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 नानार्थाः केऽपि कान्तादि वर्गेष्वेवात्र कीर्तिताः ॥ ३.३.३१४ ॥
 ॥ । अथ नानार्थवर्गः ॥
 भूरिप्रयोगा ये येषु पर्यायेष्वपि तेषु ते ॥ ३.३.३१५ ॥
जनः. (1) - लोक (पुं)
 आकाशे त्रिदिवे नाको लोकस्तु भुवने जने ॥ ३.३.३१६ ॥
जनः. (1) - लोक (पुं)
पद्यम्. (1) - श्लोक (पुं) कीर्तिः. (1) - श्लोक (पुं) बाणः. (1) - सायक (पुं) खड्गः. (1) - सायक (पुं)
 पद्ये यशसि च श्लोकः शरे खड्गे च सायकः ॥ ३.३.३१७ ॥
पद्यम्. (1) - श्लोक (पुं) कीर्तिः. (1) - श्लोक (पुं) बाणः. (1) - सायक (पुं) खड्गः. (1) - सायक (पुं)
वरुणः. (1) - जम्बुक (पुं) चिपिटः. (1) - पृथुक (पुं)
 जम्बुकौ क्रोष्टुवरुणौ पृथुकौ चिपिटार्भकौ ॥ ३.३.३१८ ॥
वरुणः. (1) - जम्बुक (पुं) चिपिटः. (1) - पृथुक (पुं)
भेरी. (1) - आनक (पुं)
 आलोकौ दर्शनद्योतौ भेरीपटकमानकौ ॥ ३.३.३१९ ॥
भेरी. (1) - आनक (पुं)
अङ्गः. (1) - अङ्क (पुं) अपवादः. (1) - कलङ्क (पुं)
 उत्सङ्गचिह्नयोरङ्कः कलङ्कोऽङ्कापवादयोः ॥ ३.३.३२० ॥
अङ्गः. (1) - अङ्क (पुं) अपवादः. (1) - कलङ्क (पुं)
नागः. (1) - तक्षक (पुं) तक्षः. (1) - तक्षक (पुं) स्फटिकम्. (1) - अर्क (पुं)
 तक्षको नागवर्द्धक्योरर्कः स्फटिकसूर्ययोः ॥ ३.३.३२१ ॥
नागः. (1) - तक्षक (पुं) तक्षः. (1) - तक्षक (पुं) स्फटिकम्. (1) - अर्क (पुं)
ब्रह्मा. (1) - क (पुं) सूर्यः. (1) - क (पुं) वायुः. (1) - क (पुं) जलम्. (1) - कम् (नपुं) शिरः. (1) - कम् (नपुं)
 मरुते वेधसि ब्रघ्ने पुंसि कः कं शिरोऽम्बुनोः ॥ ३.३.३२२ ॥
ब्रह्मा. (1) - क (पुं) सूर्यः. (1) - क (पुं) वायुः. (1) - क (पुं) जलम्. (1) - कम् (नपुं) शिरः. (1) - कम् (नपुं)
तुच्छधान्यम्. (1) - पुलाक (पुं) सङ्क्षेपः. (1) - पुलाक (पुं) भक्तसिक्तकान्नावयवः. (1) - पुलाक (पुं)
 स्यात्पुलाकस्तुच्छधान्ये संक्षेपे भक्तसिक्थके ॥ ३.३.३२३ ॥
तुच्छधान्यम्. (1) - पुलाक (पुं) सङ्क्षेपः. (1) - पुलाक (पुं) भक्तसिक्तकान्नावयवः. (1) - पुलाक (पुं)
करिणः पुच्छमूलोपान्तः. (1) - पेचक (पुं)
 उलूके करिणः पुच्छमूलोपान्ते च पेचकः ॥ ३.३.३२४ ॥
करिणः पुच्छमूलोपान्तः. (1) - पेचक (पुं)
कमण्डलुः. (1) - करक (पुं)
 कमण्डलौ च करकः सुगते च विनायकः ॥ ३.३.३२५ ॥
कमण्डलुः. (1) - करक (पुं)
हस्तपरिमाणः. (1) - किष्कु (पुं) वितस्तपरिमाणः. (1) - किष्कु (पुं)
 किष्कुर्हस्ते वितस्तौ च शूककीटे च वृश्चिकः ॥ ३.३.३२६ ॥
हस्तपरिमाणः. (1) - किष्कु (पुं) वितस्तपरिमाणः. (1) - किष्कु (पुं)
प्रतिकूलम्. (1) - प्रतीक (पुं) एकदेशः. (1) - प्रतीक (पुं)
 प्रतिकूले प्रतीकस्त्रिष्वेकदेशे तु पुंस्ययम् ॥ ३.३.३२७ ॥
प्रतिकूलम्. (1) - प्रतीक (पुं) एकदेशः. (1) - प्रतीक (पुं)
चिरायता. (1) - भूतिक (नपुं) कुम्भी. (1) - भूतिक (नपुं) तृणविशेषः. (1) - भूतिक (नपुं)
 स्याद्भूतिकं तु भूनिम्बे कत्तृणे भूस्तृणेऽपि च ॥ ३.३.३२८ ॥
चिरायता. (1) - भूतिक (नपुं) कुम्भी. (1) - भूतिक (नपुं) तृणविशेषः. (1) - भूतिक (नपुं)
ज्योत्स्निका. (1) - कोशातकी (स्त्री) घोषः. (1) - कोशातकी (स्त्री)
 ज्योत्स्निकायां च घोषे च कोशातक्यथ कट्फले ॥ ३.३.३२९ ॥
ज्योत्स्निका. (1) - कोशातकी (स्त्री) घोषः. (1) - कोशातकी (स्त्री)
कुम्भी. (1) - सोमवल्क (पुं)
 सिते च खदिरे सोमवल्कः स्यादथ सिह्वके ॥ ३.३.३३० ॥
कुम्भी. (1) - सोमवल्क (पुं)
तिलकल्कम्. (1) - पिण्याक (पुं-नपुं) सिह्लकम्. (1) - पिण्याक (पुं-नपुं) हिङ्गुवृक्षनिर्यासः. (1) - बाह्लीक (नपुं)
 तिलकल्के च पिण्याको बाह्लीकं रामठेऽपि च ॥ ३.३.३३१ ॥
तिलकल्कम्. (1) - पिण्याक (पुं-नपुं) सिह्लकम्. (1) - पिण्याक (पुं-नपुं) हिङ्गुवृक्षनिर्यासः. (1) - बाह्लीक (नपुं)
इन्द्रः. (1) - कौशिक (पुं) सर्पग्राहिः. (1) - कौशिक (पुं)
 महेन्द्र गुग्गुलूलूकव्यालग्राहिषु कौशिकः ॥ ३.३.३३२ ॥
इन्द्रः. (1) - कौशिक (पुं) सर्पग्राहिः. (1) - कौशिक (पुं)
रोगः. (1) - आतङ्क (पुं) विपत्. (1) - आतङ्क (पुं) शङ्का. (1) - आतङ्क (पुं) स्वल्पम्. (1) - क्षुल्लक (वि)
 रुक्तापशङ्कास्वातङ्कः स्वल्पेऽपि क्षुल्लकस्त्रिषु ॥ ३.३.३३३ ॥
रोगः. (1) - आतङ्क (पुं) विपत्. (1) - आतङ्क (पुं) शङ्का. (1) - आतङ्क (पुं) स्वल्पम्. (1) - क्षुल्लक (वि)
अश्वखुरम्. (1) - वर्तक (पुं)
 जैवातृकः शशाङ्केऽपि खुरेऽप्यश्वस्य वर्तकः ॥ ३.३.३३४ ॥
अश्वखुरम्. (1) - वर्तक (पुं)
व्याघ्रः. (1) - पुण्डरीक (पुं) यवः. (1) - दीपक (पुं)
 व्याघ्रेऽपि पुण्डरीको ना यवान्यामपि दीपकः ॥ ३.३.३३५ ॥
व्याघ्रः. (1) - पुण्डरीक (पुं) यवः. (1) - दीपक (पुं)
वानरः. (1) - शालावृक (पुं) जम्भूकः. (1) - शालावृक (पुं) शुनकः. (1) - शालावृक (पुं) सुवर्णम्. (1) - गैरिक (नपुं)
 शालावृकाः कपिक्रोष्टुश्वानः स्वर्णेऽपि गैरिकम् ॥ ३.३.३३६ ॥
वानरः. (1) - शालावृक (पुं) जम्भूकः. (1) - शालावृक (पुं) शुनकः. (1) - शालावृक (पुं) सुवर्णम्. (1) - गैरिक (नपुं)
दुःखम्. (1) - व्यलीक (नपुं) असत्यवचनम्. (1) - अलीक (नपुं) अप्रियम्. (1) - अलीक (नपुं)
 पीडार्थेऽपि व्यलीकं स्यादलीकं त्वप्रियेऽनृते ॥ ३.३.३३७ ॥
दुःखम्. (1) - व्यलीक (नपुं) असत्यवचनम्. (1) - अलीक (नपुं) अप्रियम्. (1) - अलीक (नपुं)
स्वभावः. (1) - अनूक (नपुं) वंशः. (1) - अनूक (नपुं) खण्डमात्रम्. (1) - शल्क (नपुं) वृक्षत्वक्. (1) - शल्क (नपुं)
 शीलान्वयावनूके द्वे शल्के शकलवल्कले ॥ ३.३.३३८ ॥
स्वभावः. (1) - अनूक (नपुं) वंशः. (1) - अनूक (नपुं) खण्डमात्रम्. (1) - शल्क (नपुं) वृक्षत्वक्. (1) - शल्क (नपुं)
साष्टशतसुवर्णम्. (1) - निष्क (पुं-नपुं) हेम्न्युरोभूषणम्. (1) - निष्क (पुं-नपुं) कर्षचतुष्टयम्. (1) - निष्क (पुं-नपुं)
 साष्टे शते सुवर्णानां हेम्न्युरोभूषणे पले ॥ ३.३.३३९ ॥
साष्टशतसुवर्णम्. (1) - निष्क (पुं-नपुं) हेम्न्युरोभूषणम्. (1) - निष्क (पुं-नपुं) कर्षचतुष्टयम्. (1) - निष्क (पुं-नपुं)
दीनार नामकनाण्यविशेषः. (1) - निष्क (पुं-नपुं) कपटः. (1) - कल्क (पुं-नपुं) पापम्. (1) - कल्क (पुं-नपुं) मलम्. (1) - कल्क (पुं-नपुं)
 दीनारेऽपि च निष्कोऽस्त्री कल्कोऽस्त्री शमलैनसोः ॥ ३.३.३४० ॥
दीनार नामकनाण्यविशेषः. (1) - निष्क (पुं-नपुं) कपटः. (1) - कल्क (पुं-नपुं) पापम्. (1) - कल्क (पुं-नपुं) मलम्. (1) - कल्क (पुं-नपुं)
शूलम्. (1) - पिनाक (पुं-नपुं)
 दम्भेऽप्यथ पिनाकोऽस्त्री शूलशङ्करधन्वनोः ॥ ३.३.३४१ ॥
शूलम्. (1) - पिनाक (पुं-नपुं)
 धेनुका तु करेण्वां च मेघजाले च कालिका ॥ ३.३.३४२ ॥
यातना. (1) - कारिका (स्त्री) कृत्यम्. (1) - कारिका (स्त्री)
 कारिका यातनावृत्त्योः कर्णिका कर्णभूषणे ॥ ३.३.३४३ ॥
यातना. (1) - कारिका (स्त्री) कृत्यम्. (1) - कारिका (स्त्री)
करिहस्तः. (1) - कर्णिका (स्त्री) अङ्गुली. (1) - कर्णिका (स्त्री) पद्मबीजः. (1) - कर्णिका (स्त्री)
 करिहस्तेऽङ्गुलौ पद्मबीजकोश्यां त्रिषूत्तरे ॥ ३.३.३४४ ॥
करिहस्तः. (1) - कर्णिका (स्त्री) अङ्गुली. (1) - कर्णिका (स्त्री) पद्मबीजः. (1) - कर्णिका (स्त्री)
मुख्यः. (2) - वृन्दारक (वि) , एक (वि) रूपिः. (1) - वृन्दारक (वि) अन्यः. (1) - एक (वि) केवलः. (1) - एक (वि)
 वृन्दारकौ रूपिमुख्यावेके मुख्यान्यकेवलाः ॥ ३.३.३४५ ॥
मुख्यः. (2) - वृन्दारक (वि) , एक (वि) रूपिः. (1) - वृन्दारक (वि) अन्यः. (1) - एक (वि) केवलः. (1) - एक (वि)
दाम्भिकः. (1) - कौक्कुटिक (वि) अदूरेरितेक्षणम्. (1) - कौक्कुटिक (वि)
 स्याद्दाम्भिकः कौक्कुटिको यश्चादूरेरितेक्षणः ॥ ३.३.३४६ ॥
दाम्भिकः. (1) - कौक्कुटिक (वि) अदूरेरितेक्षणम्. (1) - कौक्कुटिक (वि)
कार्याक्षमः. (1) - ललाटिक (वि) प्रभोर्भावदर्शिः. (1) - ललाटिक (वि)
 ललाटिकः प्रभोर्भालदर्शी कार्याक्षमश् ॥ ३.३.३४७ ॥
कार्याक्षमः. (1) - ललाटिक (वि) प्रभोर्भावदर्शिः. (1) - ललाटिक (वि)
 च यः ॥ ३.३.३४८ ॥
चक्रम्. (1) - कटक (पुं-नपुं) मेखलाख्यपर्वतमध्यभागः. (1) - कटक (पुं-नपुं)
 भूभृन्नितम्बवलयचक्रेषु कटकोऽस्त्रियाम् ॥ ३.३.३४९ ॥
चक्रम्. (1) - कटक (पुं-नपुं) मेखलाख्यपर्वतमध्यभागः. (1) - कटक (पुं-नपुं)
क्षुद्रशत्रुः. (1) - कण्टक (पुं) सूच्यग्रम्. (1) - कण्टक (पुं) रोमाञ्चः. (1) - कण्टक (पुं)
 सूच्यग्रे क्षुद्रशत्रौ च रोमहर्षे च कण्टकः ॥ ३.३.३५० ॥
क्षुद्रशत्रुः. (1) - कण्टक (पुं) सूच्यग्रम्. (1) - कण्टक (पुं) रोमाञ्चः. (1) - कण्टक (पुं)
मध्यरत्नम्. (1) - नायक (वि)
 पाकौ पक्तिशिशू मध्यरत्ने नेतरि नायकः ॥ ३.३.३५१ ॥
मध्यरत्नम्. (1) - नायक (वि)
व्याघ्रः. (1) - लुब्धक (पुं)
 पर्यङ्कः स्यात्परिकरे स्याद्व्याग्रेऽपि च लुब्धकः ॥ ३.३.३५२ ॥
व्याघ्रः. (1) - लुब्धक (पुं)
समूहः. (1) - पेटक (वि) संस्कारादिकर्तुर्गुरुः. (1) - देशिक (पुं) देश्यः. (1) - देशिक (पुं)
 पेटकस्त्रिषु वृन्देऽपि गुरौ देश्ये च देशिकः ॥ ३.३.३५३ ॥
समूहः. (1) - पेटक (वि) संस्कारादिकर्तुर्गुरुः. (1) - देशिक (पुं) देश्यः. (1) - देशिक (पुं)
ग्रामः. (1) - खेटक (नपुं) फलकः. (1) - खेटक (नपुं) धीवरः. (1) - जालिक (पुं)
 खेटकौ ग्रामफलकौ धीवरेऽपिच जालिकः ॥ ३.३.३५४ ॥
ग्रामः. (1) - खेटक (नपुं) फलकः. (1) - खेटक (नपुं) धीवरः. (1) - जालिक (पुं)
पुष्परेणुः. (1) - किञ्जल्क (पुं) स्त्रीधनम्. (1) - शुल्क (पुं-नपुं)
 पुष्परेणौ च किञ्जल्कः शुल्कोऽस्त्री स्त्रीधनेऽपि च ॥ ३.३.३५५ ॥
पुष्परेणुः. (1) - किञ्जल्क (पुं) स्त्रीधनम्. (1) - शुल्क (पुं-नपुं)
महातरङ्गः. (1) - उत्कलिका (स्त्री) भावम्. (1) - वार्धक (नपुं) समूहः. (1) - वार्धक (नपुं)
 स्यात्कल्लोलेऽप्युत्कलिका वार्धकं भाववृन्दयोः ॥ ३.३.३५६ ॥
महातरङ्गः. (1) - उत्कलिका (स्त्री) भावम्. (1) - वार्धक (नपुं) समूहः. (1) - वार्धक (नपुं)
हस्तिनी. (1) - गणिका (स्त्री) बालः. (1) - दारक (नपुं) भेदकः. (1) - दारक (नपुं)
 करिण्यां चापि गणिका दारकौ बालभेदकौ ॥ ३.३.३५७ ॥
हस्तिनी. (1) - गणिका (स्त्री) बालः. (1) - दारक (नपुं) भेदकः. (1) - दारक (नपुं)
अचक्षुष्कः. (1) - एडमूक (वि) अश्मदारणम्. (1) - टङ्क (पुं-नपुं) मदः. (1) - टङ्क (पुं-नपुं)
 अन्धेऽप्यनेडमूकः स्यात्टङ्कौ दर्पाश्मदारणौ ॥ ३.३.३५८ ॥
अचक्षुष्कः. (1) - एडमूक (वि) अश्मदारणम्. (1) - टङ्क (पुं-नपुं) मदः. (1) - टङ्क (पुं-नपुं)
मृद्भाण्डम्. (1) - मन्थ (पुं) उष्ट्रिका. (1) - मन्थ (पुं) रसदर्वकम्. (1) - खजक (पुं)
 मृद्भाण्डेऽप्युष्ट्रिका मन्थे खजकं रसदर्वके ॥ ३.३.३५९ ॥
मृद्भाण्डम्. (1) - मन्थ (पुं) उष्ट्रिका. (1) - मन्थ (पुं) रसदर्वकम्. (1) - खजक (पुं)
 इति कान्ताः ॥ ३.३.३६० ॥
अग्निज्वाला. (1) - मयूख (पुं) बाणः. (1) - शिलीमुख (पुं) भ्रमरः. (1) - शिलीमुख (पुं)
 मयूखस्त्विट्करज्वालास्वलिबाणौ शिलीमुखौ ॥ ३.३.३६१ ॥
अग्निज्वाला. (1) - मयूख (पुं) बाणः. (1) - शिलीमुख (पुं) भ्रमरः. (1) - शिलीमुख (पुं)
ललाटास्थिः. (1) - शङ्ख (पुं-नपुं) सामान्यनिधिः. (1) - शङ्ख (पुं-नपुं) चक्षुरादीन्द्रियम्. (1) - ख (नपुं)
 शङ्खो निधौ ललटास्थ्निकम्बौ न स्त्रीन्द्रियेऽपि खम् ॥ ३.३.३६२ ॥
ललाटास्थिः. (1) - शङ्ख (पुं-नपुं) सामान्यनिधिः. (1) - शङ्ख (पुं-नपुं) चक्षुरादीन्द्रियम्. (1) - ख (नपुं)
किरणः. (1) - शिखा (स्त्री) पर्वतः. (2) - नग (पुं) , अग (पुं) वृक्षः. (2) - नग (पुं) , अग (पुं)
 धृणिज्वाले अपि शिखे शैलवृक्षौ नगावगौ ॥ ३.३.३६३ ॥
किरणः. (1) - शिखा (स्त्री) पर्वतः. (2) - नग (पुं) , अग (पुं) वृक्षः. (2) - नग (पुं) , अग (पुं)
 इति खान्ताः ॥ ३.३.३६४ ॥
सूर्यः. (1) - खग (पुं)
 आशुगौ वायुविशिखौ शरार्कविहगाः खगाः ॥ ३.३.३६५ ॥
सूर्यः. (1) - खग (पुं)
पक्षी. (1) - पतङ्ग (पुं) सूर्यः. (1) - पतङ्ग (पुं) समूहः. (1) - पूग (पुं)
 पतङ्गौ पक्षिसूर्यौ च पूगः क्रमुकवृन्दयोः ॥ ३.३.३६६ ॥
पक्षी. (1) - पतङ्ग (पुं) सूर्यः. (1) - पतङ्ग (पुं) समूहः. (1) - पूग (पुं)
पशुः. (1) - मृग (पुं) अविच्छेदेन जलादिप्रवृत्तिः. (1) - वेग (पुं) वेगः. (1) - वेग (पुं)
 पशवोऽपि मृगा वेगः प्रवाहजवयोरपि ॥ ३.३.३६७ ॥
पशुः. (1) - मृग (पुं) अविच्छेदेन जलादिप्रवृत्तिः. (1) - वेग (पुं) वेगः. (1) - वेग (पुं)
पुष्परेणुः. (1) - पराग (पुं) स्नानीयादि गन्धद्रव्यम्. (1) - पराग (पुं) रजः. (1) - पराग (पुं)
 परागः कौसुमे रेणौ स्नानीयादौ रजस्यपि ॥ ३.३.३६८ ॥
पुष्परेणुः. (1) - पराग (पुं) स्नानीयादि गन्धद्रव्यम्. (1) - पराग (पुं) रजः. (1) - पराग (पुं)
नागाः. (1) - गज (पुं) हस्तिः. (1) - गज (पुं) ललाटकृततिलकम्. (1) - अपाङ्ग (पुं)
 गजेऽपि नागमातङ्गावपाङ्गस्तिलकेऽपि च ॥ ३.३.३६९ ॥
नागाः. (1) - गज (पुं) हस्तिः. (1) - गज (पुं) ललाटकृततिलकम्. (1) - अपाङ्ग (पुं)
स्वभावः. (1) - सर्ग (पुं) निर्मोक्षः. (1) - सर्ग (पुं) निश्चयः. (1) - सर्ग (पुं) अध्यायभेदः. (1) - सर्ग (पुं) सृष्टिः. (1) - सर्ग (पुं)
 सर्गः स्वभावनिर्मोक्षनिश्चयाध्यायसृष्टिषु ॥ ३.३.३७० ॥
स्वभावः. (1) - सर्ग (पुं) निर्मोक्षः. (1) - सर्ग (पुं) निश्चयः. (1) - सर्ग (पुं) अध्यायभेदः. (1) - सर्ग (पुं) सृष्टिः. (1) - सर्ग (पुं)
सन्नहनम्. (1) - योग (पुं) उपायः. (1) - योग (पुं) ध्यानम्. (1) - योग (पुं) सङ्गतिः. (1) - योग (पुं) युक्तिः. (1) - योग (पुं)
 योगः संनहनोपायध्यानसंगतियुक्तिषु ॥ ३.३.३७१ ॥
सन्नहनम्. (1) - योग (पुं) उपायः. (1) - योग (पुं) ध्यानम्. (1) - योग (पुं) सङ्गतिः. (1) - योग (पुं) युक्तिः. (1) - योग (पुं)
आनन्दः. (1) - भोग (पुं) सर्पः. (1) - भोग (पुं) स्त्र्यादिभृतिः. (1) - भोग (पुं)
 भोगः सुखे स्त्र्यादिभृतावहेश्च फणकाययोः ॥ ३.३.३७२ ॥
आनन्दः. (1) - भोग (पुं) सर्पः. (1) - भोग (पुं) स्त्र्यादिभृतिः. (1) - भोग (पुं)
चातकपक्षी. (1) - सारङ्ग (पुं) हरिणः. (1) - सारङ्ग (पुं) शबलम्. (1) - सारङ्ग (वि)
 चातके हरिणे पुंसि सारङ्गः शवले त्रिषु ॥ ३.३.३७३ ॥
चातकपक्षी. (1) - सारङ्ग (पुं) हरिणः. (1) - सारङ्ग (पुं) शबलम्. (1) - सारङ्ग (वि)
शापवचनम्. (1) - अभिषङ्ग (पुं) पराजयः. (1) - अभिषङ्ग (पुं)
 कपौ च प्लवगः शापे त्वभिषङ्गः पराभवे ॥ ३.३.३७४ ॥
शापवचनम्. (1) - अभिषङ्ग (पुं) पराजयः. (1) - अभिषङ्ग (पुं)
कृतादियुगाः. (1) - युग (नपुं) यानाद्यङ्गः. (1) - युग (पुं)
 यानाद्यङ्गे युगः पुंसि युगं युग्मे कृतादिषु ॥ ३.३.३७५ ॥
कृतादियुगाः. (1) - युग (नपुं) यानाद्यङ्गः. (1) - युग (पुं)
बाणः. (1) - गो (स्त्री-पुं) इन्द्रस्य वज्रायुधम्. (1) - गो (स्त्री-पुं) जलम्. (1) - गो (स्त्री-पुं) किरणः. (1) - गो (स्त्री-पुं) नेत्रम्. (1) - गो (स्त्री-पुं) पशुः. (1) - गो (स्त्री-पुं) स्वर्गः. (1) - गो (स्त्री-पुं) वचनम्. (1) - गो (स्त्री-पुं) दिक्. (1) - गो (स्त्री-पुं) चिह्नम्. (1) - लिङ्ग (नपुं) पुरुषलिङ्गः. (1) - लिङ्ग (नपुं)
 स्वर्गेषुपशुवाग्वज्र दिङ्नेत्रधृणिभूजले ॥ ३.३.३७६ ॥
बाणः. (1) - गो (स्त्री-पुं) इन्द्रस्य वज्रायुधम्. (1) - गो (स्त्री-पुं) जलम्. (1) - गो (स्त्री-पुं) किरणः. (1) - गो (स्त्री-पुं) नेत्रम्. (1) - गो (स्त्री-पुं) पशुः. (1) - गो (स्त्री-पुं) स्वर्गः. (1) - गो (स्त्री-पुं) वचनम्. (1) - गो (स्त्री-पुं) दिक्. (1) - गो (स्त्री-पुं) चिह्नम्. (1) - लिङ्ग (नपुं) पुरुषलिङ्गः. (1) - लिङ्ग (नपुं)
पर्वतसमभूभागः. (1) - शृङ्ग (नपुं) प्राधान्यम्. (1) - शृङ्ग (नपुं) गुह्यदेशः. (1) - वराङ्ग (नपुं) शिरः. (1) - वराङ्ग (नपुं)
 लक्ष्यदृष्ट्या स्त्रियां पुंसि गौर्लिङ्गं चिह्न शेफसोः ॥ ३.३.३७७ ॥
पर्वतसमभूभागः. (1) - शृङ्ग (नपुं) प्राधान्यम्. (1) - शृङ्ग (नपुं) गुह्यदेशः. (1) - वराङ्ग (नपुं) शिरः. (1) - वराङ्ग (नपुं)
कीर्तिः. (1) - भग (नपुं) माहात्म्यम्. (1) - भग (नपुं) स्पृहा. (1) - भग (नपुं) वीर्यम्. (1) - भग (नपुं) धनसमृद्धिः. (1) - भग (नपुं) यत्नः. (1) - भग (नपुं)
 शृङ्गं प्राधान्यसान्वोश्च वराङ्गं मूर्धगुह्ययोः ॥ ३.३.३७८ ॥
कीर्तिः. (1) - भग (नपुं) माहात्म्यम्. (1) - भग (नपुं) स्पृहा. (1) - भग (नपुं) वीर्यम्. (1) - भग (नपुं) धनसमृद्धिः. (1) - भग (नपुं) यत्नः. (1) - भग (नपुं)
 भगं श्रीकाममाहात्म्यवीर्ययत्नार्ककीर्तिषु ॥ ३.३.३७९ ॥
 इति गान्ताः ॥ ३.३.३८० ॥
परिघातः. (1) - परिघ (पुं) अम्भसां रयः. (1) - ओघ (पुं)
 परिघः परिघातेऽस्त्रेऽप्योघो वृन्देऽम्भसां रये ॥ ३.३.३८१ ॥
परिघातः. (1) - परिघ (पुं) अम्भसां रयः. (1) - ओघ (पुं)
मूल्यम्. (1) - अर्घ (पुं) पूजाविधिः. (1) - अर्घ (पुं) दुःखम्. (1) - अघ (नपुं) व्यसनम्. (1) - अघ (नपुं)
 मूल्ये पूजाविधावर्घोऽहोदुःखव्यसनेष्वघम् ॥ ३.३.३८२ ॥
मूल्यम्. (1) - अर्घ (पुं) पूजाविधिः. (1) - अर्घ (पुं) दुःखम्. (1) - अघ (नपुं) व्यसनम्. (1) - अघ (नपुं)
अल्पम्. (1) - लघु (वि) यथेप्सितम्. (1) - लघु (वि) मृद्भेदः. (1) - काच (पुं) दृग्रुजः. (1) - काच (पुं)
 त्रिष्विष्टेऽल्पे लघुः काचाः शिक्यमृद्भेददृग्रुजः ॥ ३.३.३८३ ॥
अल्पम्. (1) - लघु (वि) यथेप्सितम्. (1) - लघु (वि) मृद्भेदः. (1) - काच (पुं) दृग्रुजः. (1) - काच (पुं)
 इति घान्ताः ॥ ३.३.३८४ ॥
व्यतिक्रमः. (1) - प्रपञ्च (पुं) विस्तरः. (1) - प्रपञ्च (पुं) शुद्धामात्यः. (1) - शुचि (पुं) शुक्लवर्णयुक्तः. (1) - शुचि (वि) शुद्धिः. (1) - शुचि (वि)
 विपर्यासे विस्तरे च प्रपञ्चः पावके शुचिः ॥ ३.३.३८५ ॥
व्यतिक्रमः. (1) - प्रपञ्च (पुं) विस्तरः. (1) - प्रपञ्च (पुं) शुद्धामात्यः. (1) - शुचि (पुं) शुक्लवर्णयुक्तः. (1) - शुचि (वि) शुद्धिः. (1) - शुचि (वि)
अत्यासक्तिः. (1) - रुचि (स्त्री) किरणः. (1) - रुचि (स्त्री) स्पृहा. (1) - रुचि (स्त्री)
 मास्यमात्ये चाप्युपधे पुंसि मेध्ये सिते त्रिषु ॥ ३.३.३८६ ॥
अत्यासक्तिः. (1) - रुचि (स्त्री) किरणः. (1) - रुचि (स्त्री) स्पृहा. (1) - रुचि (स्त्री)
भल्लूकः. (1) - अच्छ (पुं) प्रसन्नः. (1) - अच्छ (पुं) हारः. (1) - गुच्छ (पुं) विकासोन्मुखपुष्पम्. (1) - गुच्छ (पुं)
 अभिष्वङ्गे स्पृहायां च गभस्तौ च रुचिः स्त्रियाम् ॥ ३.३.३८७ ॥
भल्लूकः. (1) - अच्छ (पुं) प्रसन्नः. (1) - अच्छ (पुं) हारः. (1) - गुच्छ (पुं) विकासोन्मुखपुष्पम्. (1) - गुच्छ (पुं)
 इति चान्ताः ॥ ३.३.३८८ ॥
अञ्चलः. (1) - कच्छ (पुं) परिधानम्. (1) - कच्छ (पुं)
 प्रसन्ने भल्लुकेऽप्यच्छो गुच्छः स्तबक हारयोः ॥ ३.३.३८९ ॥
अञ्चलः. (1) - कच्छ (पुं) परिधानम्. (1) - कच्छ (पुं)
गरुडः. (1) - अहिभुज (पुं) मयूरः. (1) - अहिभुज (पुं) दन्तः. (1) - द्विज (पुं) ब्राह्मणः. (1) - द्विज (पुं) पक्षिसर्पाद्याः. (1) - द्विज (पुं)
 परिधानाञ्चले कच्छो जलप्रान्ते त्रि लिङ्गकः ॥ ३.३.३९० ॥
गरुडः. (1) - अहिभुज (पुं) मयूरः. (1) - अहिभुज (पुं) दन्तः. (1) - द्विज (पुं) ब्राह्मणः. (1) - द्विज (पुं) पक्षिसर्पाद्याः. (1) - द्विज (पुं)
 इति क्षेपकच्छान्ताः ॥ ३.३.३९१ ॥
 केकि तार्क्ष्यावहिभुजौ दन्तविप्राण्डजा द्विजाः ॥ ३.३.३९२ ॥
शिवः. (1) - अज (पुं) विष्णुः. (1) - अज (पुं) गवां स्थानम्. (1) - व्रज (पुं) मार्गः. (1) - व्रज (पुं)
