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अथ वैश्यवर्गः
वैश्यः. (6) - ऊरव्य (पुं), ऊरुज (पुं), अर्य (पुं), वैश्य (पुं), भूमिस्पृश् (पुं), विश् (पुं)
ऊरव्य ऊरुज अर्या वैश्या भूमिस्पृशो विशः । ॥ २.८.११७३ ॥
वैश्यः. (6) - ऊरव्य (पुं), ऊरुज (पुं), अर्य (पुं), वैश्य (पुं), भूमिस्पृश् (पुं), विश् (पुं)
जीवनोपायः. (6) - आजीव (पुं), जीविका (स्त्री), वार्ता (स्त्री), वृत्ति (स्त्री), वर्तन (नपुं), जीवन (नपुं)
आजीवो जीविका वाताऋ वृत्तिर्वतऋनजीवने॥ २.८.११७४ ॥
जीवनोपायः. (6) - आजीव (पुं), जीविका (स्त्री), वार्ता (स्त्री), वृत्ति (स्त्री), वर्तन (नपुं), जीवन (नपुं)
जीवनोपायमार्गः. (3) - कृषि (स्त्री), पाशुपाल्य (नपुं), वाणिज्य (नपुं)
स्त्रियां कृषिः पाशुपाल्यं वाणिज्यं चेति वृत्तयः॥ २.८.११७५ ॥
जीवनोपायमार्गः. (3) - कृषि (स्त्री), पाशुपाल्य (नपुं), वाणिज्य (नपुं)
परचित्तानुवर्त्तनम्. (2) - सेवा (स्त्री), श्ववृत्ति (स्त्री)कर्षणम्. (2) - अनृत (नपुं), कृषि (स्त्री)खलादिपतितधान्यसङ्ग्रहः. (2) - उञ्छशिल (नपुं), ऋत (नपुं)
सेवा श्ववृत्तिरनृतं कृशिरुञ्छशिलं त्वृतम्॥ २.८.११७६ ॥
परचित्तानुवर्त्तनम्. (2) - सेवा (स्त्री), श्ववृत्ति (स्त्री)कर्षणम्. (2) - अनृत (नपुं), कृषि (स्त्री)खलादिपतितधान्यसङ्ग्रहः. (2) - उञ्छशिल (नपुं), ऋत (नपुं)
तण्डुलादियाचितः. (1) - मृत (नपुं)अयाचितः. (1) - अमृत (नपुं)
द्वे याचिताऽयाचितयोर्यथासंख्य्ं मृताऽमृते॥ २.८.११७७ ॥
तण्डुलादियाचितः. (1) - मृत (नपुं)अयाचितः. (1) - अमृत (नपुं)
वाणिज्यम्. (2) - सत्यानृत (नपुं), वणिग्भाव (पुं)ऋणम्. (2) - ऋण (नपुं), पर्युदञ्चन (नपुं)
सत्यानृतं वणिग्भावः, स्यादृणं पयुऋदञ्चनम्॥ २.८.११७८ ॥
वाणिज्यम्. (2) - सत्यानृत (नपुं), वणिग्भाव (पुं)ऋणम्. (2) - ऋण (नपुं), पर्युदञ्चन (नपुं)
ऋणम्. (1) - उद्धार (पुं)ऋणसम्बन्धिकालान्तरद्रव्येण लोकजीविका. (3) - अर्थप्रयोग (पुं), कुसीद (नपुं), वृद्धिजीविका (स्त्री)
उद्धारोऽथऋप्रयोगस्तु कुसीदं वृद्धिजीविका॥ २.८.११७९ ॥
ऋणम्. (1) - उद्धार (पुं)ऋणसम्बन्धिकालान्तरद्रव्येण लोकजीविका. (3) - अर्थप्रयोग (पुं), कुसीद (नपुं), वृद्धिजीविका (स्त्री)
याच्ञया प्राप्तम्. (1) - याचितक (नपुं)परिवर्तनेनाप्तम्. (1) - आपमित्यक (नपुं)
याञ्चयाऽऽप्तं याचितकं निमयादापमित्यकम्॥ २.८.११८० ॥
याच्ञया प्राप्तम्. (1) - याचितक (नपुं)परिवर्तनेनाप्तम्. (1) - आपमित्यक (नपुं)
ऋणव्यवहारे धनस्वामिः. (1) - उत्तमर्ण (पुं)ऋणव्यवहारे धनग्राहकः. (1) - अधमर्ण (पुं)
उत्तमणाऋऽधमणौऋ द्वौ प्रयोक्तृ ग्राहकौ क्रमात्॥ २.८.११८१ ॥
ऋणव्यवहारे धनस्वामिः. (1) - उत्तमर्ण (पुं)ऋणव्यवहारे धनग्राहकः. (1) - अधमर्ण (पुं)
ऋणं दत्वा तद्वृत्याजीविपुरुषः. (4) - कुसीदिक (पुं), वार्धूषिक (पुं), वृद्ध्याजीव (पुं), वार्धुषि (पुं)
कुसीदिको वाधुऋषिको वृद्ध्याजीवश्च वार्धुषिः॥ २.८.११८२ ॥
ऋणं दत्वा तद्वृत्याजीविपुरुषः. (4) - कुसीदिक (पुं), वार्धूषिक (पुं), वृद्ध्याजीव (पुं), वार्धुषि (पुं)
कृषीवलः. (4) - क्षेत्राजीव (पुं), कर्षक (पुं), कृषक (पुं), कृषीवल (पुं)
क्षेत्राजीवः कषऋकश्च कृषिकश्च कृषीवलः॥ २.८.११८३ ॥
कृषीवलः. (4) - क्षेत्राजीव (पुं), कर्षक (पुं), कृषक (पुं), कृषीवल (पुं)
धान्यसामान्योत्पत्तियोग्यक्षेत्रम्. (1) - व्रैहेय (वि)कलमाद्युत्पत्तियोग्यक्षेत्रम्. (1) - शालेय (वि)
क्षेत्रं व्रैहेयशालेयं व्रीहिशाल्युद्भवोचितम्॥ २.८.११८४ ॥
धान्यसामान्योत्पत्तियोग्यक्षेत्रम्. (1) - व्रैहेय (वि)कलमाद्युत्पत्तियोग्यक्षेत्रम्. (1) - शालेय (वि)
