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अथ शूद्रवर्गः
शूद्रः. (4) - शूद्र (पुं), अवरवर्ण (पुं), वृषल (पुं), जघन्यज (पुं)
शूद्राश्चाऽवरवर्णाश्च वृषलाश्च जघन्यजाः ॥ २.८.१३९७ ॥
शूद्रः. (4) - शूद्र (पुं), अवरवर्ण (पुं), वृषल (पुं), जघन्यज (पुं)
सङ्करवर्णः. (1) - अम्बष्ठकरण (पुं)
आचण्डालात् तु संकीर्णा अम्बष्ठकरणाऽदयः॥ २.८.१३९८ ॥
सङ्करवर्णः. (1) - अम्बष्ठकरण (पुं)
वैश्याच्छूद्रायां जातः. (1) - करण (पुं)वैश्यात्ब्राह्मणीभ्यामुत्पन्नः. (1) - अम्बष्ठ (पुं)
शूद्राविशोस्तु करणोऽम्बष्ठो वैश्याद्विजन्मनोः॥ २.८.१३९९ ॥
वैश्याच्छूद्रायां जातः. (1) - करण (पुं)वैश्यात्ब्राह्मणीभ्यामुत्पन्नः. (1) - अम्बष्ठ (पुं)
शूद्राक्षत्रियाभ्यामुत्पन्नः. (1) - उग्र (पुं)क्षत्रियाद्वैश्याभ्यामुत्पन्नः. (1) - मागध (पुं)
शूद्राक्षत्रिययोरुग्रो मागधःक्षत्रियाविशोः॥ २.८.१४०० ॥
शूद्राक्षत्रियाभ्यामुत्पन्नः. (1) - उग्र (पुं)क्षत्रियाद्वैश्याभ्यामुत्पन्नः. (1) - मागध (पुं)
वैश्याक्षत्रियाभ्यामुत्पन्नः. (1) - माहिष (पुं)आर्यशूद्राभ्यामुत्पन्नः. (1) - क्षन्त्रृ (पुं)
माहिषोऽर्याक्षत्रिययोः क्षत्ताऽर्याशूद्रयोः सुतः॥ २.८.१४०१ ॥
वैश्याक्षत्रियाभ्यामुत्पन्नः. (1) - माहिष (पुं)आर्यशूद्राभ्यामुत्पन्नः. (1) - क्षन्त्रृ (पुं)
क्षत्रियाद्ब्राह्मण्यामुत्पन्नः. (1) - सूत (पुं)वैश्यात् ब्राह्मण्यामुत्पन्नः. (1) - वैदेहक (पुं)
ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सूतस्तस्यां वैदेहको विशः॥ २.८.१४०२ ॥
क्षत्रियाद्ब्राह्मण्यामुत्पन्नः. (1) - सूत (पुं)वैश्यात् ब्राह्मण्यामुत्पन्नः. (1) - वैदेहक (पुं)
करण्यां माहिष्यादुत्पन्नः. (1) - रथकार (पुं)
रथकारस्तु माहिष्यात् करण्यां यस्य संभवः॥ २.८.१४०३ ॥
करण्यां माहिष्यादुत्पन्नः. (1) - रथकार (पुं)
ब्राह्मण्यां वृषलेन जनितः. (1) - चण्डाल (पुं)
स्याच् चण्डालस्तु जनितो ब्राह्मण्यां वृषलेन यः॥ २.८.१४०४ ॥
ब्राह्मण्यां वृषलेन जनितः. (1) - चण्डाल (पुं)
चित्रकारादिः. (2) - कारु (पुं), शिल्पिन् (पुं)सजातीयशिल्पिसङ्घः. (1) - श्रेणि (स्त्री-पुं)
कारुः शिल्पी संहतैस्तैर्द्वयोः श्रेणिः सजातिभिः॥ २.८.१४०५ ॥
चित्रकारादिः. (2) - कारु (पुं), शिल्पिन् (पुं)सजातीयशिल्पिसङ्घः. (1) - श्रेणि (स्त्री-पुं)
कारुसङ्घे मुख्यः. (2) - कुलक (पुं), कुलश्रेष्ठिन् (पुं)मालाकारः. (2) - मालाकार (पुं), मालिक (पुं)
कुलकः स्यात् कुलश्रेष्ठी मालाकारस्तु मालिकः॥ २.८.१४०६ ॥
कारुसङ्घे मुख्यः. (2) - कुलक (पुं), कुलश्रेष्ठिन् (पुं)मालाकारः. (2) - मालाकार (पुं), मालिक (पुं)
कुम्भकारः. (2) - कुम्भकार (पुं), कुलाल (पुं)गृहादौ लेपकारः. (2) - पलगण्ड (पुं), लेपक (पुं)
कुम्भकारः कुलालः स्यात् पलगण्डस्तु लेपकः॥ २.८.१४०७ ॥
कुम्भकारः. (2) - कुम्भकार (पुं), कुलाल (पुं)गृहादौ लेपकारः. (2) - पलगण्ड (पुं), लेपक (पुं)
पटनिर्माता. (2) - तन्तुवाय (पुं), कुविन्द (पुं)कञ्चुक्यादेर्निर्माता. (2) - तुन्नवाय (पुं), सौचिक (पुं)
तन्तुवायः कुविन्दः स्यात् तुन्नवायस्तु सौचिकः॥ २.८.१४०८ ॥
