलिनी खल्याप्यथ मानुष्यकं नृणाम् ॥ ३.२.३११ ॥
खलानां समूहः. (2) - खलिनी (स्त्री), खल्या (स्त्री)माणवानां समूहः. (1) - मानुष्यक (नपुं)
ग्रामाणां समूहः. (1) - ग्रामता (स्त्री)जनानां समूहः. (1) - जनता (स्त्री)धूमानां समूहः. (1) - धूम्या (स्त्री)पाशानां समूहः. (1) - पाश्या (स्त्री)गलानां समूहः. (1) - गल्या (स्त्री)
 ग्रामता जनता धूम्या पाश्या गल्या पृथक्पृथक् ॥ ३.२.३१२ ॥
ग्रामाणां समूहः. (1) - ग्रामता (स्त्री)जनानां समूहः. (1) - जनता (स्त्री)धूमानां समूहः. (1) - धूम्या (स्त्री)पाशानां समूहः. (1) - पाश्या (स्त्री)गलानां समूहः. (1) - गल्या (स्त्री)
सहस्राणां समूहः. (1) - साहस्र (नपुं)कारीषाणां समूहः. (1) - कारीष (नपुं)चर्मणां समूहः. (1) - चार्मण (नपुं)अथर्वणां समूहः. (1) - आथर्वण (नपुं)
 अपि साहस्रकारीषवार्मणाथर्वणादिकं । ॥ ३.२.३१३ ॥
सहस्राणां समूहः. (1) - साहस्र (नपुं)कारीषाणां समूहः. (1) - कारीष (नपुं)चर्मणां समूहः. (1) - चार्मण (नपुं)अथर्वणां समूहः. (1) - आथर्वण (नपुं)
 ॥ । इति संकीर्णवर्गः ॥

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