यवक्षेत्रम्. (1) - यव्य (वि)यवकक्षेत्रम्. (1) - यवक्य (वि)षष्टिकक्षेत्रम्. (1) - षष्टिक्य (वि)
यव्यं यवक्यं यष्टिक्यं यवाऽऽदिभवनं हि यत्॥ २.८.११८५ ॥
यवक्षेत्रम्. (1) - यव्य (वि)यवकक्षेत्रम्. (1) - यवक्य (वि)षष्टिकक्षेत्रम्. (1) - षष्टिक्य (वि)
तिलक्षेत्रम्. (2) - तिल्य (वि), तैलीन (वि)माषक्षेत्रम्. (2) - माष्य (नपुं), माषीण (वि)उमाक्षेत्रम्. (2) - उम्य (नपुं), औमीन (नपुं)अणुधान्यक्षेत्रम्. (2) - अणव्य (नपुं), अणवीन (वि)भङ्गाधान्यक्षेत्रम्. (2) - भङ्ग्य (नपुं), भाङ्गीन (वि)
तिल्यतैलीनवन् माषोमाऽणुभङ्गाद्विरूपता॥ २.८.११८६ ॥
तिलक्षेत्रम्. (2) - तिल्य (वि), तैलीन (वि)माषक्षेत्रम्. (2) - माष्य (नपुं), माषीण (वि)उमाक्षेत्रम्. (2) - उम्य (नपुं), औमीन (नपुं)अणुधान्यक्षेत्रम्. (2) - अणव्य (नपुं), अणवीन (वि)भङ्गाधान्यक्षेत्रम्. (2) - भङ्ग्य (नपुं), भाङ्गीन (वि)
मुद्गाधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - मौद्गीन (वि)कुद्रवधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - कौद्रवीण (नपुं)चणकधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - चाणकीण (वि)गोधुमधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - गौधुमीण (नपुं)कालयधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - कालायीण (नपुं)कोधुमधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - कौदुमीण (नपुं)प्रियङ्गधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - प्रैयङ्गवीण (नपुं)
मौद्गीनकौद्रवीणाऽऽदि शेषधान्योद्भवक्षमम्॥ २.८.११८७ ॥
मुद्गाधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - मौद्गीन (वि)कुद्रवधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - कौद्रवीण (नपुं)चणकधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - चाणकीण (वि)गोधुमधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - गौधुमीण (नपुं)कालयधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - कालायीण (नपुं)कोधुमधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - कौदुमीण (नपुं)प्रियङ्गधान्योद्भवक्षेत्रम्. (1) - प्रैयङ्गवीण (नपुं)
शाकक्षेत्रादिकः. (2) - शाकशाकट (वि), शाकशाकिन (वि)
शाकक्षेत्राऽऽदिके शाकशाकतं शाकशाकिनम्॥ २.८.११८८ ॥
शाकक्षेत्रादिकः. (2) - शाकशाकट (वि), शाकशाकिन (वि)
बीजवापोत्तरं कृष्टक्षेत्रम्. (2) - बीजाकृत (नपुं), उप्तकृष्ट (वि)कृष्टक्षेत्रम्. (3) - सीत्य (वि), कृष्ट (वि), हल्यवत् (नपुं)
बीजाकृतं तूप्रकृष्टे सीत्यं कृष्टं च हल्यवत्॥ २.८.११८९ ॥
बीजवापोत्तरं कृष्टक्षेत्रम्. (2) - बीजाकृत (नपुं), उप्तकृष्ट (वि)कृष्टक्षेत्रम्. (3) - सीत्य (वि), कृष्ट (वि), हल्यवत् (नपुं)
वारत्रयकृष्टक्षेत्रम्. (4) - त्रिगुणाकृत (वि), तृतीयाकृत (वि), त्रिहल्य (वि), त्रिसीत्य (वि)
त्रिगुणाकृतं तृतीयाकृतं त्रिहल्यं त्रिसीत्यमपि तस्मिन्॥ २.८.११९० ॥
वारत्रयकृष्टक्षेत्रम्. (4) - त्रिगुणाकृत (वि), तृतीयाकृत (वि), त्रिहल्य (वि), त्रिसीत्य (वि)
द्विवारकृष्टक्षेत्रम्. (5) - द्विगुणाकृत (वि), द्वितीयाकृत (वि), द्विहल्य (वि), द्विसीत्य (वि), शम्बाकृत (वि)
द्विगुणाकृते तु सवऋं पूवऋं शम्बाकृतमपीह॥ २.८.११९१ ॥
द्विवारकृष्टक्षेत्रम्. (5) - द्विगुणाकृत (वि), द्वितीयाकृत (वि), द्विहल्य (वि), द्विसीत्य (वि), शम्बाकृत (वि)