पटनिर्माता. (2) - तन्तुवाय (पुं), कुविन्द (पुं)कञ्चुक्यादेर्निर्माता. (2) - तुन्नवाय (पुं), सौचिक (पुं)
चित्रकारः. (2) - रङ्गाजीव (पुं), चित्रकर (पुं)शस्त्रघर्षणोपजीविः. (2) - शस्त्रमार्ज (पुं), असिधावक (पुं)
रङ्गाजीवश्चित्रकरः शस्त्रमार्जोऽसि धावकः॥ २.८.१४०९ ॥
चित्रकारः. (2) - रङ्गाजीव (पुं), चित्रकर (पुं)शस्त्रघर्षणोपजीविः. (2) - शस्त्रमार्ज (पुं), असिधावक (पुं)
चर्मकारः. (2) - पादकृत् (पुं), चर्मकार (पुं)लोहकारकः. (2) - व्योकार (पुं), लोहकारक (पुं)
पादकृच् चर्मकारः स्याद् व्योकारो लोहकारकः॥ २.८.१४१० ॥
चर्मकारः. (2) - पादकृत् (पुं), चर्मकार (पुं)लोहकारकः. (2) - व्योकार (पुं), लोहकारक (पुं)
स्वर्णकारः. (4) - नाडिन्धम (पुं), स्वर्णकार (पुं), कलाद (पुं), रुक्मकारक (पुं)
नाडिन्धमः स्वर्णकारः कलादो रुक्मकारकः॥ २.८.१४११ ॥
स्वर्णकारः. (4) - नाडिन्धम (पुं), स्वर्णकार (पुं), कलाद (पुं), रुक्मकारक (पुं)
शङ्खवादकः. (2) - शाङ्खिक (पुं), काम्बविक (पुं)ताम्रकारः. (2) - शौल्बिक (पुं), ताम्रकुट्टक (पुं)
स्याच्छाङ्खिकः काम्बविकः शौल्बिकस्ताम्रकुट्टकः॥ २.८.१४१२ ॥
शङ्खवादकः. (2) - शाङ्खिक (पुं), काम्बविक (पुं)ताम्रकारः. (2) - शौल्बिक (पुं), ताम्रकुट्टक (पुं)
तक्षः. (5) - तक्षन् (पुं), वर्धकि (पुं), त्वष्टृ (पुं), रथकार (पुं), काष्ठतक्ष (पुं)
तक्षा तु वर्धकिस्त्वष्टा रथकारश्च काष्ठतट्॥ २.८.१४१३ ॥
तक्षः. (5) - तक्षन् (पुं), वर्धकि (पुं), त्वष्टृ (पुं), रथकार (पुं), काष्ठतक्ष (पुं)
ग्रामतक्षः. (2) - ग्रामाधीन (पुं), ग्रामतक्ष (पुं)कौटतक्षः. (1) - कौटतक्ष (पुं)
ग्रामाऽधीनो ग्रामतक्षः कौटतक्षोऽनधीनकः॥ २.८.१४१४ ॥
ग्रामतक्षः. (2) - ग्रामाधीन (पुं), ग्रामतक्ष (पुं)कौटतक्षः. (1) - कौटतक्ष (पुं)
क्षुरिः. (5) - क्षुरिन् (पुं), मुण्डिन् (पुं), दिवाकीर्ति (पुं), नापित (पुं), अन्तावसायिन् (पुं)
क्षुरी मुण्डी दिवाकीर्तिनापिताऽन्तावसायिनः॥ २.८.१४१५ ॥
क्षुरिः. (5) - क्षुरिन् (पुं), मुण्डिन् (पुं), दिवाकीर्ति (पुं), नापित (पुं), अन्तावसायिन् (पुं)
रजकः. (2) - निर्णेजक (पुं), रजक (पुं)शौण्डिकः. (2) - शौण्डिक (पुं), मण्डहारक (पुं)
निर्णेजकः स्याद् रजकः शौण्डिको मण्डहारकः॥ २.८.१४१६ ॥
रजकः. (2) - निर्णेजक (पुं), रजक (पुं)शौण्डिकः. (2) - शौण्डिक (पुं), मण्डहारक (पुं)
अजाजीवनः. (2) - जाबाल (पुं), अजाजीव (पुं)देवपूजोपजीविनः. (2) - देवाजीव (पुं), देवल (पुं)
जाबालः स्यादजाजीवो देवाजीवस्तु देवलः॥ २.८.१४१७ ॥
अजाजीवनः. (2) - जाबाल (पुं), अजाजीव (पुं)देवपूजोपजीविनः. (2) - देवाजीव (पुं), देवल (पुं)
इन्द्रजालादिमाया. (2) - माया (स्त्री), शाम्बरी (स्त्री)इन्द्रजालिकः. (2) - मायाकार (पुं), प्रतिहारक (पुं)
स्यान् माया शाम्बरी मायाकारस्तु प्रतिहारकः॥ २.८.१४१८ ॥
इन्द्रजालादिमाया. (2) - माया (स्त्री), शाम्बरी (स्त्री)इन्द्रजालिकः. (2) - मायाकार (पुं), प्रतिहारक (पुं)
नटः. (4) - शैलालिन् (पुं), शैलूष (पुं), जायाजीव (पुं), कृशाश्विन् (पुं)
शैलालिनस्तु शैलूषा जायाजीवाः कृशाश्विनः॥ २.८.१४१९ ॥
नटः. (4) - शैलालिन् (पुं), शैलूष (पुं), जायाजीव (पुं), कृशाश्विन् (पुं)