 अजा विष्णुहरच्छागा गोष्ठाध्वनिवहा व्रजाः ॥ ३.३.३९३ ॥
शिवः. (1) - अज (पुं) विष्णुः. (1) - अज (पुं) गवां स्थानम्. (1) - व्रज (पुं) मार्गः. (1) - व्रज (पुं)
दन्तः. (1) - कुञ्ज (पुं-नपुं)
 धर्मराजौ जिनयमौ कुञ्जो दन्तेऽपि न स्त्रियाम् ॥ ३.३.३९४ ॥
दन्तः. (1) - कुञ्ज (पुं-नपुं)
क्षेत्रम्. (1) - वलज (नपुं) पुरमार्गः. (1) - वलज (नपुं) वल्गुदर्शना. (1) - वलजा (स्त्री)
 वलजे क्षेत्रपूर्द्वारे वलजा वल्गुदर्शना ॥ ३.३.३९५ ॥
क्षेत्रम्. (1) - वलज (नपुं) पुरमार्गः. (1) - वलज (नपुं) वल्गुदर्शना. (1) - वलजा (स्त्री)
समक्ष्मांशः. (1) - आजि (स्त्री) जनः. (1) - प्रजा (स्त्री) सन्ततिः. (1) - प्रजा (स्त्री)
 समे क्ष्मांशे रणेऽप्याजिः प्रजा स्यात्संततौ जने ॥ ३.३.३९६ ॥
समक्ष्मांशः. (1) - आजि (स्त्री) जनः. (1) - प्रजा (स्त्री) सन्ततिः. (1) - प्रजा (स्त्री)
शङ्खः. (1) - अब्ज (पुं) आत्मीयम्. (1) - निज (वि) नित्यम्. (1) - निज (वि)
 अब्जौ शङ्खशशाङ्कौ च स्वके नित्ये निजं त्रिषु ॥ ३.३.३९७ ॥
शङ्खः. (1) - अब्ज (पुं) आत्मीयम्. (1) - निज (वि) नित्यम्. (1) - निज (वि)
 इति जान्ताः ॥ ३.३.३९८ ॥
पुरुषः. (1) - क्षेत्रज्ञ (पुं) कुशलः. (1) - क्षेत्रज्ञ (वि)
 पुंस्यात्मनि प्रवीणेच क्षेत्रज्ञो वाच्यलिङ्गकः ॥ ३.३.३९९ ॥
पुरुषः. (1) - क्षेत्रज्ञ (पुं) कुशलः. (1) - क्षेत्रज्ञ (वि)
बुद्धिः. (1) - संज्ञा (स्त्री) गायत्रीच्छन्दः. (1) - संज्ञा (स्त्री) हस्तादिनार्थसूचना. (1) - संज्ञा (स्त्री) नाम. (1) - संज्ञा (स्त्री) सूर्यपत्नी. (1) - संज्ञा (स्त्री)
 संज्ञा स्याच्चेतना नाम हस्ताद्यैश्चार्थसूचना ॥ ३.३.४०० ॥
बुद्धिः. (1) - संज्ञा (स्त्री) गायत्रीच्छन्दः. (1) - संज्ञा (स्त्री) हस्तादिनार्थसूचना. (1) - संज्ञा (स्त्री) नाम. (1) - संज्ञा (स्त्री) सूर्यपत्नी. (1) - संज्ञा (स्त्री)
 दोषज्ञौ वैद्यविद्वांसौ ज्ञो विद्वान्सोमजोऽपि च ॥ ३.३.४०१ ॥
 इति ञान्ताः ॥ ३.३.४०२ ॥
गजगण्डः. (1) - करट (पुं)
 काकेभगण्डौ करटौ गजगण्डकटी कटौ ॥ ३.३.४०३ ॥
गजगण्डः. (1) - करट (पुं)
शिवः. (1) - शिपिविष्ट (पुं) खलः. (1) - शिपिविष्ट (पुं) दुश्चर्मः. (1) - शिपिविष्ट (पुं)
 शिपिविष्टस्तु खलतौ दुश्चर्मणि महेश्वरे ॥ ३.३.४०४ ॥
शिवः. (1) - शिपिविष्ट (पुं) खलः. (1) - शिपिविष्ट (पुं) दुश्चर्मः. (1) - शिपिविष्ट (पुं)
देवशिल्पिः. (1) - त्वष्टृ (पुं)
 देवशिल्पिन्यपि त्वष्टा दिष्टं दैवेऽपि न द्वयोः ॥ ३.३.४०५ ॥
देवशिल्पिः. (1) - त्वष्टृ (पुं)
अकार्यम्. (1) - कटु (नपुं) कटुरसः. (1) - कटु (पुं) मत्सरः. (1) - कटु (वि) तीक्ष्णम्. (1) - कटु (वि)
 रसे कटुः कट्वकार्ये त्रिषु मत्सरतीक्ष्णयोः ॥ ३.३.४०६ ॥
अकार्यम्. (1) - कटु (नपुं) कटुरसः. (1) - कटु (पुं) मत्सरः. (1) - कटु (वि) तीक्ष्णम्. (1) - कटु (वि)
क्षेमम्. (1) - रिष्ट (नपुं) अशुभम्. (2) - रिष्ट (नपुं) , अरिष्ट (नपुं) अभावः. (1) - रिष्ट (नपुं) शुभम्. (1) - अरिष्ट (नपुं)
 रिष्टं क्षेमाशुभाभावेष्वरिष्टे तु शुभाशुभे ॥ ३.३.४०७ ॥
क्षेमम्. (1) - रिष्ट (नपुं) अशुभम्. (2) - रिष्ट (नपुं) , अरिष्ट (नपुं) अभावः. (1) - रिष्ट (नपुं) शुभम्. (1) - अरिष्ट (नपुं)
माया. (1) - कूट (पुं-नपुं) निश्चलवस्तु. (1) - कूट (पुं-नपुं) राशिः. (1) - कूट (पुं-नपुं) कपटः. (1) - कूट (पुं-नपुं) असत्यवचनम्. (1) - कूट (पुं-नपुं) यन्त्रम्. (1) - कूट (पुं-नपुं) अयोघनम्. (1) - कूट (पुं-नपुं) सीराङ्गः. (1) - कूट (पुं-नपुं)
 मायानिश्चलयन्त्रेषु कैतवानृतराशिषु ॥ ३.३.४०८ ॥
माया. (1) - कूट (पुं-नपुं) निश्चलवस्तु. (1) - कूट (पुं-नपुं) राशिः. (1) - कूट (पुं-नपुं) कपटः. (1) - कूट (पुं-नपुं) असत्यवचनम्. (1) - कूट (पुं-नपुं) यन्त्रम्. (1) - कूट (पुं-नपुं) अयोघनम्. (1) - कूट (पुं-नपुं) सीराङ्गः. (1) - कूट (पुं-नपुं)
अल्पम्. (1) - त्रुटि (स्त्री) समयः. (1) - त्रुटि (स्त्री) संशयः. (1) - त्रुटि (स्त्री)
 अयोघने शैलशृङ्गे सीराङ्गे कूटमस्त्रियाम् ॥ ३.३.४०९ ॥
अल्पम्. (1) - त्रुटि (स्त्री) समयः. (1) - त्रुटि (स्त्री) संशयः. (1) - त्रुटि (स्त्री)
अत्युत्कर्षः. (1) - कोटी (स्त्री) आश्रयः. (1) - कोटी (स्त्री) मूलम्. (1) - जटा (स्त्री)
 सूक्ष्मैलायां त्रुटिः स्त्री स्यात्कालेऽल्पे संशयेऽपि सा ॥ ३.३.४१० ॥
अत्युत्कर्षः. (1) - कोटी (स्त्री) आश्रयः. (1) - कोटी (स्त्री) मूलम्. (1) - जटा (स्त्री)
फलम्. (1) - व्युष्टि (स्त्री) समृद्धिः. (1) - व्युष्टि (स्त्री) ज्ञानम्. (1) - दृष्टि (स्त्री) वीक्षणम्. (1) - दृष्टि (स्त्री)
 अत्युत्कर्षाश्रयः कोट्यो मूले लग्नकचे जटा ॥ ३.३.४११ ॥
फलम्. (1) - व्युष्टि (स्त्री) समृद्धिः. (1) - व्युष्टि (स्त्री) ज्ञानम्. (1) - दृष्टि (स्त्री) वीक्षणम्. (1) - दृष्टि (स्त्री)
इच्छा. (1) - इष्टि (स्त्री) यज्ञः. (1) - इष्टि (स्त्री) बहूनि. (1) - सृष्टि (वि) निश्चितम्. (1) - सृष्टि (वि)
 व्युष्टिः फले समृद्धौ च दृष्टिर्ज्ञानेऽक्ष्णि दर्शने ॥ ३.३.४१२ ॥
इच्छा. (1) - इष्टि (स्त्री) यज्ञः. (1) - इष्टि (स्त्री) बहूनि. (1) - सृष्टि (वि) निश्चितम्. (1) - सृष्टि (वि)
दुष्प्रवेशः. (1) - कष्ट (वि)
 इष्टिर्योगेच्छयोः सृष्टं निश्चिते बहुनि त्रिषु (ऽबहूनिऽ? ॥ ३.३.४१३ ॥
दुष्प्रवेशः. (1) - कष्ट (वि)
अमन्दः. (1) - पटु (वि) औषधम्. (1) - पटु (वि) शिवः. (1) - नीलकण्ठ (पुं)
 कष्टे तु कृच्छ्रगहने दक्षामन्दागदेषु तु ॥ ३.३.४१४ ॥
अमन्दः. (1) - पटु (वि) औषधम्. (1) - पटु (वि) शिवः. (1) - नीलकण्ठ (पुं)
अन्तर्जठरम्. (1) - कोष्ठ (पुं) अन्तर्गृहम्. (1) - कोष्ठ (पुं) कुसूलः. (1) - कोष्ठ (पुं)
 पटुर्द्वौ वाच्यलिङ्गौ च नीलकण्ठः शिवेऽपि च ॥ ३.३.४१५ ॥
अन्तर्जठरम्. (1) - कोष्ठ (पुं) अन्तर्गृहम्. (1) - कोष्ठ (पुं) कुसूलः. (1) - कोष्ठ (पुं)
अन्त्यम्. (1) - निष्ठा (स्त्री) नाशः. (1) - निष्ठा (स्त्री) निष्पत्तिः. (1) - निष्ठा (स्त्री) मर्यादा. (1) - काष्ठा (स्त्री) उत्कर्षः. (1) - काष्ठा (स्त्री)
 पोटा दासी द्विलिंगा च घृष्टी घर्षणसूकरौ ॥ ३.३.४१६ ॥
अन्त्यम्. (1) - निष्ठा (स्त्री) नाशः. (1) - निष्ठा (स्त्री) निष्पत्तिः. (1) - निष्ठा (स्त्री) मर्यादा. (1) - काष्ठा (स्त्री) उत्कर्षः. (1) - काष्ठा (स्त्री)
अतिशस्तः. (1) - ज्येष्ठ (वि) अल्पम्. (1) - कनिष्ठा (वि) अतियुवा. (1) - कनिष्ठा (वि)
 घटा घोष्ठ्यां हस्तिपङ्क्तौ कृपीटमुदरे जले ॥ ३.३.४१७ ॥
अतिशस्तः. (1) - ज्येष्ठ (वि) अल्पम्. (1) - कनिष्ठा (वि) अतियुवा. (1) - कनिष्ठा (वि)
 इति टान्ताः ॥ ३.३.४१८ ॥
 पुंसि कोष्ठोऽन्तर्जठरं कुसूलोऽन्तर्गृहं तथा ॥ ३.३.४१९ ॥
 निष्ठा निष्पत्तिनाशान्ताः काष्ठोत्कर्षे स्थितौ दिशि ॥ ३.३.४२० ॥
 त्रिषु ज्येष्ठोऽतिशस्तेऽपि कनिष्ठोऽतियुवाल्पयोः ॥ ३.३.४२१ ॥
 इति ठान्ताः ॥ ३.३.४२२ ॥
लगुडः. (1) - दण्ड (पुं-नपुं) गोलः. (1) - गुड (पुं) इक्षुपाकः. (1) - गुड (पुं)
 दण्डोऽस्त्री लगुडेऽपि स्याद्गुडो गोलेक्षुपाकयोः ॥ ३.३.४२३ ॥
लगुडः. (1) - दण्ड (पुं-नपुं) गोलः. (1) - गुड (पुं) इक्षुपाकः. (1) - गुड (पुं)
सर्पः. (1) - व्याड (पुं) मांसात्पशुः. (1) - व्याड (पुं) भूमिः. (1) - इडा (स्त्री) गौः. (2) - इडा (स्त्री) , इला (स्त्री) वचनम्. (2) - इडा (स्त्री) , इला (स्त्री)
 सर्प मांसात्पशू व्याडौ गोभूवाचस्त्विडा इलाः ॥ ३.३.४२४ ॥
सर्पः. (1) - व्याड (पुं) मांसात्पशुः. (1) - व्याड (पुं) भूमिः. (1) - इडा (स्त्री) गौः. (2) - इडा (स्त्री) , इला (स्त्री) वचनम्. (2) - इडा (स्त्री) , इला (स्त्री)
वंशशलाका. (1) - क्ष्वेडा (स्त्री) षट् क्षणकालः. (1) - नाडी (स्त्री)
 क्ष्वेडवंशशलाकापि नाडी कालेऽपि षट्क्षणे ॥ ३.३.४२५ ॥
वंशशलाका. (1) - क्ष्वेडा (स्त्री) षट् क्षणकालः. (1) - नाडी (स्त्री)
अवसरः. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) अधमम्. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) बाणः. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) जलम्. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) वर्गः. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) दण्डः. (1) - काण्ड (पुं-नपुं)
 काण्डोऽस्त्री दण्डबाणार्ववर्गावसरवारिषु ॥ ३.३.४२६ ॥
अवसरः. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) अधमम्. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) बाणः. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) जलम्. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) वर्गः. (1) - काण्ड (पुं-नपुं) दण्डः. (1) - काण्ड (पुं-नपुं)
अश्वभूषा. (1) - भाण्ड (नपुं) मूलवणिग्धनम्. (1) - भाण्ड (नपुं)
 स्याद्भाण्डमश्वाभरणेऽमत्रे मूलवणिग्धने ॥ ३.३.४२७ ॥
अश्वभूषा. (1) - भाण्ड (नपुं) मूलवणिग्धनम्. (1) - भाण्ड (नपुं)
 इति डान्ताः ॥ ३.३.४२८ ॥
भृशप्रतिज्ञा. (1) - बाढ (नपुं) भृशम्. (1) - प्रगाढ (नपुं) दुःखम्. (1) - प्रगाढ (नपुं)
 भृशप्रतिज्ञयोर्बाढं प्रगाढं भृशकृच्छ्रयोः ॥ ३.३.४२९ ॥
भृशप्रतिज्ञा. (1) - बाढ (नपुं) भृशम्. (1) - प्रगाढ (नपुं) दुःखम्. (1) - प्रगाढ (नपुं)
 संघातग्रासयोः पिण्डी द्वयोः पुंसि कलेवरे ॥ ३.३.४३० ॥
 गण्डौ कपोलविस्फोटौ मुण्डकस्त्रिषु मुण्डिते ॥ ३.३.४३१ ॥
 इक्षुभेदेऽपि खण्डोऽस्त्री शिखण्डो बर्हचूडयोः ॥ ३.३.४३२ ॥
शक्तः. (1) - दृढ (वि) स्थूलम्. (1) - दृढ (वि) संहतः. (1) - व्यूढ (वि) विन्यस्तः. (1) - व्यूढ (वि)
 शक्तस्थूलौ त्रिषु दृढौ व्यूढौ विन्यस्तसंहतौ ॥ ३.३.४३३ ॥
शक्तः. (1) - दृढ (वि) स्थूलम्. (1) - दृढ (वि) संहतः. (1) - व्यूढ (वि) विन्यस्तः. (1) - व्यूढ (वि)
 इति ढान्ताः ॥ ३.३.४३४ ॥
शिशुः. (1) - भ्रूण (पुं) बलिसुतः. (1) - बाण (पुं)
 भ्रूणोऽर्भके स्त्रैणगर्भे बाणो बलिसुते शरे ॥ ३.३.४३५ ॥
शिशुः. (1) - भ्रूण (पुं) बलिसुतः. (1) - बाण (पुं)
अतिसूक्ष्मधान्यांशः. (1) - कण (पुं) सङ्घातः. (1) - गण (पुं) शिवानुचरः. (1) - गण (पुं)
 कणोऽतिसूक्ष्मे धान्यांशे संघाते प्रमथे गणः ॥ ३.३.४३६ ॥
अतिसूक्ष्मधान्यांशः. (1) - कण (पुं) सङ्घातः. (1) - गण (पुं) शिवानुचरः. (1) - गण (पुं)
भृतिः. (1) - पण (पुं) धनम्. (1) - पण (पुं) द्यूतादिषूत्सृष्टः. (1) - पण (पुं)
 पणो द्यूतादिषूत्सृष्टे भृतौ मूल्ये धनेऽपि च ॥ ३.३.४३७ ॥
भृतिः. (1) - पण (पुं) धनम्. (1) - पण (पुं) द्यूतादिषूत्सृष्टः. (1) - पण (पुं)
रूपरसगन्धादयः. (1) - गुण (पुं) सत्वरजस्तमाः. (1) - गुण (पुं) शुक्लनीलादयः. (1) - गुण (पुं) सन्धिविग्रहादयः. (1) - गुण (पुं)
 मौर्व्यां द्रव्याश्रिते सत्वशौर्यसन्ध्यादिके गुणः ॥ ३.३.४३८ ॥
रूपरसगन्धादयः. (1) - गुण (पुं) सत्वरजस्तमाः. (1) - गुण (पुं) शुक्लनीलादयः. (1) - गुण (पुं) सन्धिविग्रहादयः. (1) - गुण (पुं)
निर्व्यापारस्थितिः. (1) - क्षण (पुं)
 निर्व्यापारस्थितौ कालविशेषोत्सवयोः क्षणः ॥ ३.३.४३९ ॥
निर्व्यापारस्थितिः. (1) - क्षण (पुं)
शुक्लादयः. (1) - वर्ण (पुं) स्तुतिः. (1) - वर्ण (पुं)
 वर्णो द्विजादौ शुक्लादौ स्तुतौ वर्णं तु वाक्षरे ॥ ३.३.४४० ॥
शुक्लादयः. (1) - वर्ण (पुं) स्तुतिः. (1) - वर्ण (पुं)
ब्राह्मणादिवर्णचतुष्टयवाचकः. (1) - वर्ण (पुं) अक्षरम्. (1) - वर्ण (पुं-नपुं)
 अरुणो भास्करेऽपि स्याद्वर्णभेदेऽपि च त्रिषु ॥ ३.३.४४१ ॥
ब्राह्मणादिवर्णचतुष्टयवाचकः. (1) - वर्ण (पुं) अक्षरम्. (1) - वर्ण (पुं-नपुं)
काकः. (1) - द्रोण (पुं) शब्दः. (1) - रण (पुं)
 स्थाणुः शर्वोऽप्यथ द्रोणः काकेऽप्याजौ रवे रणः ॥ ३.३.४४२ ॥
काकः. (1) - द्रोण (पुं) शब्दः. (1) - रण (पुं)
क्षुरिः. (1) - ग्रामणी (पुं) श्रेष्ठः. (1) - ग्रामणी (वि) ग्रामाधिपः. (1) - ग्रामणी (वि)
 ग्रामणीर्नापिते पुंसि श्रेष्ठे ग्रामाधिपे त्रिषु ॥ ३.३.४४३ ॥
क्षुरिः. (1) - ग्रामणी (पुं) श्रेष्ठः. (1) - ग्रामणी (वि) ग्रामाधिपः. (1) - ग्रामणी (वि)
मेषलोमः. (1) - ऊर्णा (स्त्री) भ्रुवौ अन्तरा आवर्तः. (1) - ऊर्णा (स्त्री)
 ऊर्णा मेषादिलोम्नि स्यादावर्ते चान्तरा भ्रुवोः ॥ ३.३.४४४ ॥
मेषलोमः. (1) - ऊर्णा (स्त्री) भ्रुवौ अन्तरा आवर्तः. (1) - ऊर्णा (स्त्री)
हरितवलयः. (1) - हरिणी (स्त्री) हेमप्रतिमा. (1) - हरिणी (स्त्री) मृगी. (1) - हरिणी (स्त्री)
 हरिणी स्यान्मृगी हेमप्रतिमा हरिता च या ॥ ३.३.४४५ ॥
हरितवलयः. (1) - हरिणी (स्त्री) हेमप्रतिमा. (1) - हरिणी (स्त्री) मृगी. (1) - हरिणी (स्त्री)
स्तम्भः. (1) - स्थूणा (स्त्री) वेश्मा. (1) - स्थूणा (स्त्री)
 त्रिषु पाण्डौ च हरिणः स्थूणा स्तम्भेऽपि वेश्मनः ॥ ३.३.४४६ ॥
स्तम्भः. (1) - स्थूणा (स्त्री) वेश्मा. (1) - स्थूणा (स्त्री)
स्पृहा. (1) - तृष्णा (स्त्री) पिपासा. (1) - तृष्णा (स्त्री) जुगुप्सा. (1) - घृणा (स्त्री)
 त्रिष्णे स्पृहापिपासे द्वे जुगुप्साकरुणे घृणे ॥ ३.३.४४७ ॥
स्पृहा. (1) - तृष्णा (स्त्री) पिपासा. (1) - तृष्णा (स्त्री) जुगुप्सा. (1) - घृणा (स्त्री)
वणिक्पथः. (1) - विपणि (स्त्री) पश्चिमदिग्देशकालाः. (1) - वारुणी (स्त्री) सुरा. (1) - वारुणी (स्त्री)
 वणिक्पथे च विपणिः सुरा प्रत्यक्च वारुणी ॥ ३.३.४४८ ॥
वणिक्पथः. (1) - विपणि (स्त्री) पश्चिमदिग्देशकालाः. (1) - वारुणी (स्त्री) सुरा. (1) - वारुणी (स्त्री)
हस्तिः. (1) - करेणु (पुं) हस्तिनी. (1) - करेणु (स्त्री) द्रव्यम्. (1) - द्रविण (नपुं) बलम्. (1) - द्रविण (नपुं)
 करेणुरिभ्यां स्त्री नेभे द्रविणं तु बलं धनम् ॥ ३.३.४४९ ॥
हस्तिः. (1) - करेणु (पुं) हस्तिनी. (1) - करेणु (स्त्री) द्रव्यम्. (1) - द्रविण (नपुं) बलम्. (1) - द्रविण (नपुं)
रक्षिता. (1) - शरण (नपुं) गृहम्. (1) - शरण (नपुं) पद्मम्. (1) - श्रीपर्ण (नपुं)
 शरणं गृहरक्षित्रोः श्रीपर्णं कमलेऽपि च ॥ ३.३.४५० ॥
रक्षिता. (1) - शरण (नपुं) गृहम्. (1) - शरण (नपुं) पद्मम्. (1) - श्रीपर्ण (नपुं)
अभिमरः. (1) - तीक्ष्ण (नपुं) विषम्. (1) - तीक्ष्ण (नपुं)
 विषाभिमरलोहेषु तीक्ष्णं क्लीबे खरे त्रिषु ॥ ३.३.४५१ ॥
अभिमरः. (1) - तीक्ष्ण (नपुं) विषम्. (1) - तीक्ष्ण (नपुं)
इयत्ता. (1) - प्रमाण (नपुं) कारणम्. (1) - प्रमाण (नपुं) मर्यादा. (1) - प्रमाण (नपुं) प्रमाता. (1) - प्रमाण (नपुं) शास्त्रम्. (1) - प्रमाण (नपुं)
 प्रमाणं हेतुमर्यादाशास्त्रेयत्ताप्रमातृषु ॥ ३.३.४५२ ॥
इयत्ता. (1) - प्रमाण (नपुं) कारणम्. (1) - प्रमाण (नपुं) मर्यादा. (1) - प्रमाण (नपुं) प्रमाता. (1) - प्रमाण (नपुं) शास्त्रम्. (1) - प्रमाण (नपुं)
साधकतमम्. (1) - करण (नपुं) क्षेत्रम्. (1) - करण (नपुं) देहः. (1) - करण (नपुं) इन्द्रियम्. (1) - करण (नपुं)
 करणं साधकतमं क्षेत्रगात्रेन्द्रियेष्वपि ॥ ३.३.४५३ ॥
साधकतमम्. (1) - करण (नपुं) क्षेत्रम्. (1) - करण (नपुं) देहः. (1) - करण (नपुं) इन्द्रियम्. (1) - करण (नपुं)
निष्प्रयाससैन्यगमनम्. (1) - संसरण (नपुं)प्राण्युत्पादरूपसंसारम्. (1) - संसरण (नपुं)
 प्राण्युत्पादे संसरणमसंबाधचमूगतौ ॥ ३.३.४५४ ॥
निष्प्रयाससैन्यगमनम्. (1) - संसरण (नपुं)प्राण्युत्पादरूपसंसारम्. (1) - संसरण (नपुं)
उन्नयनक्रिया. (1) - समुद्गिरण (नपुं)वान्तान्नः. (1) - समुद्गिरण (नपुं)
 घण्टापथेऽथ वान्तान्ने समुद्गिरणमुन्नये ॥ ३.३.४५५ ॥
उन्नयनक्रिया. (1) - समुद्गिरण (नपुं)वान्तान्नः. (1) - समुद्गिरण (नपुं)
पशुशृङ्गः. (1) - विषाण (वि)इभदन्तः. (1) - विषाण (वि)
 अतस्त्रिषु विषाणं स्यात्पशुशृङ्गेभदन्तयोः ॥ ३.३.४५६ ॥
पशुशृङ्गः. (1) - विषाण (वि)इभदन्तः. (1) - विषाण (वि)
चतुष्पथम्. (1) - प्रवण (पुं)क्रमनिम्नोर्वी. (1) - प्रवण (वि)
 प्रवणे क्रमनिम्नोर्व्यां प्रह्वे ना तु चतुष्पथे ॥ ३.३.४५७ ॥
चतुष्पथम्. (1) - प्रवण (पुं)क्रमनिम्नोर्वी. (1) - प्रवण (वि)
निचितम्. (1) - सङ्कीर्ण (वि)अशुद्धः. (1) - सङ्कीर्ण (वि)शून्यम्. (1) - ईरिण (वि)ऊषरदेशः. (1) - ईरिण (वि)
 संकीर्णौ निचिताशुद्धा विरिणं शून्यमूषरम् ॥ ३.३.४५८ ॥
निचितम्. (1) - सङ्कीर्ण (वि)अशुद्धः. (1) - सङ्कीर्ण (वि)शून्यम्. (1) - ईरिण (वि)ऊषरदेशः. (1) - ईरिण (वि)
सेतुः. (1) - वरण (पुं)कचोच्चयः. (1) - वेणी (स्त्री)नदीभेदः. (1) - वेणी (स्त्री)
 सेतौ च चरणो वेणी नदीभेदे कचोच्चये ॥ ३.३.४५९ ॥
सेतुः. (1) - वरण (पुं)कचोच्चयः. (1) - वेणी (स्त्री)नदीभेदः. (1) - वेणी (स्त्री)
 इति णान्ताः ॥ ३.३.४६० ॥
देवः. (1) - विवस्वत् (पुं)नदविशेषः. (1) - सरस्वत् (पुं)
 देवसूर्यौ विवस्वन्तौ सरस्वन्तौनदार्णवौ ॥ ३.३.४६१ ॥
देवः. (1) - विवस्वत् (पुं)नदविशेषः. (1) - सरस्वत् (पुं)
भासः. (1) - शकुन्त (पुं)
 पक्षितार्क्ष्यौ गरुत्मन्तौ शकुन्तौ भासपक्षिणौ ॥ ३.३.४६२ ॥
भासः. (1) - शकुन्त (पुं)
उत्पातः. (1) - धूमकेतु (पुं)अग्निः. (1) - धूमकेतु (पुं)पर्वतः. (1) - जीमूत (पुं)
 अग्न्युत्पातौ धूमकेतू जीमूतौ मेघपर्वतौ ॥ ३.३.४६३ ॥
उत्पातः. (1) - धूमकेतु (पुं)अग्निः. (1) - धूमकेतु (पुं)पर्वतः. (1) - जीमूत (पुं)
हस्तः. (1) - हस्त (पुं)नक्षत्रनाम. (1) - हस्त (पुं)वायुदेवः. (1) - मरुत् (पुं)
 हस्तौ तु पाणिनक्षत्रे मरुतौ पवनामरौ ॥ ३.३.४६४ ॥
हस्तः. (1) - हस्त (पुं)नक्षत्रनाम. (1) - हस्त (पुं)वायुदेवः. (1) - मरुत् (पुं)
हस्तिपकः. (1) - यन्तृ (पुं)पोष्टा. (1) - भर्तृ (पुं)धाता. (1) - भर्तृ (पुं)
 यन्ता हस्तिपके सूते भर्ता धातरि पोष्टरि ॥ ३.३.४६५ ॥
हस्तिपकः. (1) - यन्तृ (पुं)पोष्टा. (1) - भर्तृ (पुं)धाता. (1) - भर्तृ (पुं)
नौका. (1) - पोत (पुं)
 यानपात्रे शिशौ पोतः प्रेतः प्राण्यन्तरे मृते ॥ ३.३.४६६ ॥
नौका. (1) - पोत (पुं)
ग्रहभेदः. (1) - केतु (पुं)पताका. (1) - केतु (पुं)राजा. (1) - सुत (पुं)
 ग्रहभेदे ध्वजे केतुः पार्थिवे तनये सुतः ॥ ३.३.४६७ ॥
ग्रहभेदः. (1) - केतु (पुं)पताका. (1) - केतु (पुं)राजा. (1) - सुत (पुं)
कारुभेदः. (1) - स्थपति (पुं)पर्वतः. (1) - भूभृत् (पुं)राजा. (1) - भूभृत् (पुं)
 स्थपतिः कारुभेदेऽपि भूभृद्भूमिधरे नृपे ॥ ३.३.४६८ ॥
कारुभेदः. (1) - स्थपति (पुं)पर्वतः. (1) - भूभृत् (पुं)राजा. (1) - भूभृत् (पुं)
राजा. (1) - मूर्धाभिषिक्त (पुं)आर्तवम्. (1) - ऋतु (पुं)
 मूर्धाभिषिक्तो भूपेऽपि ऋतुः स्त्री कुसुमेऽपि च ॥ ३.३.४६९ ॥
राजा. (1) - मूर्धाभिषिक्त (पुं)आर्तवम्. (1) - ऋतु (पुं)
विष्णुः. (2) - अजित (पुं), अव्यक्त (पुं)तक्षः. (1) - सूत (पुं)
 विष्णावप्यजिताव्यक्तौ सूतस्त्वष्टरि सारथौ ॥ ३.३.४७० ॥
विष्णुः. (2) - अजित (पुं), अव्यक्त (पुं)तक्षः. (1) - सूत (पुं)
विद्वान्. (1) - व्यक्त (वि)शास्त्रम्. (1) - दृष्टान्त (पुं)निदर्शनम्. (1) - दृष्टान्त (पुं)
 व्यक्तः प्राज्ञेऽपि दृष्टान्तावुभौ शास्त्रनिदर्शने ॥ ३.३.४७१ ॥
विद्वान्. (1) - व्यक्त (वि)शास्त्रम्. (1) - दृष्टान्त (पुं)निदर्शनम्. (1) - दृष्टान्त (पुं)
द्वारपालकः. (1) - क्षन्त्रृ (पुं)
 क्षत्ता स्यात्सारथौ द्वाःस्थे क्षत्रियायां च शूद्रजे ॥ ३.३.४७२ ॥
द्वारपालकः. (1) - क्षन्त्रृ (पुं)
भेदः. (1) - वृत्तान्त (पुं)कार्त्स्न्यम्. (1) - वृत्तान्त (पुं)प्रकरणम्. (1) - वृत्तान्त (पुं)