द्रोणपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - द्रौणिका (नपुं)आढकपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - आढकिक (वि)कुडवपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - कौडविक (वि)प्रस्थपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - प्रास्थिक (वि)
द्रोणाऽऽढकाऽऽदि वापाऽऽदौ द्रौणिकाऽऽढकिकाऽऽदयः॥ २.८.११९२ ॥
द्रोणपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - द्रौणिका (नपुं)आढकपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - आढकिक (वि)कुडवपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - कौडविक (वि)प्रस्थपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - प्रास्थिक (वि)
खारीपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - खारीक (पुं)
ख़्हरीवापस्तु खारीक उत्त्मणाऋऽऽदयस्त्रिषु॥ २.८.११९३ ॥
खारीपरिमितव्रीहिवापयोग्यक्षेत्रम्. (1) - खारीक (पुं)
क्षेत्रम्. (3) - वप्र (पुं-नपुं), केदार (पुं), क्षेत्र (नपुं)
पुन्नपुंसकयोर्वप्रः केदारः क्षेत्रमस्य तु॥ २.८.११९४ ॥
क्षेत्रम्. (3) - वप्र (पुं-नपुं), केदार (पुं), क्षेत्र (नपुं)
क्षेत्रगणम्. (4) - कैदारक (नपुं), कैदार्य (नपुं), क्षैत्र (नपुं), कैदारिक (नपुं)
कैदारकं स्यात् कैदायऋं क्षेत्रं कैदारिकं गणे॥ २.८.११९५ ॥
क्षेत्रगणम्. (4) - कैदारक (नपुं), कैदार्य (नपुं), क्षैत्र (नपुं), कैदारिक (नपुं)
मृद्खण्डः. (2) - लोष्ट (पुं-नपुं), लेष्टु (पुं)लोष्टभेदनकाष्ठम्. (2) - कोटिश (पुं), लोष्टभेदन (पुं)
लोष्टानि लेष्टवः पुंसि कोटिशो लोष्टभेदनः॥ २.८.११९६ ॥
मृद्खण्डः. (2) - लोष्ट (पुं-नपुं), लेष्टु (पुं)लोष्टभेदनकाष्ठम्. (2) - कोटिश (पुं), लोष्टभेदन (पुं)
वृषभादिप्रेरणदण्डः. (3) - प्राजन (नपुं), तोदन (नपुं), तोत्र (नपुं)खननाद्यर्थायुधम्. (2) - खनित्र (नपुं), अवदारण (नपुं)
प्राजनं तोदनं तोत्रं खनित्रमवदारणे॥ २.८.११९७ ॥
वृषभादिप्रेरणदण्डः. (3) - प्राजन (नपुं), तोदन (नपुं), तोत्र (नपुं)खननाद्यर्थायुधम्. (2) - खनित्र (नपुं), अवदारण (नपुं)
तृणच्छेदनायुधम्. (2) - दात्र (नपुं), लवित्र (नपुं)वृषादेर्युगबन्धनरज्जुः. (3) - आबन्ध (पुं), योत्र (नपुं), योक्त्र (नपुं)लाङ्गलस्याधस्थलोहकाष्ठम्. (1) - फल (नपुं)
दात्रं लवित्रमाबन्धो योत्रं योक्त्रमथो फलम्॥ २.८.११९८ ॥
तृणच्छेदनायुधम्. (2) - दात्र (नपुं), लवित्र (नपुं)वृषादेर्युगबन्धनरज्जुः. (3) - आबन्ध (पुं), योत्र (नपुं), योक्त्र (नपुं)लाङ्गलस्याधस्थलोहकाष्ठम्. (1) - फल (नपुं)
लाङ्गलस्याधस्थलोहकाष्ठम्. (4) - निरीश (नपुं), कुटक (नपुं), फाल (पुं), कृषिक (पुं)हलम्. (2) - लाङ्गल (नपुं), हल (नपुं)
निरीषं कुटकं फालः कृषको लांगलं हलम्॥ २.८.११९९ ॥
लाङ्गलस्याधस्थलोहकाष्ठम्. (4) - निरीश (नपुं), कुटक (नपुं), फाल (पुं), कृषिक (पुं)हलम्. (2) - लाङ्गल (नपुं), हल (नपुं)
हलम्. (2) - गोदारण (नपुं), सीर (पुं)युगस्य कीलकः. (2) - शम्या (स्त्री), युगकीलक (पुं)
गोदारणं च सीरोऽथ शम्या स्त्री युगकीलकः॥ २.८.१२०० ॥
हलम्. (2) - गोदारण (नपुं), सीर (पुं)युगस्य कीलकः. (2) - शम्या (स्त्री), युगकीलक (पुं)
हलयुगयोर्मध्यकाष्ठम्. (2) - ईशा (स्त्री), लाङ्गलदण्ड (पुं)लाङ्गलकृतरेखा. (2) - सीता (स्त्री), लाङ्गलपद्धति (स्त्री)
ईष लांगलदँडः स्यात् सीत लाङ्गलपद्धतिः॥ २.८.१२०१ ॥
हलयुगयोर्मध्यकाष्ठम्. (2) - ईशा (स्त्री), लाङ्गलदण्ड (पुं)लाङ्गलकृतरेखा. (2) - सीता (स्त्री), लाङ्गलपद्धति (स्त्री)
पशुबन्धनस्तम्भः. (2) - मेधि (पुं), खलेदारु (नपुं)
पुंसि मेधिः खले दारु न्यस्तं यत् पशुबन्धने॥ २.८.१२०२ ॥