नटः. (2) - भरत (पुं), नट (पुं)काथिकः. (2) - चारण (पुं), कुशीलव (पुं)
भरता इत्यपि नटाश्चारणास्तु कुशीलवाः॥ २.८.१४२० ॥
नटः. (2) - भरत (पुं), नट (पुं)काथिकः. (2) - चारण (पुं), कुशीलव (पुं)
मृदङ्गवादकः. (2) - मार्दङ्गिक (पुं), मौरजिक (पुं)करतालिकावादकः. (2) - पाणिवाद (पुं), पाणिघ (पुं)
मार्दङ्गिका मौरजिकाः पाणिवादास्तु पाणिघाः॥ २.८.१४२१ ॥
मृदङ्गवादकः. (2) - मार्दङ्गिक (पुं), मौरजिक (पुं)करतालिकावादकः. (2) - पाणिवाद (पुं), पाणिघ (पुं)
वेणुवादकः. (2) - वेणुध्म (पुं), वैणविक (पुं)वीणावादकः. (2) - वीणावाद (पुं), वैणिक (पुं)
वेणुध्माः स्युर्वैणविका वीणावादास्तु वैणिकाः॥ २.८.१४२२ ॥
वेणुवादकः. (2) - वेणुध्म (पुं), वैणविक (पुं)वीणावादकः. (2) - वीणावाद (पुं), वैणिक (पुं)
पक्षीणां हन्ता. (2) - जीवान्तक (पुं), शाकुनिक (पुं)जालेन मृगान्बध्नः. (2) - वागुरिक (पुं), जालिक (पुं)
जीवान्तकः शाकुनिको द्वौ वागुरिकजालिकौ॥ २.८.१४२३ ॥
पक्षीणां हन्ता. (2) - जीवान्तक (पुं), शाकुनिक (पुं)जालेन मृगान्बध्नः. (2) - वागुरिक (पुं), जालिक (पुं)
मांसविक्रयजीविः. (3) - वैतंसिक (पुं), कौटिक (पुं), मांसिक (पुं)
वैतंसिकः कौटिकश्च मांसिकश्च समं त्रयम्॥ २.८.१४२४ ॥
मांसविक्रयजीविः. (3) - वैतंसिक (पुं), कौटिक (पुं), मांसिक (पुं)
वेतनोपजीविः. (4) - भृतक (पुं), भृतिभुज् (पुं), कर्मकर (पुं), वैतनिक (पुं)
भृतको भृतिभुक् कर्मकरो वैतनिकोऽपि सः॥ २.८.१४२५ ॥
वेतनोपजीविः. (4) - भृतक (पुं), भृतिभुज् (पुं), कर्मकर (पुं), वैतनिक (पुं)
वार्तावाहकः. (2) - वार्तावह (पुं), वैवधिक (पुं)भारवाहकः. (2) - भारवाह (पुं), भारिक (पुं)
वार्तावहो वैवधिको भारवाहस्तु भारिकः॥ २.८.१४२६ ॥
वार्तावाहकः. (2) - वार्तावह (पुं), वैवधिक (पुं)भारवाहकः. (2) - भारवाह (पुं), भारिक (पुं)
नीचः. (5) - विवर्ण (पुं), पामर (पुं), नीच (पुं), प्राकृत (पुं), पृथग्जन (पुं)
विवर्णः पामरो नीचः प्राकृतश्च पृथग्जनः॥ २.८.१४२७ ॥
नीचः. (5) - विवर्ण (पुं), पामर (पुं), नीच (पुं), प्राकृत (पुं), पृथग्जन (पुं)
नीचः. (5) - निहीन (पुं), अपसद (पुं), जाल्म (पुं), क्षुल्लक (पुं), चेतर (पुं)
निहीनोऽपसदो जाल्मः क्षुल्लकश्चेतरश्च सः॥ २.८.१४२८ ॥
नीचः. (5) - निहीन (पुं), अपसद (पुं), जाल्म (पुं), क्षुल्लक (पुं), चेतर (पुं)
दासः. (6) - भृत्य (पुं), दासेर (पुं), दासेय (पुं), दास (पुं), गोप्यक (पुं), चेटक (पुं)
भृत्ये दासेरदासेयदासगोप्यकचेटकाः॥ २.८.१४२९ ॥
दासः. (6) - भृत्य (पुं), दासेर (पुं), दासेय (पुं), दास (पुं), गोप्यक (पुं), चेटक (पुं)
दासः. (5) - नियोज्य (पुं), किङ्कर (पुं), प्रैष्य (पुं), भुजिष्य (पुं), परिचारक (पुं)
नियोज्यकिङ्करप्रैष्यभुजिष्यपरिचारकाः॥ २.८.१४३० ॥
दासः. (5) - नियोज्य (पुं), किङ्कर (पुं), प्रैष्य (पुं), भुजिष्य (पुं), परिचारक (पुं)
परेण संवर्धितः. (4) - पराचित (पुं), परिस्कन्द (पुं), परजात (पुं), परैधित (पुं)
पराचितपरिस्कन्दपरजातपरैधिताः॥ २.८.१४३१ ॥
परेण संवर्धितः. (4) - पराचित (पुं), परिस्कन्द (पुं), परजात (पुं), परैधित (पुं)
अलसः. (6) - मन्द (पुं), तुन्दपरिमृज (पुं), आलस्य (पुं), शीतक (पुं), अलस (पुं), अनुष्ण (पुं)