 वृत्तान्तः स्यात्प्रकरणे प्रकारे कार्त्स्न्यवार्तयोः ॥ ३.३.४७३ ॥
भेदः. (1) - वृत्तान्त (पुं)कार्त्स्न्यम्. (1) - वृत्तान्त (पुं)प्रकरणम्. (1) - वृत्तान्त (पुं)
जननिवासस्थानम्. (1) - आनर्त (पुं)नृत्यस्थानम्. (1) - आनर्त (पुं)युद्धम्. (1) - आनर्त (पुं)
 आनर्तः समरे नृत्यस्थान नीवृद्विशेषयोः ॥ ३.३.४७४ ॥
जननिवासस्थानम्. (1) - आनर्त (पुं)नृत्यस्थानम्. (1) - आनर्त (पुं)युद्धम्. (1) - आनर्त (पुं)
सिद्धान्तः. (1) - कृतान्त (पुं)अकुशलकर्मम्. (1) - कृतान्त (पुं)प्राक्तनशुभाशुभकर्मः. (1) - कृतान्त (पुं)
 कृतान्तो यम सिद्धान्त दैवाकुशलकर्मसु ॥ ३.३.४७५ ॥
सिद्धान्तः. (1) - कृतान्त (पुं)अकुशलकर्मम्. (1) - कृतान्त (पुं)प्राक्तनशुभाशुभकर्मः. (1) - कृतान्त (पुं)
श्लेष्मादिः. (1) - धातु (पुं)रसरक्तादिः. (1) - धातु (पुं)महाभूताः. (1) - धातु (पुं)
 श्लेष्मादि रस रक्तादि महा भूतानि तद्गुणाः ॥ ३.३.४७६ ॥
श्लेष्मादिः. (1) - धातु (पुं)रसरक्तादिः. (1) - धातु (पुं)महाभूताः. (1) - धातु (पुं)
महाभूतगुणाः. (1) - धातु (पुं)इन्द्रियम्. (1) - धातु (पुं)अश्मविकृतिः. (1) - धातु (पुं)शब्दयोनिः. (1) - धातु (पुं)
 इन्द्रियाण्यश्म विकृतिः शब्दयोनिश्च धातवः ॥ ३.३.४७७ ॥
महाभूतगुणाः. (1) - धातु (पुं)इन्द्रियम्. (1) - धातु (पुं)अश्मविकृतिः. (1) - धातु (पुं)शब्दयोनिः. (1) - धातु (पुं)
कक्षान्तरम्. (1) - शुद्धान्त (पुं)नृपस्यासर्वगोचरप्रदेशः. (1) - शुद्धान्त (पुं)
 कक्षान्तरेऽपि शुद्धान्तो भूपस्यासर्व गोचरे ॥ ३.३.४७८ ॥
कक्षान्तरम्. (1) - शुद्धान्त (पुं)नृपस्यासर्वगोचरप्रदेशः. (1) - शुद्धान्त (पुं)
काठिन्यम्. (1) - मूर्ति (स्त्री)कासूः. (1) - शक्ति (स्त्री)
 कासू सामर्थ्ययोः शक्तिर्मूर्तिः काठिन्यकाययोः । । ॥ ३.३.४७९ ॥
काठिन्यम्. (1) - मूर्ति (स्त्री)कासूः. (1) - शक्ति (स्त्री)
विशालता. (1) - व्रतति (स्त्री)रात्रिः. (1) - वसति (स्त्री)वेश्मा. (1) - वसति (स्त्री)
 विस्तार वल्लयोर्व्रततिर्वसती रात्रिवेश्मनोः ॥ ३.३.४८० ॥
विशालता. (1) - व्रतति (स्त्री)रात्रिः. (1) - वसति (स्त्री)वेश्मा. (1) - वसति (स्त्री)
अपचयः. (1) - अपचिति (स्त्री)दानम्. (1) - साति (स्त्री)
 क्षयार्चयोरपचितिः सातिर्दानावसानयोः । । ॥ ३.३.४८१ ॥
अपचयः. (1) - अपचिति (स्त्री)दानम्. (1) - साति (स्त्री)
धनुष्कोटिः. (1) - अर्ति (स्त्री)दुःखम्. (1) - अर्ति (स्त्री)जननम्. (1) - जाति (स्त्री)सामान्यम्. (1) - जाति (स्त्री)
 आर्तिः पीडा धनुष्कोट्योर्जातिः सामान्यजन्मनोः ॥ ३.३.४८२ ॥
धनुष्कोटिः. (1) - अर्ति (स्त्री)दुःखम्. (1) - अर्ति (स्त्री)जननम्. (1) - जाति (स्त्री)सामान्यम्. (1) - जाति (स्त्री)
डिम्बः. (1) - ईति (स्त्री)प्रवासः. (1) - ईति (स्त्री)प्रचारः. (1) - रीति (स्त्री)स्यन्दः. (1) - रीति (स्त्री)
 प्रचार स्यन्दयो रीतिरीतिर्डिम्ब प्रवासयोः ॥ ३.३.४८३ ॥
डिम्बः. (1) - ईति (स्त्री)प्रवासः. (1) - ईति (स्त्री)प्रचारः. (1) - रीति (स्त्री)स्यन्दः. (1) - रीति (स्त्री)
उदयः. (1) - प्राप्ति (स्त्री)अधिकफलम्. (1) - प्राप्ति (स्त्री)अग्निः. (1) - त्रेता (स्त्री)त्रेतायुगम्. (1) - त्रेता (स्त्री)
 उदयेऽधिगमे प्राप्तिस्त्रेता त्वग्नित्रये युगे ॥ ३.३.४८४ ॥
उदयः. (1) - प्राप्ति (स्त्री)अधिकफलम्. (1) - प्राप्ति (स्त्री)अग्निः. (1) - त्रेता (स्त्री)त्रेतायुगम्. (1) - त्रेता (स्त्री)
वीणाभेदः. (1) - महती (स्त्री)धनसमृद्धिः. (1) - भूति (स्त्री)
 वीणाभेदेऽपि महती भूतिर्भस्मनि सम्पदि ॥ ३.३.४८५ ॥
वीणाभेदः. (1) - महती (स्त्री)धनसमृद्धिः. (1) - भूति (स्त्री)
नगरम्. (1) - भोगवती (स्त्री)नदी. (1) - भोगवती (स्त्री)नागाः. (1) - भोगवती (स्त्री)
 नदी नगर्योर्नागानां भोगवत्यथ संगरे ॥ ३.३.४८६ ॥
नगरम्. (1) - भोगवती (स्त्री)नदी. (1) - भोगवती (स्त्री)नागाः. (1) - भोगवती (स्त्री)
सङ्गम्. (1) - समिति (स्त्री)सङ्गरम्. (1) - समिति (स्त्री)अपचयः. (1) - क्षिति (स्त्री)वासः. (1) - क्षिति (स्त्री)
 संगे सभायां समितिः क्षयवासावपि क्षिती ॥ ३.३.४८७ ॥
सङ्गम्. (1) - समिति (स्त्री)सङ्गरम्. (1) - समिति (स्त्री)अपचयः. (1) - क्षिति (स्त्री)वासः. (1) - क्षिति (स्त्री)
आयुधम्. (1) - हेति (स्त्री)रवेरर्चिः. (1) - हेति (स्त्री)
 रवेरर्चिश्च शस्त्रं च वह्निज्वाला च हेतयः ॥ ३.३.४८८ ॥
आयुधम्. (1) - हेति (स्त्री)रवेरर्चिः. (1) - हेति (स्त्री)
जगतीच्छन्दः. (1) - जगती (स्त्री)
 जगती जगति छन्दोविशेषोऽपि क्षितावपि ॥ ३.३.४८९ ॥
जगतीच्छन्दः. (1) - जगती (स्त्री)
पङ्क्तिच्छन्दः. (1) - पङ्क्ति (स्त्री)दशमम्. (1) - पङ्क्ति (स्त्री)प्रभावः. (1) - आयति (स्त्री)
 पङ्क्तिश्छन्दोऽपि दशमं स्यात्प्रभावेऽपि चायतिः ॥ ३.३.४९० ॥
पङ्क्तिच्छन्दः. (1) - पङ्क्ति (स्त्री)दशमम्. (1) - पङ्क्ति (स्त्री)प्रभावः. (1) - आयति (स्त्री)
गतिः. (1) - पत्ति (स्त्री)
 पत्तिर्गतौ च मूले तु पक्षतिः पक्षभेदयोः ॥ ३.३.४९१ ॥
गतिः. (1) - पत्ति (स्त्री)
पुरुषलिङ्गः. (1) - प्रकृति (स्त्री)स्त्रीयोनिः. (1) - प्रकृति (स्त्री)कैशिक्याद्याः. (1) - वृत्ति (स्त्री)
 प्रकृतिर्योनिलिङ्गे च कैशिक्याद्याश्च वृत्तयः ॥ ३.३.४९२ ॥
पुरुषलिङ्गः. (1) - प्रकृति (स्त्री)स्त्रीयोनिः. (1) - प्रकृति (स्त्री)कैशिक्याद्याः. (1) - वृत्ति (स्त्री)
वालुका. (1) - सिकता (स्त्री-बहु)श्रवः. (1) - श्रुति (स्त्री)वेदः. (1) - श्रुति (स्त्री)
 सिकताः स्युर्वालुकापि वेदे श्रवसि च श्रुतिः ॥ ३.३.४९३ ॥
वालुका. (1) - सिकता (स्त्री-बहु)श्रवः. (1) - श्रुति (स्त्री)वेदः. (1) - श्रुति (स्त्री)
जनितात्यर्थानुरागा. (1) - वनिता (स्त्री)
 वनिता जनितात्यर्थानुरागायां च योषिति ॥ ३.३.४९४ ॥
जनितात्यर्थानुरागा. (1) - वनिता (स्त्री)
क्षितिव्युदासः. (1) - गुप्ति (स्त्री)धारणम्. (1) - धृति (स्त्री)धैर्यम्. (1) - धृति (स्त्री)
 गुप्तिः क्षितिव्युदासेऽपि धृतिर्धारणधैर्ययोः ॥ ३.३.४९५ ॥
क्षितिव्युदासः. (1) - गुप्ति (स्त्री)धारणम्. (1) - धृति (स्त्री)धैर्यम्. (1) - धृति (स्त्री)
बृहतीच्छन्दः. (1) - बृहती (स्त्री)महती. (1) - बृहती (स्त्री)
 बृहती क्षुद्र वार्ताकी छन्दोभेदे महत्यपि ॥ ३.३.४९६ ॥
बृहतीच्छन्दः. (1) - बृहती (स्त्री)महती. (1) - बृहती (स्त्री)
हस्तिनी. (1) - वासिता (स्त्री)स्त्री. (1) - वासिता (स्त्री)लोकप्रवादः. (1) - वार्ता (स्त्री)
 वासिता स्त्री करिण्योश्च वार्ता वृत्तौ जनश्रुतौ ॥ ३.३.४९७ ॥
हस्तिनी. (1) - वासिता (स्त्री)स्त्री. (1) - वासिता (स्त्री)लोकप्रवादः. (1) - वार्ता (स्त्री)
निःसारम्. (1) - वार्त (नपुं)अरोगः. (1) - वार्त (वि)जलम्. (1) - घृत (नपुं)
 वार्तं फल्गुन्यरोगे च त्रिष्वप्सु च घृतामृते ॥ ३.३.४९८ ॥
निःसारम्. (1) - वार्त (नपुं)अरोगः. (1) - वार्त (वि)जलम्. (1) - घृत (नपुं)
रूप्यकम्. (1) - कलधौत (नपुं)सुवर्णम्. (1) - कलधौत (नपुं)कारणम्. (1) - निमित्त (नपुं)चिह्नम्. (1) - निमित्त (नपुं)
 कलधौतं रूप्यहेम्नोर्निमित्तं हेतुलक्ष्मणोः ॥ ३.३.४९९ ॥
रूप्यकम्. (1) - कलधौत (नपुं)सुवर्णम्. (1) - कलधौत (नपुं)कारणम्. (1) - निमित्त (नपुं)चिह्नम्. (1) - निमित्त (नपुं)
अवधृतम्. (1) - श्रुत (नपुं)शास्त्रम्. (1) - श्रुत (नपुं)कृतयुगम्. (1) - कृत (नपुं)पर्याप्तिः. (1) - कृत (नपुं)
 श्रुतं शास्त्रावधृतयोर्युगपर्याप्तयोः कृतम् ॥ ३.३.५०० ॥
अवधृतम्. (1) - श्रुत (नपुं)शास्त्रम्. (1) - श्रुत (नपुं)कृतयुगम्. (1) - कृत (नपुं)पर्याप्तिः. (1) - कृत (नपुं)
महाभीतिः. (1) - अत्याहित (नपुं)जीवानपेक्षिः. (1) - अत्याहित (नपुं)
 अत्याहितं महाभीतिः कर्म जीवानपेक्षि च ॥ ३.३.५०१ ॥
महाभीतिः. (1) - अत्याहित (नपुं)जीवानपेक्षिः. (1) - अत्याहित (नपुं)
आवृतम्. (1) - भूत (नपुं)अतीतः. (1) - भूत (नपुं)भूमिः. (1) - भूत (नपुं)प्राणी. (1) - भूत (नपुं)युक्तम्. (1) - भूत (नपुं)
 युक्ते क्ष्मादावृते भूतं प्राण्यतीते समे त्रिषु ॥ ३.३.५०२ ॥
आवृतम्. (1) - भूत (नपुं)अतीतः. (1) - भूत (नपुं)भूमिः. (1) - भूत (नपुं)प्राणी. (1) - भूत (नपुं)युक्तम्. (1) - भूत (नपुं)
चरित्रम्. (1) - वृत्त (नपुं)पद्यम्. (1) - वृत्त (नपुं)अतीतः. (1) - वृत्त (वि)दृढम्. (1) - वृत्त (वि)
 वृत्तं पद्ये चरित्रे त्रिष्वतीते दृढनिस्तले ॥ ३.३.५०३ ॥
चरित्रम्. (1) - वृत्त (नपुं)पद्यम्. (1) - वृत्त (नपुं)अतीतः. (1) - वृत्त (वि)दृढम्. (1) - वृत्त (वि)
राज्यम्. (1) - महत् (नपुं)जनवादः. (1) - अवगीत (नपुं)गर्हितम्. (1) - अवगीत (वि)
 महद्राज्यं चावगीतं जन्ये स्याद्गर्हिते त्रिषु ॥ ३.३.५०४ ॥
राज्यम्. (1) - महत् (नपुं)जनवादः. (1) - अवगीत (नपुं)गर्हितम्. (1) - अवगीत (वि)
रूप्यकम्. (2) - श्वेत (नपुं), रजत (नपुं)सुवर्णम्. (1) - रजत (नपुं)शुक्लवर्णयुक्तः. (1) - रजत (वि)
 श्वेतं रूप्येऽपि रजतं हेम्नि रूप्ये सिते त्रिषु ॥ ३.३.५०५ ॥
रूप्यकम्. (2) - श्वेत (नपुं), रजत (नपुं)सुवर्णम्. (1) - रजत (नपुं)शुक्लवर्णयुक्तः. (1) - रजत (वि)
चरम्. (1) - जगत् (वि)नील्यादिरागिः. (1) - रक्त (वि)
 त्रिष्वितो जगदिङ्गेऽपि रक्तं नील्यादि रागि च ॥ ३.३.५०६ ॥
चरम्. (1) - जगत् (वि)नील्यादिरागिः. (1) - रक्त (वि)
शुक्लवर्णयुक्तः. (1) - अवदात (वि)पीतवर्णः. (1) - अवदात (वि)शुद्धम्. (1) - अवदात (वि)
 अवदातः सिते पीते शुद्धे बद्धार्जुनौ सितौ ॥ ३.३.५०७ ॥
शुक्लवर्णयुक्तः. (1) - अवदात (वि)पीतवर्णः. (1) - अवदात (वि)शुद्धम्. (1) - अवदात (वि)
कृत्रिमम्. (1) - संस्कृत (वि) लक्षणोपेतम्. (1) - संस्कृत (वि) अतिसंस्कृतम्. (1) - अभिनीत (वि)मर्षिः. (1) - अभिनीत (वि)युक्तम्. (1) - अभिनीत (वि)
 युक्तेऽति संस्कृतेऽमर्षिण्यभिनीतोऽथ संस्कृतम् ॥ ३.३.५०८ ॥
कृत्रिमम्. (1) - संस्कृत (वि) लक्षणोपेतम्. (1) - संस्कृत (वि) अतिसंस्कृतम्. (1) - अभिनीत (वि)मर्षिः. (1) - अभिनीत (वि)युक्तम्. (1) - अभिनीत (वि)
अनवधिः. (1) - अनन्त (वि)
 कृत्रिमे लक्षणोपेतेऽप्यनन्तोऽनवधावपि ॥ ३.३.५०९ ॥
अनवधिः. (1) - अनन्त (वि)
प्रमुदितः. (1) - प्रतीत (वि)कुलजः. (1) - अभिजात (वि)बुधः. (1) - अभिजात (वि)
 ख्याते हृष्टे प्रतीतोऽभिजातस्तु कुलजे बुधे ॥ ३.३.५१० ॥
प्रमुदितः. (1) - प्रतीत (वि)कुलजः. (1) - अभिजात (वि)बुधः. (1) - अभिजात (वि)
पवित्रः. (1) - विविक्ति (वि)विजनः. (1) - विविक्ति (वि)मूर्खः. (1) - मूर्छित (वि)सोच्छ्रयः. (1) - मूर्छित (वि)
 विविक्तौ पूतविजनौ मूर्छितौ मूढसोच्छ्रयौ ॥ ३.३.५११ ॥
पवित्रः. (1) - विविक्ति (वि)विजनः. (1) - विविक्ति (वि)मूर्खः. (1) - मूर्छित (वि)सोच्छ्रयः. (1) - मूर्छित (वि)
शुल्कवर्णः. (1) - शिति (वि)कृष्णवर्णः. (1) - शिति (वि)अम्लरसः. (1) - शुक्त (वि)परुषम्. (1) - शुक्त (वि)
 द्वौ चाम्ल परुषौ शुक्तौ शिती धवलमेचकौ ॥ ३.३.५१२ ॥
शुल्कवर्णः. (1) - शिति (वि)कृष्णवर्णः. (1) - शिति (वि)अम्लरसः. (1) - शुक्त (वि)परुषम्. (1) - शुक्त (वि)
अभ्यर्हितम्. (1) - सत् (वि)प्रशस्तम्. (1) - सत् (वि)विद्यमानम्. (1) - सत् (वि)साधुः. (1) - सत् (वि)सत्यम्. (1) - सत् (वि)
 सत्ये साधौ विद्यमाने प्रशस्तेऽभ्यर्हिते च सत् ॥ ३.३.५१३ ॥
अभ्यर्हितम्. (1) - सत् (वि)प्रशस्तम्. (1) - सत् (वि)विद्यमानम्. (1) - सत् (वि)साधुः. (1) - सत् (वि)सत्यम्. (1) - सत् (वि)
अरात्यभियुक्ते अग्रतः कृतः. (1) - पुरस्कृत (वि)
 पुरस्कृतः पूजितेऽरात्यभियुक्तेऽग्रतः कृते ॥ ३.३.५१४ ॥
अरात्यभियुक्ते अग्रतः कृतः. (1) - पुरस्कृत (वि)
आश्रयः. (1) - निवात (वि)अवातः. (1) - निवात (वि)शस्त्राभेद्यः. (1) - निवात (वि)वर्मः. (1) - निवात (वि)
 निवातावाश्रयावातौ शस्त्राभेद्यं च वर्म यत् ॥ ३.३.५१५ ॥
आश्रयः. (1) - निवात (वि)अवातः. (1) - निवात (वि)शस्त्राभेद्यः. (1) - निवात (वि)वर्मः. (1) - निवात (वि)
जातः. (1) - उच्छ्रित (वि)प्रवृद्धम्. (1) - उच्छ्रित (वि)उन्नद्धः. (1) - उच्छ्रित (वि)प्रोद्यतः. (1) - उत्थित (वि)उत्पन्नः. (1) - उत्थित (वि)वृद्धिमत्. (1) - उत्थित (वि)
 जातोन्नद्धप्रवृद्धाः स्युरुच्छ्रिता उत्थितास्त्वमी ॥ ३.३.५१६ ॥
जातः. (1) - उच्छ्रित (वि)प्रवृद्धम्. (1) - उच्छ्रित (वि)उन्नद्धः. (1) - उच्छ्रित (वि)प्रोद्यतः. (1) - उत्थित (वि)उत्पन्नः. (1) - उत्थित (वि)वृद्धिमत्. (1) - उत्थित (वि)
अर्चितः. (1) - आदृत (वि)सादरः. (1) - आदृत (वि)
 वृद्धिमत्प्रोद्यतोत्पन्ना आदृतौ सादरार्चितौ ॥ ३.३.५१७ ॥
अर्चितः. (1) - आदृत (वि)सादरः. (1) - आदृत (वि)
 समूहोत्पन्नयोर्जातमहिजिच्छ्रीपतीन्द्रयोः ॥ ३.३.५१८ ॥
 सौप्तिकेऽपि प्रपातोऽथावपातावतटावटौ ॥ ३.३.५१९ ॥
 समित्सङ्गे रणेऽपि स्त्री व्यवस्थायामपि स्थितिः ॥ ३.३.५२० ॥
अभिधेयः. (1) - अर्थ (पुं)निवृत्तिः. (1) - अर्थ (पुं)प्रयोजनम्. (1) - अर्थ (पुं)वस्तु. (1) - अर्थ (पुं)
 अर्थोऽभिधेय रै वस्तु प्रयोजन निवृत्तिषु ॥ ३.३.५२१ ॥
अभिधेयः. (1) - अर्थ (पुं)निवृत्तिः. (1) - अर्थ (पुं)प्रयोजनम्. (1) - अर्थ (पुं)वस्तु. (1) - अर्थ (पुं)
आगमः. (1) - तीर्थ (नपुं)कूपसमीपरचितजलाधारः. (1) - तीर्थ (नपुं)ऋषिजुष्टजलम्. (1) - तीर्थ (नपुं)संस्कारादिकर्तुर्गुरुः. (1) - तीर्थ (नपुं)
 निपानागमयोस्तीर्थमृषि जुष्टे जले गुरौ ॥ ३.३.५२२ ॥
आगमः. (1) - तीर्थ (नपुं)कूपसमीपरचितजलाधारः. (1) - तीर्थ (नपुं)ऋषिजुष्टजलम्. (1) - तीर्थ (नपुं)संस्कारादिकर्तुर्गुरुः. (1) - तीर्थ (नपुं)
अन्योन्यसम्बद्धार्थः. (1) - समर्थ (वि)हितम्. (1) - समर्थ (वि)शक्तिस्थः. (1) - समर्थ (वि)
 समर्थस्त्रिषु शक्तिस्थे संबद्धार्थे हितेऽपि च ॥ ३.३.५२३ ॥
अन्योन्यसम्बद्धार्थः. (1) - समर्थ (वि)हितम्. (1) - समर्थ (वि)शक्तिस्थः. (1) - समर्थ (वि)
क्षीणरागः. (1) - दशमीस्थ (पुं)वृद्धः. (1) - दशमीस्थ (पुं)मार्गः. (1) - वीथी (स्त्री)
 दशमीस्थौ क्षीणराग वृद्धौ वीथी पदव्यपि ॥ ३.३.५२४ ॥
क्षीणरागः. (1) - दशमीस्थ (पुं)वृद्धः. (1) - दशमीस्थ (पुं)मार्गः. (1) - वीथी (स्त्री)
सभा. (1) - आस्था (स्त्री)यत्नः. (1) - आस्था (स्त्री)मानः. (1) - प्रस्थ (पुं-नपुं)
 आस्थानी यत्नयोरास्था प्रस्थोऽस्त्री सानु मानयोः ॥ ३.३.५२५ ॥
सभा. (1) - आस्था (स्त्री)यत्नः. (1) - आस्था (स्त्री)मानः. (1) - प्रस्थ (पुं-नपुं)
शास्त्रम्. (1) - ग्रन्थ (पुं)द्रव्यम्. (1) - ग्रन्थ (पुं)आधारः. (1) - संस्था (स्त्री)स्थितिः. (1) - संस्था (स्त्री)मृतिः. (1) - संस्था (स्त्री)
 शास्त्र द्रविणयोर्ग्रन्थः संस्थाधारे स्थितौ मृतौ ॥ ३.३.५२६ ॥
शास्त्रम्. (1) - ग्रन्थ (पुं)द्रव्यम्. (1) - ग्रन्थ (पुं)आधारः. (1) - संस्था (स्त्री)स्थितिः. (1) - संस्था (स्त्री)मृतिः. (1) - संस्था (स्त्री)
 इति थान्ताः ॥ ३.३.५२७ ॥
अभिप्रायः. (1) - छन्द (पुं)वशः. (1) - छन्द (पुं)मेघः. (1) - अब्द (पुं)वत्सरः. (1) - अब्द (पुं)
 अभिप्राय वशौ छन्दावब्दौ जीमूत वत्सरौ ॥ ३.३.५२८ ॥
अभिप्रायः. (1) - छन्द (पुं)वशः. (1) - छन्द (पुं)मेघः. (1) - अब्द (पुं)वत्सरः. (1) - अब्द (पुं)
अज्ञः. (1) - अपवाद (पुं)निन्दा. (1) - अपवाद (पुं)पुत्रः. (1) - दायाद (पुं)सगोत्रः. (1) - दायाद (पुं)
 अपवादौ तु निन्दाज्ञे दायादौ सुत बान्धवौ ॥ ३.३.५२९ ॥
अज्ञः. (1) - अपवाद (पुं)निन्दा. (1) - अपवाद (पुं)पुत्रः. (1) - दायाद (पुं)सगोत्रः. (1) - दायाद (पुं)
किरणः. (1) - पाद (पुं)तुर्यांशः. (1) - पाद (पुं)अग्निः. (1) - तमोनुद् (पुं)चन्द्रः. (1) - तमोनुद् (पुं)सूर्यः. (1) - तमोनुद् (पुं)
 पादा रश्म्यङ्घ्रि तुर्यांशाश्चन्द्राग्न्यर्कास्तमोनुदः ॥ ३.३.५३० ॥
किरणः. (1) - पाद (पुं)तुर्यांशः. (1) - पाद (पुं)अग्निः. (1) - तमोनुद् (पुं)चन्द्रः. (1) - तमोनुद् (पुं)सूर्यः. (1) - तमोनुद् (पुं)
जनवादः. (1) - निर्वाद (पुं)नूतनतृणम्. (1) - शाद (पुं)
 निर्वादो जनवादेऽपि शादो जम्बाल शष्पयोः ॥ ३.३.५३१ ॥
जनवादः. (1) - निर्वाद (पुं)नूतनतृणम्. (1) - शाद (पुं)
सरवरोदनम्. (1) - आक्रन्द (पुं)त्राता. (1) - आक्रन्द (पुं)दारुणरणम्. (1) - आक्रन्द (पुं)
 आरावे रुदिते त्रातर्याक्रन्दो दारुणे रणे ॥ ३.३.५३२ ॥
सरवरोदनम्. (1) - आक्रन्द (पुं)त्राता. (1) - आक्रन्द (पुं)दारुणरणम्. (1) - आक्रन्द (पुं)
अनुसरणम्. (1) - प्रसाद (पुं)व्यञ्जनम्. (1) - सूद (वि)
 स्यात्प्रसादोऽनुरगेऽपि सूदः स्याद्व्यञ्जनेऽपि च ॥ ३.३.५३३ ॥
अनुसरणम्. (1) - प्रसाद (पुं)व्यञ्जनम्. (1) - सूद (वि)
गोपालः. (1) - गोविन्द (पुं)आनन्दः. (1) - आमोद (पुं)मदः. (1) - आमोद (पुं)
 गोष्ठाध्यक्षेऽपि गोविन्दो हर्षेऽप्यामोदवन्मदः ॥ ३.३.५३४ ॥
गोपालः. (1) - गोविन्द (पुं)आनन्दः. (1) - आमोद (पुं)मदः. (1) - आमोद (पुं)
प्राधान्यम्. (1) - ककुद (पुं-नपुं)राजचिह्नम्. (1) - ककुद (पुं-नपुं)वृषाङ्गम्. (1) - ककुद (पुं-नपुं)
 प्राधान्ये राजलिङ्गे च वृषाङ्गे ककुदोऽस्त्रियाम् ॥ ३.३.५३५ ॥
प्राधान्यम्. (1) - ककुद (पुं-नपुं)राजचिह्नम्. (1) - ककुद (पुं-नपुं)वृषाङ्गम्. (1) - ककुद (पुं-नपुं)
ज्ञानम्. (1) - संविद् (स्त्री)क्रियाकारः. (1) - संविद् (स्त्री)सम्भाषणम्. (1) - संविद् (स्त्री)युद्धम्. (1) - संविद् (स्त्री)
 स्त्री संविज्ज्ञान संभाषा क्रियाकाराजि नामसु ॥ ३.३.५३६ ॥
ज्ञानम्. (1) - संविद् (स्त्री)क्रियाकारः. (1) - संविद् (स्त्री)सम्भाषणम्. (1) - संविद् (स्त्री)युद्धम्. (1) - संविद् (स्त्री)
धर्मः. (1) - उपनिषद् (स्त्री)रहस्यम्. (1) - उपनिषद् (स्त्री)वत्सरः. (1) - शरद् (स्त्री)
 धर्मे रहस्युपनिषत्स्यादृतौ वत्सरे शरत् ॥ ३.३.५३७ ॥
धर्मः. (1) - उपनिषद् (स्त्री)रहस्यम्. (1) - उपनिषद् (स्त्री)वत्सरः. (1) - शरद् (स्त्री)
वस्तु. (1) - पद (नपुं)चरणः. (1) - पद (नपुं)चिह्नम्. (1) - पद (नपुं)स्थानम्. (1) - पद (नपुं)त्राणनम्. (1) - पद (नपुं)व्यवसितिः. (1) - पद (नपुं)
 पदं व्यवसिति त्राण स्थान लक्ष्माङ्घ्रि वस्तुषु ॥ ३.३.५३८ ॥
वस्तु. (1) - पद (नपुं)चरणः. (1) - पद (नपुं)चिह्नम्. (1) - पद (नपुं)स्थानम्. (1) - पद (नपुं)त्राणनम्. (1) - पद (नपुं)व्यवसितिः. (1) - पद (नपुं)
मानः. (1) - गोष्पद (नपुं)सेवितः. (1) - गोष्पद (नपुं)कृत्यम्. (1) - आस्पद (नपुं)प्रतिष्ठा. (1) - आस्पद (नपुं)
 गोष्पदं सेविते माने प्रतिष्ठा कृत्यमास्पदम् ॥ ३.३.५३९ ॥
मानः. (1) - गोष्पद (नपुं)सेवितः. (1) - गोष्पद (नपुं)कृत्यम्. (1) - आस्पद (नपुं)प्रतिष्ठा. (1) - आस्पद (नपुं)
मधुरम्. (1) - स्वादु (वि)यथेप्सितम्. (1) - स्वादु (वि)अतीक्ष्णः. (1) - मृदु (वि)
 त्रिष्विष्ट मधुरौ स्वादू मृदू चातीक्ष्ण कोमलौ ॥ ३.३.५४० ॥
मधुरम्. (1) - स्वादु (वि)यथेप्सितम्. (1) - स्वादु (वि)अतीक्ष्णः. (1) - मृदु (वि)
अल्पम्. (1) - मन्द (वि)अपटुः. (1) - मन्द (वि)मूर्खः. (1) - मन्द (वि)निर्भाग्यः. (1) - मन्द (वि)प्रत्यग्रः. (1) - शारद (वि)अप्रतिभः. (1) - शारद (वि)
 मूढाल्पापटु निर्भाग्या मन्दाः स्युर्द्वौ तु शारदौ ॥ ३.३.५४१ ॥