पशुबन्धनस्तम्भः. (2) - मेधि (पुं), खलेदारु (नपुं)
व्रीहिः. (3) - आशु (वि), व्रीहि (पुं), पाटल (पुं)यवः. (2) - शितशूक (पुं), यव (पुं)
आशुर्व्रीहिः पाटलः स्याच्छितशूकयवौ समौ॥ २.८.१२०३ ॥
व्रीहिः. (3) - आशु (वि), व्रीहि (पुं), पाटल (पुं)यवः. (2) - शितशूक (पुं), यव (पुं)
अपक्वयवः. (1) - तोक्म (पुं)रेणुकः. (2) - कलाय (पुं), सतीनक (पुं)
तोक्मस्तु तत्र हरिते कलायस्तु सतीनकः॥ २.८.१२०४ ॥
अपक्वयवः. (1) - तोक्म (पुं)रेणुकः. (2) - कलाय (पुं), सतीनक (पुं)
रेणुकः. (2) - हरेणु (पुं), खण्डिक (पुं)कोद्रवः. (2) - कोरदूष (पुं), कोद्रव (पुं)
हरेणुरेणुकौ चाऽस्मिन् कोरदूषस्तु कोद्रवः॥ २.८.१२०५ ॥
रेणुकः. (2) - हरेणु (पुं), खण्डिक (पुं)कोद्रवः. (2) - कोरदूष (पुं), कोद्रव (पुं)
मसूरः. (2) - मङ्गल्यक (पुं), मसूर (पुं)वनमुद्गः. (2) - मकुष्ठक (पुं), मयुष्ठक (पुं)
मंगल्यको मसूरोऽथ मकुष्ठक मयुष्ठकौ॥ २.८.१२०६ ॥
मसूरः. (2) - मङ्गल्यक (पुं), मसूर (पुं)वनमुद्गः. (2) - मकुष्ठक (पुं), मयुष्ठक (पुं)
वनमुद्गः. (1) - वनमुद्ग (पुं)सर्षपः. (3) - सर्षप (पुं), तन्तुभ (पुं), कदम्बक (पुं)
वनमुद्गे सषऋपे तु द्वौ तंतुभकदम्बकौ॥ २.८.१२०७ ॥
वनमुद्गः. (1) - वनमुद्ग (पुं)सर्षपः. (3) - सर्षप (पुं), तन्तुभ (पुं), कदम्बक (पुं)
श्वेतसर्षपः. (1) - सिद्धार्थ (पुं)गोधुमः. (2) - गोधूम (पुं), सुमन (पुं)
सिद्धार्थस्त्वेष धवलो गोधूमः सुमनः समौ॥ २.८.१२०८ ॥
श्वेतसर्षपः. (1) - सिद्धार्थ (पुं)गोधुमः. (2) - गोधूम (पुं), सुमन (पुं)
अर्धस्विन्नयवादिः. (2) - यावक (पुं), कुल्माष (पुं)चणकः. (2) - चणक (पुं), हरिमन्थक (पुं)
स्याद् यावकस्तु कुल्माषश्चणको हरिमन्थकः॥ २.८.१२०९ ॥
अर्धस्विन्नयवादिः. (2) - यावक (पुं), कुल्माष (पुं)चणकः. (2) - चणक (पुं), हरिमन्थक (पुं)
तैलहीनतिलः. (2) - तिलपेज (पुं), तिलपिञ्ज (पुं)
द्वौ तिले तिलपेजश्च तिलपिञ्जश्च निष्फले॥ २.८.१२१० ॥
तैलहीनतिलः. (2) - तिलपेज (पुं), तिलपिञ्ज (पुं)
कृष्णसर्षपः. (5) - क्षव (पुं), क्षुधाभिजनन (पुं), राजिका (स्त्री), कृष्णिका (स्त्री), आसुरी (स्त्री)
क्षवः क्षुताभिजननो राजिका कृष्णिकाऽऽसुरी॥ २.८.१२११ ॥
कृष्णसर्षपः. (5) - क्षव (पुं), क्षुधाभिजनन (पुं), राजिका (स्त्री), कृष्णिका (स्त्री), आसुरी (स्त्री)
कङ्गुः. (2) - कङ्गु (स्त्री), प्रियङ्गु (स्त्री)अतसी. (3) - अतसी (स्त्री), उमा (स्त्री), क्षुमा (स्त्री)
स्त्रियौ कङ्गुप्रियङ्गू द्वे अतसी स्यादुमा क्षुमा॥ २.८.१२१२ ॥
कङ्गुः. (2) - कङ्गु (स्त्री), प्रियङ्गु (स्त्री)अतसी. (3) - अतसी (स्त्री), उमा (स्त्री), क्षुमा (स्त्री)
चणभेदः. (2) - मातुलानी (स्त्री), भङ्गा (स्त्री)व्रीहिभेदः. (1) - अणु (पुं)
मातुलानी तु भङ्गायां व्रीहि भेदस्त्वणुः पुमान्॥ २.८.१२१३ ॥
चणभेदः. (2) - मातुलानी (स्त्री), भङ्गा (स्त्री)व्रीहिभेदः. (1) - अणु (पुं)
सस्यशूकम्. (2) - किंशारु (पुं), सस्यशूक (नपुं)धान्यमञ्जरी. (2) - कणिश (नपुं), सस्यमञ्जरी (स्त्री)
किंशारुः सस्यशूकं स्यात् कणिशं सस्यमञ्जरी॥ २.८.१२१४ ॥
सस्यशूकम्. (2) - किंशारु (पुं), सस्यशूक (नपुं)धान्यमञ्जरी. (2) - कणिश (नपुं), सस्यमञ्जरी (स्त्री)
धान्यम्. (3) - धान्य (नपुं), व्रीहि (पुं), स्तम्बकरि (पुं)यवादीनां मूलम्. (2) - स्तम्ब (पुं), गुच्छ (पुं)
धान्यं व्रीहिः स्तम्बकरिः स्तम्बो गुच्छस्तृणादिनः॥ २.८.१२१५ ॥
धान्यम्. (3) - धान्य (नपुं), व्रीहि (पुं), स्तम्बकरि (पुं)यवादीनां मूलम्. (2) - स्तम्ब (पुं), गुच्छ (पुं)