मान्दस्तुन्दपरिमृज आलस्यः शीतकोऽलसोऽनुष्णः॥ २.८.१४३२ ॥
अलसः. (6) - मन्द (पुं), तुन्दपरिमृज (पुं), आलस्य (पुं), शीतक (पुं), अलस (पुं), अनुष्ण (पुं)
चतुरः. (6) - दक्ष (पुं), चतुर (पुं), पेशल (पुं), पटु (पुं), सूत्थान (पुं), उष्ण (पुं)
दक्षे तु चतुरपेशलपटवः सूत्थान उष्णश्च॥ २.८.१४३३ ॥
चतुरः. (6) - दक्ष (पुं), चतुर (पुं), पेशल (पुं), पटु (पुं), सूत्थान (पुं), उष्ण (पुं)
चण्डालः. (5) - चण्डाल (पुं), प्लव (पुं), मातङ्ग (पुं), दिवाकीर्ति (पुं), जनङ्गम (पुं)
चण्डालप्लवमातङ्गदिवाकीर्तिजनङ्गमाः॥ २.८.१४३४ ॥
चण्डालः. (5) - चण्डाल (पुं), प्लव (पुं), मातङ्ग (पुं), दिवाकीर्ति (पुं), जनङ्गम (पुं)
चण्डालः. (5) - निषाद (पुं), श्वपच (पुं), अन्तेवासिन् (पुं), चाण्डाल (पुं), पुक्कस (पुं)
निपादश्वपचावन्तेवासिचाण्डालपुक्कसाः॥ २.८.१४३५ ॥
चण्डालः. (5) - निषाद (पुं), श्वपच (पुं), अन्तेवासिन् (पुं), चाण्डाल (पुं), पुक्कस (पुं)
किरातः. (1) - किरात (पुं)शबरः. (1) - शबर (पुं)पुलिन्दः. (1) - पुलिन्द (पुं)
भेदाः । किरातशबरपुलिन्दा म्लेच्छजातयः॥ २.८.१४३६ ॥
किरातः. (1) - किरात (पुं)शबरः. (1) - शबर (पुं)पुलिन्दः. (1) - पुलिन्द (पुं)
मृगवधाजीवः. (4) - व्याध (पुं), मृगवधाजीव (पुं), मृगयु (पुं), लुब्धक (पुं)
व्याधो मृगवधाजीवो मृगयुर्लुब्धकोऽपि सः॥ २.८.१४३७ ॥
मृगवधाजीवः. (4) - व्याध (पुं), मृगवधाजीव (पुं), मृगयु (पुं), लुब्धक (पुं)
शुनकः. (4) - कौलेयक (पुं), सारमेय (पुं), कुक्कुर (पुं), मृगदंशक (पुं)
कौलेयकः सारमेयः कुक्कुरो मृगदंशकः॥ २.८.१४३८ ॥
शुनकः. (4) - कौलेयक (पुं), सारमेय (पुं), कुक्कुर (पुं), मृगदंशक (पुं)
शुनकः. (3) - शुनक (पुं), भषक (पुं), श्वान (पुं)मत्तशुनः. (2) - अलर्क (पुं), योगित (पुं)
शुनको भपकः श्वा स्यादलर्कस्तु स योगितः॥ २.८.१४३९ ॥
शुनकः. (3) - शुनक (पुं), भषक (पुं), श्वान (पुं)मत्तशुनः. (2) - अलर्क (पुं), योगित (पुं)
मृगयाकुशलशुनः. (1) - विश्वकद्रु (पुं)शुनी. (2) - सरमा (स्त्री), शुनी (स्त्री)
श्वा विश्वकद्रुर्मृगयाकुशलः सरमा शुनी॥ २.८.१४४० ॥
मृगयाकुशलशुनः. (1) - विश्वकद्रु (पुं)शुनी. (2) - सरमा (स्त्री), शुनी (स्त्री)
ग्राम्यसूकरः. (1) - विट्चर (पुं)तरुणपशुः. (1) - वर्कर (पुं)
विट्चरः सूकरो ग्राम्यो वर्करस्तरुणः पशुः॥ २.८.१४४१ ॥
ग्राम्यसूकरः. (1) - विट्चर (पुं)तरुणपशुः. (1) - वर्कर (पुं)
मृगया. (4) - आच्छोदन (नपुं), मृगव्य (नपुं), आखेट (पुं), मृगया (स्त्री)
आच्छोदनं मृगव्यं स्यादाखेटोमृगया स्त्रियाम्॥ २.८.१४४२ ॥
मृगया. (4) - आच्छोदन (नपुं), मृगव्य (नपुं), आखेट (पुं), मृगया (स्त्री)
दक्षिणव्रणकुरङ्गः. (1) - दक्षिणेर्मन् (पुं)
दक्षिणाऽरुर्लुब्धयोगाद् दक्षिणेर्मा कुरङ्गकः॥ २.८.१४४३ ॥
दक्षिणव्रणकुरङ्गः. (1) - दक्षिणेर्मन् (पुं)
चोरः. (6) - चौर (पुं), एकागारिक (पुं), स्तेन (पुं), दस्यु (पुं), तस्कर (पुं), मोषक (पुं)
चौरैकागारिकस्तेनदस्युतस्करमोपकाः॥ २.८.१४४४ ॥
चोरः. (6) - चौर (पुं), एकागारिक (पुं), स्तेन (पुं), दस्यु (पुं), तस्कर (पुं), मोषक (पुं)
