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इति पुरवर्गः
अथ शैलवर्गः
पर्वतः. (6) - महीध्र (पुं) , शिखरिन् (पुं) , क्ष्माभृत् (पुं) , अहार्य (पुं) , धर (पुं) , पर्वत (पुं)
महीध्रे शिखरिक्ष्माभृदहार्यधरपर्वताः । ॥ २.३.८२ ॥
पर्वतः. (6) - महीध्र (पुं) , शिखरिन् (पुं) , क्ष्माभृत् (पुं) , अहार्य (पुं) , धर (पुं) , पर्वत (पुं)
पर्वतः. (7) - अद्रि (पुं) , गोत्र (पुं) , गिरि (पुं) , ग्रावन् (पुं) , अचल (पुं) , शैल (पुं) , शिलोच्चय (पुं)
अद्रिगोत्रगिरिग्रावाचलशैलशिलोच्चयाः॥ २.३.८३ ॥
पर्वतः. (7) - अद्रि (पुं) , गोत्र (पुं) , गिरि (पुं) , ग्रावन् (पुं) , अचल (पुं) , शैल (पुं) , शिलोच्चय (पुं)
लोकालोकपर्वतः. (2) - लोकालोक (पुं) , चक्रवाल (पुं) ; लङ्काधिष्ठानपर्वतः. (2) - त्रिकूट (पुं) , त्रिककुद् (पुं)
लोकालोकश्चक्रवालस्त्रिकूटस्त्रिककुत्समौ॥ २.३.८४ ॥
लोकालोकपर्वतः. (2) - लोकालोक (पुं) , चक्रवाल (पुं) ; लङ्काधिष्ठानपर्वतः. (2) - त्रिकूट (पुं) , त्रिककुद् (पुं)
पश्चिमपर्वतः. (2) - अस्त (पुं) , चरमक्ष्माभृत् (पुं) ; उदयपर्वतः. (2) - उदय (पुं) , पूर्वपर्वत (पुं)
अस्तस्तु चरमक्ष्माभृदुदयः पूर्वपर्वतः॥ २.३.८५ ॥
पश्चिमपर्वतः. (2) - अस्त (पुं) , चरमक्ष्माभृत् (पुं) ; उदयपर्वतः. (2) - उदय (पुं) , पूर्वपर्वत (पुं)
हिमवान्. (1) - हिमवत् (पुं) ; निषधपर्वतः. (1) - निषध (पुं) ; विन्ध्यापर्वतः. (1) - विन्ध्य (पुं) ; माल्यवान्. (1) - माल्यवत् (पुं) ; परियात्रकपर्वतः. (1) - परियात्रक (पुं)
हिमवान्निषधो विन्ध्यो माल्यवान्पारियात्रिकः॥ २.३.८६ ॥
हिमवान्. (1) - हिमवत् (पुं) ; निषधपर्वतः. (1) - निषध (पुं) ; विन्ध्यापर्वतः. (1) - विन्ध्य (पुं) ; माल्यवान्. (1) - माल्यवत् (पुं) ; परियात्रकपर्वतः. (1) - परियात्रक (पुं)
गन्धमादनपर्वतः. (1) - गन्धमादन (नपुं) ; हेमकूटपर्वतः. (1) - हेमकूट (पुं)
गन्धमादनमन्ये च हेमकूटादयो नगाः॥ २.३.८७ ॥
गन्धमादनपर्वतः. (1) - गन्धमादन (नपुं) ; हेमकूटपर्वतः. (1) - हेमकूट (पुं)
पाषाणप्रस्तरग्रावोपलाश्मानः शिला दृषत्॥ २.३.८८ ॥
पर्वताग्रः. (3) - कूट (पुं-नपुं) , शिखर (नपुं) , शृङ्ग (नपुं) ; पर्वतात्पतनस्थानम्. (3) - प्रपात (पुं) , अतट (पुं) , भृगु (पुं)
कूटोऽस्त्री शिखरं शृङ्गं प्रपातस्त्वतटो भृगुः॥ २.३.८९ ॥