अल्पम्. (1) - मन्द (वि)अपटुः. (1) - मन्द (वि)मूर्खः. (1) - मन्द (वि)निर्भाग्यः. (1) - मन्द (वि)प्रत्यग्रः. (1) - शारद (वि)अप्रतिभः. (1) - शारद (वि)
विद्वान्. (1) - विशारद (वि)सुप्रगल्भः. (1) - विशारद (वि)
 प्रत्यग्राप्रतिभौ विद्वत्सुप्रगल्भौ विशारदौ ॥ ३.३.५४२ ॥
विद्वान्. (1) - विशारद (वि)सुप्रगल्भः. (1) - विशारद (वि)
 इति दान्ताः ॥ ३.३.५४३ ॥
व्यामः. (1) - न्यग्रोध (पुं)देहः. (1) - उत्सेध (पुं)
 व्यामो वटश्च न्यग्रोधावुत्सेधः काय उन्नतिः ॥ ३.३.५४४ ॥
व्यामः. (1) - न्यग्रोध (पुं)देहः. (1) - उत्सेध (पुं)
पर्याहारः. (2) - विवध (पुं), वीवध (पुं)मार्गः. (2) - विवध (पुं), वीवध (पुं)
 पर्याहारश्च मार्गश्,ह्च विवधौ वीवधौ च तौ ॥ ३.३.५४५ ॥
पर्याहारः. (2) - विवध (पुं), वीवध (पुं)मार्गः. (2) - विवध (पुं), वीवध (पुं)
यज्ञियतरोः शाखा. (1) - परिधि (पुं)उपसूर्यकः. (1) - परिधि (पुं)
 परिधिर्यज्ञिय तरोः शाखायामुपसूर्यके ॥ ३.३.५४६ ॥
यज्ञियतरोः शाखा. (1) - परिधि (पुं)उपसूर्यकः. (1) - परिधि (पुं)
अधिष्ठानम्. (1) - आधि (पुं)बन्धकः. (1) - आधि (पुं)व्यसनम्. (1) - आधि (पुं)
 बन्धकं व्यसनं चेतः पीडाधिष्ठानमाधयः ॥ ३.३.५४७ ॥
अधिष्ठानम्. (1) - आधि (पुं)बन्धकः. (1) - आधि (पुं)व्यसनम्. (1) - आधि (पुं)
मनोनिग्रहः. (1) - समाधि (पुं)समर्थनम्. (1) - समाधि (पुं)धान्यादिसञ्चयः. (1) - समाधि (पुं)
 स्युः समर्थन नीवाक नियमाश्च समाधयः ॥ ३.३.५४८ ॥
मनोनिग्रहः. (1) - समाधि (पुं)समर्थनम्. (1) - समाधि (पुं)धान्यादिसञ्चयः. (1) - समाधि (पुं)
मुख्यानुयायिः. (1) - अनुबन्ध (पुं)प्रकृतस्यानुवर्तनम्. (1) - अनुबन्ध (पुं)प्रकृतिप्रत्ययादिविनश्वरः. (1) - अनुबन्ध (पुं)शिशुः. (1) - अनुबन्ध (पुं)दोषोत्पादः. (1) - अनुबन्ध (पुं)
 दोषोत्पादेऽनुबन्धः स्यात्प्रकृतस्यादि विनश्वरे ॥ ३.३.५४९ ॥
मुख्यानुयायिः. (1) - अनुबन्ध (पुं)प्रकृतस्यानुवर्तनम्. (1) - अनुबन्ध (पुं)प्रकृतिप्रत्ययादिविनश्वरः. (1) - अनुबन्ध (पुं)शिशुः. (1) - अनुबन्ध (पुं)दोषोत्पादः. (1) - अनुबन्ध (पुं)
 मुख्यानुयायिनि शिशौ प्रकृत्यानुवर्तने ॥ ३.३.५५० ॥
परिच्छेदः. (1) - अवधि (पुं)बिलम्. (1) - अवधि (पुं)
 विधुर्विष्णौ चन्द्रमसि परिच्छेदे बिलेऽवधिः ॥ ३.३.५५१ ॥
परिच्छेदः. (1) - अवधि (पुं)बिलम्. (1) - अवधि (पुं)
विधानम्. (1) - विधि (पुं)प्रार्थना. (1) - प्रणिधि (पुं)
 विधिर्विधाने दैवेऽपि प्रणिधिः प्रार्थने चरे ॥ ३.३.५५२ ॥
विधानम्. (1) - विधि (पुं)प्रार्थना. (1) - प्रणिधि (पुं)
विद्वान्. (1) - वृद्धि (पुं)समुदायः. (1) - स्कन्ध (पुं)
 बुध वृद्धौ पण्डितेऽपि स्कन्धः समुदयेऽपि च ॥ ३.३.५५३ ॥
विद्वान्. (1) - वृद्धि (पुं)समुदायः. (1) - स्कन्ध (पुं)
नदी. (1) - सिन्धु (स्त्री)नदविशेषः. (1) - सिन्धु (पुं)
 देशे नद विशेषेऽब्धौ सिन्धुर्ना सरिति स्त्रियाम् ॥ ३.३.५५४ ॥
नदी. (1) - सिन्धु (स्त्री)नदविशेषः. (1) - सिन्धु (पुं)
विधिः. (1) - विधा (स्त्री)भेदः. (1) - विधा (स्त्री)रम्यम्. (1) - साधु (वि)
 विधा विधौ प्रकारे च साधू रम्येऽपि च त्रिषु ॥ ३.३.५५५ ॥
विधिः. (1) - विधा (स्त्री)भेदः. (1) - विधा (स्त्री)रम्यम्. (1) - साधु (वि)
पत्नी. (1) - वधू (स्त्री)लेपः. (1) - सुधा (स्त्री)सीहुण्डः. (1) - सुधा (स्त्री)
 वधूर्जाया स्नुषा स्त्री च सुधा लेपोऽमृतं स्नुही ॥ ३.३.५५६ ॥
पत्नी. (1) - वधू (स्त्री)लेपः. (1) - सुधा (स्त्री)सीहुण्डः. (1) - सुधा (स्त्री)
प्रतिज्ञा. (1) - सन्धा (स्त्री)मर्यादा. (1) - सन्धा (स्त्री)सम्प्रत्ययः. (1) - श्रद्धा (स्त्री)स्पृहा. (1) - श्रद्धा (स्त्री)
 सन्धा प्रतिज्ञा मर्यादा श्रद्धा संप्रत्ययः स्पृहा ॥ ३.३.५५७ ॥
प्रतिज्ञा. (1) - सन्धा (स्त्री)मर्यादा. (1) - सन्धा (स्त्री)सम्प्रत्ययः. (1) - श्रद्धा (स्त्री)स्पृहा. (1) - श्रद्धा (स्त्री)
सुरा. (1) - मधु (पुं)पुष्पमधुः. (1) - मधु (पुं)अन्धकारः. (1) - अन्ध (नपुं)
 मधु मद्ये पुष्परसे क्षौद्रेऽप्यन्धं तमस्यपि ॥ ३.३.५५८ ॥
सुरा. (1) - मधु (पुं)पुष्पमधुः. (1) - मधु (पुं)अन्धकारः. (1) - अन्ध (नपुं)
पण्डितम्मन्यः. (1) - समुन्नद्ध (वि)गर्वितः. (1) - समुन्नद्ध (वि)
 अतस्त्रिषु समुन्नद्धौ पण्डितंमन्य गर्वितौ ॥ ३.३.५५९ ॥
पण्डितम्मन्यः. (1) - समुन्नद्ध (वि)गर्वितः. (1) - समुन्नद्ध (वि)
ब्राह्मणाधिक्षेपः. (1) - ब्रह्मबन्धु (वि)ब्राह्मणनिर्देशः. (1) - ब्रह्मबन्धु (वि)
 ब्रह्मबन्धुरधिक्षेपे निर्देशेऽथावलम्बितः ॥ ३.३.५६० ॥
ब्राह्मणाधिक्षेपः. (1) - ब्रह्मबन्धु (वि)ब्राह्मणनिर्देशः. (1) - ब्रह्मबन्धु (वि)
अवलम्बितः. (1) - अवष्टब्ध (वि)अविदूरम्. (1) - अवष्टब्ध (वि)प्रसिद्धः. (1) - प्रसिद्ध (वि)भूषितः. (1) - प्रसिद्ध (वि)
 अविदूरोऽप्यवष्टब्धः प्रसिद्धौ ख्यात भूषितौ ॥ ३.३.५६१ ॥
अवलम्बितः. (1) - अवष्टब्ध (वि)अविदूरम्. (1) - अवष्टब्ध (वि)प्रसिद्धः. (1) - प्रसिद्ध (वि)भूषितः. (1) - प्रसिद्ध (वि)
 लेशेऽपि गन्धः संबाधो गुह्यसंकुलयोरपि ॥ ३.३.५६२ ॥
 बाधा निषेधे दुःखे च ज्ञातृचान्द्रिसुरा बुधाः ॥ ३.३.५६३ ॥
 ॥ । इति धान्ताः ॥
 सूर्य वह्नी चित्रभानू भानू रश्मि दिवाकरौ ॥ ३.३.५६४ ॥
धाता. (1) - भूतात्मन् (पुं)देहः. (1) - भूतात्मन् (पुं)मूर्खः. (1) - पृथग्जन (पुं)
 भूतात्मानौ धातृ देहौ मूर्ख नीचौ पृथग्जनौ ॥ ३.३.५६५ ॥
धाता. (1) - भूतात्मन् (पुं)देहः. (1) - भूतात्मन् (पुं)मूर्खः. (1) - पृथग्जन (पुं)
 ग्रावाणौ शैलपाषाणौ पत्रिणौ शरपक्षिणौ ॥ ३.३.५६६ ॥
वृक्षः. (1) - शिखरिन् (पुं)अग्निः. (1) - शिखिन् (पुं)
 तरुशैलौ शिखरिणौ शिखिनौ वह्नि बर्हिणौ ॥ ३.३.५६७ ॥
वृक्षः. (1) - शिखरिन् (पुं)अग्निः. (1) - शिखिन् (पुं)
स्पृहा. (1) - प्रतियत्न (पुं)उपग्रहः. (1) - प्रतियत्न (पुं)सारथिः. (1) - सादिन् (पुं)
 प्रतियत्नावुभौ लिप्सोपग्रहावथ सादिनौ ॥ ३.३.५६८ ॥
स्पृहा. (1) - प्रतियत्न (पुं)उपग्रहः. (1) - प्रतियत्न (पुं)सारथिः. (1) - सादिन् (पुं)
बाणः. (1) - वाजिन् (पुं)
 द्वौ सारथि हयारोहौ वाजिनोऽश्वेषु पक्षिणः ॥ ३.३.५६९ ॥
बाणः. (1) - वाजिन् (पुं)
जन्मभूमिः. (1) - अभिजन (पुं)किरणः. (1) - हायन (पुं)वर्षम्. (1) - हायन (पुं)व्रीहिभेदः. (1) - हायन (पुं)
 कुलेऽप्यभिजनो जन्म भूम्यामप्यथ हायनाः ॥ ३.३.५७० ॥
जन्मभूमिः. (1) - अभिजन (पुं)किरणः. (1) - हायन (पुं)वर्षम्. (1) - हायन (पुं)व्रीहिभेदः. (1) - हायन (पुं)
चन्द्रः. (1) - विरोचन (पुं)अग्निः. (1) - विरोचन (पुं)
 वर्षार्चिर्व्रीहिभेदाश्च चन्द्राग्न्यर्का विरोचनाः ॥ ३.३.५७१ ॥
चन्द्रः. (1) - विरोचन (पुं)अग्निः. (1) - विरोचन (पुं)
केशः. (1) - वृजिन (पुं)देवशिल्पिः. (1) - विश्वकर्मन् (पुं)सूर्यः. (1) - विश्वकर्मन् (पुं)
 केशेऽपि वृजिनो विश्वकर्मार्क सुरशिल्पिनोः ॥ ३.३.५७२ ॥
केशः. (1) - वृजिन (पुं)देवशिल्पिः. (1) - विश्वकर्मन् (पुं)सूर्यः. (1) - विश्वकर्मन् (पुं)
ब्रह्मा. (1) - आत्मन् (पुं)बुद्धिः. (1) - आत्मन् (पुं)स्वभावः. (1) - आत्मन् (पुं)देहः. (1) - आत्मन् (पुं)धृतिः. (1) - आत्मन् (पुं)यत्नः. (1) - आत्मन् (पुं)
 आत्मा यत्नो धृतिर्बुद्धिः स्वभावो ब्रह्म वर्ष्म च ॥ ३.३.५७३ ॥
ब्रह्मा. (1) - आत्मन् (पुं)बुद्धिः. (1) - आत्मन् (पुं)स्वभावः. (1) - आत्मन् (पुं)देहः. (1) - आत्मन् (पुं)धृतिः. (1) - आत्मन् (पुं)यत्नः. (1) - आत्मन् (पुं)
इन्द्रः. (1) - घनाघन (पुं)मत्तगजः. (1) - घनाघन (पुं)वर्षुकाब्दः. (1) - घनाघन (पुं)
 शक्रो घातुक मत्तेभो वर्षुकाब्दो घनाघनः ॥ ३.३.५७४ ॥
इन्द्रः. (1) - घनाघन (पुं)मत्तगजः. (1) - घनाघन (पुं)वर्षुकाब्दः. (1) - घनाघन (पुं)
अर्थादिदर्पाज्ञानम्. (1) - अभिमान (पुं)हिंसा. (1) - अभिमान (पुं)प्रणयम्. (1) - अभिमान (पुं)
 अभिमानोऽर्थादि दर्पे ज्ञाने प्रणय हिंसयोः ॥ ३.३.५७५ ॥
अर्थादिदर्पाज्ञानम्. (1) - अभिमान (पुं)हिंसा. (1) - अभिमान (पुं)प्रणयम्. (1) - अभिमान (पुं)
कठिनगुणः. (1) - घन (पुं)कठिनम्. (1) - घन (वि)निरन्तरम्. (1) - घन (वि)
 घनो मेघे मूर्तिगुणे त्रिषु मूर्ते निरन्तरे ॥ ३.३.५७६ ॥
कठिनगुणः. (1) - घन (पुं)कठिनम्. (1) - घन (वि)निरन्तरम्. (1) - घन (वि)
अधिपतिः. (1) - इन (पुं)चन्द्रः. (1) - राजन् (पुं)क्षत्रियः. (1) - राजन् (पुं)राजा. (1) - राजन् (पुं)
 इनः सूर्ये प्रभौ राजा मृगाङ्के क्षत्रिये नृपे ॥ ३.३.५७७ ॥
अधिपतिः. (1) - इन (पुं)चन्द्रः. (1) - राजन् (पुं)क्षत्रियः. (1) - राजन् (पुं)राजा. (1) - राजन् (पुं)
नर्तकी. (1) - वाणिनी (स्त्री)दूती. (1) - वाणिनी (स्त्री)नदी. (1) - वाहिनी (स्त्री)
 वाणिन्यौ नर्तकी दूत्यौ स्रवन्त्यामपि वाहिनी ॥ ३.३.५७८ ॥
नर्तकी. (1) - वाणिनी (स्त्री)दूती. (1) - वाणिनी (स्त्री)नदी. (1) - वाहिनी (स्त्री)
इन्द्रस्य वज्रायुधम्. (1) - ह्लादिनी (स्त्री)तडित्. (1) - ह्लादिनी (स्त्री)वन्दा. (1) - कामिनी (स्त्री)
 ह्लादिन्यौ वज्रतडितौ वन्दायामपि कामिनी ॥ ३.३.५७९ ॥
इन्द्रस्य वज्रायुधम्. (1) - ह्लादिनी (स्त्री)तडित्. (1) - ह्लादिनी (स्त्री)वन्दा. (1) - कामिनी (स्त्री)
चर्मः. (1) - तनु (स्त्री)अधोजिह्विका. (1) - सूना (स्त्री)
 त्वग्देहयोरपि तनुः सूनाधो जिह्विकापि च ॥ ३.३.५८० ॥
चर्मः. (1) - तनु (स्त्री)अधोजिह्विका. (1) - सूना (स्त्री)
विशालता. (1) - वितान (पुं-नपुं)यज्ञः. (1) - वितान (पुं-नपुं)तुच्छम्. (1) - वितान (वि)मदः. (1) - वितान (वि)
 क्रतु विस्तारयोरस्त्री वितानं त्रिषु तुच्छके ॥ ३.३.५८१ ॥
विशालता. (1) - वितान (पुं-नपुं)यज्ञः. (1) - वितान (पुं-नपुं)तुच्छम्. (1) - वितान (वि)मदः. (1) - वितान (वि)
कृत्यम्. (1) - केतन (नपुं)पताका. (1) - केतन (नपुं)उपनिमन्त्रणम्. (1) - केतन (नपुं)
 मन्देऽथ केतनं कृत्ये केतावुपनिमन्त्रणे ॥ ३.३.५८२ ॥
कृत्यम्. (1) - केतन (नपुं)पताका. (1) - केतन (नपुं)उपनिमन्त्रणम्. (1) - केतन (नपुं)
ब्राह्मणः. (1) - ब्रह्मन् (नपुं)प्रजापतिः. (1) - ब्रह्मन् (नपुं)वेदतत्त्वम्. (1) - ब्रह्मन् (नपुं)तपः. (1) - ब्रह्मन् (नपुं)
 वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म ब्रह्मा विप्रः प्रजापतिः ॥ ३.३.५८३ ॥
ब्राह्मणः. (1) - ब्रह्मन् (नपुं)प्रजापतिः. (1) - ब्रह्मन् (नपुं)वेदतत्त्वम्. (1) - ब्रह्मन् (नपुं)तपः. (1) - ब्रह्मन् (नपुं)
हिंसा. (1) - गन्धन (नपुं)सूचना. (1) - गन्धन (नपुं)उत्साहनम्. (1) - गन्धन (नपुं)
 उत्साहने च हिंसायां सूचने चापि गन्धनम् ॥ ३.३.५८४ ॥
हिंसा. (1) - गन्धन (नपुं)सूचना. (1) - गन्धन (नपुं)उत्साहनम्. (1) - गन्धन (नपुं)
आप्यायनः. (1) - आतञ्चन (नपुं)प्रतीवापः. (1) - आतञ्चन (नपुं)वेगः. (1) - आतञ्चन (नपुं)
 आतञ्चनं प्रतीवाप जवनाप्यायनार्थकम् ॥ ३.३.५८५ ॥
आप्यायनः. (1) - आतञ्चन (नपुं)प्रतीवापः. (1) - आतञ्चन (नपुं)वेगः. (1) - आतञ्चन (नपुं)
चिह्नम्. (1) - व्यञ्जन (नपुं)दाढिका. (1) - व्यञ्जन (नपुं)दध्यादिव्यञ्जनम्. (1) - व्यञ्जन (नपुं)अवयवविशेषः. (1) - व्यञ्जन (नपुं)
 व्यञ्जनं लाञ्छनं श्मश्रु निष्ठानावयवेष्वपि ॥ ३.३.५८६ ॥
चिह्नम्. (1) - व्यञ्जन (नपुं)दाढिका. (1) - व्यञ्जन (नपुं)दध्यादिव्यञ्जनम्. (1) - व्यञ्जन (नपुं)अवयवविशेषः. (1) - व्यञ्जन (नपुं)
लोकवादः. (1) - कौलीन (नपुं)पश्वहिपक्षिनाम्युद्धम्. (1) - कौलीन (नपुं)
 स्यात्कौलीनं लोकवादे युद्धे पश्वहि पक्षिणाम् ॥ ३.३.५८७ ॥
लोकवादः. (1) - कौलीन (नपुं)पश्वहिपक्षिनाम्युद्धम्. (1) - कौलीन (नपुं)
निःसरणम्. (1) - उद्यान (नपुं)प्रयोजनम्. (1) - उद्यान (नपुं)
 स्यादुद्यानं निःसरणे वनभेदे प्रयोजने ॥ ३.३.५८८ ॥
निःसरणम्. (1) - उद्यान (नपुं)प्रयोजनम्. (1) - उद्यान (नपुं)
अवकाशः. (1) - स्थान (नपुं)स्थितिः. (1) - स्थान (नपुं)क्रीडा. (1) - देवन (नपुं)
 अवकाशे स्थितौ स्थानं क्रीडादावपि देवनम् ॥ ३.३.५८९ ॥
अवकाशः. (1) - स्थान (नपुं)स्थितिः. (1) - स्थान (नपुं)क्रीडा. (1) - देवन (नपुं)
प्रतिरोधः. (1) - व्युत्थान (नपुं)विरोधाचरणम्. (1) - व्युत्थान (नपुं)
 व्युत्थानं प्रतिरोधे च विरोधाचरणेऽपि च ॥ ३.३.५९० ॥
प्रतिरोधः. (1) - व्युत्थान (नपुं)विरोधाचरणम्. (1) - व्युत्थान (नपुं)
पौरुषम्. (1) - उत्थान (नपुं)सन्निविष्टोद्गमः. (1) - उत्थान (नपुं)तन्त्रम्. (1) - उत्थान (नपुं)
 उत्थानं पौरुषे तन्त्रे संनिविष्टोद्गमेऽपि च ॥ ३.३.५९१ ॥
पौरुषम्. (1) - उत्थान (नपुं)सन्निविष्टोद्गमः. (1) - उत्थान (नपुं)तन्त्रम्. (1) - उत्थान (नपुं)
 मारणे मृतसंस्कारे गतौ द्रव्येऽर्थ दापने ॥ ३.३.५९२ ॥
अनुव्रज्या. (1) - साधन (नपुं)गतिः. (1) - साधन (नपुं)मारणम्. (1) - साधन (नपुं)मृतसंस्कारः. (1) - साधन (नपुं)निर्वर्तनम्. (1) - साधन (नपुं)उपकरणम्. (1) - साधन (नपुं)उपपादनम्. (1) - साधन (नपुं)द्रव्यम्. (1) - साधन (नपुं)
 निर्वर्तनोपकरणानुव्रज्यासु च साधनम् ॥ ३.३.५९३ ॥
अनुव्रज्या. (1) - साधन (नपुं)गतिः. (1) - साधन (नपुं)मारणम्. (1) - साधन (नपुं)मृतसंस्कारः. (1) - साधन (नपुं)निर्वर्तनम्. (1) - साधन (नपुं)उपकरणम्. (1) - साधन (नपुं)उपपादनम्. (1) - साधन (नपुं)द्रव्यम्. (1) - साधन (नपुं)
न्यासार्पणम्. (1) - निर्यातन (नपुं)वैरशोधनम्. (1) - निर्यातन (नपुं)दानम्. (1) - निर्यातन (नपुं)
 निर्यातनं वैर शुद्धौ दाने न्यासार्पणेऽपि च ॥ ३.३.५९४ ॥
न्यासार्पणम्. (1) - निर्यातन (नपुं)वैरशोधनम्. (1) - निर्यातन (नपुं)दानम्. (1) - निर्यातन (नपुं)
भ्रंशः. (1) - व्यसन (नपुं)कामजदोषः. (1) - व्यसन (नपुं)कोपजदोषः. (1) - व्यसन (नपुं)विपत्. (1) - व्यसन (नपुं)
 व्यसनं विपदि भ्रंशे दोषे कामजकोपजे ॥ ३.३.५९५ ॥
भ्रंशः. (1) - व्यसन (नपुं)कामजदोषः. (1) - व्यसन (नपुं)कोपजदोषः. (1) - व्यसन (नपुं)विपत्. (1) - व्यसन (नपुं)
अक्षिलोमन्. (1) - पक्ष्मन् (नपुं)पुष्परेणुः. (1) - पक्ष्मन् (नपुं)तन्त्वाद्यंशे़प्यणीयसी. (1) - पक्ष्मन् (नपुं)
 पक्ष्माक्षिलोम्नि किञ्जल्के तन्त्वाद्यम्शेऽप्यणीयसि ॥ ३.३.५९६ ॥
अक्षिलोमन्. (1) - पक्ष्मन् (नपुं)पुष्परेणुः. (1) - पक्ष्मन् (नपुं)तन्त्वाद्यंशे़प्यणीयसी. (1) - पक्ष्मन् (नपुं)
तिथिभेदः. (1) - पर्वन् (नपुं)त्रिंशत् कलाः. (1) - पर्वन् (नपुं)नेत्रच्छदः. (1) - वर्त्मन् (नपुं)
 तिथिभेदे क्षणे पर्व वर्त्म नेत्रच्छदेऽध्वनि ॥ ३.३.५९७ ॥
तिथिभेदः. (1) - पर्वन् (नपुं)त्रिंशत् कलाः. (1) - पर्वन् (नपुं)नेत्रच्छदः. (1) - वर्त्मन् (नपुं)
अकार्यम्. (1) - कौपीन (नपुं)गुह्यम्. (1) - कौपीन (नपुं)रतम्. (1) - मैथुन (नपुं)सङ्गतिः. (1) - मैथुन (नपुं)
 अकार्यगुह्ये कौपीनं मैथुनं संगतौ रते ॥ ३.३.५९८ ॥
अकार्यम्. (1) - कौपीन (नपुं)गुह्यम्. (1) - कौपीन (नपुं)रतम्. (1) - मैथुन (नपुं)सङ्गतिः. (1) - मैथुन (नपुं)
परमात्मा. (1) - प्रधान (नपुं)बुद्धिः. (2) - प्रधान (नपुं), प्रज्ञान (नपुं)चिह्नम्. (1) - प्रज्ञान (नपुं)
 प्रधानं परमात्मा धीः प्रज्ञानं बुद्धिचिह्नयोः ॥ ३.३.५९९ ॥
परमात्मा. (1) - प्रधान (नपुं)बुद्धिः. (2) - प्रधान (नपुं), प्रज्ञान (नपुं)चिह्नम्. (1) - प्रज्ञान (नपुं)
फलम्. (1) - प्रसून (नपुं)वंशः. (1) - निधन (नपुं)नाशः. (1) - निधन (नपुं)
 प्रसूनं पुष्पफलयोर्निधनं कुलनाशयोः ॥ ३.३.६०० ॥
फलम्. (1) - प्रसून (नपुं)वंशः. (1) - निधन (नपुं)नाशः. (1) - निधन (नपुं)
आह्वानम्. (1) - क्रन्दन (नपुं)रोदनम्. (1) - क्रन्दन (नपुं)प्रमाणः. (1) - वर्ष्मन् (नपुं)
 क्रन्दने रोदनाह्वाने वर्ष्म देहप्रमाणयोः ॥ ३.३.६०१ ॥
आह्वानम्. (1) - क्रन्दन (नपुं)रोदनम्. (1) - क्रन्दन (नपुं)प्रमाणः. (1) - वर्ष्मन् (नपुं)
गृहम्. (1) - धामन् (नपुं)किरणः. (1) - धामन् (नपुं)प्रभावः. (1) - धामन् (नपुं)देहः. (1) - धामन् (नपुं)
 गृहदेहत्विट्प्रभावा धामान्यथ चतुष्पथे ॥ ३.३.६०२ ॥
गृहम्. (1) - धामन् (नपुं)किरणः. (1) - धामन् (नपुं)प्रभावः. (1) - धामन् (नपुं)देहः. (1) - धामन् (नपुं)
चतुष्पथम्. (1) - संस्थान (नपुं)सन्निवेशः. (1) - संस्थान (नपुं)प्रधानम्. (1) - लक्ष्मन् (नपुं)
 संनिवेशे च संस्थानं लक्ष्म चिह्नप्रधानयोः ॥ ३.३.६०३ ॥
चतुष्पथम्. (1) - संस्थान (नपुं)सन्निवेशः. (1) - संस्थान (नपुं)प्रधानम्. (1) - लक्ष्मन् (नपुं)
सम्पिधानम्. (1) - आच्छादन (नपुं)
 आच्छादने संविधानमपवारणमित्युभे ॥ ३.३.६०४ ॥
सम्पिधानम्. (1) - आच्छादन (नपुं)
अवाप्तिः. (1) - आराधन (नपुं)साधनम्. (1) - आराधन (नपुं)तोषणम्. (1) - आराधन (नपुं)
 आराधनं साधने स्यादवाप्तौ तोषणेऽपि च ॥ ३.३.६०५ ॥
अवाप्तिः. (1) - आराधन (नपुं)साधनम्. (1) - आराधन (नपुं)तोषणम्. (1) - आराधन (नपुं)
अध्यासनम्. (1) - अधिष्ठान (नपुं)चक्रम्. (1) - अधिष्ठान (नपुं)मूलनगरादन्यनगरम्. (1) - अधिष्ठान (नपुं)प्रभावः. (1) - अधिष्ठान (नपुं)
 अधिष्ठानं चक्रपुरप्रभावाध्यासनेष्वपि ॥ ३.३.६०६ ॥
अध्यासनम्. (1) - अधिष्ठान (नपुं)चक्रम्. (1) - अधिष्ठान (नपुं)मूलनगरादन्यनगरम्. (1) - अधिष्ठान (नपुं)प्रभावः. (1) - अधिष्ठान (नपुं)
स्वजातिश्रेष्ठः. (1) - रत्न (नपुं)
 रत्नं स्वजातिश्रेष्ठेऽपि वने सलिलकानने ॥ ३.३.६०७ ॥
स्वजातिश्रेष्ठः. (1) - रत्न (नपुं)
विरलम्. (1) - तलिन (वि)स्तोकम्. (1) - तलिन (वि)
 तलिनं विरले स्तोके वाच्यलिङ्गं तथोत्तरे ॥ ३.३.६०८ ॥
विरलम्. (1) - तलिन (वि)स्तोकम्. (1) - तलिन (वि)
एकः. (1) - समान (वि)समः. (1) - समान (वि)सत्. (1) - समान (वि)खलः. (1) - पिशुन (वि)सूचकः. (1) - पिशुन (वि)
 समानाः सत्समैके स्युः पिशुनौ खलसूचकौ ॥ ३.३.६०९ ॥
एकः. (1) - समान (वि)समः. (1) - समान (वि)सत्. (1) - समान (वि)खलः. (1) - पिशुन (वि)सूचकः. (1) - पिशुन (वि)
ऊनः. (2) - हीन (वि), न्यून (वि)गर्ह्यः. (2) - हीन (वि), न्यून (वि)वेगिः. (1) - तरस्विन् (वि)शूरः. (1) - तरस्विन् (वि)
 हीनन्यूनावूनगर्ह्यौ वेगिशूरौ तरस्विनौ ॥ ३.३.६१० ॥
ऊनः. (2) - हीन (वि), न्यून (वि)गर्ह्यः. (2) - हीन (वि), न्यून (वि)वेगिः. (1) - तरस्विन् (वि)शूरः. (1) - तरस्विन् (वि)
अभिग्रस्तः. (1) - अभिपन्न (वि)अपराधः. (1) - अभिपन्न (वि)व्यापद्गतः. (1) - अभिपन्न (वि)
 अभिपन्नोऽपराद्धोऽभिग्रस्तव्यापद्गतावपि ॥ ३.३.६११ ॥
अभिग्रस्तः. (1) - अभिपन्न (वि)अपराधः. (1) - अभिपन्न (वि)व्यापद्गतः. (1) - अभिपन्न (वि)
 ॥ । इति नान्ताः ॥
भूषणम्. (1) - कलाप (पुं)मयूरपिच्छः. (1) - कलाप (पुं)शराधारः. (1) - कलाप (पुं)संहतः. (1) - कलाप (पुं)
 कलापो भूषणे बर्हे तूणीरे संहतावपि ॥ ३.३.६१२ ॥
भूषणम्. (1) - कलाप (पुं)मयूरपिच्छः. (1) - कलाप (पुं)शराधारः. (1) - कलाप (पुं)संहतः. (1) - कलाप (पुं)
परिच्छदः. (1) - परीवाप (पुं)पर्युप्तिः. (1) - परीवाप (पुं)सलिलस्थितिः. (1) - परीवाप (पुं)
 परिच्छदे परीवापः पर्युप्तौ सलिलस्थितौ ॥ ३.३.६१३ ॥
परिच्छदः. (1) - परीवाप (पुं)पर्युप्तिः. (1) - परीवाप (पुं)सलिलस्थितिः. (1) - परीवाप (पुं)
गोपालः. (1) - गोप (पुं)विष्णुः. (1) - वृषाकपि (पुं)शिवः. (1) - वृषाकपि (पुं)
 गोधुग्गोष्ठपती गोपौ हरविष्णू वृषाकपी ॥ ३.३.६१४ ॥
गोपालः. (1) - गोप (पुं)विष्णुः. (1) - वृषाकपि (पुं)शिवः. (1) - वृषाकपि (पुं)