चोरः. (4) - प्रतिरोधिन् (पुं), परास्कन्दिन् (पुं), पाटच्चर (पुं), मलिम्लुच (पुं)
प्रतिरोधिपरास्कन्दिपाटच्चरमलिम्लुचाः॥ २.८.१४४५ ॥
चोरः. (4) - प्रतिरोधिन् (पुं), परास्कन्दिन् (पुं), पाटच्चर (पुं), मलिम्लुच (पुं)
चोरकर्मः. (4) - चौरिका (स्त्री), स्तैन्य (नपुं), चौर्य (नपुं), स्तेय (नपुं)चौर्यधनम्. (1) - लोप्त्र (नपुं)
चौरिका स्तैन्यचौर्ये च स्तेयं लोप्त्रं तु तद्धने॥ २.८.१४४६ ॥
चोरकर्मः. (4) - चौरिका (स्त्री), स्तैन्य (नपुं), चौर्य (नपुं), स्तेय (नपुं)चौर्यधनम्. (1) - लोप्त्र (नपुं)
मृगादिबन्धनसाधनम्. (1) - वीतंस (पुं)
वीतंसस्तूपकरणं बन्धने मृगपक्षिणाम्॥ २.८.१४४७ ॥
मृगादिबन्धनसाधनम्. (1) - वीतंस (पुं)
मृगादिबन्धनयन्त्रम्. (2) - उन्माथ (पुं), कूटयन्त्र (नपुं)जालविशेषः. (2) - वागुरा (स्त्री), मृगबन्धनी (स्त्री)
उन्माथः कूटयन्त्रं स्याद् वागुरा मृगबन्धनी॥ २.८.१४४८ ॥
मृगादिबन्धनयन्त्रम्. (2) - उन्माथ (पुं), कूटयन्त्र (नपुं)जालविशेषः. (2) - वागुरा (स्त्री), मृगबन्धनी (स्त्री)
रज्जुः. (5) - शुल्ब (नपुं), वराटक (पुं), रज्जु (स्त्री), वटी (वि), गुण (पुं)
शुल्बं वराटकं स्त्री तु रज्जुस्त्रिषु वटी गुणः॥ २.८.१४४९ ॥
रज्जुः. (5) - शुल्ब (नपुं), वराटक (पुं), रज्जु (स्त्री), वटी (वि), गुण (पुं)
सलिलोद्वाहनयन्त्रम्. (2) - उद्घाटन (नपुं), घटीयन्त्र (नपुं)
उद्घाटनं घटीयन्त्रं सलिलोद्वाहनं प्रहेः॥ २.८.१४५० ॥
सलिलोद्वाहनयन्त्रम्. (2) - उद्घाटन (नपुं), घटीयन्त्र (नपुं)
वस्त्रव्यूतिदण्डः. (2) - वेमन् (पुं-नपुं), वायदण्ड (पुं)तन्तवः. (2) - सूत्र (नपुं), तन्तु (पुं)
पुंसि वेमा वायदण्डः सूत्राणि नरि तन्तवः॥ २.८.१४५१ ॥
वस्त्रव्यूतिदण्डः. (2) - वेमन् (पुं-नपुं), वायदण्ड (पुं)तन्तवः. (2) - सूत्र (नपुं), तन्तु (पुं)
तन्तुवानः. (2) - वाणि (स्त्री), व्यूति (स्त्री)वस्त्रादिलेप्यम्. (1) - पुस्त (नपुं)
वाणिर्व्यूतिः स्त्रियौ तुल्ये पुस्तं लेप्याऽऽदिकर्मणि॥ २.८.१४५२ ॥
तन्तुवानः. (2) - वाणि (स्त्री), व्यूति (स्त्री)वस्त्रादिलेप्यम्. (1) - पुस्त (नपुं)
वस्त्रदन्तादिभिः कृतपुत्रिका. (2) - पाञ्चालिका (स्त्री), पुत्रिका (स्त्री)
पाञ्चालिका पुत्त्रिका स्याद् वस्त्रदन्ताऽऽदिभिः कृता॥ २.८.१४५३ ॥
वस्त्रदन्तादिभिः कृतपुत्रिका. (2) - पाञ्चालिका (स्त्री), पुत्रिका (स्त्री)
जतुविकारः. (1) - जातुष (वि)त्रपुविकारः. (1) - त्रापुष (वि)
जतुत्रपुविकारे तु जातुपं त्रापुषं त्रिषु॥ २.८.१४५४ ॥
जतुविकारः. (1) - जातुष (वि)त्रपुविकारः. (1) - त्रापुष (वि)
पेटकः. (4) - पिटक (पुं), पेटक (पुं), पेटा (स्त्री), मञ्जूषा (स्त्री)शक्याधारलगुडः. (1) - विहङ्गिका (स्त्री)
पिटकः पेटकः पेटामञ्जूषाऽथ विहङ्गिका॥ २.८.१४५५ ॥
पेटकः. (4) - पिटक (पुं), पेटक (पुं), पेटा (स्त्री), मञ्जूषा (स्त्री)शक्याधारलगुडः. (1) - विहङ्गिका (स्त्री)
शक्याधारलगुडः. (1) - भारयष्टि (स्त्री)भारयष्ट्यामालम्बमानः. (2) - शिक्य (नपुं), काच (पुं)पादुका. (1) - पादुका (स्त्री)
भारयष्टिस्तदाऽऽलम्बि शिक्यं काचोऽथ पादुका॥ २.८.१४५६ ॥
