| |
|

This overlay will guide you through the buttons:

इति भूमिवर्गः
अथ पुरवर्गः
नगरम्. (5) - पुर् (स्त्री) , पुरी (स्त्री) , नगरी (स्त्री-नपुं) , पत्तन (नपुं) , पुटभेदन (नपुं)
पूः स्त्री पुरीनगर्यौ वा पत्तनं पुटभेदनम् ॥ २.२.४१ ॥
नगरम्. (5) - पुर् (स्त्री) , पुरी (स्त्री) , नगरी (स्त्री-नपुं) , पत्तन (नपुं) , पुटभेदन (नपुं)
नगरम्. (2) - स्थानीय (नपुं) , निगम (पुं) , राजधानी. (1) - मूलनगर (नपुं) , मूलनगरादन्यनगरम्. (1) - शाखानगर (नपुं)
स्थानीयं निगमोऽन्यत्तु यन्मूलनगरात्पुरम्॥ २.२.४२ ॥
नगरम्. (2) - स्थानीय (नपुं) , निगम (पुं) , राजधानी. (1) - मूलनगर (नपुं) , मूलनगरादन्यनगरम्. (1) - शाखानगर (नपुं)
वेश्यानिवासः. (2) - वेश (पुं) , वेश्याजनसमाश्रय (पुं)
तच्छाखानगरं वेशो वेश्याजनसमाश्रयः॥ २.२.४३ ॥
वेश्यानिवासः. (2) - वेश (पुं) , वेश्याजनसमाश्रय (पुं)
क्रय्यवस्तुशाला. (2) - आपण (पुं) , निषद्या (स्त्री) , क्रय्यवस्तुशालापङ्क्तिः. (2) - विपणि (स्त्री,पुं) , पण्यवीथिका (स्त्री)
आपणस्तु निषद्यायां विपणिः पण्यवीथिका॥ २.२.४४ ॥
क्रय्यवस्तुशाला. (2) - आपण (पुं) , निषद्या (स्त्री) , क्रय्यवस्तुशालापङ्क्तिः. (2) - विपणि (स्त्री,पुं) , पण्यवीथिका (स्त्री)
ग्राममध्यमार्गः. (3) - रथ्या (स्त्री) , प्रतोली (स्त्री) , विशिखा (स्त्री) , परिखोद्धृतमृत्तिकाकूटः. (2) - चय (पुं) , वप्र (पुं, नपुं)
रथ्या प्रतोली विशिखा स्याच्चयो वप्रमस्त्रियाम्॥ २.२.४५ ॥
ग्राममध्यमार्गः. (3) - रथ्या (स्त्री) , प्रतोली (स्त्री) , विशिखा (स्त्री) , परिखोद्धृतमृत्तिकाकूटः. (2) - चय (पुं) , वप्र (पुं, नपुं)
यष्टिकाकण्टकादिरचितवेष्टनम्. (3) - प्राकार (पुं) , वरण (पुं) , साल (पुं) , कण्टकादिवेष्टनम्. (1) - प्राचीन (नपुं)
प्राकारो वरणः सालः प्राचीनं प्रातन्तो वृतिः॥ २.२.४६ ॥
यष्टिकाकण्टकादिरचितवेष्टनम्. (3) - प्राकार (पुं) , वरण (पुं) , साल (पुं) , कण्टकादिवेष्टनम्. (1) - प्राचीन (नपुं)
भित्तिः. (2) - भित्ति (स्त्री) , कुड्य (नपुं) , अस्थ्यादिमयभित्तिः. (1) - एडूक (नपुं)
भित्तिः स्त्री कुड्यमेडूकं यदन्तर्न्यस्तकीकसम्॥ २.२.४७ ॥
भित्तिः. (2) - भित्ति (स्त्री) , कुड्य (नपुं) , अस्थ्यादिमयभित्तिः. (1) - एडूक (नपुं)
गृहम्. (6) - गृह (नपुं) , गेह (पुं-नपुं) , उदवसित (नपुं) , वेश्मन् (नपुं) , सद्मन् (नपुं) , निकेतन (नपुं)
गृहं गेहोदवसितं वेश्म सद्म निकेतनम्॥ २.२.४८ ॥