तृणादिकाण्डः. (2) - नाडी (स्त्री), नाल (नपुं)धान्यरहितकाण्डः. (1) - पलाल (पुं-नपुं)
नाडी नालं च काण्डोऽस्य पलालोस्त्री स निष्फलः॥ २.८.१२१६ ॥
तृणादिकाण्डः. (2) - नाडी (स्त्री), नाल (नपुं)धान्यरहितकाण्डः. (1) - पलाल (पुं-नपुं)
पलालादिक्षोदः. (2) - कडङ्गर (पुं), बुस (नपुं)तुषः. (2) - धान्यत्वच् (स्त्री), तुष (पुं)
कडङ्गरो बुसं क्लीबे धान्यत्वचि तुषः पुमान्॥ २.८.१२१७ ॥
पलालादिक्षोदः. (2) - कडङ्गर (पुं), बुस (नपुं)तुषः. (2) - धान्यत्वच् (स्त्री), तुष (पुं)
तीक्ष्णाग्रधान्यम्. (1) - शूक (पुं-नपुं)शिम्बा. (2) - शमी (स्त्री), शिम्बा (स्त्री)
शूकोऽस्त्री श्लक्ष्णतीक्ष्णाऽग्रे शमी शिम्बा त्रिषूत्तरे॥ २.८.१२१८ ॥
तीक्ष्णाग्रधान्यम्. (1) - शूक (पुं-नपुं)शिम्बा. (2) - शमी (स्त्री), शिम्बा (स्त्री)
अपनीततृणसशीकृत धान्यम्. (2) - ऋद्ध (वि), आवसित (वि)अपनीतबुसधान्यम्. (2) - पूत (वि), बहुलीकृत (वि)
ऋद्धमावसितं धान्यं पूतं तु बहुलीकृतम्॥ २.८.१२१९ ॥
अपनीततृणसशीकृत धान्यम्. (2) - ऋद्ध (वि), आवसित (वि)अपनीतबुसधान्यम्. (2) - पूत (वि), बहुलीकृत (वि)
शमीप्रभवमाषादिधान्यम्. (1) - शमीधान्य (नपुं)यवादिशूकधान्यम्. (1) - शूकधान्य (नपुं)
माषाऽऽदयः शमीधान्ये शूकधान्ये यवाऽऽदयः॥ २.८.१२२० ॥
शमीप्रभवमाषादिधान्यम्. (1) - शमीधान्य (नपुं)यवादिशूकधान्यम्. (1) - शूकधान्य (नपुं)
कलमषष्टिकाद्याः. (1) - शालि (पुं)
शालयः कलमाद्याश्च षष्टिकाद्याश्च पुंस्यमी॥ २.८.१२२१ ॥
कलमषष्टिकाद्याः. (1) - शालि (पुं)
श्यामाकादितृणधान्यानि. (2) - तृणधान्य (नपुं), नीवार (पुं)मुन्यन्नविशेषः. (2) - गवेधु (स्त्री), गवेधुका (स्त्री)
तृणधान्यानि नीवाराः स्त्री गवेधुर्गवेधुका॥ २.८.१२२२ ॥
श्यामाकादितृणधान्यानि. (2) - तृणधान्य (नपुं), नीवार (पुं)मुन्यन्नविशेषः. (2) - गवेधु (स्त्री), गवेधुका (स्त्री)
मुसलः. (2) - अयोग्र (पुं-नपुं), मुसल (पुं-नपुं)उलूखलम्. (2) - उदूखल (नपुं), उलूखल (नपुं)
अयोग्रं मुसलोऽस्त्री स्यादुदूखलमुलूखलम्॥ २.८.१२२३ ॥
मुसलः. (2) - अयोग्र (पुं-नपुं), मुसल (पुं-नपुं)उलूखलम्. (2) - उदूखल (नपुं), उलूखल (नपुं)
शूर्पम्. (2) - प्रस्फोटन (नपुं), शूर्प (पुं-नपुं)चालनी. (2) - चालनी (स्त्री), तितउ (पुं)
प्रस्फोटनं शूपऋमस्त्री चालनी तितउः पुमान्॥ २.८.१२२४ ॥
शूर्पम्. (2) - प्रस्फोटन (नपुं), शूर्प (पुं-नपुं)चालनी. (2) - चालनी (स्त्री), तितउ (पुं)
धान्यादिभरणार्थं वस्त्रादिनानिर्मितस्यूतः. (2) - स्यूत (पुं), प्रसेव (पुं)वंशादिनिर्मितभाण्डः. (2) - कण्डोल (पुं), पिट (पुं)वंशादिविकारः. (2) - कट (पुं), किलिञ्जक (पुं)
स्यूतप्रसेवौ कण्डोलपिटौ कटकिलिञ्जकौ॥ २.८.१२२५ ॥
धान्यादिभरणार्थं वस्त्रादिनानिर्मितस्यूतः. (2) - स्यूत (पुं), प्रसेव (पुं)वंशादिनिर्मितभाण्डः. (2) - कण्डोल (पुं), पिट (पुं)वंशादिविकारः. (2) - कट (पुं), किलिञ्जक (पुं)
पाकस्थानम्. (3) - रसवती (स्त्री), पाकस्थान (नपुं), महानस (नपुं)
समानौ रसवत्यां तु पाकस्थानमहानसे॥ २.८.१२२६ ॥
पाकस्थानम्. (3) - रसवती (स्त्री), पाकस्थान (नपुं), महानस (नपुं)
महानसाधिकारी. (1) - पौरोगव (पुं)पाककर्ता. (2) - सूपकार (पुं), बल्लव (पुं)
पौरोगवस्तदध्यक्षः सूपकारास्तु बल्लवाः॥ २.८.१२२७ ॥
महानसाधिकारी. (1) - पौरोगव (पुं)पाककर्ता. (2) - सूपकार (पुं), बल्लव (पुं)
पाककर्ता. (5) - आरालिक (वि), आन्धसिक (वि), सूदा (वि), औदनिक (वि), गुण (वि)
आरालिका आन्धसिकाः सूदा औदनिका गुणाः॥ २.८.१२२८ ॥
पाककर्ता. (5) - आरालिक (वि), आन्धसिक (वि), सूदा (वि), औदनिक (वि), गुण (वि)