अश्रुः. (1) - बाष्प (पुं)उष्मा. (1) - बाष्प (पुं)सिद्धान्नम्. (1) - कशिपु (पुं-नपुं)वस्त्रम्. (1) - कशिपु (पुं-नपुं)
 बाष्पमूष्माश्रु कशिपु त्वन्नमाच्छादनं द्वयम् ॥ ३.३.६१५ ॥
अश्रुः. (1) - बाष्प (पुं)उष्मा. (1) - बाष्प (पुं)सिद्धान्नम्. (1) - कशिपु (पुं-नपुं)वस्त्रम्. (1) - कशिपु (पुं-नपुं)
हर्म्याद्युपरिगृहम्. (1) - तल्प (पुं-नपुं)पत्नी. (1) - तल्प (पुं-नपुं)शय्या. (1) - तल्प (पुं-नपुं)तरुमूलम्. (1) - विटप (पुं-नपुं)
 तल्पं शय्याट्टदारेषु स्तम्बेऽपि विटपोऽस्त्रियाम् ॥ ३.३.६१६ ॥
हर्म्याद्युपरिगृहम्. (1) - तल्प (पुं-नपुं)पत्नी. (1) - तल्प (पुं-नपुं)शय्या. (1) - तल्प (पुं-नपुं)तरुमूलम्. (1) - विटप (पुं-नपुं)
बुधः. (3) - प्राप्तरूप (वि), स्वरूप (वि), अभिरूप (वि)मनोरमम्. (3) - प्राप्तरूप (वि), स्वरूप (वि), अभिरूप (वि)
 प्राप्तरूपस्वरूपाभिरूपा बुधमनोज्ञयोः ॥ ३.३.६१७ ॥
बुधः. (3) - प्राप्तरूप (वि), स्वरूप (वि), अभिरूप (वि)मनोरमम्. (3) - प्राप्तरूप (वि), स्वरूप (वि), अभिरूप (वि)
कच्छपी. (1) - कच्छपी (स्त्री)वीणाभेदः. (1) - कच्छपी (स्त्री)
 भेद्यलिङ्गा अमी कूर्मी वीणाभेदश्च कच्छपी ॥ ३.३.६१८ ॥
कच्छपी. (1) - कच्छपी (स्त्री)वीणाभेदः. (1) - कच्छपी (स्त्री)
मृगरोमोत्थपटः. (1) - कुतप (पुं)
 कुतपो मृगरोमोत्थपटे चाह्नो.ष्टमेंऽशके ॥ ३.३.६१९ ॥
मृगरोमोत्थपटः. (1) - कुतप (पुं)
 ॥ । इति पान्ताः ॥
 शिफा शिखायां सरिति मांसिकायां च मातरि ॥ ३.३.६२० ॥
 शफं मूले तरूणां स्याद्गवादीनां खुरेऽपि च ॥ ३.३.६२१ ॥
 गुल्फः स्याद्गुंफने बाहोरलंकारे च कीर्तितः ॥ ३.३.६२२ ॥
 रवर्णे पुंसि रेफः स्यात्कुत्सिते वाच्यलिङ्गकः ॥ ३.३.६२३ ॥
 ॥ । इति फान्ताः ॥
अन्तराभवसत्वः. (1) - गन्धर्व (पुं)
 अन्तराभवसत्वेऽश्वे गन्धर्वो दिव्यगायने ॥ ३.३.६२४ ॥
अन्तराभवसत्वः. (1) - गन्धर्व (पुं)
करवलयः. (1) - कम्बु (पुं)सर्पः. (1) - द्विजिह्व (पुं)सूचकः. (1) - द्विजिह्व (पुं)
 कम्बुर्ना वलये शङ्खे द्विजिह्वौ सर्पसूचकौ ॥ ३.३.६२५ ॥
करवलयः. (1) - कम्बु (पुं)सर्पः. (1) - द्विजिह्व (पुं)सूचकः. (1) - द्विजिह्व (पुं)
 पूर्वोऽन्यलिङ्गः प्रागाह पुमूबहुत्वेऽपि पूर्वजान् ॥ ३.३.६२६ ॥
 चित्रपुङ्खेऽपि कादम्बो नितम्बोऽद्रितटे कटौ ॥ ३.३.६२७ ॥
 दर्वी फणापि बिम्बोऽस्त्री मण्डलेऽपि च ॥ ३.३.६२८ ॥
 ॥ । इति बान्ताः ॥
घटः. (1) - कुम्भ (वि)मूर्खः. (1) - डिम्भ (पुं)
 कुम्भौ घटेभमूर्धांशौ डिम्भौ तु शिशुबालिशौ ॥ ३.३.६२९ ॥
घटः. (1) - कुम्भ (वि)मूर्खः. (1) - डिम्भ (पुं)
जडीभावः. (1) - स्तम्भ (पुं)स्तम्भः. (1) - स्तम्भ (पुं)ब्रह्मा. (1) - शम्भु (पुं)
 स्तम्भौ स्थूणाजडीभावौ शम्भू ब्रह्मत्रिलोचनौ ॥ ३.३.६३० ॥
जडीभावः. (1) - स्तम्भ (पुं)स्तम्भः. (1) - स्तम्भ (पुं)ब्रह्मा. (1) - शम्भु (पुं)
शिशुः. (1) - गर्भ (पुं)जठरम्. (1) - गर्भ (पुं)प्रणयम्. (1) - विस्रम्भ (पुं)
 कुक्षिभ्रूणार्भका गर्भा विस्रम्भः प्रणयेऽपि च ॥ ३.३.६३१ ॥
शिशुः. (1) - गर्भ (पुं)जठरम्. (1) - गर्भ (पुं)प्रणयम्. (1) - विस्रम्भ (पुं)
अक्षः. (1) - दुन्दुभि (स्त्री)
 स्याद्भेर्यां दुन्दुभिः पुंसि स्यादक्षे दुन्दुभिः स्त्रियाम् ॥ ३.३.६३२ ॥
अक्षः. (1) - दुन्दुभि (स्त्री)
कमण्डलुः. (1) - कुसुम्भ (पुं)
 स्यान्महारजते क्लीबं कुसुम्भं करके पुमान् ॥ ३.३.६३३ ॥
कमण्डलुः. (1) - कुसुम्भ (पुं)
क्षत्रियः. (1) - नाभि (पुं)गौः. (1) - सुरभि (स्त्री)
 क्षत्रियेऽपि च नाभिर्ना सुरभिर्गवि च स्त्रियाम् ॥ ३.३.६३४ ॥
क्षत्रियः. (1) - नाभि (पुं)गौः. (1) - सुरभि (स्त्री)
सभ्यम्. (1) - सभा (स्त्री)अधिकारी. (1) - वल्लभ (वि)
 सभा संसदि सभ्ये च त्रिष्वध्यक्षेऽपि वल्लभः ॥ ३.३.६३५ ॥
सभ्यम्. (1) - सभा (स्त्री)अधिकारी. (1) - वल्लभ (वि)
 ॥ । इति भान्ताः ॥
प्रग्रहः. (1) - रश्मि (पुं)वानरः. (1) - प्लवङ्गम (पुं)मण्डूकः. (1) - प्लवङ्गम (पुं)
 किरण प्रग्रहौ रश्मी कपिभेकौ प्लवङ्गमौ ॥ ३.३.६३६ ॥
प्रग्रहः. (1) - रश्मि (पुं)वानरः. (1) - प्लवङ्गम (पुं)मण्डूकः. (1) - प्लवङ्गम (पुं)
इच्छा. (1) - काम (पुं)उद्योगः. (1) - पराक्रम (पुं)शक्तिः. (1) - पराक्रम (पुं)
 इच्छामनोभवौ कामौ शक्त्युद्योगौ पराक्रमौ ॥ ३.३.६३७ ॥
इच्छा. (1) - काम (पुं)उद्योगः. (1) - पराक्रम (पुं)शक्तिः. (1) - पराक्रम (पुं)
आचारः. (1) - धर्म (पुं)नीतिः. (1) - धर्म (पुं)पुण्यम्. (1) - धर्म (पुं)सोमयाजिः. (1) - धर्म (पुं)स्वभावः. (1) - धर्म (पुं)यमः. (1) - धर्म (पुं)
 धर्माः पुण्ययमन्यायस्वभावाचारसोमपाः ॥ ३.३.६३८ ॥
आचारः. (1) - धर्म (पुं)नीतिः. (1) - धर्म (पुं)पुण्यम्. (1) - धर्म (पुं)सोमयाजिः. (1) - धर्म (पुं)स्वभावः. (1) - धर्म (पुं)यमः. (1) - धर्म (पुं)
उपधा. (1) - उपक्रम (पुं)उपायपूर्वारम्भः. (1) - उपक्रम (पुं)
 उपायपूर्व आरम्भ उपधा चाप्युपक्रमः ॥ ३.३.६३९ ॥
उपधा. (1) - उपक्रम (पुं)उपायपूर्वारम्भः. (1) - उपक्रम (पुं)
मूलनगरादन्यनगरम्. (1) - निगम (पुं)वणिक्पथः. (1) - निगम (पुं)वेदः. (1) - निगम (पुं)
 वणिक्पथः पुरं वेदो निगमा नागरो वणिक् ॥ ३.३.६४० ॥
मूलनगरादन्यनगरम्. (1) - निगम (पुं)वणिक्पथः. (1) - निगम (पुं)वेदः. (1) - निगम (पुं)
नागरः. (1) - नैगम (पुं)कृष्णवर्णः. (1) - राम (वि)मनोरमम्. (1) - राम (वि)शुक्लवर्णयुक्तः. (1) - राम (वि)
 नैगमौ द्वौ बले रामो नीलचारुसिते त्रिषु ॥ ३.३.६४१ ॥
नागरः. (1) - नैगम (पुं)कृष्णवर्णः. (1) - राम (वि)मनोरमम्. (1) - राम (वि)शुक्लवर्णयुक्तः. (1) - राम (वि)
ग्रामशब्दादिः. (1) - ग्राम (पुं)समूहः. (1) - ग्राम (पुं)क्रान्तिः. (1) - विक्रम (पुं)
 शब्दादिपूर्वो वृन्देऽपि ग्रामः क्रान्तौ च विक्रमः ॥ ३.३.६४२ ॥
ग्रामशब्दादिः. (1) - ग्राम (पुं)समूहः. (1) - ग्राम (पुं)क्रान्तिः. (1) - विक्रम (पुं)
स्तुतिः. (1) - स्तोम (पुं)यज्ञः. (1) - स्तोम (पुं)अलसः. (1) - जिह्म (पुं)कुटिलः. (1) - जिह्म (पुं)
 स्तोमः स्तोत्रेऽध्वरे वृन्दे जिह्वास्तु कुतिलेऽलसे ॥ ३.३.६४३ ॥
स्तुतिः. (1) - स्तोम (पुं)यज्ञः. (1) - स्तोम (पुं)अलसः. (1) - जिह्म (पुं)कुटिलः. (1) - जिह्म (पुं)
धर्मः. (1) - उष्ण (पुं)चेष्टा. (1) - उष्ण (पुं)अलङ्कारः. (1) - उष्ण (पुं)अतस्मित्तज्ज्ञानम्. (1) - विभ्रम (पुं)
 उष्णेऽपि घर्मश्चेष्टालङ्कारे भ्रान्तौ च विभ्रमः ॥ ३.३.६४४ ॥
धर्मः. (1) - उष्ण (पुं)चेष्टा. (1) - उष्ण (पुं)अलङ्कारः. (1) - उष्ण (पुं)अतस्मित्तज्ज्ञानम्. (1) - विभ्रम (पुं)
गुल्मरोगः. (1) - गुल्म (पुं)तरुमूलम्. (1) - गुल्म (पुं)भगिनी. (1) - जामि (स्त्री)दोषवारणकृतकुलरक्षास्त्री. (1) - जामि (स्त्री)
 गुल्मा रुक्स्तम्बसेनाश्च जामिः स्वसृकुलस्त्रियोः ॥ ३.३.६४५ ॥
गुल्मरोगः. (1) - गुल्म (पुं)तरुमूलम्. (1) - गुल्म (पुं)भगिनी. (1) - जामि (स्त्री)दोषवारणकृतकुलरक्षास्त्री. (1) - जामि (स्त्री)
क्षमा. (1) - क्षमा (स्त्री)हितम्. (1) - क्षम (वि)सक्तम्. (1) - क्षम (वि)युक्तम्. (1) - क्षम (वि)
 क्षितिक्षान्त्योः क्षमा युक्ते क्षमं शक्ते हिते त्रिषु ॥ ३.३.६४६ ॥
क्षमा. (1) - क्षमा (स्त्री)हितम्. (1) - क्षम (वि)सक्तम्. (1) - क्षम (वि)युक्तम्. (1) - क्षम (वि)
हरितवर्णः. (1) - श्याम (वि)रात्रिः. (1) - श्यामा (स्त्री)
 त्रिषु श्यामौ हरित्कृष्णौ श्यामा स्याच्छारिवा निशा ॥ ३.३.६४७ ॥
हरितवर्णः. (1) - श्याम (वि)रात्रिः. (1) - श्यामा (स्त्री)
पुच्छम्. (1) - ललाम (नपुं)पुण्ड्रम्. (1) - ललाम (नपुं)अश्वभूषा. (1) - ललाम (नपुं)प्राधान्यम्. (1) - ललाम (नपुं)पताका. (1) - ललाम (नपुं)
 ललामं पुच्छपुण्ड्राश्वभूषाप्राधान्यकेतुषु ॥ ३.३.६४८ ॥
पुच्छम्. (1) - ललाम (नपुं)पुण्ड्रम्. (1) - ललाम (नपुं)अश्वभूषा. (1) - ललाम (नपुं)प्राधान्यम्. (1) - ललाम (नपुं)पताका. (1) - ललाम (नपुं)
अध्यात्मम्. (1) - सूक्ष्म (नपुं)प्रधानम्. (1) - प्रथम (वि)
 सूक्ष्ममध्यात्ममप्याद्ये प्रधाने प्रथमस्त्रिषु ॥ ३.३.६४९ ॥
अध्यात्मम्. (1) - सूक्ष्म (नपुं)प्रधानम्. (1) - प्रथम (वि)
प्रतिकूलम्. (1) - वाम (वि)सुन्दरम्. (1) - वाम (वि)न्यूनम्. (1) - अधम (वि)
 वामौ वल्गुप्रतीपौ द्वावधमौ न्यूनकुत्सितौ ॥ ३.३.६५० ॥
प्रतिकूलम्. (1) - वाम (वि)सुन्दरम्. (1) - वाम (वि)न्यूनम्. (1) - अधम (वि)
जीर्णम्. (1) - यातयाम (वि)परिभुक्तम्. (1) - यातयाम (वि)
 जीर्णं च परिभुक्तं च यातयाममिदं द्वयम् ॥ ३.३.६५१ ॥
जीर्णम्. (1) - यातयाम (वि)परिभुक्तम्. (1) - यातयाम (वि)
 ॥ । इति गान्ताः ॥
अश्वः. (1) - तार्क्ष्य (पुं)गृहम्. (1) - क्षय (पुं)
 तुरङ्गगरुडौ तार्क्ष्यौ निलयापचयौ क्षयौ ॥ ३.३.६५२ ॥
अश्वः. (1) - तार्क्ष्य (पुं)गृहम्. (1) - क्षय (पुं)
पत्युः कनिष्ठभ्राता. (1) - श्वशुर्य (पुं)पत्नीभ्राता. (1) - श्वशुर्य (पुं)भ्रातृपुत्रः. (1) - भ्रातृव्य (पुं)शत्रुः. (1) - भ्रातृव्य (पुं)
 श्वशुर्यौ देवरश्यालौ भ्रातृव्यौ भ्रातृजद्विषौ ॥ ३.३.६५३ ॥
पत्युः कनिष्ठभ्राता. (1) - श्वशुर्य (पुं)पत्नीभ्राता. (1) - श्वशुर्य (पुं)भ्रातृपुत्रः. (1) - भ्रातृव्य (पुं)शत्रुः. (1) - भ्रातृव्य (पुं)
रसदब्दः. (1) - पर्जन्य (पुं)इन्द्रः. (1) - पर्जन्य (पुं)स्वामिः. (1) - अर्य (पुं)
 पर्जन्यौ रसदब्देन्द्रौ स्यादर्यः स्वामिवैश्ययोः ॥ ३.३.६५४ ॥
रसदब्दः. (1) - पर्जन्य (पुं)इन्द्रः. (1) - पर्जन्य (पुं)स्वामिः. (1) - अर्य (पुं)
पुष्य-नक्षत्रम्. (1) - तिष्य (पुं)कलियुगम्. (1) - तिष्य (पुं)अवसरः. (1) - पर्याय (पुं)
 तिष्यः पुष्ये कलियुगे पर्यायोऽवसरे क्रमे ॥ ३.३.६५५ ॥
पुष्य-नक्षत्रम्. (1) - तिष्य (पुं)कलियुगम्. (1) - तिष्य (पुं)अवसरः. (1) - पर्याय (पुं)
अधीनः. (1) - प्रत्यय (पुं)ज्ञानम्. (1) - प्रत्यय (पुं)कारणम्. (1) - प्रत्यय (पुं)रन्ध्रम्. (1) - प्रत्यय (पुं)शब्दः. (1) - प्रत्यय (पुं)शपथः. (1) - प्रत्यय (पुं)विश्वासः. (1) - प्रत्यय (पुं)
 प्रत्ययोऽधीन शपथज्ञानविश्वासहेतुषु ॥ ३.३.६५६ ॥
अधीनः. (1) - प्रत्यय (पुं)ज्ञानम्. (1) - प्रत्यय (पुं)कारणम्. (1) - प्रत्यय (पुं)रन्ध्रम्. (1) - प्रत्यय (पुं)शब्दः. (1) - प्रत्यय (पुं)शपथः. (1) - प्रत्यय (पुं)विश्वासः. (1) - प्रत्यय (पुं)
दीर्घद्वेषः. (1) - अनुशय (पुं)पश्चात्तापः. (1) - अनुशय (पुं)
 रन्ध्रे शब्देऽथानुशयो दीर्घद्वेषानुतापयोः ॥ ३.३.६५७ ॥
दीर्घद्वेषः. (1) - अनुशय (पुं)पश्चात्तापः. (1) - अनुशय (पुं)
असाकल्यम्. (1) - स्थूलोच्चय (पुं)गजानां मध्ये गतः. (1) - स्थूलोच्चय (पुं)
 स्थूलोच्चयस्त्वसाकल्ये नागानां मध्यमे गते ॥ ३.३.६५८ ॥
असाकल्यम्. (1) - स्थूलोच्चय (पुं)गजानां मध्ये गतः. (1) - स्थूलोच्चय (पुं)
आचारः. (1) - समय (पुं)कालः. (1) - समय (पुं)सम्भाषणम्. (1) - समय (पुं)शपथः. (1) - समय (पुं)सिद्धान्तः. (1) - समय (पुं)
 समयाः शपथाचारकालसिद्धान्तसंविदः ॥ ३.३.६५९ ॥
आचारः. (1) - समय (पुं)कालः. (1) - समय (पुं)सम्भाषणम्. (1) - समय (पुं)शपथः. (1) - समय (पुं)सिद्धान्तः. (1) - समय (पुं)
अशुभम्. (1) - अनय (पुं)प्राक्तनशुभाशुभकर्मः. (1) - अनय (पुं)विपत्. (1) - अनय (पुं)व्यसनम्. (1) - अनय (पुं)
 व्यसनान्यशुभं दैवं विपदित्यनयास्त्रयः ॥ ३.३.६६० ॥
अशुभम्. (1) - अनय (पुं)प्राक्तनशुभाशुभकर्मः. (1) - अनय (पुं)विपत्. (1) - अनय (पुं)व्यसनम्. (1) - अनय (पुं)
अतिक्रमः. (1) - अत्यय (पुं)दण्डः. (1) - अत्यय (पुं)दोषः. (1) - अत्यय (पुं)दुःखम्. (1) - अत्यय (पुं)
 अत्ययोऽतिक्रमे कृच्छ्रे दोषे दण्डेऽप्यथापदि ॥ ३.३.६६१ ॥
अतिक्रमः. (1) - अत्यय (पुं)दण्डः. (1) - अत्यय (पुं)दोषः. (1) - अत्यय (पुं)दुःखम्. (1) - अत्यय (पुं)
आयतिः. (1) - सम्पराय (पुं)विपत्. (1) - सम्पराय (पुं)युद्धम्. (1) - सम्पराय (पुं)पत्युर्वा पत्न्याः वा पिता. (1) - पूज्य (पुं)
 युद्धायत्योः संपरायः पूज्यस्तु श्वशुरेऽपि च ॥ ३.३.६६२ ॥
आयतिः. (1) - सम्पराय (पुं)विपत्. (1) - सम्पराय (पुं)युद्धम्. (1) - सम्पराय (पुं)पत्युर्वा पत्न्याः वा पिता. (1) - पूज्य (पुं)
पश्चादवस्थायिबलम्. (1) - सन्नय (पुं)समूहः. (1) - सन्नय (पुं)
 पस्चादवस्थायि बलं समवायश्च सन्नयौ ॥ ३.३.६६३ ॥
पश्चादवस्थायिबलम्. (1) - सन्नय (पुं)समूहः. (1) - सन्नय (पुं)
सन्निवेशः. (1) - संस्त्याय (पुं)समूहः. (1) - संस्त्याय (पुं)स्नेहः. (1) - प्रणय (पुं)विश्रम्भः. (1) - प्रणय (पुं)याचनम्. (1) - प्रणय (पुं)
 संघाते संनिवेशे च संस्त्यायः प्रणयास्त्वमी ॥ ३.३.६६४ ॥
सन्निवेशः. (1) - संस्त्याय (पुं)समूहः. (1) - संस्त्याय (पुं)स्नेहः. (1) - प्रणय (पुं)विश्रम्भः. (1) - प्रणय (पुं)याचनम्. (1) - प्रणय (पुं)
विरोधः. (1) - समुच्छ्रय (पुं)
 विस्रम्भयाञ्चाप्रेमाणो विरोधेऽपि समुच्छ्रयः ॥ ३.३.६६५ ॥
विरोधः. (1) - समुच्छ्रय (पुं)
शब्दादीन्द्रियम्. (1) - विषय (पुं)यस्य यत् ज्ञातः तत्. (1) - विषय (पुं)
 विषयो यस्य यो ज्ञातस्तत्र शब्दादिकेष्वपि ॥ ३.३.६६६ ॥
शब्दादीन्द्रियम्. (1) - विषय (पुं)यस्य यत् ज्ञातः तत्. (1) - विषय (पुं)
निर्यासः. (1) - कषाय (पुं-नपुं)सभा. (1) - प्रतिश्रय (पुं)
 निर्यासेऽपि कषायो स्त्री सभायां च प्रतिश्रयः ॥ ३.३.६६७ ॥
निर्यासः. (1) - कषाय (पुं-नपुं)सभा. (1) - प्रतिश्रय (पुं)
भूम्नि. (1) - प्राय (पुं)अन्तगमनम्. (1) - प्राय (पुं)कोपः. (1) - मन्यु (पुं)
 प्रायो भूम्न्यन्तगमने मन्युर्दैन्ये क्रतौ क्रुधि ॥ ३.३.६६८ ॥
भूम्नि. (1) - प्राय (पुं)अन्तगमनम्. (1) - प्राय (पुं)कोपः. (1) - मन्यु (पुं)
रहस्यम्. (1) - गुह्य (नपुं)भगशिश्नः. (1) - गुह्य (नपुं)शपथः. (1) - सत्य (वि)तथ्यम्. (1) - सत्य (वि)
 रहस्योपस्थयोर्गुह्यं सत्यं शपथतथ्ययोः ॥ ३.३.६६९ ॥
रहस्यम्. (1) - गुह्य (नपुं)भगशिश्नः. (1) - गुह्य (नपुं)शपथः. (1) - सत्य (वि)तथ्यम्. (1) - सत्य (वि)
बलम्. (1) - वीर्य (नपुं)प्रभावः. (1) - वीर्य (नपुं)शुभम्. (1) - द्रव्य (नपुं)गुणाश्रयम्. (1) - द्रव्य (नपुं)
 वीर्यं बले प्रभावे च द्रव्यं भव्ये गुणाश्रये ॥ ३.३.६७० ॥
बलम्. (1) - वीर्य (नपुं)प्रभावः. (1) - वीर्य (नपुं)शुभम्. (1) - द्रव्य (नपुं)गुणाश्रयम्. (1) - द्रव्य (नपुं)
अग्निः. (1) - धिष्ण्य (वि)गृहम्. (1) - धिष्ण्य (वि)नक्षत्रम्. (1) - धिष्ण्य (वि)स्थानम्. (1) - धिष्ण्य (वि)
 धिष्ण्यं स्थाने गृहे भेऽग्नौ भाग्यं कर्म शुभाशुभम् ॥ ३.३.६७१ ॥
अग्निः. (1) - धिष्ण्य (वि)गृहम्. (1) - धिष्ण्य (वि)नक्षत्रम्. (1) - धिष्ण्य (वि)स्थानम्. (1) - धिष्ण्य (वि)
कशेरुः. (1) - गाङ्गेय (नपुं)दन्तिका. (1) - विशल्या (स्त्री)
 कशेरु हेम्नोर्गाङ्गेयं विशल्या दन्तिकापि च ॥ ३.३.६७२ ॥
कशेरुः. (1) - गाङ्गेय (नपुं)दन्तिका. (1) - विशल्या (स्त्री)
लक्ष्मी. (1) - वृषाकपायी (स्त्री)पार्वती. (1) - वृषाकपायी (स्त्री)नाम. (1) - अभिख्या (स्त्री)शोभा. (1) - अभिख्या (स्त्री)
 वृषाकपायी श्रीगौर्योरभिज्ञा नामशोभयोः ॥ ३.३.६७३ ॥
लक्ष्मी. (1) - वृषाकपायी (स्त्री)पार्वती. (1) - वृषाकपायी (स्त्री)नाम. (1) - अभिख्या (स्त्री)शोभा. (1) - अभिख्या (स्त्री)
 आरम्भो निष्कृतिः शिक्षा पूजनं संप्रधारणम् ॥ ३.३.६७४ ॥
आरम्भः. (1) - क्रिया (स्त्री)चेष्टा. (1) - क्रिया (स्त्री)निष्कृतिः. (1) - क्रिया (स्त्री)शिक्षा. (1) - क्रिया (स्त्री)पूजनम्. (1) - क्रिया (स्त्री)सम्प्रधारणम्. (1) - क्रिया (स्त्री)उपायः. (1) - क्रिया (स्त्री)कर्मम्. (1) - क्रिया (स्त्री)रोगनिवारणः. (1) - क्रिया (स्त्री)
 उपायः कर्म चेष्टा च चिकित्सा च नव क्रियाः ॥ ३.३.६७५ ॥
आरम्भः. (1) - क्रिया (स्त्री)चेष्टा. (1) - क्रिया (स्त्री)निष्कृतिः. (1) - क्रिया (स्त्री)शिक्षा. (1) - क्रिया (स्त्री)पूजनम्. (1) - क्रिया (स्त्री)सम्प्रधारणम्. (1) - क्रिया (स्त्री)उपायः. (1) - क्रिया (स्त्री)कर्मम्. (1) - क्रिया (स्त्री)रोगनिवारणः. (1) - क्रिया (स्त्री)
अनातपः. (1) - छाया (स्त्री)प्रतिमा. (1) - छाया (स्त्री)शोभा. (1) - छाया (स्त्री)सूर्यपत्नी. (1) - छाया (स्त्री)
 छाया सूर्यप्रिया कान्तिः प्रतिबिम्बमनातपः ॥ ३.३.६७६ ॥
अनातपः. (1) - छाया (स्त्री)प्रतिमा. (1) - छाया (स्त्री)शोभा. (1) - छाया (स्त्री)सूर्यपत्नी. (1) - छाया (स्त्री)
हर्म्यादेः प्रकोष्ठम्. (1) - कक्ष्या (स्त्री)स्त्रीकटीभूषणम्. (1) - कक्ष्या (स्त्री)
 कक्ष्या प्रकोष्ठे हर्म्यादेः काञ्च्यां मध्येभबन्धने ॥ ३.३.६७७ ॥
हर्म्यादेः प्रकोष्ठम्. (1) - कक्ष्या (स्त्री)स्त्रीकटीभूषणम्. (1) - कक्ष्या (स्त्री)
क्रिया. (1) - कृत्या (स्त्री)देवता. (1) - कृत्या (स्त्री)धनादिभिः भेद्यम्. (1) - कृत्या (वि)
 कृत्या क्रियादेवतयोस्त्रिषु भेद्ये धनादिभिः ॥ ३.३.६७८ ॥
क्रिया. (1) - कृत्या (स्त्री)देवता. (1) - कृत्या (स्त्री)धनादिभिः भेद्यम्. (1) - कृत्या (वि)
जनवादः. (1) - जन्य (वि)अधमम्. (1) - जघन्य (वि)
 जन्यः स्याज्जनवादेऽपि जघन्योऽन्त्येऽधमेऽपि च ॥ ३.३.६७९ ॥
जनवादः. (1) - जन्य (वि)अधमम्. (1) - जघन्य (वि)
गर्ह्यः. (1) - वक्तव्य (वि)अधीनः. (1) - वक्तव्य (वि)सज्जः. (1) - कल्य (नपुं)
 गर्ह्याधीनौ च वक्तव्यौ कल्यौ सज्जनिरामयौ ॥ ३.३.६८० ॥
गर्ह्यः. (1) - वक्तव्य (वि)अधीनः. (1) - वक्तव्य (वि)सज्जः. (1) - कल्य (नपुं)
अर्थादनपेतः. (1) - अर्थ्य (वि)आत्मवान्. (1) - अर्थ्य (वि)मनोरमम्. (1) - पुण्य (वि)
 आत्मवाननपेतोऽर्थादर्थ्यौ पुण्यं तु चार्वपि ॥ ३.३.६८१ ॥
अर्थादनपेतः. (1) - अर्थ्य (वि)आत्मवान्. (1) - अर्थ्य (वि)मनोरमम्. (1) - पुण्य (वि)
प्रशस्तम्. (1) - रूप्य (नपुं)रूप्यकम्. (1) - रूप्य (नपुं)वल्गुवाक्. (1) - वदान्य (वि)
 रूप्यं प्रशस्तरूपेऽपि वदान्यो वल्गुवागपि ॥ ३.३.६८२ ॥
प्रशस्तम्. (1) - रूप्य (नपुं)रूप्यकम्. (1) - रूप्य (नपुं)वल्गुवाक्. (1) - वदान्य (वि)
न्याय्यम्. (1) - मध्य (वि)सोमदैवतम्. (1) - सौम्य (वि)सुन्दरम्. (1) - सौम्य (वि)
 न्याय्येऽपि मध्यं सौम्यं तु सुन्दरे सोमदैवते ॥ ३.३.६८३ ॥
न्याय्यम्. (1) - मध्य (वि)सोमदैवतम्. (1) - सौम्य (वि)सुन्दरम्. (1) - सौम्य (वि)
 ॥ । इति यान्ताः ॥
अवसरः. (1) - वार (पुं)प्रस्तरम्. (1) - संस्तर (पुं)यज्ञः. (1) - संस्तर (पुं)
 निवहावसरौ वारौ संस्तरौ प्रस्तराध्वरौ ॥ ३.३.६८४ ॥
अवसरः. (1) - वार (पुं)प्रस्तरम्. (1) - संस्तर (पुं)यज्ञः. (1) - संस्तर (पुं)
द्वापरयुगम्. (1) - द्वापर (पुं)संशयः. (1) - द्वापर (पुं)
 गुरू गोष्पतिपित्राद्यौ द्वापरौ युगसंशयौ ॥ ३.३.६८५ ॥
द्वापरयुगम्. (1) - द्वापर (पुं)संशयः. (1) - द्वापर (पुं)
भेदः. (1) - प्रकार (पुं)सादृश्यम्. (1) - प्रकार (पुं)आकृतिः. (1) - आकार (पुं)
 प्रकारौ भेदसादृश्ये आकाराविङ्गिताकृती ॥ ३.३.६८६ ॥
भेदः. (1) - प्रकार (पुं)सादृश्यम्. (1) - प्रकार (पुं)आकृतिः. (1) - आकार (पुं)
बाणः. (1) - किंशारु (पुं)पर्वतः. (1) - मरु (पुं)
 किंशारू धान्यशूकेषु मरू धन्वधराधरौ ॥ ३.३.६८७ ॥
बाणः. (1) - किंशारु (पुं)पर्वतः. (1) - मरु (पुं)
वृक्षः. (1) - अद्रि (पुं)सूर्यः. (1) - अद्रि (पुं)स्त्रीस्तनम्. (1) - पयोधर (पुं)मेघः. (1) - पयोधर (पुं)