गृहम्. (6) - गृह (नपुं) , गेह (पुं-नपुं) , उदवसित (नपुं) , वेश्मन् (नपुं) , सद्मन् (नपुं) , निकेतन (नपुं)
गृहम्. (6) - निशान्त (नपुं) , वस्त्य (नपुं) , सदन (नपुं) , भवन (नपुं) , आगार (नपुं) , मन्दिर (नपुं)
निशान्तं पस्त्यसदनं भवनागारमन्दिरम्॥ २.२.४९ ॥
गृहम्. (6) - निशान्त (नपुं) , वस्त्य (नपुं) , सदन (नपुं) , भवन (नपुं) , आगार (नपुं) , मन्दिर (नपुं)
गृहम्. (4) - गृह (पुं-बहु) , निकाय्य (पुं) , निलय (पुं) , आलय (पुं)
गृहाः पुंसि च भूम्न्येव निकाय्यनिलयालयाः॥ २.२.५० ॥
गृहम्. (4) - गृह (पुं-बहु) , निकाय्य (पुं) , निलय (पुं) , आलय (पुं)
सभागृहम्. (4) - वास (पुं) , कुटी (स्त्री-पुं) , शाला (स्त्री) , सभा (स्त्री)
वासः कुटी द्वयोः शाला सभा संजवनं त्विदम्॥ २.२.५१ ॥
सभागृहम्. (4) - वास (पुं) , कुटी (स्त्री-पुं) , शाला (स्त्री) , सभा (स्त्री)
अन्योन्याभिमुखशालाचतुष्कम्. (1) - सञ्जवन (नपुं) , अन्योन्याभिमुखशालाचतुष्कम्. (1) - चतुःशाल (नपुं) , मुनीनां गृहम्. (2) - पर्णशाला (स्त्री) , उटज (पुं-नपुं)
चतुःशालं मुनीनां तु पर्णशालोटजोऽस्त्रियाम्॥ २.२.५२ ॥
अन्योन्याभिमुखशालाचतुष्कम्. (1) - सञ्जवन (नपुं) , अन्योन्याभिमुखशालाचतुष्कम्. (1) - चतुःशाल (नपुं) , मुनीनां गृहम्. (2) - पर्णशाला (स्त्री) , उटज (पुं-नपुं)
यज्ञस्थानम्. (2) - चैत्य (नपुं) , आयतन (नपुं) , अश्वालयः. (2) - वाजिशाला (स्त्री) , मन्दुरा (स्त्री)
चैत्यमायतनं तुल्ये वाजिशाला तु मन्दुरा॥ २.२.५३ ॥
यज्ञस्थानम्. (2) - चैत्य (नपुं) , आयतन (नपुं) , अश्वालयः. (2) - वाजिशाला (स्त्री) , मन्दुरा (स्त्री)
स्वर्णकारादीनाम् शाला. (2) - आवेशन (नपुं) , शिल्पिशाला (स्त्री) , जलशाला. (2) - प्रपा (स्त्री) , पानीयशालिका (स्त्री)
आवेशनं शिल्पिशाला प्रपा पानीयशालिका॥ २.२.५४ ॥
स्वर्णकारादीनाम् शाला. (2) - आवेशन (नपुं) , शिल्पिशाला (स्त्री) , जलशाला. (2) - प्रपा (स्त्री) , पानीयशालिका (स्त्री)
शिष्याणां निलयः. (1) - मठ (पुं) , मद्यसन्धानगृहम्. (2) - गञ्जा (स्त्री) , मदिरागृह (नपुं)
मठश्छात्रादिनिलयो गञ्जा तु मदिरागृहम्॥ २.२.५५ ॥
शिष्याणां निलयः. (1) - मठ (पुं) , मद्यसन्धानगृहम्. (2) - गञ्जा (स्त्री) , मदिरागृह (नपुं)
गृहमध्यभागः. (2) - गर्भागार (नपुं) , वासगृह (नपुं) , प्रसवस्थानम्. (2) - अरिष्ट (नपुं) , सूतिकागृह (नपुं)
गर्भागारं वासगृहमरिष्टं सूतिकागृहम्॥ २.२.५६ ॥