भक्ष्यकारः. (3) - आपूपिक (वि), कान्दविक (वि), भक्ष्यकार (वि)
आपूपिकः कान्दविको भक्ष्यकार इमे त्रिषु॥ २.८.१२२९ ॥
भक्ष्यकारः. (3) - आपूपिक (वि), कान्दविक (वि), भक्ष्यकार (वि)
चुल्लिः. (5) - अश्मन्त (नपुं), उद्धान (नपुं), अधिश्रयणी (स्त्री), चुल्ली (स्त्री), अन्तिका (स्त्री)
अश्मन्तमुद्धानमधिश्रयणी चुल्लिरन्तिका॥ २.८.१२३० ॥
चुल्लिः. (5) - अश्मन्त (नपुं), उद्धान (नपुं), अधिश्रयणी (स्त्री), चुल्ली (स्त्री), अन्तिका (स्त्री)
अङ्गारशकटी. (3) - अङ्गारधानिका (स्त्री), अङ्गारशकटी (स्त्री), हसन्ती (स्त्री)
अङ्गारधानिक।आंगारशकट्यपि हसन्त्यपि॥ २.८.१२३१ ॥
अङ्गारशकटी. (3) - अङ्गारधानिका (स्त्री), अङ्गारशकटी (स्त्री), हसन्ती (स्त्री)
अङ्गारशकटी. (1) - हसनी (स्त्री)प्रज्वलकाष्ठम्. (1) - अङ्गार (पुं-नपुं)अर्धदग्धकाष्ठम्. (2) - अलात (नपुं), उल्मुक (नपुं)
हसन्यप्यथ न स्त्री स्यादङ्गारोऽलातमुल्मुकम्॥ २.८.१२३२ ॥
अङ्गारशकटी. (1) - हसनी (स्त्री)प्रज्वलकाष्ठम्. (1) - अङ्गार (पुं-नपुं)अर्धदग्धकाष्ठम्. (2) - अलात (नपुं), उल्मुक (नपुं)
भर्जनपात्रम्. (2) - अम्बरीष (नपुं), भ्राष्ट्र (पुं)मद्यनिर्माणोपयोगिपात्रम्. (2) - कन्दु (स्त्री-पुं), स्वेदनी (स्त्री)
क्लीबेऽम्बरीपं भ्राष्ट्रो ना कन्दुर्वा स्वेदनी स्त्रियाम्॥ २.८.१२३३ ॥
भर्जनपात्रम्. (2) - अम्बरीष (नपुं), भ्राष्ट्र (पुं)मद्यनिर्माणोपयोगिपात्रम्. (2) - कन्दु (स्त्री-पुं), स्वेदनी (स्त्री)
महाकुम्भः. (2) - अलिञ्जर (पुं), मणिक (पुं)गलन्तिका. (3) - कर्करी (स्त्री), आलु (स्त्री), गलन्तिका (स्त्री)
अलिञ्जरः स्यान्मणिकं ककऋय्यऋलुर्गलन्तिका॥ २.८.१२३४ ॥
महाकुम्भः. (2) - अलिञ्जर (पुं), मणिक (पुं)गलन्तिका. (3) - कर्करी (स्त्री), आलु (स्त्री), गलन्तिका (स्त्री)
स्थाली. (4) - पिठर (पुं), स्थाली (स्त्री), उखा (स्त्री), कुण्ड (नपुं)घटः. (1) - कलश (वि)
पिठरः स्थाल्युखा कुण्डं कलशस्तु त्रिषु द्वयोः॥ २.८.१२३५ ॥
स्थाली. (4) - पिठर (पुं), स्थाली (स्त्री), उखा (स्त्री), कुण्ड (नपुं)घटः. (1) - कलश (वि)
घटः. (3) - घट (पुं), कुट (पुं), निप (पुं-नपुं)पात्रभेदः. (2) - शराव (पुं-नपुं), वर्धमानक (पुं)
घटः कुटनिपावस्त्री शरावो वधऋमानकः॥ २.८.१२३६ ॥
घटः. (3) - घट (पुं), कुट (पुं), निप (पुं-नपुं)पात्रभेदः. (2) - शराव (पुं-नपुं), वर्धमानक (पुं)
पिष्टपाकोपयोगी पात्रम्. (2) - ऋजीष (नपुं), पिष्टपचन (नपुं)पानपात्रम्. (2) - कंस (पुं-नपुं), पानभाजन (नपुं)
ऋजीषं पिष्टपचनं कंसोऽस्त्री पानभाजनम्॥ २.८.१२३७ ॥
पिष्टपाकोपयोगी पात्रम्. (2) - ऋजीष (नपुं), पिष्टपचन (नपुं)पानपात्रम्. (2) - कंस (पुं-नपुं), पानभाजन (नपुं)
चर्मनिर्मिततैलघृतादिपात्रम्. (2) - कुतू (स्त्री), कृत्ति (स्त्री)अल्पतैलघृतादिपात्रम्. (1) - कुतुप (पुं)
कुतूः कृत्तेः स्नेहपात्रं सैवाऽल्पा कुतुपः पुमान्॥ २.८.१२३८ ॥
चर्मनिर्मिततैलघृतादिपात्रम्. (2) - कुतू (स्त्री), कृत्ति (स्त्री)अल्पतैलघृतादिपात्रम्. (1) - कुतुप (पुं)
पात्रम्. (5) - आवपन (नपुं), भाण्ड (नपुं), पात्र (नपुं), अमत्र (नपुं), भाजन (नपुं)
सवऋमावपनं भाण्डं पात्रामत्रे च भाजनम्॥ २.८.१२३९ ॥
पात्रम्. (5) - आवपन (नपुं), भाण्ड (नपुं), पात्र (नपुं), अमत्र (नपुं), भाजन (नपुं)
दर्विः. (3) - दर्वि (स्त्री), कम्बि (स्त्री), खजाका (स्त्री)दर्विभेदः. (2) - तर्दू (पुं), दारुहस्तक (पुं)
दविऋः कम्बिः खजाका च स्यात् तद्दूर्दारुहस्तकः॥ २.८.१२४० ॥