 अद्रयो द्रुमशैलार्काः स्त्रीस्तनाब्दौ पयोधरौ ॥ ३.३.६८८ ॥
वृक्षः. (1) - अद्रि (पुं)सूर्यः. (1) - अद्रि (पुं)स्त्रीस्तनम्. (1) - पयोधर (पुं)मेघः. (1) - पयोधर (पुं)
अन्धकारः. (1) - वृत्र (पुं)शत्रुः. (1) - वृत्र (पुं)वृत्रासुरः. (1) - वृत्र (पुं)हस्तः. (1) - कर (पुं)
 ध्वान्तारिदानवा वृत्रा बलिहस्तांशवः कराः ॥ ३.३.६८९ ॥
अन्धकारः. (1) - वृत्र (पुं)शत्रुः. (1) - वृत्र (पुं)वृत्रासुरः. (1) - वृत्र (पुं)हस्तः. (1) - कर (पुं)
भङ्गः. (1) - प्रदर (पुं)बाणः. (1) - प्रदर (पुं)नारीरोगः. (1) - प्रदर (पुं)केशः. (1) - अस्र (पुं)
 प्रदरा भङ्गनारीरुक्बाणा अस्राः कचा अपि ॥ ३.३.६९० ॥
भङ्गः. (1) - प्रदर (पुं)बाणः. (1) - प्रदर (पुं)नारीरोगः. (1) - प्रदर (पुं)केशः. (1) - अस्र (पुं)
अजातशृङ्गगौः. (1) - तूवर (पुं)कालेप्यश्मश्रुः पुरुषः. (1) - तूवर (पुं)
 अजातशृङ्गो गौः कालेऽप्यश्मश्रुर्ना च तूबरौ ॥ ३.३.६९१ ॥
अजातशृङ्गगौः. (1) - तूवर (पुं)कालेप्यश्मश्रुः पुरुषः. (1) - तूवर (पुं)
सुवर्णम्. (1) - रै (पुं)पर्यङ्कः. (1) - परिकर (पुं)परिवारः. (1) - परिकर (पुं)
 स्वर्णेऽपि राः परिकरः पर्यङ्कपरिवारयोः ॥ ३.३.६९२ ॥
सुवर्णम्. (1) - रै (पुं)पर्यङ्कः. (1) - परिकर (पुं)परिवारः. (1) - परिकर (पुं)
मुक्ताशुद्धिः. (1) - तार (पुं)वायुः. (1) - शार (पुं)नानावर्णाः. (1) - शार (वि)
 मुक्ताशुद्धौ च तारः स्याच्छारो वायौ स तु त्रिषु ॥ ३.३.६९३ ॥
मुक्ताशुद्धिः. (1) - तार (पुं)वायुः. (1) - शार (पुं)नानावर्णाः. (1) - शार (वि)
क्रियाकारः. (1) - सङ्गर (पुं)प्रतिज्ञा. (1) - सङ्गर (पुं)विपत्. (1) - सङ्गर (पुं)युद्धम्. (1) - सङ्गर (पुं)
 कर्बुरेऽथ प्रतिज्ञाजिसंविदापत्सु संगरः ॥ ३.३.६९४ ॥
क्रियाकारः. (1) - सङ्गर (पुं)प्रतिज्ञा. (1) - सङ्गर (पुं)विपत्. (1) - सङ्गर (पुं)युद्धम्. (1) - सङ्गर (पुं)
वेदभेदः. (1) - मन्त्र (पुं)गुप्तिवादः. (1) - मन्त्र (पुं)
 वेदभेदे गुप्तवादे मन्त्रो मित्रो रवावपि ॥ ३.३.६९५ ॥
वेदभेदः. (1) - मन्त्र (पुं)गुप्तिवादः. (1) - मन्त्र (पुं)
बाणः. (1) - स्वरु (पुं)यज्ञः. (1) - स्वरु (पुं)यूपखण्डः. (1) - स्वरु (पुं)गुह्यम्. (1) - अवस्कर (पुं)
 मखेषु यूपखण्डेऽपि स्वरुर्गुह्येऽप्यवस्करः ॥ ३.३.६९६ ॥
बाणः. (1) - स्वरु (पुं)यज्ञः. (1) - स्वरु (पुं)यूपखण्डः. (1) - स्वरु (पुं)गुह्यम्. (1) - अवस्कर (पुं)
हस्तिगर्जनम्. (1) - आडम्बर (पुं)
 आडम्बरस्तूर्यरवे गजेन्द्राणां च गर्जिते ॥ ३.३.६९७ ॥
हस्तिगर्जनम्. (1) - आडम्बर (पुं)
चोरकर्मः. (1) - अभिहार (पुं)कलहाह्वानम्. (1) - अभिहार (पुं)सन्नहनम्. (1) - अभिहार (पुं)
 अभिहारोऽभियोगे च चौर्ये संनहनेऽपि च ॥ ३.३.६९८ ॥
चोरकर्मः. (1) - अभिहार (पुं)कलहाह्वानम्. (1) - अभिहार (पुं)सन्नहनम्. (1) - अभिहार (पुं)
खड्गपिधानम्. (1) - परीवार (पुं)परिच्छदः. (1) - परीवार (पुं)परिजनः. (1) - परीवार (पुं)
 स्याज्जङ्गमे परीवारः खड्गकोशे परिच्छदे ॥ ३.३.६९९ ॥
खड्गपिधानम्. (1) - परीवार (पुं)परिच्छदः. (1) - परीवार (पुं)परिजनः. (1) - परीवार (पुं)
पीठाद्यासनम्. (1) - विष्टर (पुं)वृक्षः. (1) - विष्टर (पुं)दर्भमुष्टिः. (1) - विष्टर (पुं)
 विष्टरो विटपी दर्भमुष्टिः पीठाद्यमासनम् ॥ ३.३.७०० ॥
पीठाद्यासनम्. (1) - विष्टर (पुं)वृक्षः. (1) - विष्टर (पुं)दर्भमुष्टिः. (1) - विष्टर (पुं)
द्वारस्था योषित्. (1) - प्रतीहारी (स्त्री)
 द्वारि द्वाः स्थे प्रतीहारः प्रतीहार्यप्यनन्तरे ॥ ३.३.७०१ ॥
द्वारस्था योषित्. (1) - प्रतीहारी (स्त्री)
विपुलनकुलः. (1) - बभ्रु (पुं)विष्णुः. (1) - बभ्रु (पुं)कपिलवर्णः. (1) - बभ्रु (वि)
 विपुले नकुले विष्णौ बभ्रुर्ना पिङ्गले त्रिषु ॥ ३.३.७०२ ॥
विपुलनकुलः. (1) - बभ्रु (पुं)विष्णुः. (1) - बभ्रु (पुं)कपिलवर्णः. (1) - बभ्रु (वि)
बलम्. (1) - सार (पुं)स्थिरांशः. (1) - सार (पुं)न्याय्यम्. (1) - सार (नपुं)वरः. (1) - सार (वि)
 सारो बले स्थिरांशे च न्याय्ये क्लीबं वरे त्रिषु ॥ ३.३.७०३ ॥
बलम्. (1) - सार (पुं)स्थिरांशः. (1) - सार (पुं)न्याय्यम्. (1) - सार (नपुं)वरः. (1) - सार (वि)
द्यूतकृत्. (1) - दुरोदर (पुं)द्यूते लाप्यमानः. (1) - दुरोदर (पुं)द्यूतक्रीडनम्. (1) - दुरोदर (नपुं)दुरोदरो द्यूतकारे पणे द्यूते दुरोदरम्
 दुरोदरो द्यूतकारे पणे द्यूते दुरोदरम् ॥ ३.३.७०४ ॥
द्यूतकृत्. (1) - दुरोदर (पुं)द्यूते लाप्यमानः. (1) - दुरोदर (पुं)द्यूतक्रीडनम्. (1) - दुरोदर (नपुं)दुरोदरो द्यूतकारे पणे द्यूते दुरोदरम्
महावनम्. (1) - कान्तार (पुं-नपुं)
 महारण्ये दुर्गपथे कान्तारं पुन्नपुंसकम् ॥ ३.३.७०५ ॥
महावनम्. (1) - कान्तार (पुं-नपुं)
अन्यशुभद्वेषः. (1) - मत्सर (पुं)अन्यशुभद्वेषबुद्धिः. (1) - मत्सर (वि)कृपणः. (1) - मत्सर (वि)
 मत्सरोऽन्यशुभद्वेषे तद्वत्कृपणयोस्त्रिषु ॥ ३.३.७०६ ॥
अन्यशुभद्वेषः. (1) - मत्सर (पुं)अन्यशुभद्वेषबुद्धिः. (1) - मत्सर (वि)कृपणः. (1) - मत्सर (वि)
देवाद्वृतः. (1) - वर (पुं)मनाक्प्रियः. (1) - वर (नपुं)श्रेष्ठः. (1) - वर (वि)
 देवाद्वृते वरः श्रेष्ठे त्रिषु क्लीबं मनाक्प्रिये ॥ ३.३.७०७ ॥
देवाद्वृतः. (1) - वर (पुं)मनाक्प्रियः. (1) - वर (नपुं)श्रेष्ठः. (1) - वर (वि)
घटः. (1) - करीर (पुं)वंशाङ्कुरः. (1) - करीर (पुं-नपुं)
 वंशाङ्कुरे करीरोऽस्त्री तरुभेदे घटे च ना ॥ ३.३.७०८ ॥
घटः. (1) - करीर (पुं)वंशाङ्कुरः. (1) - करीर (पुं-नपुं)
चमूजघनः. (1) - प्रतिसर (पुं)हस्तसूत्रम्. (1) - प्रतिसर (पुं-नपुं)
 ना चमूजघने हस्तसूत्रे प्रतिसरोऽस्त्रियाम् ॥ ३.३.७०९ ॥
चमूजघनः. (1) - प्रतिसर (पुं)हस्तसूत्रम्. (1) - प्रतिसर (पुं-नपुं)
 यमानिलेन्द्रचन्द्रार्कविष्णुसिंहांशुवाजिषु ॥ ३.३.७१० ॥
विष्णुः. (1) - हरि (पुं)सूर्यः. (1) - हरि (पुं)चन्द्रः. (1) - हरि (पुं)वायुः. (1) - हरि (पुं)यमः. (1) - हरि (पुं)इन्द्रः. (1) - हरि (पुं)किरणः. (1) - हरि (पुं)अश्वः. (1) - हरि (पुं)शुकः. (1) - हरि (पुं)वानरः. (1) - हरि (पुं)मण्डूकः. (1) - हरि (पुं)कपिलवर्णः. (1) - हरि (वि)
 शुकाहिकपिभेकेषु हरिर्ना कपिले त्रिषु ॥ ३.३.७११ ॥
विष्णुः. (1) - हरि (पुं)सूर्यः. (1) - हरि (पुं)चन्द्रः. (1) - हरि (पुं)वायुः. (1) - हरि (पुं)यमः. (1) - हरि (पुं)इन्द्रः. (1) - हरि (पुं)किरणः. (1) - हरि (पुं)अश्वः. (1) - हरि (पुं)शुकः. (1) - हरि (पुं)वानरः. (1) - हरि (पुं)मण्डूकः. (1) - हरि (पुं)कपिलवर्णः. (1) - हरि (वि)
कर्परांशः. (1) - शर्करा (स्त्री)गतिः. (1) - यात्रा (स्त्री)यापनम्. (1) - यात्रा (स्त्री)
 शर्करा कर्परांशेऽपि यात्रा स्याद्यापने गतौ ॥ ३.३.७१२ ॥
कर्परांशः. (1) - शर्करा (स्त्री)गतिः. (1) - यात्रा (स्त्री)यापनम्. (1) - यात्रा (स्त्री)
भूमिः. (1) - इरा (स्त्री)वचनम्. (1) - इरा (स्त्री)जलम्. (1) - इरा (स्त्री)निद्रा. (1) - तन्द्रा (स्त्री)
 इरा भूवाक्सुराप्सुस्यात्तन्द्री निद्राप्रमीलयोः ॥ ३.३.७१३ ॥
भूमिः. (1) - इरा (स्त्री)वचनम्. (1) - इरा (स्त्री)जलम्. (1) - इरा (स्त्री)निद्रा. (1) - तन्द्रा (स्त्री)
उपमाता. (1) - धात्री (स्त्री)आमलकी. (1) - धात्री (स्त्री)
 धात्री स्यादुपमातापि क्षितिरप्यामलक्यपि ॥ ३.३.७१४ ॥
उपमाता. (1) - धात्री (स्त्री)आमलकी. (1) - धात्री (स्त्री)
मधुमक्षिका. (1) - क्षुद्रा (स्त्री)नटी. (1) - क्षुद्रा (स्त्री)वेश्या. (1) - क्षुद्रा (स्त्री)व्यङ्गा. (1) - क्षुद्रा (स्त्री)
 क्षुद्रा व्यङ्गा नटी वेश्या सरघा कण्टकारिका ॥ ३.३.७१५ ॥
मधुमक्षिका. (1) - क्षुद्रा (स्त्री)नटी. (1) - क्षुद्रा (स्त्री)वेश्या. (1) - क्षुद्रा (स्त्री)व्यङ्गा. (1) - क्षुद्रा (स्त्री)
अल्पम्. (2) - क्षुद्र (वि), मात्रा (स्त्री)अधमम्. (1) - क्षुद्र (वि)परद्रोहकारी. (1) - क्षुद्र (वि)परिमाणः. (1) - मात्रा (स्त्री)परिवारः. (1) - मात्रा (स्त्री)
 त्रिषु क्रूरेऽधमेऽल्पेऽपि क्षुद्रं मात्रा परिच्छदे ॥ ३.३.७१६ ॥
अल्पम्. (2) - क्षुद्र (वि), मात्रा (स्त्री)अधमम्. (1) - क्षुद्र (वि)परद्रोहकारी. (1) - क्षुद्र (वि)परिमाणः. (1) - मात्रा (स्त्री)परिवारः. (1) - मात्रा (स्त्री)
कार्त्स्न्यम्. (1) - मात्र (नपुं)अवधारणम्. (1) - मात्र (नपुं)
 अल्पे च परिमाणे सा मात्रं कार्त्स्न्येऽवधारणे ॥ ३.३.७१७ ॥
कार्त्स्न्यम्. (1) - मात्र (नपुं)अवधारणम्. (1) - मात्र (नपुं)
आलेख्यम्. (1) - चित्र (नपुं)कटिः. (1) - कलत्र (नपुं)पत्नी. (1) - कलत्र (नपुं)
 आलेख्याश्चर्ययोश्चित्रं कलत्रं श्रोणिभार्ययोः ॥ ३.३.७१८ ॥
आलेख्यम्. (1) - चित्र (नपुं)कटिः. (1) - कलत्र (नपुं)पत्नी. (1) - कलत्र (नपुं)
योग्यः. (1) - पात्र (नपुं)
 योग्यभाजनयोः पात्रं पत्रं वाहनपक्षयोः ॥ ३.३.७१९ ॥
योग्यः. (1) - पात्र (नपुं)
आज्ञा. (1) - शास्त्र (नपुं)ग्रन्थम्. (1) - शास्त्र (नपुं)लोहः. (1) - शस्त्र (नपुं)
 निदेशग्रन्थयोः शास्त्रं शस्त्रमायुधलोहयोः ॥ ३.३.७२० ॥
आज्ञा. (1) - शास्त्र (नपुं)ग्रन्थम्. (1) - शास्त्र (नपुं)लोहः. (1) - शस्त्र (नपुं)
वस्त्रम्. (1) - नेत्र (नपुं)तरुमूलम्. (1) - नेत्र (नपुं)पत्नी. (1) - क्षेत्र (नपुं)देहः. (1) - क्षेत्र (नपुं)
 स्याज्जटांशुकयोर्नेत्रं क्षेत्रं पत्नीशरीरयोः ॥ ३.३.७२१ ॥
वस्त्रम्. (1) - नेत्र (नपुं)तरुमूलम्. (1) - नेत्र (नपुं)पत्नी. (1) - क्षेत्र (नपुं)देहः. (1) - क्षेत्र (नपुं)
वराहमुखाग्रस्थसृङ्गः. (1) - पोत्र (नपुं)हलम्. (1) - पोत्र (नपुं)नाम. (1) - गोत्र (पुं)
 मुखाग्रे क्रोडहलयोः पोत्रं गोत्रं तु नाम्नि च ॥ ३.३.७२२ ॥
वराहमुखाग्रस्थसृङ्गः. (1) - पोत्र (नपुं)हलम्. (1) - पोत्र (नपुं)नाम. (1) - गोत्र (पुं)
आच्छादनम्. (1) - सत्र (नपुं)यज्ञः. (1) - सत्र (नपुं)सदादानम्. (1) - सत्र (नपुं)वनम्. (1) - सत्र (नपुं)
 सत्रमाच्छादने यज्ञे सदादाने वनेऽपि च ॥ ३.३.७२३ ॥
आच्छादनम्. (1) - सत्र (नपुं)यज्ञः. (1) - सत्र (नपुं)सदादानम्. (1) - सत्र (नपुं)वनम्. (1) - सत्र (नपुं)
विषयः. (1) - अजिर (नपुं)देहः. (1) - अजिर (नपुं)वस्त्रम्. (1) - अम्बर (नपुं)
 अजिरं विषये कायेऽप्यंबरं व्योम्नि वाससि ॥ ३.३.७२४ ॥
विषयः. (1) - अजिर (नपुं)देहः. (1) - अजिर (नपुं)वस्त्रम्. (1) - अम्बर (नपुं)
स्वभूमिः. (1) - चक्र (नपुं)मोक्षः. (1) - अक्षर (नपुं)
 चक्रं राष्ट्रेऽप्यक्षरं तु मोक्षेऽपि क्षीरमप्सु च ॥ ३.३.७२५ ॥
स्वभूमिः. (1) - चक्र (नपुं)मोक्षः. (1) - अक्षर (नपुं)
सुवर्णम्. (2) - भूरि (पुं), चन्द्र (पुं)
 स्वर्णेऽपि भूरिचन्द्रौ द्वौ द्वारमात्रेऽपि गोपुरम् ॥ ३.३.७२६ ॥
सुवर्णम्. (2) - भूरि (पुं), चन्द्र (पुं)
कपटः. (1) - गह्वर (नपुं)समीपः. (1) - उपह्वर (नपुं)विजनः. (1) - उपह्वर (नपुं)
 गुहादम्भौ गह्वरे द्वे रहोऽन्तिकमुपह्वरे ॥ ३.३.७२७ ॥
कपटः. (1) - गह्वर (नपुं)समीपः. (1) - उपह्वर (नपुं)विजनः. (1) - उपह्वर (नपुं)
पुरोभागः. (1) - अग्र (नपुं)अधिकम्. (1) - अग्र (नपुं)उपरि. (1) - अग्र (नपुं)गृहम्. (1) - पुर (नपुं)नगरम्. (1) - पुर (नपुं)
 पुरोऽधिकमुपर्यग्राण्यगारे नगरे पुरम् ॥ ३.३.७२८ ॥
पुरोभागः. (1) - अग्र (नपुं)अधिकम्. (1) - अग्र (नपुं)उपरि. (1) - अग्र (नपुं)गृहम्. (1) - पुर (नपुं)नगरम्. (1) - पुर (नपुं)
नगरम्. (1) - मन्दिर (नपुं)विषयः. (1) - राष्ट्र (पुं-नपुं)उपद्रवम्. (1) - राष्ट्र (पुं-नपुं)
 मन्दिरं चाथ राष्ट्रोऽस्त्री विषये स्यादुपद्रवे ॥ ३.३.७२९ ॥
नगरम्. (1) - मन्दिर (नपुं)विषयः. (1) - राष्ट्र (पुं-नपुं)उपद्रवम्. (1) - राष्ट्र (पुं-नपुं)
बिलम्. (1) - दर (पुं-नपुं)हीरकः. (1) - वज्र (पुं-नपुं)
 दरोऽस्त्रियां भये श्वभ्रे वज्रोऽस्त्री हीरके पवौ ॥ ३.३.७३० ॥
बिलम्. (1) - दर (पुं-नपुं)हीरकः. (1) - वज्र (पुं-नपुं)
परिच्छदः. (1) - तन्त्र (नपुं)प्रधानम्. (1) - तन्त्र (नपुं)सिद्धान्तः. (1) - तन्त्र (नपुं)सूत्रवायः. (1) - तन्त्र (नपुं)
 तन्त्रं प्रधाने सिद्धान्ते सूत्रवाये परिच्छदे ॥ ३.३.७३१ ॥
परिच्छदः. (1) - तन्त्र (नपुं)प्रधानम्. (1) - तन्त्र (नपुं)सिद्धान्तः. (1) - तन्त्र (नपुं)सूत्रवायः. (1) - तन्त्र (नपुं)
चामरम्. (1) - औशीर (पुं)दण्डः. (1) - औशीर (पुं)आसनम्. (1) - औशीर (नपुं)शय्या. (1) - औशीर (नपुं)
 औशीरश्चामरे दण्डेऽप्यौशीरं शयनासने ॥ ३.३.७३२ ॥
चामरम्. (1) - औशीर (पुं)दण्डः. (1) - औशीर (पुं)आसनम्. (1) - औशीर (नपुं)शय्या. (1) - औशीर (नपुं)
खड्गफलम्. (1) - पुष्कर (नपुं)शुण्डाग्रभागः. (1) - पुष्कर (नपुं)वाद्यभाण्डमुखम्. (1) - पुष्कर (नपुं)तीर्थविशेषः. (1) - पुष्कर (नपुं)
 पुष्करं करिहस्ताग्रे वाद्यभाण्डमुखे जले ॥ ३.३.७३३ ॥
खड्गफलम्. (1) - पुष्कर (नपुं)शुण्डाग्रभागः. (1) - पुष्कर (नपुं)वाद्यभाण्डमुखम्. (1) - पुष्कर (नपुं)तीर्थविशेषः. (1) - पुष्कर (नपुं)
 व्योम्नि खड्गफले पद्मे तीर्थौषधिविशेषयोः ॥ ३.३.७३४ ॥
अवकाशः. (1) - अन्तर (नपुं)अवधिः. (1) - अन्तर (नपुं)अवसरः. (1) - अन्तर (नपुं)अन्तर्धानम्. (1) - अन्तर (नपुं)अन्तरात्मा. (1) - अन्तर (नपुं)आत्मीयम्. (1) - अन्तर (नपुं)बहिः. (1) - अन्तर (नपुं)बिलम्. (1) - अन्तर (नपुं)भेदः. (1) - अन्तर (नपुं)परिधानम्. (1) - अन्तर (नपुं)तादर्थ्यम्. (1) - अन्तर (नपुं)विना. (1) - अन्तर (नपुं)मध्यम्. (1) - अन्तर (नपुं)
 अन्तरमवकाशावधिपरिधानान्तर्धिभेदतादर्थ्ये ॥ ३.३.७३५ ॥
अवकाशः. (1) - अन्तर (नपुं)अवधिः. (1) - अन्तर (नपुं)अवसरः. (1) - अन्तर (नपुं)अन्तर्धानम्. (1) - अन्तर (नपुं)अन्तरात्मा. (1) - अन्तर (नपुं)आत्मीयम्. (1) - अन्तर (नपुं)बहिः. (1) - अन्तर (नपुं)बिलम्. (1) - अन्तर (नपुं)भेदः. (1) - अन्तर (नपुं)परिधानम्. (1) - अन्तर (नपुं)तादर्थ्यम्. (1) - अन्तर (नपुं)विना. (1) - अन्तर (नपुं)मध्यम्. (1) - अन्तर (नपुं)
मुस्ता. (1) - पिठर (नपुं)राजकशेरुः. (1) - नागर (नपुं)
 छिद्रात्मीयविनाबहिरवसरमध्येऽन्तरात्मनि च ॥ ३.३.७३६ ॥
मुस्ता. (1) - पिठर (नपुं)राजकशेरुः. (1) - नागर (नपुं)
मुस्ता. (1) - पिठर (नपुं)राजकशेरुः. (1) - नागर (नपुं)
 मुस्तेऽपि पिठरं राजकशेरुण्यपि नागरम् ॥ ३.३.७३७ ॥
मुस्ता. (1) - पिठर (नपुं)राजकशेरुः. (1) - नागर (नपुं)
घनान्धकारः. (1) - शार्वर (वि)परद्रोहकारी. (1) - शार्वर (वि)
 शार्वरं त्वन्धतमसे घातुके भेद्यलिङ्गकम् ॥ ३.३.७३८ ॥
घनान्धकारः. (1) - शार्वर (वि)परद्रोहकारी. (1) - शार्वर (वि)
ईषद्रक्तवर्णः. (1) - गौर (वि)व्रणकारिः. (1) - अरुष्कर (वि)
 गौरोऽरुणे सिते पीते व्रणकार्यप्यरुष्करः ॥ ३.३.७३९ ॥
ईषद्रक्तवर्णः. (1) - गौर (वि)व्रणकारिः. (1) - अरुष्कर (वि)
कठिनम्. (1) - जठर (पुं-नपुं)अधस्तात्. (1) - अधर (वि)
 जठरः कठिनेऽपि स्यादधस्तादपि चाधरः ॥ ३.३.७४० ॥
कठिनम्. (1) - जठर (पुं-नपुं)अधस्तात्. (1) - अधर (वि)
अनाकुलः. (1) - एकाग्र (वि)व्यासक्तः. (1) - व्यग्र (वि)आकुलः. (1) - व्यग्र (वि)
 अनाकुलेऽपि चैकाग्रो व्यग्रो व्यासक्त आकुले ॥ ३.३.७४१ ॥
अनाकुलः. (1) - एकाग्र (वि)व्यासक्तः. (1) - व्यग्र (वि)आकुलः. (1) - व्यग्र (वि)
श्रेष्ठः. (2) - उत्तर (वि), अनुत्तर (वि)उपरि. (1) - उत्तर (वि)उत्तरदिक्. (1) - उत्तर (वि)अश्रेष्ठः. (1) - अनुत्तर (वि)अधः. (1) - अनुत्तर (वि)पूर्वदिक्. (1) - अनुत्तर (वि)
 उपरुदीच्यश्रेष्ठेष्वप्युत्तरः स्यादनुत्तरः ॥ ३.३.७४२ ॥
श्रेष्ठः. (2) - उत्तर (वि), अनुत्तर (वि)उपरि. (1) - उत्तर (वि)उत्तरदिक्. (1) - उत्तर (वि)अश्रेष्ठः. (1) - अनुत्तर (वि)अधः. (1) - अनुत्तर (वि)पूर्वदिक्. (1) - अनुत्तर (वि)
अन्यः. (1) - पर (पुं)उत्तमः. (1) - पर (पुं)दूरम्. (1) - पर (पुं)
 एषां विपर्यये श्रेष्ठे दूरानात्मोत्तमाः पराः ॥ ३.३.७४३ ॥
अन्यः. (1) - पर (पुं)उत्तमः. (1) - पर (पुं)दूरम्. (1) - पर (पुं)
मधुरम्. (1) - मधुर (वि)प्रियम्. (1) - मधुर (वि)
 स्वादुप्रियौ च मधुरौ क्रूरौ कठिननिर्दयौ ॥ ३.३.७४४ ॥
मधुरम्. (1) - मधुर (वि)प्रियम्. (1) - मधुर (वि)
महत्. (1) - उदार (वि)धाता. (1) - उदार (वि)अन्यः. (1) - इतर (पुं)नीचः. (1) - इतर (पुं)
 उदारौ दातृमहतोरितरस्त्वन्यनीचयोः ॥ ३.३.७४५ ॥
महत्. (1) - उदार (वि)धाता. (1) - उदार (वि)अन्यः. (1) - इतर (पुं)नीचः. (1) - इतर (पुं)
अलसः. (1) - स्वैर (वि)स्वच्छन्दः. (1) - स्वैर (वि)उद्दीप्तम्. (1) - शुभ्र (वि)
 मन्दस्वच्छन्दयोः स्वैरः शुभ्रमुद्दीप्तशुक्लयोः ॥ ३.३.७४६ ॥
अलसः. (1) - स्वैर (वि)स्वच्छन्दः. (1) - स्वैर (वि)उद्दीप्तम्. (1) - शुभ्र (वि)
 आसारो वेगवद्वर्षे सैन्यप्रसरणं तथा ॥ ३.३.७४७ ॥
 धाराम्बुपाते चोत्कर्षेऽस्त्रौ कटाहे तु कर्परः ॥ ३.३.७४८ ॥
 बन्धुरं सुन्दरे नम्रे गिरिर्गेन्दुकशैलयोः ॥ ३.३.७४९ ॥
 चरुः स्थाल्यां हविः पक्तावधीरः कातरे चले ॥ ३.३.७५० ॥
 ॥ । इति रान्ताः ॥
किरीटम्. (1) - मौलि (वि)संयतकेशः. (1) - मौलि (वि)शिरोमध्यस्थचूडा. (1) - मौलि (वि)
 चूडा किरीटं केशाश्च संयता मौलयस्त्रयः ॥ ३.३.७५१ ॥
किरीटम्. (1) - मौलि (वि)संयतकेशः. (1) - मौलि (वि)शिरोमध्यस्थचूडा. (1) - मौलि (वि)
हस्तिः. (1) - पीलु (पुं)बाणः. (1) - पीलु (पुं)पुष्पम्. (1) - पीलु (पुं)
 द्रुमप्रभेदमातङ्गकाण्डपुष्पाणि पीलवः ॥ ३.३.७५२ ॥
हस्तिः. (1) - पीलु (पुं)बाणः. (1) - पीलु (पुं)पुष्पम्. (1) - पीलु (पुं)
कलियुगम्. (1) - कलि (पुं)
 कृतान्तानेहसोः कालश्चतुर्थेऽपि युगे कलिः ॥ ३.३.७५३ ॥
कलियुगम्. (1) - कलि (पुं)
हरिणः. (1) - कमल (पुं)प्रावारः. (1) - कम्बल (पुं)
 स्यात्कुरङ्गेऽपि कमलः प्रावारेऽपि च कम्बलः ॥ ३.३.७५४ ॥
हरिणः. (1) - कमल (पुं)प्रावारः. (1) - कम्बल (पुं)
उपहारः. (1) - बलि (पुं)प्राण्यङ्गजम्. (1) - बलि (स्त्री)
 करोपहारयोः पुंसि बलिः प्राण्यङ्गजे स्त्रियाम् ॥ ३.३.७५५ ॥
उपहारः. (1) - बलि (पुं)प्राण्यङ्गजम्. (1) - बलि (स्त्री)
काकः. (1) - बल (पुं)स्थौल्यम्. (1) - बल (नपुं)
 स्थौल्यसामर्थ्यसैन्येषु बलं ना काकसीरिणोः ॥ ३.३.७५६ ॥
काकः. (1) - बल (पुं)स्थौल्यम्. (1) - बल (नपुं)
वातिः. (1) - वातूल (पुं)वातासहः. (1) - वातूल (वि)
 वातूलः पुंसि वात्यायामपि वातासहे त्रिषु ॥ ३.३.७५७ ॥
वातिः. (1) - वातूल (पुं)वातासहः. (1) - वातूल (वि)
वक्राशयः. (1) - व्याल (वि)सर्पः. (1) - व्याल (पुं)
 भेद्यलिङ्गः शठे व्यालः पुंसि श्वापदसर्पयोः ॥ ३.३.७५८ ॥
वक्राशयः. (1) - व्याल (वि)सर्पः. (1) - व्याल (पुं)
पापम्. (1) - मल (पुं-नपुं)पुराणकिट्टम्. (1) - मल (पुं-नपुं)रोगः. (1) - शूल (पुं-नपुं)शूलम्. (1) - शूल (पुं-नपुं)
 मलोऽस्त्री पापविट्किट्टान्यस्त्री शूलं रुगायुधम् ॥ ३.३.७५९ ॥
पापम्. (1) - मल (पुं-नपुं)पुराणकिट्टम्. (1) - मल (पुं-नपुं)रोगः. (1) - शूल (पुं-नपुं)शूलम्. (1) - शूल (पुं-नपुं)
शङ्कुः. (1) - कील (स्त्री-पुं)अस्रिः. (1) - पालि (स्त्री)अङ्कः. (1) - पालि (स्त्री)पङ्क्तिः. (1) - पालि (स्त्री)
 शङ्कावपि द्वयोः कीलः पालिः स्त्र्यश्र्यङ्कपङ्क्तिषु ॥ ३.३.७६० ॥
शङ्कुः. (1) - कील (स्त्री-पुं)अस्रिः. (1) - पालि (स्त्री)अङ्कः. (1) - पालि (स्त्री)पङ्क्तिः. (1) - पालि (स्त्री)