गृहमध्यभागः. (2) - गर्भागार (नपुं) , वासगृह (नपुं) , प्रसवस्थानम्. (2) - अरिष्ट (नपुं) , सूतिकागृह (नपुं)
पाषाणादिनिबद्धा भूः. (1) - कुट्टिम (पुं) , चन्द्रशाला. (2) - चन्द्रशाला (स्त्री) , शिरोगृह (नपुं)
कुट्टिमोऽस्त्री निबद्धा भूश्चन्द्रशाला शिरोगृहम्॥ २.२.५७ ॥
पाषाणादिनिबद्धा भूः. (1) - कुट्टिम (पुं) , चन्द्रशाला. (2) - चन्द्रशाला (स्त्री) , शिरोगृह (नपुं)
जालकम्. (2) - वातायन (नपुं) , गवाक्ष (पुं)
वातायनं गवाक्षोऽथ मण्डपोऽस्त्री जनाश्रयः॥ २.२.५८ ॥
जालकम्. (2) - वातायन (नपुं) , गवाक्ष (पुं)
हर्म्यादि धनिनां वासः प्रासादो देवभूभुजाम्॥ २.२.५९ ॥
राजगृहम्. (2) - सौध (पुं-नपुं) , राजसदन (नपुं) , राजगृहसामान्यम्. (2) - उपकार्या (स्त्री) , उपकारिका (स्त्री)
सौधोऽस्त्री राजसदनमुपकार्योपकारिका॥ २.२.६० ॥
राजगृहम्. (2) - सौध (पुं-नपुं) , राजसदन (नपुं) , राजगृहसामान्यम्. (2) - उपकार्या (स्त्री) , उपकारिका (स्त्री)
ईश्वरगृहविशेषः. (3) - स्वस्तिक (पुं) , सर्वतोभद्र (पुं) , नन्द्यावर्त (पुं)
स्वस्तिकः सर्वतोभद्रो नन्द्यावर्तादयोऽपि च॥ २.२.६१ ॥
ईश्वरगृहविशेषः. (3) - स्वस्तिक (पुं) , सर्वतोभद्र (पुं) , नन्द्यावर्त (पुं)
ईश्वरगृहविशेषः. (2) - विच्छन्दक (पुं) , प्रभेद (पुं)
विच्छन्दकः प्रभेदा हि भवन्तीश्वरसद्मनाम्॥ २.२.६२ ॥
ईश्वरगृहविशेषः. (2) - विच्छन्दक (पुं) , प्रभेद (पुं)
राज्ञां स्त्रीगृहम्. (2) - स्त्र्यगार (नपुं) , अन्तःपुर (नपुं)
स्त्र्यगारं भूभुजामन्तःपुरं स्यादवरोधनम्॥ २.२.६३ ॥
राज्ञां स्त्रीगृहम्. (2) - स्त्र्यगार (नपुं) , अन्तःपुर (नपुं)
राज्ञां स्त्रीगृहम्. (2) - शुद्धान्त (पुं) , अवरोधन (नपुं) , हर्म्याद्युपरिगृहम्. (2) - अट्ट (पुं) , क्षौम (पुं-नपुं)
शुद्धान्तश्चावरोधश्च स्यादट्टः क्षौममस्त्रियाम्॥ २.२.६४ ॥
राज्ञां स्त्रीगृहम्. (2) - शुद्धान्त (पुं) , अवरोधन (नपुं) , हर्म्याद्युपरिगृहम्. (2) - अट्ट (पुं) , क्षौम (पुं-नपुं)
त्रीणिद्वाराद्बहिर्वर्तमानः प्रकोष्टकः. (3) - प्रघाण (पुं) , प्रघण (पुं) , अलिन्द (पुं)
प्रघाणप्रघणालिन्दा बहिर्द्वारप्रकोष्ठके॥ २.२.६५ ॥
त्रीणिद्वाराद्बहिर्वर्तमानः प्रकोष्टकः. (3) - प्रघाण (पुं) , प्रघण (पुं) , अलिन्द (पुं)
देहली. (2) - गृहावग्रहणी (स्त्री) , देहली (स्त्री) ,प्राङ्गणम्. (3) - अङ्गण (नपुं) , चत्वर (नपुं) , अजिर (नपुं)
गृहावग्रहणी देहल्यङ्गणं चत्वराजिरे॥ २.२.६६ ॥
देहली. (2) - गृहावग्रहणी (स्त्री) , देहली (स्त्री) ,प्राङ्गणम्. (3) - अङ्गण (नपुं) , चत्वर (नपुं) , अजिर (नपुं)