दर्विः. (3) - दर्वि (स्त्री), कम्बि (स्त्री), खजाका (स्त्री)दर्विभेदः. (2) - तर्दू (पुं), दारुहस्तक (पुं)
वास्तुकादिशाकः. (3) - शाक (पुं-नपुं), हरितक (नपुं), शिग्रु (पुं)
अस्त्री शाकं हरितकं शिग्रुरस्य तु नाडिका॥ २.८.१२४१ ॥
वास्तुकादिशाकः. (3) - शाक (पुं-नपुं), हरितक (नपुं), शिग्रु (पुं)
शाकनालः. (2) - कलम्ब (पुं), कडम्ब (पुं)हरिद्रासर्षपमरीचादिचूर्णम्. (2) - वेषवार (पुं), उपस्कर (पुं)
कलम्बश्च कदम्बश्च वेषवार उपस्करः॥ २.८.१२४२ ॥
शाकनालः. (2) - कलम्ब (पुं), कडम्ब (पुं)हरिद्रासर्षपमरीचादिचूर्णम्. (2) - वेषवार (पुं), उपस्कर (पुं)
तिन्तिडीकस्याम्लभेदः. (3) - तिन्तिडीक (नपुं), चुक्र (नपुं), वृक्षाम्ल (नपुं)मरीचम्. (1) - वेल्लज (नपुं)
तिन्तिडीकं च चुक्रं च वृक्षाम्लमथ वेल्लजम्॥ २.८.१२४३ ॥
तिन्तिडीकस्याम्लभेदः. (3) - तिन्तिडीक (नपुं), चुक्र (नपुं), वृक्षाम्ल (नपुं)मरीचम्. (1) - वेल्लज (नपुं)
मरीचम्. (5) - मरीच (नपुं), कोलक (नपुं), कृष्ण (नपुं), औषण (नपुं), धर्मपत्तन (नपुं)
मरीचं कोलकं कृष्णभूषणं धमऋपत्तनम्॥ २.८.१२४४ ॥
मरीचम्. (5) - मरीच (नपुं), कोलक (नपुं), कृष्ण (नपुं), औषण (नपुं), धर्मपत्तन (नपुं)
जीरकः. (4) - जीरक (पुं), जरण (पुं), अजाजी (स्त्री), कणा (स्त्री)
जीरको जरणोऽजाजि कणाः कृष्णे तु जीरके॥ २.८.१२४५ ॥
जीरकः. (4) - जीरक (पुं), जरण (पुं), अजाजी (स्त्री), कणा (स्त्री)
कृष्णवर्णजीरकः. (6) - सुषवी (स्त्री), कारवी (स्त्री), पृथ्वी (स्त्री), पृथु (पुं), काला (स्त्री), उपकुंञ्चिका (स्त्री)
सुषवी कारवी पृथ्वी पृथुः कालोपकुञ्जिका॥ २.८.१२४६ ॥
कृष्णवर्णजीरकः. (6) - सुषवी (स्त्री), कारवी (स्त्री), पृथ्वी (स्त्री), पृथु (पुं), काला (स्त्री), उपकुंञ्चिका (स्त्री)
आर्द्रकम्. (2) - आर्द्रक (नपुं), शृङ्गबेर (नपुं)धान्यकम्. (2) - छत्रा (स्त्री), वितुन्नक (नपुं)
आर्द्रकं शृङ्गबेरं स्यादथ छत्रा वितुन्नकम्॥ २.८.१२४७ ॥
आर्द्रकम्. (2) - आर्द्रक (नपुं), शृङ्गबेर (नपुं)धान्यकम्. (2) - छत्रा (स्त्री), वितुन्नक (नपुं)
धान्यकम्. (2) - कुस्तुम्बरु (नपुं), धान्याक (नपुं)शुण्ठी. (2) - शुण्ठी (स्त्री), महौषध (नपुं)
कुस्तुम्बरु च धान्याकमथ शुण्ठी महौषधम्॥ २.८.१२४८ ॥
धान्यकम्. (2) - कुस्तुम्बरु (नपुं), धान्याक (नपुं)शुण्ठी. (2) - शुण्ठी (स्त्री), महौषध (नपुं)
शुण्ठी. (3) - विश्व (स्त्री-नपुं), नागर (नपुं), विश्वभेषज (नपुं)
स्त्रीनपुंसकयोर्विश्वं नागरं विश्वभेषजम्॥ २.८.१२४९ ॥
शुण्ठी. (3) - विश्व (स्त्री-नपुं), नागर (नपुं), विश्वभेषज (नपुं)
काञ्जिकम्. (4) - आरनालक (नपुं), सौवीर (नपुं), कुल्माष (नपुं), अभिषुत (नपुं)
आरनालकसौवीरकुल्माषऽभिशुतानि च॥ २.८.१२५० ॥
काञ्जिकम्. (4) - आरनालक (नपुं), सौवीर (नपुं), कुल्माष (नपुं), अभिषुत (नपुं)
काञ्जिकम्. (4) - अवन्तिसोम (नपुं), धान्याम्ल (नपुं), कुञ्जल (नपुं), काञ्जिक (नपुं)
अवन्तिसोमधान्याम्लकुञ्जलानि च काञ्जिके॥ २.८.१२५१ ॥
काञ्जिकम्. (4) - अवन्तिसोम (नपुं), धान्याम्ल (नपुं), कुञ्जल (नपुं), काञ्जिक (नपुं)
हिङ्गुवृक्षनिर्यासः. (5) - सहस्रवेधि (नपुं), जतुक (नपुं), बल्हीक (नपुं), हिङ्गु (नपुं), रामठ (नपुं)
सहस्रवेधि जतुकं बल्हीकं हिङ्गु रामठम्॥ २.८.१२५२ ॥
हिङ्गुवृक्षनिर्यासः. (5) - सहस्रवेधि (नपुं), जतुक (नपुं), बल्हीक (नपुं), हिङ्गु (नपुं), रामठ (नपुं)
हिङ्गुपत्रम्. (5) - कारवी (स्त्री), पृथ्वी (स्त्री), बाष्पिका (स्त्री), कबरी (स्त्री), पृथु (पुं)
तत्पत्री कारवी पृथ्वी बाष्पिका कबरी पृथुः॥ २.८.१२५३ ॥