कलाकौशल्यादिकर्मः. (1) - कला (स्त्री)सखी. (1) - आली (स्त्री) पङ्क्तिः. (1) - आली (स्त्री)
 कला शिल्पे कालभेदे चाली सख्यावली अपि ॥ ३.३.७६१ ॥
कलाकौशल्यादिकर्मः. (1) - कला (स्त्री)सखी. (1) - आली (स्त्री) पङ्क्तिः. (1) - आली (स्त्री)
अब्ध्यम्बुविकृतिः. (1) - वेला (स्त्री)मर्यादा. (1) - वेला (स्त्री)समयः. (1) - वेला (स्त्री)
 अब्ध्यम्बुविकृतौ वेला कालमर्यादयोरपि ॥ ३.३.७६२ ॥
अब्ध्यम्बुविकृतिः. (1) - वेला (स्त्री)मर्यादा. (1) - वेला (स्त्री)समयः. (1) - वेला (स्त्री)
कृत्तिका. (1) - बहुला (स्त्री)गौः. (1) - बहुला (स्त्री)अग्निः. (1) - बहुल (वि)कृष्णवर्णः. (1) - बहुल (वि)
 बहुलाः कृत्तिका गावो बहुलोऽग्नौ शितौ त्रिषु ॥ ३.३.७६३ ॥
कृत्तिका. (1) - बहुला (स्त्री)गौः. (1) - बहुला (स्त्री)अग्निः. (1) - बहुल (वि)कृष्णवर्णः. (1) - बहुल (वि)
विलासम्. (1) - लीला (स्त्री)क्रिया. (1) - लीला (स्त्री)शर्करा. (1) - उपला (स्त्री)
 लीला विलासक्रिययोरुपला शर्करापि च ॥ ३.३.७६४ ॥
विलासम्. (1) - लीला (स्त्री)क्रिया. (1) - लीला (स्त्री)शर्करा. (1) - उपला (स्त्री)
रक्तम्. (1) - कीलाल (नपुं)आकाशः. (1) - कीलाल (नपुं)आद्यः. (1) - मूल (नपुं)
 शोणितेऽम्भसि कीलालं मूलमाद्ये शिफाभयोः ॥ ३.३.७६५ ॥
रक्तम्. (1) - कीलाल (नपुं)आकाशः. (1) - कीलाल (नपुं)आद्यः. (1) - मूल (नपुं)
समूहः. (1) - जाल (नपुं)जालकम्. (1) - जाल (नपुं)नूतनकलिका. (1) - जाल (नपुं)
 जालं समूह आनायगवाक्षक्षारकेष्वपि ॥ ३.३.७६६ ॥
समूहः. (1) - जाल (नपुं)जालकम्. (1) - जाल (नपुं)नूतनकलिका. (1) - जाल (नपुं)
स्वभावः. (1) - शील (नपुं)सद्वृत्तम्. (1) - शील (नपुं)सस्यहेतुकृतम्. (1) - फल (नपुं)
 शीलं स्वभावे सद्वृत्ते सस्ये हेतुकृते फलम् ॥ ३.३.७६७ ॥
स्वभावः. (1) - शील (नपुं)सद्वृत्तम्. (1) - शील (नपुं)सस्यहेतुकृतम्. (1) - फल (नपुं)
नेत्ररुक्. (1) - पटल (नपुं)समूहः. (1) - पटल (स्त्री-नपुं)छदिर्नेत्ररुजोः क्लीबं समूहे पटलं न ना
 छदिर्नेत्ररुजोः क्लीबं समूहे पटलं न ना ॥ ३.३.७६८ ॥
नेत्ररुक्. (1) - पटल (नपुं)समूहः. (1) - पटल (स्त्री-नपुं)छदिर्नेत्ररुजोः क्लीबं समूहे पटलं न ना
अधः. (1) - तल (नपुं)स्वरूपः. (1) - तल (नपुं)मांसम्. (1) - पल (नपुं)
 अधस्स्वरूपयोरस्त्री तलं स्याच्चामिषे पलम् ॥ ३.३.७६९ ॥
अधः. (1) - तल (नपुं)स्वरूपः. (1) - तल (नपुं)मांसम्. (1) - पल (नपुं)
बडवाग्निः. (1) - पाताल (नपुं)अधमम्. (1) - चेल (वि)
 और्वानलेऽपि पातालं चैलं वस्त्रेऽधमे त्रिषु ॥ ३.३.७७० ॥
बडवाग्निः. (1) - पाताल (नपुं)अधमम्. (1) - चेल (वि)
शङ्कुभिः कीर्णश्वभ्रम्. (1) - कुकूल (नपुं)तुषानलः. (1) - कुकूल (पुं)
 कुकूलम् शङ्कुभिः कीर्णे श्वभ्रे ना तु तुषानले ॥ ३.३.७७१ ॥
शङ्कुभिः कीर्णश्वभ्रम्. (1) - कुकूल (नपुं)तुषानलः. (1) - कुकूल (पुं)
निश्चितम्. (1) - केवल (नपुं)एकः. (1) - केवल (वि)समग्रम्. (1) - केवल (वि)
 निर्णीते केवलमिति त्रिलिङ्गं त्वेककृत्स्नयोः ॥ ३.३.७७२ ॥
निश्चितम्. (1) - केवल (नपुं)एकः. (1) - केवल (वि)समग्रम्. (1) - केवल (वि)
क्षेमम्. (1) - कुशल (नपुं)पर्याप्तिः. (1) - कुशल (नपुं)पुण्यम्. (1) - कुशल (नपुं)शिक्षितः. (1) - कुशल (वि)
 पर्याप्तिक्षेमपुण्येषु कुशलं शिक्षिते त्रिषु ॥ ३.३.७७३ ॥
क्षेमम्. (1) - कुशल (नपुं)पर्याप्तिः. (1) - कुशल (नपुं)पुण्यम्. (1) - कुशल (नपुं)शिक्षितः. (1) - कुशल (वि)
नूतनाङ्कुरः. (1) - प्रवाल (पुं-नपुं)जडम्. (1) - स्थूल (वि)
 प्रवालमङ्कुरेऽप्यस्त्री त्रिषु स्थूलं जडेऽपि च ॥ ३.३.७७४ ॥
नूतनाङ्कुरः. (1) - प्रवाल (पुं-नपुं)जडम्. (1) - स्थूल (वि)
दन्तुरः. (1) - कराल (वि)उन्नतः. (1) - कराल (वि)चारपुरुषः. (1) - पेशल (वि)
 करालो दन्तुरे तुङ्गे चारौ दक्षे च पेशलः ॥ ३.३.७७५ ॥
दन्तुरः. (1) - कराल (वि)उन्नतः. (1) - कराल (वि)चारपुरुषः. (1) - पेशल (वि)
मूर्खः. (1) - बाल (पुं)शिशुः. (1) - बाल (पुं)सतृष्णः. (1) - लोल (वि)
 मूर्खेऽर्भकेऽपि बालः स्याल्लोलश्चलसतृष्णयोः ॥ ३.३.७७६ ॥
मूर्खः. (1) - बाल (पुं)शिशुः. (1) - बाल (पुं)सतृष्णः. (1) - लोल (वि)
बलभद्रः. (1) - कुल (नपुं)गृहम्. (1) - कुल (नपुं)कुबेरः. (1) - एककुण्डल (वि)
 कुलं गृहेऽपि तालाङ्के कुबेरे चैककुण्डलः ॥ ३.३.७७७ ॥
बलभद्रः. (1) - कुल (नपुं)गृहम्. (1) - कुल (नपुं)कुबेरः. (1) - एककुण्डल (वि)
अवमानितम्. (1) - हेला (स्त्री)सूर्यः. (1) - हेलि (पुं)युद्धम्. (1) - हिलि (पुं)
 स्त्रीभावावज्ञयोर्हेला हेलिः सूर्ये रणे हिलिः ॥ ३.३.७७८ ॥
अवमानितम्. (1) - हेला (स्त्री)सूर्यः. (1) - हेलि (पुं)युद्धम्. (1) - हिलि (पुं)
राजा. (1) - हाल (पुं)सुरा. (1) - हाल (पुं)शकलः. (1) - दल (नपुं)
 हालः स्यान्नृपतौ मद्ये शकलच्छदयोर्दलम् ॥ ३.३.७७९ ॥
राजा. (1) - हाल (पुं)सुरा. (1) - हाल (पुं)शकलः. (1) - दल (नपुं)
चित्रोपकरणशलाका. (1) - तूलि (स्त्री)शय्या. (1) - तूलि (स्त्री)तूलम्. (1) - तूलि (स्त्री)
 तूलिश्चित्रोपकरणशलाकातूलशय्ययोः ॥ ३.३.७८० ॥
चित्रोपकरणशलाका. (1) - तूलि (स्त्री)शय्या. (1) - तूलि (स्त्री)तूलम्. (1) - तूलि (स्त्री)
शब्दः. (1) - तुमुल (नपुं)व्याकुलम्. (1) - तुमुल (नपुं)कर्णपाली. (1) - शष्कुली (स्त्री)
 तुमुलं व्याकुले शब्दे शष्कुली कर्णपाल्यपि ॥ ३.३.७८१ ॥
शब्दः. (1) - तुमुल (नपुं)व्याकुलम्. (1) - तुमुल (नपुं)कर्णपाली. (1) - शष्कुली (स्त्री)
 ॥ । इति लान्ताः ॥
वनम्. (2) - दव (पुं), दाव (पुं)जननम्. (1) - भव (पुं)
 दवदावौ वनारण्यवह्नी जन्महरौ भवौ ॥ ३.३.७८२ ॥
वनम्. (2) - दव (पुं), दाव (पुं)जननम्. (1) - भव (पुं)
मन्त्री. (1) - सचिव (पुं)सहायकः. (1) - सचिव (पुं)वृक्षः. (1) - धव (पुं)पुरुषः. (1) - धव (पुं)
 मन्त्री सहायः सचिवौ पतिशाखिनरा धवाः ॥ ३.३.७८३ ॥
मन्त्री. (1) - सचिव (पुं)सहायकः. (1) - सचिव (पुं)वृक्षः. (1) - धव (पुं)पुरुषः. (1) - धव (पुं)
पर्वतः. (1) - अवि (स्त्री)मेषः. (1) - अवि (स्त्री)सूर्यः. (1) - अवि (स्त्री)आज्ञा. (1) - हव (पुं)यज्ञः. (1) - हव (पुं)
 अवयः शैलमेषार्का आज्ञाह्वानाध्वरा हवाः ॥ ३.३.७८४ ॥
पर्वतः. (1) - अवि (स्त्री)मेषः. (1) - अवि (स्त्री)सूर्यः. (1) - अवि (स्त्री)आज्ञा. (1) - हव (पुं)यज्ञः. (1) - हव (पुं)
सत्ता. (1) - भाव (पुं)स्वभावः. (1) - भाव (पुं)अभिप्रायः. (1) - भाव (पुं)चेष्टा. (1) - भाव (पुं)आत्मा. (1) - भाव (पुं)जननम्. (1) - भाव (पुं)
 भावः सत्तास्वभावाभिप्रायचेष्टात्मजन्मसु ॥ ३.३.७८५ ॥
सत्ता. (1) - भाव (पुं)स्वभावः. (1) - भाव (पुं)अभिप्रायः. (1) - भाव (पुं)चेष्टा. (1) - भाव (पुं)आत्मा. (1) - भाव (पुं)जननम्. (1) - भाव (पुं)
फलम्. (1) - प्रसव (पुं)पुष्पम्. (1) - प्रसव (पुं)उत्पादः. (1) - प्रसव (पुं)
 स्यादुत्पादे फले पुष्पे प्रसवो गर्भमोचने ॥ ३.३.७८६ ॥
फलम्. (1) - प्रसव (पुं)पुष्पम्. (1) - प्रसव (पुं)उत्पादः. (1) - प्रसव (पुं)
अपह्नवः. (1) - निह्नव (पुं)अविश्वासः. (1) - निह्नव (पुं)कपटः. (1) - निह्नव (पुं)
 अविश्वासेऽपह्नवेऽपि निकृतावपि निह्नवः ॥ ३.३.७८७ ॥
अपह्नवः. (1) - निह्नव (पुं)अविश्वासः. (1) - निह्नव (पुं)कपटः. (1) - निह्नव (पुं)
इच्छाप्रसवः. (1) - उत्सव (पुं)कोपः. (1) - उत्सव (पुं)उत्सेकः. (1) - उत्सव (पुं)
 उत्सेकामर्षयोरिच्छाप्रसरे मह उत्सवः ॥ ३.३.७८८ ॥
इच्छाप्रसवः. (1) - उत्सव (पुं)कोपः. (1) - उत्सव (पुं)उत्सेकः. (1) - उत्सव (पुं)
प्रभावः. (1) - अनुभाव (पुं)सताम्मतिनिश्चयः. (1) - अनुभाव (पुं)
 अनुभावः प्रभावे च सतां च मतिनिश्चये ॥ ३.३.७८९ ॥
प्रभावः. (1) - अनुभाव (पुं)सताम्मतिनिश्चयः. (1) - अनुभाव (पुं)
आद्योपलब्धिः. (1) - प्रभव (पुं)जन्महेतुः. (1) - प्रभव (पुं)स्थानम्. (1) - प्रभव (पुं)
 स्याज्जन्महेतुः प्रभवः स्थानं चाद्योपलब्धये ॥ ३.३.७९० ॥
आद्योपलब्धिः. (1) - प्रभव (पुं)जन्महेतुः. (1) - प्रभव (पुं)स्थानम्. (1) - प्रभव (पुं)
शूद्रायां विप्रतनयः. (1) - पारशव (पुं)आयुधम्. (1) - पारशव (पुं)
 शूद्रायां विप्रतनये शस्त्रे पारशवो मतः ॥ ३.३.७९१ ॥
शूद्रायां विप्रतनयः. (1) - पारशव (पुं)आयुधम्. (1) - पारशव (पुं)
भभेदः. (1) - ध्रुव (पुं)निश्चितम्. (1) - ध्रुव (नपुं)शाश्वतम्. (1) - ध्रुव (वि)
 ध्रुवो भभेदे क्लीबे तु निश्चिते शाश्वते त्रिषु ॥ ३.३.७९२ ॥
भभेदः. (1) - ध्रुव (पुं)निश्चितम्. (1) - ध्रुव (नपुं)शाश्वतम्. (1) - ध्रुव (वि)
आत्मा. (1) - स्व (पुं)धनम्. (1) - स्व (पुं-नपुं)आत्मीयम्. (1) - स्व (वि)
 स्वो ज्ञातावात्मनि स्वं त्रिष्वात्मीये स्वोऽस्त्रियां धने ॥ ३.३.७९३ ॥
आत्मा. (1) - स्व (पुं)धनम्. (1) - स्व (पुं-नपुं)आत्मीयम्. (1) - स्व (वि)
स्त्रीकटीवस्त्रबन्धः. (1) - नीवी (स्त्री)
 स्त्रीकटीवस्त्रबन्धेऽपि नीवी परिपणेऽपि च ॥ ३.३.७९४ ॥
स्त्रीकटीवस्त्रबन्धः. (1) - नीवी (स्त्री)
युद्धम्. (1) - द्वन्द्व (नपुं)युग्मम्. (1) - द्वन्द्व (नपुं)
 शिवा गौरीफेरवयोर्द्वन्द्वं कलहयुग्मयोः ॥ ३.३.७९५ ॥
युद्धम्. (1) - द्वन्द्व (नपुं)युग्मम्. (1) - द्वन्द्व (नपुं)
शरीरवायुः. (1) - सत्त्व (नपुं)वस्तु. (1) - सत्त्व (नपुं)व्यवसायः. (1) - सत्त्व (नपुं)जन्तुः. (1) - सत्त्व (पुं-नपुं)
 द्रव्यासु व्यवसायेऽपि सत्त्वमस्त्री तु जन्तुषु ॥ ३.३.७९६ ॥
शरीरवायुः. (1) - सत्त्व (नपुं)वस्तु. (1) - सत्त्व (नपुं)व्यवसायः. (1) - सत्त्व (नपुं)जन्तुः. (1) - सत्त्व (पुं-नपुं)
अविक्रमः. (1) - क्लीब (वि)
 क्लीबं नपुंसकं षण्डे वाच्यलिङ्गमविक्रमे ॥ ३.३.७९७ ॥
अविक्रमः. (1) - क्लीब (वि)
 ॥ । इति वान्ताः ॥
मनुष्यः. (1) - विश् (पुं)अभिमरः. (1) - स्पश (पुं)
 द्वौ विशौ वैश्यमनुजौ द्वौ चाराभिमरौ स्पशौ ॥ ३.३.७९८ ॥
मनुष्यः. (1) - विश् (पुं)अभिमरः. (1) - स्पश (पुं)
समूहः. (1) - राशि (पुं)मेषादयः. (1) - राशि (पुं)
 द्वौ राशी पुञ्जमेषाद्यौ द्वौ वंशौ कुलमस्करौ ॥ ३.३.७९९ ॥
समूहः. (1) - राशि (पुं)मेषादयः. (1) - राशि (पुं)
प्रकाशः. (1) - वीकाश (पुं)विजनः. (1) - वीकाश (पुं)भृतिः. (1) - निर्वेश (पुं)अनुभवः. (1) - निर्वेश (पुं)
 रहः प्रकाशौ वीकाशौ निर्वेशो भृतिभोगयोः ॥ ३.३.८०० ॥
प्रकाशः. (1) - वीकाश (पुं)विजनः. (1) - वीकाश (पुं)भृतिः. (1) - निर्वेश (पुं)अनुभवः. (1) - निर्वेश (पुं)
कृपणः. (1) - कीनाश (पुं)कृषीवलः. (1) - कीनाश (पुं)यमः. (1) - कीनाश (पुं)
 कृतान्ते पुंसि कीनाशः क्षुद्रकर्षकयोस्त्रिषु ॥ ३.३.८०१ ॥
कृपणः. (1) - कीनाश (पुं)कृषीवलः. (1) - कीनाश (पुं)यमः. (1) - कीनाश (पुं)
लक्ष्यम्. (1) - अपदेश (पुं)निमित्तम्. (1) - अपदेश (पुं)व्याजम्. (1) - अपदेश (पुं)जलम्. (1) - कुश (नपुं)
 पदे लक्ष्ये निमित्तेऽपदेशः स्यात्कुशमप्सु च ॥ ३.३.८०२ ॥
लक्ष्यम्. (1) - अपदेश (पुं)निमित्तम्. (1) - अपदेश (पुं)व्याजम्. (1) - अपदेश (पुं)जलम्. (1) - कुश (नपुं)
अनेकविधा अवस्था. (1) - दशा (स्त्री)आयता तृष्णा. (1) - आशा (स्त्री)
 दशावस्थानेकविधाप्याशा तृष्णापि चायता ॥ ३.३.८०३ ॥
अनेकविधा अवस्था. (1) - दशा (स्त्री)आयता तृष्णा. (1) - आशा (स्त्री)
स्त्री. (1) - वशा (स्त्री)ज्ञानम्. (1) - दृश् (स्त्री)ज्ञानशीलः. (1) - दृश् (वि)
 वशा स्त्री करिणी च स्यात्दृग्ज्ञाने ज्ञातरि त्रिषु ॥ ३.३.८०४ ॥
स्त्री. (1) - वशा (स्त्री)ज्ञानम्. (1) - दृश् (स्त्री)ज्ञानशीलः. (1) - दृश् (वि)
अमसृणः. (1) - कर्कश (पुं)कठिनम्. (1) - कर्कश (पुं)साहसिकः. (1) - कर्कश (पुं)
 स्यात्कर्कशः साहसिकः कठोरामसृणावपि ॥ ३.३.८०५ ॥
अमसृणः. (1) - कर्कश (पुं)कठिनम्. (1) - कर्कश (पुं)साहसिकः. (1) - कर्कश (पुं)
अतिप्रसिद्धः. (1) - प्रकाश (पुं)शिशुः. (1) - बालिश (पुं)
 प्रकाशोऽतिप्रसिद्धेऽपि शिशावज्ञे च बालिशः ॥ ३.३.८०६ ॥
अतिप्रसिद्धः. (1) - प्रकाश (पुं)शिशुः. (1) - बालिश (पुं)
अपचयः. (1) - नाश (पुं)तिरोधानम्. (1) - नाश (पुं)प्रियः. (1) - जीवितेश (पुं)यमः. (1) - जीवितेश (पुं)
 नाशः क्षये तिरोधाने जीवितेशः प्रिये यमे ॥ ३.३.८०७ ॥
अपचयः. (1) - नाश (पुं)तिरोधानम्. (1) - नाश (पुं)प्रियः. (1) - जीवितेश (पुं)यमः. (1) - जीवितेश (पुं)
परद्रोहकारी. (1) - निस्त्रिंश (पुं)सूर्यः. (1) - अंशु (पुं)कराः. (1) - अंशु (पुं)
 नृशंसखड्गौ निस्त्रिंशावंशुः सूर्येऽंशवः कराः ॥ ३.३.८०८ ॥
परद्रोहकारी. (1) - निस्त्रिंश (पुं)सूर्यः. (1) - अंशु (पुं)कराः. (1) - अंशु (पुं)
आख्याशालिः. (1) - आशु (नपुं)बन्धनम्. (1) - पाश (पुं)आयुधम्. (1) - पाश (पुं)
 आश्वाख्या शालिशीघ्रार्थे पाशो बन्धनशस्त्रयोः ॥ ३.३.८०९ ॥
आख्याशालिः. (1) - आशु (नपुं)बन्धनम्. (1) - पाश (पुं)आयुधम्. (1) - पाश (पुं)
 ॥ । इति शान्ताः ॥
देवः. (1) - अनिमिष (पुं)मत्स्यः. (1) - अनिमिष (पुं)मनुष्यः. (1) - पुरुष (पुं)
 सुरमत्स्यावनिमिषौ पुरुषावात्ममानवौ ॥ ३.३.८१० ॥
देवः. (1) - अनिमिष (पुं)मत्स्यः. (1) - अनिमिष (पुं)मनुष्यः. (1) - पुरुष (पुं)
मत्स्यात्खगः. (1) - ध्वाङ्क्ष (पुं)तृणम्. (1) - कक्ष (पुं)शाखादिभिर्विस्तृतवल्ली. (1) - कक्ष (पुं)
 काकमत्स्यात्खगौ ध्वाङ्क्षौ कक्षौ च तृणवीरुधौ ॥ ३.३.८११ ॥
मत्स्यात्खगः. (1) - ध्वाङ्क्ष (पुं)तृणम्. (1) - कक्ष (पुं)शाखादिभिर्विस्तृतवल्ली. (1) - कक्ष (पुं)
प्रग्रहः. (1) - अभीषु (पुं)किरणः. (1) - अभीषु (पुं)मर्दनम्. (1) - प्रैष (पुं)प्रेषणम्. (1) - प्रैष (पुं)
 अभीपुः प्रग्रहे रश्मौ प्रैषः प्रेषणमर्दने ॥ ३.३.८१२ ॥
प्रग्रहः. (1) - अभीषु (पुं)किरणः. (1) - अभीषु (पुं)मर्दनम्. (1) - प्रैष (पुं)प्रेषणम्. (1) - प्रैष (पुं)
सहायः. (1) - पक्ष (पुं)शिरोवेष्टनम्. (1) - उष्णीष (पुं)किरीटम्. (1) - उष्णीष (पुं)
 पक्षः सहायेऽप्युष्णीषः शिरोवेष्टकिरीटयोः ॥ ३.३.८१३ ॥
सहायः. (1) - पक्ष (पुं)शिरोवेष्टनम्. (1) - उष्णीष (पुं)किरीटम्. (1) - उष्णीष (पुं)
मूषकः. (1) - वृष (पुं)श्रेष्ठः. (1) - वृष (पुं)सुकृतः. (1) - वृष (पुं)शुक्रलः. (1) - वृष (पुं)
 शुक्रले मूषिके श्रेष्ठे सुकृते वृषभे वृषः ॥ ३.३.८१४ ॥
मूषकः. (1) - वृष (पुं)श्रेष्ठः. (1) - वृष (पुं)सुकृतः. (1) - वृष (पुं)शुक्रलः. (1) - वृष (पुं)
नूतनकलिका. (1) - कोष (पुं-नपुं)खड्गपिधानम्. (1) - कोष (पुं-नपुं)भण्डारम्. (1) - कोष (पुं-नपुं)दिव्यम्. (1) - कोष (पुं-नपुं)
 कोषोऽस्त्री कुड्मले खड्गपिधानेऽर्थौघदिव्ययोः ॥ ३.३.८१५ ॥
नूतनकलिका. (1) - कोष (पुं-नपुं)खड्गपिधानम्. (1) - कोष (पुं-नपुं)भण्डारम्. (1) - कोष (पुं-नपुं)दिव्यम्. (1) - कोष (पुं-नपुं)
चक्रम्. (1) - अक्ष (पुं)इन्द्रियम्. (1) - अक्ष (पुं)व्यवहारः. (1) - अक्ष (पुं)अक्षः. (1) - आकर्ष (पुं)शारीणामाधारपट्टः. (1) - आकर्ष (पुं)द्यूतक्रीडनम्. (1) - आकर्ष (पुं)
 द्यूतेऽक्षे शारिफलकेऽप्याकर्षोऽथाक्षमिन्द्रिये ॥ ३.३.८१६ ॥
चक्रम्. (1) - अक्ष (पुं)इन्द्रियम्. (1) - अक्ष (पुं)व्यवहारः. (1) - अक्ष (पुं)अक्षः. (1) - आकर्ष (पुं)शारीणामाधारपट्टः. (1) - आकर्ष (पुं)द्यूतक्रीडनम्. (1) - आकर्ष (पुं)
 ना द्यूताङ्गे कर्षचक्रे व्यवहारे कलिद्रुमे ॥ ३.३.८१७ ॥
करीषाग्निः. (1) - कर्षु (पुं)वार्ता. (1) - कर्षु (पुं)कुल्याभिधायिनी. (1) - कर्षू (स्त्री)
 कर्षूर्वार्त्ता करीषाग्निः कर्षः कुल्याभिधायिनी ॥ ३.३.८१८ ॥
करीषाग्निः. (1) - कर्षु (पुं)वार्ता. (1) - कर्षु (पुं)कुल्याभिधायिनी. (1) - कर्षू (स्त्री)
जलम्. (1) - विष (नपुं)
 पुम्भावे तत्क्रियायां च पौरुषं विषमप्सु च ॥ ३.३.८१९ ॥
जलम्. (1) - विष (नपुं)
उपादानम्. (1) - आमिष (पुं-नपुं)अपराधः. (1) - किल्बिष (नपुं)
 उपादानेऽप्यामिषं स्यादपराधेऽपि किल्बिषम् ॥ ३.३.८२० ॥
उपादानम्. (1) - आमिष (पुं-नपुं)अपराधः. (1) - किल्बिष (नपुं)
लोकधात्वंशः. (1) - वर्ष (पुं-नपुं)वत्सरः. (1) - वर्ष (पुं-नपुं)
 स्याद्वृष्टौ लोकधात्वंशे वत्सरे वर्षमस्त्रियाम् ॥ ३.३.८२१ ॥
लोकधात्वंशः. (1) - वर्ष (पुं-नपुं)वत्सरः. (1) - वर्ष (पुं-नपुं)
नृत्येक्षणम्. (1) - प्रेक्षा (स्त्री)भृतिः. (1) - भिक्षा (स्त्री)सेवा. (1) - भिक्षा (स्त्री)याचनम्. (1) - भिक्षा (स्त्री)
 प्रेक्षा नृत्तेक्षणं प्रज्ञा भिक्षा सेवार्थना भृतिः ॥ ३.३.८२२ ॥
नृत्येक्षणम्. (1) - प्रेक्षा (स्त्री)भृतिः. (1) - भिक्षा (स्त्री)सेवा. (1) - भिक्षा (स्त्री)याचनम्. (1) - भिक्षा (स्त्री)
शोभा. (1) - त्विष् (स्त्री)कार्त्स्न्यम्. (1) - न्यक्ष (वि)अधमम्. (1) - न्यक्ष (वि)
 त्विट्शोभापि त्रिषु परे न्यक्षं कार्त्स्न्यनिकृष्टयोः ॥ ३.३.८२३ ॥
शोभा. (1) - त्विष् (स्त्री)कार्त्स्न्यम्. (1) - न्यक्ष (वि)अधमम्. (1) - न्यक्ष (वि)
प्रत्यक्षः. (1) - अध्यक्ष (वि)अप्रेमः. (1) - रूक्ष (वि)अचिक्कणः. (1) - रूक्ष (वि)
 प्रत्यक्षेऽधिकृतेऽध्यक्षो रूक्षस्त्वप्रेम्ण्यचिक्कणे ॥ ३.३.८२४ ॥
प्रत्यक्षः. (1) - अध्यक्ष (वि)अप्रेमः. (1) - रूक्ष (वि)अचिक्कणः. (1) - रूक्ष (वि)
व्याजम्. (1) - लक्ष (नपुं)लक्षसङ्ख्या. (1) - लक्ष (नपुं)शब्दः. (1) - घोष (पुं)गवां स्थानम्. (1) - घोष (पुं)
 व्याजसंख्याशरव्येषु लक्षं घोषौ रवव्रजौ ॥ ३.३.८२५ ॥
व्याजम्. (1) - लक्ष (नपुं)लक्षसङ्ख्या. (1) - लक्ष (नपुं)शब्दः. (1) - घोष (पुं)गवां स्थानम्. (1) - घोष (पुं)
भित्तिः. (1) - कपिशीर्ष (नपुं)शृङ्गः. (1) - कपिशीर्ष (नपुं)चषकः. (1) - अनुतर्ष (पुं)सुरा. (1) - अनुतर्ष (पुं)
 कपिशीर्षं भित्तिशृङ्गेऽनुतर्षश्चषकः सुरा ॥ ३.३.८२६ ॥
भित्तिः. (1) - कपिशीर्ष (नपुं)शृङ्गः. (1) - कपिशीर्ष (नपुं)चषकः. (1) - अनुतर्ष (पुं)सुरा. (1) - अनुतर्ष (पुं)
वातादयः. (1) - दोष (पुं)रात्रिः. (1) - दोषा (अव्य)कुक्कुटः. (1) - दक्ष (वि)
 दोषो वातादिके दोषा रात्रौ दक्षोऽपि कुक्कुटे ॥ ३.३.८२७ ॥
वातादयः. (1) - दोष (पुं)रात्रिः. (1) - दोषा (अव्य)कुक्कुटः. (1) - दक्ष (वि)
शुण्डाग्रभागः. (1) - गण्डूष (पुं)मुखे जलपूरणम्. (1) - गण्डूष (स्त्री-पुं)
 शुण्डाग्रभागे गण्डूषो द्वयोश्च मुखपूरणे ॥ ३.३.८२८ ॥
शुण्डाग्रभागः. (1) - गण्डूष (पुं)मुखे जलपूरणम्. (1) - गण्डूष (स्त्री-पुं)
 ॥ । इति षान्ताः ॥
 रविश्वेतच्छदौ हंसौ सूर्यवह्नी विभावसू ॥ ३.३.८२९ ॥
सद्योजातवृषभवत्सः. (1) - वत्स (पुं)वर्षम्. (1) - वत्स (पुं)चातकपक्षी. (1) - दिवौकस् (पुं)
 वत्सौ तर्णकवर्षौ द्वौ सारङ्गाश्च दिवौकसः ॥ ३.३.८३० ॥
सद्योजातवृषभवत्सः. (1) - वत्स (पुं)वर्षम्. (1) - वत्स (पुं)चातकपक्षी. (1) - दिवौकस् (पुं)
गुणः. (1) - रस (पुं)रागः. (1) - रस (पुं)शृङ्गारादिः. (1) - रस (पुं)विषम्. (1) - रस (पुं)वीर्यम्. (1) - रस (पुं)द्रवः. (1) - रस (पुं)
 शृङ्गारादौ विषे वीर्ये गुणे रागे द्रवे रसः ॥ ३.३.८३१ ॥
गुणः. (1) - रस (पुं)रागः. (1) - रस (पुं)शृङ्गारादिः. (1) - रस (पुं)विषम्. (1) - रस (पुं)वीर्यम्. (1) - रस (पुं)द्रवः. (1) - रस (पुं)
कर्णाभरणम्. (2) - उत्तंस (पुं), अवतंस (पुं)शिखास्थमाल्यम्. (2) - उत्तंस (पुं), अवतंस (पुं)
 पुंस्युत्तंसावतंसौ द्वौ कर्णपूरेऽपि शेखरे ॥ ३.३.८३२ ॥