द्वारस्तम्भाधःस्थितकाष्ठम्. (1) - शिला (स्त्री) , द्वारस्तम्भोपरिस्थितदारुः. (1) - नासा (स्त्री)
अधस्ताद्दारुणि शिला नासा दारुपरि स्थितम्॥ २.२.६७ ॥
द्वारस्तम्भाधःस्थितकाष्ठम्. (1) - शिला (स्त्री) , द्वारस्तम्भोपरिस्थितदारुः. (1) - नासा (स्त्री)
गुप्तद्वारम्. (2) - प्रच्छन्न (नपुं) , अन्तर्द्वार (नपुं) , पार्श्वद्वारम्. (2) - पक्षद्वार (नपुं) , पक्षक (पुं)
प्रच्छन्नमन्तर्द्वारं स्यात्पक्षद्वारं तु पक्षकम्॥ २.२.६८ ॥
गुप्तद्वारम्. (2) - प्रच्छन्न (नपुं) , अन्तर्द्वार (नपुं) , पार्श्वद्वारम्. (2) - पक्षद्वार (नपुं) , पक्षक (पुं)
गृहाच्छादनपटलप्रान्तभागः. (3) - वलीक (पुं, नपुं) , नीध्र (नपुं) , पटलप्रान्त (पुं) , छादनम्. (2) - पटल (नपुं) , छदिस् (स्त्री)
वलीकनीध्रे पटलप्रान्तेऽथ पटलं छदिः॥ २.२.६९ ॥
गृहाच्छादनपटलप्रान्तभागः. (3) - वलीक (पुं, नपुं) , नीध्र (नपुं) , पटलप्रान्त (पुं) , छादनम्. (2) - पटल (नपुं) , छदिस् (स्त्री)
छादनार्थवक्रदारुः. (2) - गोपानसी (स्त्री) , वलभी (स्त्री)
गोपानसी तु वलभी छादने वक्रदारुणि॥ २.२.७० ॥
छादनार्थवक्रदारुः. (2) - गोपानसी (स्त्री) , वलभी (स्त्री)
गृहप्रान्तस्थपक्षिस्थानम्. (2) - कपोतपालिका (स्त्री) , विटङ्क (पुं-नपुं)
कपोतपालिकायां तु विटङ्कं पुंनपुंसकम्॥ २.२.७१ ॥
गृहप्रान्तस्थपक्षिस्थानम्. (2) - कपोतपालिका (स्त्री) , विटङ्क (पुं-नपुं)
द्वारम्. (3) - द्वा (स्त्री) , द्वार (नपुं) , प्रतीहार (पुं) , प्राङ्गणस्थोपवेशस्थानम्. (2) - वितर्दि (स्त्री) , वेदिका (स्त्री)
स्त्री द्वार्द्वारं प्रतीहारः स्याद्धितर्दिस्तु वेदिका॥ २.२.७२ ॥
द्वारम्. (3) - द्वा (स्त्री) , द्वार (नपुं) , प्रतीहार (पुं) , प्राङ्गणस्थोपवेशस्थानम्. (2) - वितर्दि (स्त्री) , वेदिका (स्त्री)
द्वारबाह्यभागम्. (2) - तोरण (पुं-नपुं) , बहिर्द्वार (नपुं) , नगरद्वारम्. (2) - पुरद्वार (नपुं) , गोपुर (नपुं)
तोरणोऽस्त्री बहिर्द्वारम् पुरद्वारं तु गोपुरम्॥ २.२.७३ ॥
द्वारबाह्यभागम्. (2) - तोरण (पुं-नपुं) , बहिर्द्वार (नपुं) , नगरद्वारम्. (2) - पुरद्वार (नपुं) , गोपुर (नपुं)
नगरद्वारावतरणार्थं कृतं मृत्कूटम्. (1) - हस्तिनख (पुं)
कूटं पूर्द्वारि यद्धस्तिनखस्तस्मिन्नथ त्रिषु॥ २.२.७४ ॥
नगरद्वारावतरणार्थं कृतं मृत्कूटम्. (1) - हस्तिनख (पुं)
कवाटम्. (2) - कपाट (वि) , अरर (वि) , कवाटबन्धनकाष्ठम्. (1) - अर्गल (स्त्री-नपुं)