शक्याधारलगुडः. (1) - भारयष्टि (स्त्री)भारयष्ट्यामालम्बमानः. (2) - शिक्य (नपुं), काच (पुं)पादुका. (1) - पादुका (स्त्री)
पादुका. (2) - पादू (स्त्री), उपानह् (स्त्री)विस्तृतपादुका. (1) - अनुपदीना (स्त्री)
पादूरुपानत् स्त्री सैवाऽनुपदीना पदाऽऽयता॥ २.८.१४५७ ॥
पादुका. (2) - पादू (स्त्री), उपानह् (स्त्री)विस्तृतपादुका. (1) - अनुपदीना (स्त्री)
चर्ममयरज्जुः. (3) - नध्री (स्त्री), वर्ध्री (स्त्री), वरत्रा (स्त्री)अश्वादेस्ताडनी. (1) - कशा (स्त्री)
नद्ध्नी वर्ध्नी वरत्रा स्यादश्वाऽऽदेस्ताडनी कशा॥ २.८.१४५८ ॥
चर्ममयरज्जुः. (3) - नध्री (स्त्री), वर्ध्री (स्त्री), वरत्रा (स्त्री)अश्वादेस्ताडनी. (1) - कशा (स्त्री)
चाण्डालिका. (3) - चाण्डालिका (स्त्री), कण्डोलवीणा (स्त्री), चण्डालवल्लकी (स्त्री)
चाण्डालिका तु कण्डोल वीणा चण्डालवल्लकी॥ २.८.१४५९ ॥
चाण्डालिका. (3) - चाण्डालिका (स्त्री), कण्डोलवीणा (स्त्री), चण्डालवल्लकी (स्त्री)
सुवर्णतुला. (2) - नाराची (स्त्री), एषणिका (स्त्री)स्वर्णघर्षणशिला. (3) - शाण (पुं), निकष (पुं), कष (पुं)
नाराची स्यादेषणिका शाणस्तु निकषः कषः॥ २.८.१४६० ॥
सुवर्णतुला. (2) - नाराची (स्त्री), एषणिका (स्त्री)स्वर्णघर्षणशिला. (3) - शाण (पुं), निकष (पुं), कष (पुं)
सुवर्णादिच्छेदनद्रव्यम्. (2) - व्रश्चन (पुं), पत्रपरशु (पुं)शलाकाभेदः. (2) - एषिका (स्त्री), तूलिका (स्त्री)
व्रश्चनःपत्रपरशुरीपिका तूलिका समे॥ २.८.१४६१ ॥
सुवर्णादिच्छेदनद्रव्यम्. (2) - व्रश्चन (पुं), पत्रपरशु (पुं)शलाकाभेदः. (2) - एषिका (स्त्री), तूलिका (स्त्री)
मूषा. (2) - तैजसावर्तनी (स्त्री), मूषा (स्त्री)अग्निज्वलनवस्तु. (2) - भस्त्रा (स्त्री), चर्मप्रसेविका (स्त्री)
तैजसावर्तनी मूषा भस्त्रा चर्मप्रसेविका॥ २.८.१४६२ ॥
मूषा. (2) - तैजसावर्तनी (स्त्री), मूषा (स्त्री)अग्निज्वलनवस्तु. (2) - भस्त्रा (स्त्री), चर्मप्रसेविका (स्त्री)
मुक्तादिवेधिनी. (2) - आस्फोटनी (स्त्री), वेधनिका (स्त्री)कर्तरी. (2) - कृपाणी (स्त्री), कर्तरी (स्त्री)
आस्फोटनी वेधनिका कृपाणी कर्तरी समे॥ २.८.१४६३ ॥
मुक्तादिवेधिनी. (2) - आस्फोटनी (स्त्री), वेधनिका (स्त्री)कर्तरी. (2) - कृपाणी (स्त्री), कर्तरी (स्त्री)
वृक्षभेदनायुधम्. (2) - वृक्षादनी (स्त्री), वृक्षभेदिन् (पुं)पाषाणदारणघनभेदः. (2) - टङ्क (पुं), पाषाणदारण (पुं)
वृक्षादनी वृक्षभेदी टङ्कः पाषाणदारणः॥ २.८.१४६४ ॥
वृक्षभेदनायुधम्. (2) - वृक्षादनी (स्त्री), वृक्षभेदिन् (पुं)पाषाणदारणघनभेदः. (2) - टङ्क (पुं), पाषाणदारण (पुं)
शास्त्रादिविदारणशस्त्रम्. (2) - क्रकच (पुं-नपुं), करपत्र (नपुं)चर्मखण्डनशस्त्रम्. (2) - आरा (स्त्री), चर्मप्रभेधिका (स्त्री)
क्रकचोऽस्त्री करपत्रमारा चर्मप्रभेधिका॥ २.८.१४६५ ॥
शास्त्रादिविदारणशस्त्रम्. (2) - क्रकच (पुं-नपुं), करपत्र (नपुं)चर्मखण्डनशस्त्रम्. (2) - आरा (स्त्री), चर्मप्रभेधिका (स्त्री)
लोहप्रतिमा. (3) - सूर्मी (स्त्री), स्थूणा (स्त्री), अयःप्रतिमा (स्त्री)कलाकौशल्यादिकर्मः. (1) - शिल्प (नपुं)
सूर्मी स्थूणाऽयःप्रतिमा शिल्पं कर्म कलाऽऽदिकम्॥ २.८.१४६६ ॥
लोहप्रतिमा. (3) - सूर्मी (स्त्री), स्थूणा (स्त्री), अयःप्रतिमा (स्त्री)कलाकौशल्यादिकर्मः. (1) - शिल्प (नपुं)