पर्वताग्रः. (3) - कूट (पुं-नपुं) , शिखर (नपुं) , शृङ्ग (नपुं) ; पर्वतात्पतनस्थानम्. (3) - प्रपात (पुं) , अतट (पुं) , भृगु (पुं)
मेखलाख्यपर्वतमध्यभागः. (1) - कटक (पुं-नपुं) ; पर्वतसमभूभागः. (3) - स्नु (पुं) , प्रस्थ (पुं-नपुं) , सानु (पुं-नपुं)
कटकोऽस्त्री नितम्बोऽद्रेः स्नुः प्रस्थः सानुरस्त्रियाम्॥ २.३.९० ॥
मेखलाख्यपर्वतमध्यभागः. (1) - कटक (पुं-नपुं) ; पर्वतसमभूभागः. (3) - स्नु (पुं) , प्रस्थ (पुं-नपुं) , सानु (पुं-नपुं)
जलस्रवणस्थानम्. (2) - उत्स (पुं) , प्रस्रवण (नपुं) ; निर्गतजलप्रवाहः. (3) - वारिप्रवाह (पुं) , निर्झर (पुं) , झर (पुं)
उत्सः प्रस्रवणं वारिप्रवाहो निर्झरो झरः॥ २.३.९१ ॥
जलस्रवणस्थानम्. (2) - उत्स (पुं) , प्रस्रवण (नपुं) ; निर्गतजलप्रवाहः. (3) - वारिप्रवाह (पुं) , निर्झर (पुं) , झर (पुं)
कृत्रिमगृहाकारगिरिविवरम्. (2) - दरी (स्त्री) , कन्दर (स्त्री-पुं) ; गिरिबिलम्. (3) - देवखात (नपुं) , बिल (नपुं) , गुहा (स्त्री)
दरी तु कन्दरो वा स्त्री देवखातबिले गुहा॥ २.३.९२ ॥
कृत्रिमगृहाकारगिरिविवरम्. (2) - दरी (स्त्री) , कन्दर (स्त्री-पुं) ; गिरिबिलम्. (3) - देवखात (नपुं) , बिल (नपुं) , गुहा (स्त्री)
गिरिबिलम्. (1) - गह्वर (नपुं) ; पतितस्थूलपाषाणः. (1) - गण्डशैल (पुं)
गह्वरं गण्डशैलास्तु च्युताः स्थूलोपला गिरेः॥ २.३.९३ ॥
गिरिबिलम्. (1) - गह्वर (नपुं) ; पतितस्थूलपाषाणः. (1) - गण्डशैल (पुं)
पर्वतनिर्गतशिलाखण्डः. (1) - दन्तक (पुं)
दन्तकास्तु बहिस्तिर्यक् प्रदेशान्निर्गता गिरेः॥ २.३.९४ ॥
पर्वतनिर्गतशिलाखण्डः. (1) - दन्तक (पुं)
रत्नाद्युत्पत्तिस्थानम्. (2) - खनि (स्त्री) , आकर (पुं) ; पर्वतसमीपस्थाल्पपर्वतः. (2) - पाद (पुं) , प्रत्यन्तपर्वत (पुं)
खनिः स्त्रियामाकरः स्यात्पादाः प्रत्यन्तपर्वताः॥ २.३.९५ ॥
रत्नाद्युत्पत्तिस्थानम्. (2) - खनि (स्त्री) , आकर (पुं) ; पर्वतसमीपस्थाल्पपर्वतः. (2) - पाद (पुं) , प्रत्यन्तपर्वत (पुं)
उपत्यकाद्रेरासन्ना भूमिरूर्ध्वमधित्यका॥ २.३.९६ ॥
अद्रेरधस्थोर्ध्वासन्नभूमिः. (1) - उपत्यका (स्त्री)
धातुर्मनःशिलाद्यद्रेर्गैरिकं तु विशेषतः॥ २.३.९७ ॥
अद्रेरधस्थोर्ध्वासन्नभूमिः. (1) - उपत्यका (स्त्री)
मनःशिलादिधातुः. (1) - धातु (पुं)
निकुञ्जकुञ्जौ वा क्लीबे लतादिपिहितोदरे ॥ २.३.९८ ॥
मनःशिलादिधातुः. (1) - धातु (पुं)

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