कपाटमररं तुल्ये तद्विष्कम्भोऽर्गलं न ना॥ २.२.७५ ॥
कवाटम्. (2) - कपाट (वि) , अरर (वि) , कवाटबन्धनकाष्ठम्. (1) - अर्गल (स्त्री-नपुं)
सौधाद्यारोहणमार्गः. (2) - आरोहण (नपुं) , सोपान (नपुं) , काष्टादिकृतावरोहणमार्गः. (2) - निःश्रेणि (स्त्री) , अधिरोहिणी (स्त्री)
आरोहणं स्यात्सोपानं निश्रेणिस्त्वधिरोहिणी॥ २.२.७६ ॥
सौधाद्यारोहणमार्गः. (2) - आरोहण (नपुं) , सोपान (नपुं) , काष्टादिकृतावरोहणमार्गः. (2) - निःश्रेणि (स्त्री) , अधिरोहिणी (स्त्री)
गृहसम्मार्जनी. (2) - सम्मार्जनी (स्त्री) , शोधनी (स्त्री) , गृहशोधन्याक्षिप्त धूल्यादिः-कचरा. (2) - सङ्कर (पुं) , अवकर (पुं)
संमार्जनी शोधनी स्यात्संकरोऽवकरस्तथा॥ २.२.७७ ॥
गृहसम्मार्जनी. (2) - सम्मार्जनी (स्त्री) , शोधनी (स्त्री) , गृहशोधन्याक्षिप्त धूल्यादिः-कचरा. (2) - सङ्कर (पुं) , अवकर (पुं)
गृहनिर्गमनप्रवेशमार्गः. (2) - मुख (नपुं) , निःसरण (नपुं) , गृहरचनापरिच्छिन्नदेशः. (2) - संनिवेश (पुं) , निकर्षण (नपुं)
क्षिप्ते मुखं निःसरणं संनिवेशो निकर्षणम्॥ २.२.७८ ॥
गृहनिर्गमनप्रवेशमार्गः. (2) - मुख (नपुं) , निःसरण (नपुं) , गृहरचनापरिच्छिन्नदेशः. (2) - संनिवेश (पुं) , निकर्षण (नपुं)
ग्रामः. (2) - संवसथ (पुं) , ग्राम (पुं) , गृहरचनावच्छिन्नवास्तुभूमिः. (2) - वेश्मभू (स्त्री) , वास्तु (पुं-नपुं)
समौ संवसथग्रामौ वेश्मभूर्वास्तुरस्त्रियाम्॥ २.२.७९ ॥
ग्रामः. (2) - संवसथ (पुं) , ग्राम (पुं) , गृहरचनावच्छिन्नवास्तुभूमिः. (2) - वेश्मभू (स्त्री) , वास्तु (पुं-नपुं)
ग्रामादिसमीपदेशः. (2) - ग्रामान्त (नपुं) , उपशल्य (नपुं) , सीमा. (2) - सीमा (स्त्री) , सीमन् (स्त्री)
ग्रामान्त उपशल्यं स्यात्सीमसीमे स्त्रियामुभे॥ २.२.८० ॥
ग्रामादिसमीपदेशः. (2) - ग्रामान्त (नपुं) , उपशल्य (नपुं) , सीमा. (2) - सीमा (स्त्री) , सीमन् (स्त्री)
गोपग्रामः. (2) - घोष (पुं) , आभीरपल्ली (स्त्री) , भिल्लग्रामः. (2) - पक्कण (पुं) , शबरालय (पुं)
घोष आभीरपल्ली स्यात्पक्कणः शबरालयः ॥ २.२.८१ ॥
गोपग्रामः. (2) - घोष (पुं) , आभीरपल्ली (स्त्री) , भिल्लग्रामः. (2) - पक्कण (पुं) , शबरालय (पुं)

Add to Playlist

Practice Later

No Playlist Found

Create a Verse Post


Shloka QR Code

🔗

🪔 Powered by Gyaandweep.com

namo namaḥ!

भाषा चुने (Choose Language)

नमो नमः

Practice 100+ Vedic scriptures and 1000s of chants — one verse at a time.

Sign In