प्रतिमा. (5) - प्रतिमान (नपुं), प्रतिबिम्ब (नपुं), प्रतिमा (स्त्री), प्रतियातना (स्त्री), प्रतिच्छाया (स्त्री)
प्रतिमानं प्रतिबिम्बं प्रतिमा प्रतियातना प्रतिच्छाया॥ २.८.१४६७ ॥
प्रतिमा. (5) - प्रतिमान (नपुं), प्रतिबिम्ब (नपुं), प्रतिमा (स्त्री), प्रतियातना (स्त्री), प्रतिच्छाया (स्त्री)
प्रतिमा. (3) - प्रतिकृति (स्त्री), अर्चा (स्त्री), प्रतिनिधि (पुं)उपमा. (2) - उपमा (स्त्री), उपमान (नपुं)
प्रतिकृतिरर्चा पुंसि प्रतिनिधिरुपमोपमानं स्यात्॥ २.८.१४६८ ॥
प्रतिमा. (3) - प्रतिकृति (स्त्री), अर्चा (स्त्री), प्रतिनिधि (पुं)उपमा. (2) - उपमा (स्त्री), उपमान (नपुं)
सदृशः. (6) - वाच्यलिङ्ग (वि), सम (वि), तुल्य (वि), सदृक्ष (वि), सदृश (वि), सदृश् (वि)
वाच्यलिङ्गाः समस्तुल्यः सदृक्षः सदृशः सदृक्॥ २.८.१४६९ ॥
सदृशः. (6) - वाच्यलिङ्ग (वि), सम (वि), तुल्य (वि), सदृक्ष (वि), सदृश (वि), सदृश् (वि)
सदृशः. (2) - साधारण (वि), समान (वि)
साधारणः समानश्च स्युरुत्तरपदे त्वमी॥ २.८.१४७० ॥
सदृशः. (2) - साधारण (वि), समान (वि)
निभसंकाशनीकाशप्रतीकाशोपमाऽऽदयः॥ २.८.१४७१ ॥
वेतनम्. (6) - कर्मण्या (स्त्री), विधा (स्त्री), भृत्या (स्त्री), भृति (स्त्री), भर्मन् (नपुं), वेतन (नपुं)
कर्मण्या तु विधाभृत्याभृतयो भर्म वेतनम्॥ २.८.१४७२ ॥
वेतनम्. (6) - कर्मण्या (स्त्री), विधा (स्त्री), भृत्या (स्त्री), भृति (स्त्री), भर्मन् (नपुं), वेतन (नपुं)
वेतनम्. (5) - भरण्य (नपुं), भरण (नपुं), मूल्य (नपुं), निर्वेश (पुं), पण (पुं)
भरण्यं भरणं मूल्यं निर्वेशः पण इत्यपि॥ २.८.१४७३ ॥
वेतनम्. (5) - भरण्य (नपुं), भरण (नपुं), मूल्य (नपुं), निर्वेश (पुं), पण (पुं)
सुरा. (5) - सुरा (स्त्री), हलिप्रिया (स्त्री), हाला (स्त्री), परिस्रुत् (स्त्री), वरुणात्मजा (स्त्री)
सुरा हलिप्रिया हाला परिस्रुद् वरुणात्मजा॥ २.८.१४७४ ॥
सुरा. (5) - सुरा (स्त्री), हलिप्रिया (स्त्री), हाला (स्त्री), परिस्रुत् (स्त्री), वरुणात्मजा (स्त्री)
सुरा. (5) - गन्धोत्तमा (स्त्री), प्रसन्ना (स्त्री), इरा (स्त्री), कादम्बरी (स्त्री), परिस्रुत् (स्त्री)
गन्धोत्तमाप्रसन्नेराकादम्बर्यः परिस्रुता॥ २.८.१४७५ ॥
सुरा. (5) - गन्धोत्तमा (स्त्री), प्रसन्ना (स्त्री), इरा (स्त्री), कादम्बरी (स्त्री), परिस्रुत् (स्त्री)
सुरा. (3) - मदिरा (स्त्री), कश्य (नपुं), मद्य (नपुं)पानरुचिजनकभक्षणम्. (1) - अवदंश (पुं)
मदिरा कश्यमद्ये चाप्यवदंशस्तु भक्षणम्॥ २.८.१४७६ ॥
सुरा. (3) - मदिरा (स्त्री), कश्य (नपुं), मद्य (नपुं)पानरुचिजनकभक्षणम्. (1) - अवदंश (पुं)
मद्यगृहम्. (3) - शुण्डा (स्त्री), पान (नपुं), मदस्थान (नपुं)मधुपानावसरः. (2) - मधुवार (पुं), मधुक्रम (पुं)
शुण्डापानं मदस्थानं मधुवारा मधुक्रमाः॥ २.८.१४७७ ॥
मद्यगृहम्. (3) - शुण्डा (स्त्री), पान (नपुं), मदस्थान (नपुं)मधुपानावसरः. (2) - मधुवार (पुं), मधुक्रम (पुं)
मधुकपुष्पकृतमद्यम्. (4) - मध्वासव (पुं), माधवक (पुं), मधु (नपुं), मार्द्वीक (नपुं)
मध्वासवो माधवको मधु माध्वीकमद्वयोः॥ २.८.१४७८ ॥