कर्णाभरणम्. (2) - उत्तंस (पुं), अवतंस (पुं)शिखास्थमाल्यम्. (2) - उत्तंस (पुं), अवतंस (पुं)
अग्निः. (1) - वसु (पुं)किरणः. (1) - वसु (पुं)देवेष्वेकः. (1) - वसु (पुं)धनम्. (1) - वसु (नपुं)रत्नम्. (1) - वसु (नपुं)
 देवभेदेऽनले रश्मौ वसू रत्ने धने वसु ॥ ३.३.८३३ ॥
अग्निः. (1) - वसु (पुं)किरणः. (1) - वसु (पुं)देवेष्वेकः. (1) - वसु (पुं)धनम्. (1) - वसु (नपुं)रत्नम्. (1) - वसु (नपुं)
विष्णुः. (1) - वेधस् (पुं)हिताशंसा. (1) - आशिस् (स्त्री)
 विष्णौ च वेधाः स्त्री त्वाशीर्हिताशंसाहिदंष्ट्रयोः ॥ ३.३.८३४ ॥
विष्णुः. (1) - वेधस् (पुं)हिताशंसा. (1) - आशिस् (स्त्री)
प्रार्थना. (1) - लालसा (स्त्री)औत्सुक्यम्. (1) - लालसा (स्त्री)चौर्यादिपरोपद्रवकर्मः. (1) - हिंसा (स्त्री)
 लालसे प्रार्थनौत्सुक्ये हिंसा चौर्यादिकर्म च ॥ ३.३.८३५ ॥
प्रार्थना. (1) - लालसा (स्त्री)औत्सुक्यम्. (1) - लालसा (स्त्री)चौर्यादिपरोपद्रवकर्मः. (1) - हिंसा (स्त्री)
अश्वा. (1) - प्रसू (स्त्री)आकाशः. (2) - रोदस् (नपुं), रोदसी (स्त्री)भूमिः. (2) - रोदस् (नपुं), रोदसी (स्त्री)
 प्रसूरश्वापि भूद्यावौ रोदस्यौ रोदसी च ते ॥ ३.३.८३६ ॥
अश्वा. (1) - प्रसू (स्त्री)आकाशः. (2) - रोदस् (नपुं), रोदसी (स्त्री)भूमिः. (2) - रोदस् (नपुं), रोदसी (स्त्री)
शोभा. (1) - अर्चिस् (स्त्री-नपुं)नक्षत्रम्. (1) - ज्योतिस् (नपुं)दृष्टिः. (1) - ज्योतिस् (नपुं)द्योतः. (1) - ज्योतिस् (नपुं)
 ज्वालाभासौ न पुंस्यर्चिर्ज्योतिर्भद्योतदृष्टिषु ॥ ३.३.८३७ ॥
शोभा. (1) - अर्चिस् (स्त्री-नपुं)नक्षत्रम्. (1) - ज्योतिस् (नपुं)दृष्टिः. (1) - ज्योतिस् (नपुं)द्योतः. (1) - ज्योतिस् (नपुं)
पापम्. (1) - आगस् (नपुं)पक्षी. (1) - वयस् (नपुं)बाल्यादिः. (1) - वयस् (नपुं)
 पापापराधयोरागः खगबाल्यादिनोर्वयः ॥ ३.३.८३८ ॥
पापम्. (1) - आगस् (नपुं)पक्षी. (1) - वयस् (नपुं)बाल्यादिः. (1) - वयस् (नपुं)
प्रभा. (2) - वर्च (पुं), महस् (नपुं)पुरीषम्. (1) - वर्च (पुं)उत्सवः. (1) - महस् (नपुं)
 तेजः पुरीषयोर्वर्चो महश्चोत्सवतेजसोः ॥ ३.३.८३९ ॥
प्रभा. (2) - वर्च (पुं), महस् (नपुं)पुरीषम्. (1) - वर्च (पुं)उत्सवः. (1) - महस् (नपुं)
राहुः. (1) - तमस् (नपुं)
 रजो गुणे च स्त्रीपुष्पे राहौ ध्वान्ते गुणे तमः ॥ ३.३.८४० ॥
राहुः. (1) - तमस् (नपुं)
पद्यम्. (1) - छन्दस् (नपुं)स्पृहा. (1) - छन्दस् (नपुं)कृच्छ्रादिकर्मः. (1) - तपस् (नपुं)
 छन्दः पद्येऽभिलाषे च तपः कृच्छ्रादिकर्म च ॥ ३.३.८४१ ॥
पद्यम्. (1) - छन्दस् (नपुं)स्पृहा. (1) - छन्दस् (नपुं)कृच्छ्रादिकर्मः. (1) - तपस् (नपुं)
बलम्. (1) - सहस् (नपुं)मार्गः. (1) - सहस् (पुं)श्रावणमासः. (1) - नभस् (पुं)
 सहो बलं सहा मार्गो नभः खं श्रावणो नभाः ॥ ३.३.८४२ ॥
बलम्. (1) - सहस् (नपुं)मार्गः. (1) - सहस् (पुं)श्रावणमासः. (1) - नभस् (पुं)
गृहम्. (1) - ओकस् (नपुं)आश्रयः. (1) - ओकास् (पुं)
 ओकः सद्माश्रयश्चौकाः पयः क्षीरं पयोऽंबु च ॥ ३.३.८४३ ॥
गृहम्. (1) - ओकस् (नपुं)आश्रयः. (1) - ओकास् (पुं)
प्रभा. (1) - ओजस् (नपुं)बलम्. (1) - ओजस् (नपुं)इन्द्रियम्. (1) - स्रोतस् (नपुं)निम्नगारयः. (1) - स्रोतस् (नपुं)
 ओजो दीप्तौ बले स्रोत इन्द्रिये निम्नगारये ॥ ३.३.८४४ ॥
प्रभा. (1) - ओजस् (नपुं)बलम्. (1) - ओजस् (नपुं)इन्द्रियम्. (1) - स्रोतस् (नपुं)निम्नगारयः. (1) - स्रोतस् (नपुं)
प्रभा. (1) - तेजस् (नपुं)बलम्. (1) - तेजस् (नपुं)प्रभावः. (1) - तेजस् (नपुं)
 तेजः प्रभावे दीप्तौ च बले शुक्रेऽप्यतस्त्रिषु ॥ ३.३.८४५ ॥
प्रभा. (1) - तेजस् (नपुं)बलम्. (1) - तेजस् (नपुं)प्रभावः. (1) - तेजस् (नपुं)
विदत्. (1) - विद्वस् (वि)हिंसाशीलः. (1) - बीभत्स (वि)
 विद्वान्विदंश्च बीभत्सो हिंस्रोऽप्यतिशयेत्वमी ॥ ३.३.८४६ ॥
विदत्. (1) - विद्वस् (वि)हिंसाशीलः. (1) - बीभत्स (वि)
अतिशयेन वृद्धः. (1) - ज्यायस् (वि)अतिशयेन प्रशस्तः. (1) - ज्यायस् (वि)अत्यन्तम् युवा. (1) - कनीयस् (वि)अत्यन्तम् अल्पः. (1) - कनीयस् (वि)
 वृद्धप्रशंसयोर्ज्यायान्कनीयांस्तु युवाल्पयोः ॥ ३.३.८४७ ॥
अतिशयेन वृद्धः. (1) - ज्यायस् (वि)अतिशयेन प्रशस्तः. (1) - ज्यायस् (वि)अत्यन्तम् युवा. (1) - कनीयस् (वि)अत्यन्तम् अल्पः. (1) - कनीयस् (वि)
अत्यन्तम् ऊरुः. (1) - वरीयस् (वि)अत्यन्तम् वरः. (1) - वरीयस् (वि)अत्यन्तम् साधुः. (1) - साधीयस् (वि)अत्यन्तम् बाढः. (1) - साधीयस् (वि)
 वरीयांस्तूरुवरयोः साधीयान्साधुबाढयोः ॥ ३.३.८४८ ॥
अत्यन्तम् ऊरुः. (1) - वरीयस् (वि)अत्यन्तम् वरः. (1) - वरीयस् (वि)अत्यन्तम् साधुः. (1) - साधीयस् (वि)अत्यन्तम् बाढः. (1) - साधीयस् (वि)
 ॥ । इति सान्ताः ॥
दलम्. (1) - बर्ह (पुं-नपुं)निर्बन्धः. (1) - ग्रह (पुं)अर्कादयः. (1) - ग्रह (पुं)
 दलेऽपि बर्हं निर्बन्धोपरागार्कादयो ग्रहाः ॥ ३.३.८४९ ॥
दलम्. (1) - बर्ह (पुं-नपुं)निर्बन्धः. (1) - ग्रह (पुं)अर्कादयः. (1) - ग्रह (पुं)
क्वाथरसः. (1) - निर्यूह (पुं)नागदन्तकम्. (1) - निर्यूह (पुं)शिखास्थमाल्यम्. (1) - निर्यूह (पुं)द्वारम्. (1) - निर्यूह (पुं)
 द्वार्यापीडे क्वाथरसे निर्यूहो नागदन्तके ॥ ३.३.८५० ॥
क्वाथरसः. (1) - निर्यूह (पुं)नागदन्तकम्. (1) - निर्यूह (पुं)शिखास्थमाल्यम्. (1) - निर्यूह (पुं)द्वारम्. (1) - निर्यूह (पुं)
तुलासूत्रम्. (2) - प्रग्राह (पुं), प्रग्रह (पुं)प्रग्रहः. (2) - प्रग्राह (पुं), प्रग्रह (पुं)
 तुलासूत्रेऽश्वादिरश्मौ प्रग्राहः प्रग्रहोऽपि च ॥ ३.३.८५१ ॥
तुलासूत्रम्. (2) - प्रग्राह (पुं), प्रग्रह (पुं)प्रग्रहः. (2) - प्रग्राह (पुं), प्रग्रह (पुं)
पत्नी. (1) - परिग्रह (पुं)परिजनः. (1) - परिग्रह (पुं)आदानम्. (1) - परिग्रह (पुं)मूलधनम्. (1) - परिग्रह (पुं)शापवचनम्. (1) - परिग्रह (पुं)
 पत्नीपरिजनादानमूलशापाः परिग्रहाः ॥ ३.३.८५२ ॥
पत्नी. (1) - परिग्रह (पुं)परिजनः. (1) - परिग्रह (पुं)आदानम्. (1) - परिग्रह (पुं)मूलधनम्. (1) - परिग्रह (पुं)शापवचनम्. (1) - परिग्रह (पुं)
पत्नी. (1) - गृह (पुं-बहु)वरस्त्रियाः श्रोणी. (1) - आरोह (पुं)
 दारेषु च गृहाः श्रोण्यामप्यारोहो वरस्त्रियाः ॥ ३.३.८५३ ॥
पत्नी. (1) - गृह (पुं-बहु)वरस्त्रियाः श्रोणी. (1) - आरोह (पुं)
वृत्रासुरः. (1) - अहि (पुं)अग्निः. (1) - तमोपह (पुं)चन्द्रः. (1) - तमोपह (पुं)सूर्यः. (1) - तमोपह (पुं)
 व्यूहो वृन्देऽप्यहिर्वृत्रेऽप्यग्नीन्द्वर्कास्तमोपहाः ॥ ३.३.८५४ ॥
वृत्रासुरः. (1) - अहि (पुं)अग्निः. (1) - तमोपह (पुं)चन्द्रः. (1) - तमोपह (पुं)सूर्यः. (1) - तमोपह (पुं)
परिवारः. (1) - परिबर्ह (पुं)नृपार्हाः. (1) - परिबर्ह (पुं)
 परिच्छदे नृपार्हेऽर्थे परिबर्होऽव्ययाः परे ॥ ३.३.८५५ ॥
परिवारः. (1) - परिबर्ह (पुं)नृपार्हाः. (1) - परिबर्ह (पुं)
 ॥ । इति हान्ताः ॥
ईषदर्थः. (1) - आङ् (अव्य)सर्वतोव्याप्तिः. (1) - आङ् (अव्य)सीमार्थः. (1) - आङ् (अव्य)धातुयोगजार्थः. (1) - आङ् (अव्य)
आङीषदर्थेऽभिव्याप्तौ सीमार्थे धातुयोगजे॥ ३.३.८५६ ॥
ईषदर्थः. (1) - आङ् (अव्य)सर्वतोव्याप्तिः. (1) - आङ् (अव्य)सीमार्थः. (1) - आङ् (अव्य)धातुयोगजार्थः. (1) - आङ् (अव्य)
प्रगृह्यः. (1) - आ (अव्य)स्मृतिः. (1) - आ (अव्य)वाक्यम्. (1) - आ (अव्य)कोपः. (1) - आस्तु (अव्य)दुःखम्. (1) - आस्तु (अव्य)
आ प्रगृह्यस्स्मृतौ वाक्येऽप्यास्तु स्यात्कोपपीडयोः॥ ३.३.८५७ ॥
प्रगृह्यः. (1) - आ (अव्य)स्मृतिः. (1) - आ (अव्य)वाक्यम्. (1) - आ (अव्य)कोपः. (1) - आस्तु (अव्य)दुःखम्. (1) - आस्तु (अव्य)
ईषदर्थः. (1) - कु (स्त्री)जुगुप्सा. (1) - कु (स्त्री)पापम्. (1) - कु (स्त्री)निर्भर्त्सनम्. (1) - धिक् (अव्य)निन्दा. (1) - धिक् (अव्य)
पापकुत्सेषदर्थे कु धिङ्निर्भत्सननिन्दयोः॥ ३.३.८५८ ॥
ईषदर्थः. (1) - कु (स्त्री)जुगुप्सा. (1) - कु (स्त्री)पापम्. (1) - कु (स्त्री)निर्भर्त्सनम्. (1) - धिक् (अव्य)निन्दा. (1) - धिक् (अव्य)
अन्वाचयः. (1) - च (अव्य)इतरेतरः. (1) - च (अव्य)समाहारः. (1) - च (अव्य)समुच्चयः. (1) - च (अव्य)
चान्वाचयसमाहारेतरेतरसमुच्चये॥ ३.३.८५९ ॥
अन्वाचयः. (1) - च (अव्य)इतरेतरः. (1) - च (अव्य)समाहारः. (1) - च (अव्य)समुच्चयः. (1) - च (अव्य)
आशीः. (1) - स्वस्ति (अव्य)क्षेमम्. (1) - स्वस्ति (अव्य)पुण्यादिः. (1) - स्वस्ति (अव्य)प्रकर्षः. (1) - अति (अव्य)लङ्घनम्. (1) - अति (अव्य)
स्वस्त्याशीः क्षेमपुण्यादौ प्रकर्षे लङ्घनेऽप्यति॥ ३.३.८६० ॥
आशीः. (1) - स्वस्ति (अव्य)क्षेमम्. (1) - स्वस्ति (अव्य)पुण्यादिः. (1) - स्वस्ति (अव्य)प्रकर्षः. (1) - अति (अव्य)लङ्घनम्. (1) - अति (अव्य)
प्रश्नः. (1) - स्वित् (अव्य)वितर्कः. (1) - स्वित् (अव्य)भेदः. (1) - तु (अव्य)अवधारणम्. (1) - तु (अव्य)
स्वित्प्रश्ने च वितर्के च तु स्याद्भेदेऽवधारणे॥ ३.३.८६१ ॥
प्रश्नः. (1) - स्वित् (अव्य)वितर्कः. (1) - स्वित् (अव्य)भेदः. (1) - तु (अव्य)अवधारणम्. (1) - तु (अव्य)
सह. (1) - सकृत् (अव्य)एकवारम्. (1) - सकृत् (अव्य)दूरम्. (1) - आरात् (अव्य)समीपः. (1) - आरात् (अव्य)
सकृत्सहैकवारे चाप्याराद्दूरसमीपयोः॥ ३.३.८६२ ॥
सह. (1) - सकृत् (अव्य)एकवारम्. (1) - सकृत् (अव्य)दूरम्. (1) - आरात् (अव्य)समीपः. (1) - आरात् (अव्य)
चरमम्. (1) - पश्चात् (अव्य)पश्चिमदिक्. (1) - पश्चात् (अव्य)प्रश्नः. (1) - उत (अव्य)समुच्चयः. (1) - उत (अव्य)विकल्पः. (1) - उत (अव्य)
प्रतीच्यां चरमे पश्चादुताप्यर्थविकल्पयोः॥ ३.३.८६३ ॥
चरमम्. (1) - पश्चात् (अव्य)पश्चिमदिक्. (1) - पश्चात् (अव्य)प्रश्नः. (1) - उत (अव्य)समुच्चयः. (1) - उत (अव्य)विकल्पः. (1) - उत (अव्य)
पुनः. (1) - शश्वत् (अव्य)सहार्थः. (1) - शश्वत् (अव्य)प्रत्यक्षः. (1) - साक्षात् (अव्य)तुल्यम्. (1) - साक्षात् (अव्य)
पुनस्सहार्थयोः शश्वत्साक्षात्प्रत्यक्षतुल्ययोः॥ ३.३.८६४ ॥
पुनः. (1) - शश्वत् (अव्य)सहार्थः. (1) - शश्वत् (अव्य)प्रत्यक्षः. (1) - साक्षात् (अव्य)तुल्यम्. (1) - साक्षात् (अव्य)
आमन्त्रणम्. (1) - बत (अव्य)करुणरसः. (1) - बत (अव्य)सन्तोषम्. (1) - बत (अव्य)विस्मयः. (1) - बत (अव्य)दुःखम्. (1) - बत (अव्य)
खेदानुकम्पासन्तोषविस्मयामन्त्रणे बत॥ ३.३.८६५ ॥
आमन्त्रणम्. (1) - बत (अव्य)करुणरसः. (1) - बत (अव्य)सन्तोषम्. (1) - बत (अव्य)विस्मयः. (1) - बत (अव्य)दुःखम्. (1) - बत (अव्य)
आनन्दः. (1) - हन्त (अव्य)करुणरसः. (1) - हन्त (अव्य)वाक्यारम्भः. (1) - हन्त (अव्य)विषादः. (1) - हन्त (अव्य)
हन्त हर्षेऽनुकम्पायां वाक्यारम्भविषादयोः॥ ३.३.८६६ ॥
आनन्दः. (1) - हन्त (अव्य)करुणरसः. (1) - हन्त (अव्य)वाक्यारम्भः. (1) - हन्त (अव्य)विषादः. (1) - हन्त (अव्य)
लक्षणादिः. (1) - प्रति (अव्य)प्रतिनिधिः. (1) - प्रति (अव्य)वीप्सा. (1) - प्रति (अव्य)
प्रति प्रतिनिधौ वीप्सालक्षणादौ प्रयोगतः॥ ३.३.८६७ ॥
लक्षणादिः. (1) - प्रति (अव्य)प्रतिनिधिः. (1) - प्रति (अव्य)वीप्सा. (1) - प्रति (अव्य)
कारणम्. (1) - इति (अव्य)प्रकरणम्. (1) - इति (अव्य)प्रकर्षः. (1) - इति (अव्य)समापनम्. (1) - इति (अव्य)
इति हेतुप्रकरणप्रकर्षादिसमाप्तिषु॥ ३.३.८६८ ॥
कारणम्. (1) - इति (अव्य)प्रकरणम्. (1) - इति (अव्य)प्रकर्षः. (1) - इति (अव्य)समापनम्. (1) - इति (अव्य)
पूर्वदिक्. (1) - पुरस्तात् (अव्य)प्रथमा. (1) - पुरस्तात् (अव्य)पुरार्थः. (1) - पुरस्तात् (अव्य)अग्रे. (1) - पुरस्तात् (अव्य)
प्राच्यां पुरस्तात्प्रथमे पुरार्थेऽग्रत इत्यपि॥ ३.३.८६९ ॥
पूर्वदिक्. (1) - पुरस्तात् (अव्य)प्रथमा. (1) - पुरस्तात् (अव्य)पुरार्थः. (1) - पुरस्तात् (अव्य)अग्रे. (1) - पुरस्तात् (अव्य)
साकल्यम्. (1) - यावत् तावत् (अव्य)अवधिः. (1) - यावत् तावत् (अव्य)मानः. (1) - यावत् तावत् (अव्य)अवधारणम्. (1) - यावत् तावत् (अव्य)
यावत्तावच्च साकल्येऽवधौ मानेऽवधारणे॥ ३.३.८७० ॥
साकल्यम्. (1) - यावत् तावत् (अव्य)अवधिः. (1) - यावत् तावत् (अव्य)मानः. (1) - यावत् तावत् (अव्य)अवधारणम्. (1) - यावत् तावत् (अव्य)
अनन्तरम्. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)आरम्भः. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)कार्त्स्न्यम्. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)प्रश्नः. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)शुभम्. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)
मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्नकार्त्स्न्येष्वथो अथ॥ ३.३.८७१ ॥
अनन्तरम्. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)आरम्भः. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)कार्त्स्न्यम्. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)प्रश्नः. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)शुभम्. (2) - अथो (अव्य), अथ (अव्य)
अविधिः. (1) - वृथा (अव्य)अनेकम्. (1) - नाना (अव्य)उभयार्थः. (1) - नाना (अव्य)
वृथा निरर्थकाविध्योर्नानानेकोभयार्थयोः॥ ३.३.८७२ ॥
अविधिः. (1) - वृथा (अव्य)अनेकम्. (1) - नाना (अव्य)उभयार्थः. (1) - नाना (अव्य)
प्रश्नः. (1) - नु (अव्य)विकल्पः. (1) - नु (अव्य)पश्चात्. (1) - अनु (अव्य)सादृश्यम्. (1) - अनु (अव्य)
नु पृच्छायां विकल्पे च पश्चात्सादृश्ययोरनु॥ ३.३.८७३ ॥
प्रश्नः. (1) - नु (अव्य)विकल्पः. (1) - नु (अव्य)पश्चात्. (1) - अनु (अव्य)सादृश्यम्. (1) - अनु (अव्य)
आमन्त्रणम्. (1) - ननु (अव्य)अनुज्ञा. (1) - ननु (अव्य)अनुनयः. (1) - ननु (अव्य)अवधारणम्. (1) - ननु (अव्य)प्रश्नः. (1) - ननु (अव्य)
प्रश्नावधारणानुज्ञानुनयामन्त्रणे ननु॥ ३.३.८७४ ॥
आमन्त्रणम्. (1) - ननु (अव्य)अनुज्ञा. (1) - ननु (अव्य)अनुनयः. (1) - ननु (अव्य)अवधारणम्. (1) - ननु (अव्य)प्रश्नः. (1) - ननु (अव्य)
गर्हा. (1) - अपि (अव्य)प्रश्नः. (1) - अपि (अव्य)शङ्का. (1) - अपि (अव्य)सम्भावना. (1) - अपि (अव्य)समुच्चयः. (1) - अपि (अव्य)
गर्हासमुच्चयप्रश्नशङ्कासम्भावनास्वपि॥ ३.३.८७५ ॥
गर्हा. (1) - अपि (अव्य)प्रश्नः. (1) - अपि (अव्य)शङ्का. (1) - अपि (अव्य)सम्भावना. (1) - अपि (अव्य)समुच्चयः. (1) - अपि (अव्य)
उपमा. (1) - वा (अव्य)विकल्पः. (1) - वा (अव्य)अर्धः. (1) - सामि (अव्य)जुगुप्सितः. (1) - सामि (अव्य)
उपमायां विकल्पे वा सामि त्वर्धे जुगुप्सिते॥ ३.३.८७६ ॥
उपमा. (1) - वा (अव्य)विकल्पः. (1) - वा (अव्य)अर्धः. (1) - सामि (अव्य)जुगुप्सितः. (1) - सामि (अव्य)
सह. (1) - अमा (अव्य)समीपः. (1) - अमा (अव्य)
अमा सह समीपे च कं वारिणि च मूर्धनि॥ ३.३.८७७ ॥
सह. (1) - अमा (अव्य)समीपः. (1) - अमा (अव्य)
इव. (1) - एवम् (अव्य)इत्थम्. (1) - एवम् (अव्य)अर्थनिश्चयः. (1) - नूनम् (अव्य)तर्कः. (1) - नूनम् (अव्य)
इवेत्थमर्थयोरेवं नूनं तर्केऽर्थनिश्चये॥ ३.३.८७८ ॥
इव. (1) - एवम् (अव्य)इत्थम्. (1) - एवम् (अव्य)अर्थनिश्चयः. (1) - नूनम् (अव्य)तर्कः. (1) - नूनम् (अव्य)
आनन्दः. (1) - जोषम् (अव्य)तूष्णीमर्थः. (1) - जोषम् (अव्य)जुगुप्सनम्. (1) - किम् (अव्य)प्रश्नः. (1) - किम् (अव्य)
तूष्णीमर्थे सुखे जोषं किं पृच्छायां जुगुप्सने॥ ३.३.८७९ ॥
आनन्दः. (1) - जोषम् (अव्य)तूष्णीमर्थः. (1) - जोषम् (अव्य)जुगुप्सनम्. (1) - किम् (अव्य)प्रश्नः. (1) - किम् (अव्य)
कोपः. (1) - नामन् (अव्य)कुत्सनम्. (1) - नामन् (अव्य)प्राकाश्यः. (1) - नामन् (अव्य)सम्भाव्यः. (1) - नामन् (अव्य)उपगमः. (1) - नामन् (अव्य)
नाम प्राकाश्यसम्भाव्यक्रोधोपगमकुत्सने॥ ३.३.८८० ॥
कोपः. (1) - नामन् (अव्य)कुत्सनम्. (1) - नामन् (अव्य)प्राकाश्यः. (1) - नामन् (अव्य)सम्भाव्यः. (1) - नामन् (अव्य)उपगमः. (1) - नामन् (अव्य)
भूषणम्. (1) - अलम् (अव्य)पर्याप्तिः. (1) - अलम् (अव्य)शक्तिः. (1) - अलम् (अव्य)
अलं भूषणपर्याप्तिशक्तिवारणवाचकम्॥ ३.३.८८१ ॥
भूषणम्. (1) - अलम् (अव्य)पर्याप्तिः. (1) - अलम् (अव्य)शक्तिः. (1) - अलम् (अव्य)
परिप्रश्नः. (1) - हुम् (अव्य)वितर्कः. (1) - हुम् (अव्य)मध्यम्. (1) - समया (अव्य)समीपः. (1) - समया (अव्य)
हुं वितर्के परिप्रश्ने समयान्तिकमध्ययोः॥ ३.३.८८२ ॥
परिप्रश्नः. (1) - हुम् (अव्य)वितर्कः. (1) - हुम् (अव्य)मध्यम्. (1) - समया (अव्य)समीपः. (1) - समया (अव्य)
अप्रथमः. (1) - पुनर् (अव्य)भेदः. (1) - पुनर् (अव्य)निषेधः. (1) - निर् (अव्य)निश्चयः. (1) - निर् (अव्य)
पुनरप्रथमे भेदे निर्निश्चयनिषेधयोः॥ ३.३.८८३ ॥
अप्रथमः. (1) - पुनर् (अव्य)भेदः. (1) - पुनर् (अव्य)निषेधः. (1) - निर् (अव्य)निश्चयः. (1) - निर् (अव्य)
प्रबन्धम्. (1) - पुरा (अव्य)चिरातीतम्. (1) - पुरा (अव्य)निकटागामिकम्. (1) - पुरा (अव्य)
स्यात्प्रबन्धे चिरातीते निकटागामिके पुरा॥ ३.३.८८४ ॥
प्रबन्धम्. (1) - पुरा (अव्य)चिरातीतम्. (1) - पुरा (अव्य)निकटागामिकम्. (1) - पुरा (अव्य)
अङ्गीकृतिः. (3) - ऊररी (अव्य), ऊरी (अव्य), उररी (अव्य)विस्तरः. (3) - ऊररी (अव्य), ऊरी (अव्य), उररी (अव्य)
ऊरर्यूरी चोररी च विस्तारेऽङ्गीकृतौ त्रयम्॥ ३.३.८८५ ॥
अङ्गीकृतिः. (3) - ऊररी (अव्य), ऊरी (अव्य), उररी (अव्य)विस्तरः. (3) - ऊररी (अव्य), ऊरी (अव्य), उररी (अव्य)
परलोकः. (1) - स्वर् (अव्य)सम्भाव्यः. (1) - किल (अव्य)वार्ता. (1) - किल (अव्य)
स्वर्गे परे च लोके स्वर्वार्तासम्भाव्ययोः किल॥ ३.३.८८६ ॥
परलोकः. (1) - स्वर् (अव्य)सम्भाव्यः. (1) - किल (अव्य)वार्ता. (1) - किल (अव्य)
अनुनयः. (1) - खलु (अव्य)जिज्ञासा. (1) - खलु (अव्य)निषेधः. (1) - खलु (अव्य)वाक्यालङ्कारः. (1) - खलु (अव्य)
निषेधवाक्यालङ्कारजिज्ञासानुनये खलु॥ ३.३.८८७ ॥
अनुनयः. (1) - खलु (अव्य)जिज्ञासा. (1) - खलु (अव्य)निषेधः. (1) - खलु (अव्य)वाक्यालङ्कारः. (1) - खलु (अव्य)
अभिमुखम्. (1) - अभितस् (अव्य)साकल्यम्. (1) - अभितस् (अव्य)शीघ्रम्. (1) - अभितस् (अव्य)उभयतः. (1) - अभितस् (अव्य)
समीपोभयतश्शीघ्रसाकल्याभिमुखेऽभितः॥ ३.३.८८८ ॥
अभिमुखम्. (1) - अभितस् (अव्य)साकल्यम्. (1) - अभितस् (अव्य)शीघ्रम्. (1) - अभितस् (अव्य)उभयतः. (1) - अभितस् (अव्य)
नाम. (1) - प्रादुस् (अव्य)प्राकाश्यः. (1) - प्रादुस् (अव्य)अन्योन्यम्. (1) - मिथः (अव्य)रहस्यम्. (1) - मिथः (अव्य)
नामप्राकाश्ययोः प्रादुर्मिथोऽन्योन्यं रहस्यपि॥ ३.३.८८९ ॥
नाम. (1) - प्रादुस् (अव्य)प्राकाश्यः. (1) - प्रादुस् (अव्य)अन्योन्यम्. (1) - मिथः (अव्य)रहस्यम्. (1) - मिथः (अव्य)
अन्तर्धानम्. (1) - तिरस् (अव्य)अर्तिः. (1) - हा (अव्य)शुद्धिः. (1) - हा (अव्य)विषादः. (1) - हा (अव्य)
तिरोऽन्तर्धौ तिर्यगर्थे हा विषादशुगर्तिषु॥ ३.३.८९० ॥
अन्तर्धानम्. (1) - तिरस् (अव्य)अर्तिः. (1) - हा (अव्य)शुद्धिः. (1) - हा (अव्य)विषादः. (1) - हा (अव्य)
अद्भुतरसः. (1) - अहह (अव्य)दुःखम्. (1) - अहह (अव्य)अवधारणम्. (1) - हि (अव्य)
अहहेत्यद्भुते खेदे हि हेताववधारणे॥ ३.३.८९१ ॥
अद्भुतरसः. (1) - अहह (अव्य)दुःखम्. (1) - अहह (अव्य)अवधारणम्. (1) - हि (अव्य)
 ॥ । इति नानार्थवर्गः ॥

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