मधुकपुष्पकृतमद्यम्. (4) - मध्वासव (पुं), माधवक (पुं), मधु (नपुं), मार्द्वीक (नपुं)
इक्षुशाकादिजन्यमद्यम्. (3) - मैरेय (नपुं), आसव (पुं), सीधु (पुं)सुराकल्कः. (2) - मेदक (पुं), जगल (पुं)
मैरेयमासवः सीधुर्मन्दको जगलः समौ॥ २.८.१४७९ ॥
इक्षुशाकादिजन्यमद्यम्. (3) - मैरेय (नपुं), आसव (पुं), सीधु (पुं)सुराकल्कः. (2) - मेदक (पुं), जगल (पुं)
मद्यसन्धानम्. (2) - सन्धान (नपुं), अभिषव (पुं)नानाद्रव्यकृतमद्यम्. (2) - किण्व (नपुं), नग्नहू (पुं)
संधानं स्यादभिषवः किण्वं पुंसि तु नग्नहूः॥ २.८.१४८० ॥
मद्यसन्धानम्. (2) - सन्धान (नपुं), अभिषव (पुं)नानाद्रव्यकृतमद्यम्. (2) - किण्व (नपुं), नग्नहू (पुं)
सुरामण्डः. (2) - कारोत्तर (पुं), सुरामण्ड (पुं)पानसभा. (2) - आपान (नपुं), पानगोष्ठिका (स्त्री)
कारोत्तरः सुरामण्ड आपानं पानघोष्ठिका॥ २.८.१४८१ ॥
सुरामण्डः. (2) - कारोत्तर (पुं), सुरामण्ड (पुं)पानसभा. (2) - आपान (नपुं), पानगोष्ठिका (स्त्री)
मद्यपात्रम्. (2) - चषक (पुं-नपुं), पानपात्र (नपुं)मद्यपानम्. (2) - सरक (पुं), अनुतर्षण (नपुं)
चपकोऽस्त्री पानपात्रं सरकोऽप्यनुतर्षणम्॥ २.८.१४८२ ॥
मद्यपात्रम्. (2) - चषक (पुं-नपुं), पानपात्र (नपुं)मद्यपानम्. (2) - सरक (पुं), अनुतर्षण (नपुं)
द्यूतकृत्. (5) - धूर्त (पुं), अक्षदेविन् (पुं), कितव (पुं), अक्षधूर्त (पुं), द्यूतकृत् (पुं)
धूर्तोऽक्षदेवी कितवोऽक्षधूर्तो द्यूतकृत् समाः॥ २.८.१४८३ ॥
द्यूतकृत्. (5) - धूर्त (पुं), अक्षदेविन् (पुं), कितव (पुं), अक्षधूर्त (पुं), द्यूतकृत् (पुं)
ऋणादौ प्रतिनिधिभूतः. (2) - लग्नक (पुं), प्रतिभू (पुं)द्यूतकारकः. (2) - सभिक (पुं), द्यूतकारक (पुं)
स्युर्लग्नकाः प्रतिभुवः सभिका द्यूतकारकाः॥ २.८.१४८४ ॥
ऋणादौ प्रतिनिधिभूतः. (2) - लग्नक (पुं), प्रतिभू (पुं)द्यूतकारकः. (2) - सभिक (पुं), द्यूतकारक (पुं)
द्यूतक्रीडनम्. (4) - द्यूत (पुं-नपुं), अक्षवती (स्त्री), कैतव (नपुं), पण (पुं)
द्यूतोऽस्त्रियामक्षवती कैतवं पण इत्यपि॥ २.८.१४८५ ॥
द्यूतक्रीडनम्. (4) - द्यूत (पुं-नपुं), अक्षवती (स्त्री), कैतव (नपुं), पण (पुं)
द्यूते लाप्यमानः. (2) - पण (पुं), ग्लह (पुं)अक्षः. (3) - अक्ष (पुं), देवन (पुं), पाशक (पुं)
पणोऽक्षेषु ग्लहोऽक्षास्तु देवनाः पाशकाश्च ते॥ २.८.१४८६ ॥
द्यूते लाप्यमानः. (2) - पण (पुं), ग्लह (पुं)अक्षः. (3) - अक्ष (पुं), देवन (पुं), पाशक (पुं)
शारीणामितस्ततः नयनम्. (1) - परिणाय (पुं)
परिणायस्तु शारीणां समन्तात् नयनेऽस्त्रियाम्॥ २.८.१४८७ ॥
शारीणामितस्ततः नयनम्. (1) - परिणाय (पुं)
शारीणामाधारपट्टः. (2) - अष्टापद (पुं-नपुं), शारिफल (पुं-नपुं)समाहूयकृतद्यूतम्. (2) - प्राणिवृत्त (नपुं), समाह्वय (पुं)
अष्टापदं शारिफलं प्राणिवृत्तं समाह्वयः॥ २.८.१४८८ ॥
शारीणामाधारपट्टः. (2) - अष्टापद (पुं-नपुं), शारिफल (पुं-नपुं)समाहूयकृतद्यूतम्. (2) - प्राणिवृत्त (नपुं), समाह्वय (पुं)
उक्ता भूरिप्रयोगत्वादेकस्मिन् येऽत्र यौगिकाः॥ २.८.१४८९ ॥
ताद्धर्म्यादन्यतो वृत्तावूत्द्या लिङ्गाऽन्तरेऽपि ते॥ २.८.१४९० ॥
इति शूद्रवर्गः

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