हिङ्गुपत्रम्. (5) - कारवी (स्त्री), पृथ्वी (स्त्री), बाष्पिका (स्त्री), कबरी (स्त्री), पृथु (पुं)
हरिद्रा. (5) - निशाह्वा (स्त्री), काञ्चनी (स्त्री), पीता (स्त्री), हरिद्रा (स्त्री), वरवर्णिनी (स्त्री)
निशाऽऽख्या काञ्चनी पीता हरिद्रा वरवणिऋनी॥ २.८.१२५४ ॥
हरिद्रा. (5) - निशाह्वा (स्त्री), काञ्चनी (स्त्री), पीता (स्त्री), हरिद्रा (स्त्री), वरवर्णिनी (स्त्री)
लवणम्. (4) - सामुद्र (नपुं), लवण (पुं), अक्षीव (नपुं), वशिर (नपुं)
सामुद्रं यत् तु लवणमक्षीवं वशिरं च तत्॥ २.८.१२५५ ॥
लवणम्. (4) - सामुद्र (नपुं), लवण (पुं), अक्षीव (नपुं), वशिर (नपुं)
सिन्धुजलवणम्. (4) - सैन्धव (पुं-नपुं), शीतशिव (नपुं), माणिमन्थ (नपुं), सिन्धुज (नपुं)
सैन्धवोऽस्त्री शीतशिवं माणिमन्थं च सिन्धुजे॥ २.८.१२५६ ॥
सिन्धुजलवणम्. (4) - सैन्धव (पुं-नपुं), शीतशिव (नपुं), माणिमन्थ (नपुं), सिन्धुज (नपुं)
शाम्भरलवणम्. (2) - रौमक (नपुं), वसुक (नपुं)कृतकलवणम्. (2) - पाक्य (नपुं), बिड (नपुं)
रौमकं वसुकं पाक्यं बिडं च कृतके द्वयम्॥ २.८.१२५७ ॥
शाम्भरलवणम्. (2) - रौमक (नपुं), वसुक (नपुं)कृतकलवणम्. (2) - पाक्य (नपुं), बिड (नपुं)
मधुरलवणम्. (3) - सौवर्चल (नपुं), अक्ष (पुं-नपुं), रुचक (पुं)कृष्णवर्णलवणम्. (1) - तिलक (नपुं)
सौवर्चलेऽक्षरुचके तिलकं तत्र मेचके॥ २.८.१२५८ ॥
मधुरलवणम्. (3) - सौवर्चल (नपुं), अक्ष (पुं-नपुं), रुचक (पुं)कृष्णवर्णलवणम्. (1) - तिलक (नपुं)
फाणितम्. (3) - मत्स्यन्डी (स्त्री), फाणित (नपुं), खण्डविकार (पुं)शर्करा. (2) - शर्करा (स्त्री), सिता (स्त्री)
मत्स्यण्डी फाणितं खण्डविकारे शर्करा सिता॥ २.८.१२५९ ॥
फाणितम्. (3) - मत्स्यन्डी (स्त्री), फाणित (नपुं), खण्डविकार (पुं)शर्करा. (2) - शर्करा (स्त्री), सिता (स्त्री)
क्षीरविकृतिः. (1) - कूर्चिका (स्त्री)दधिमधुशर्करामरिचार्द्रादिभिः कृतलेह्यः. (2) - रसाला (स्त्री), मार्जिता (स्त्री)
कूर्चिका क्षीरविकृतिः स्याद्रसाला तु मार्जिता॥ २.८.१२६० ॥
क्षीरविकृतिः. (1) - कूर्चिका (स्त्री)दधिमधुशर्करामरिचार्द्रादिभिः कृतलेह्यः. (2) - रसाला (स्त्री), मार्जिता (स्त्री)
दध्यादिव्यञ्जनम्. (2) - तेमन (नपुं), निष्ठान (नपुं)
स्यात्तेमनं तु निष्ठानं त्रिलिङ्गा वासिताऽवधेः॥ २.८.१२६१ ॥
दध्यादिव्यञ्जनम्. (2) - तेमन (नपुं), निष्ठान (नपुं)
लोहशलाकया पक्वमांसः. (3) - शूलाकृत (वि), भटित्र (वि), शूल्य (वि)स्थालीसंस्कृतान्नादिः. (2) - उख्य (वि), पैठर (वि)
शूलाकृतं भटित्रं च शूल्यमुख्यं तु पैठरम्॥ २.८.१२६२ ॥
लोहशलाकया पक्वमांसः. (3) - शूलाकृत (वि), भटित्र (वि), शूल्य (वि)स्थालीसंस्कृतान्नादिः. (2) - उख्य (वि), पैठर (वि)
पाकेन संस्कृतव्यञ्जनादिः. (2) - प्रणीत (वि), उपसम्पन्न (वि)द्रव्यान्तरसंस्कृतपक्वम्. (2) - प्रयस्त (वि), सुसंस्कृत (वि)
प्रणीतमुपसम्पन्नं प्रयस्तं स्यात्सुसंस्कृतम्॥ २.८.१२६३ ॥
पाकेन संस्कृतव्यञ्जनादिः. (2) - प्रणीत (वि), उपसम्पन्न (वि)द्रव्यान्तरसंस्कृतपक्वम्. (2) - प्रयस्त (वि), सुसंस्कृत (वि)
मण्डयुक्तदध्यादिः. (2) - पिच्छिल (वि), विजिल (वि)केशकीटाद्यपनीयशोधितोन्नः. (2) - सम्मृष्ट (वि), शोधित (वि)
स्यात्पिच्छिलं तु विजिलं संमृष्टं शोधितं समे॥ २.८.१२६४ ॥
मण्डयुक्तदध्यादिः. (2) - पिच्छिल (वि), विजिल (वि)केशकीटाद्यपनीयशोधितोन्नः. (2) - सम्मृष्ट (वि), शोधित (वि)
स्निग्धम्. (3) - चिक्कण (वि), मसृण (वि), स्निग्ध (वि)ग्राहितहिङ्ग्वादिगन्धव्यञ्जनादिः. (2) - भावित (वि), वासित (वि)
चिक्कणं मसृणं स्निग्धं तुल्ये भावितवासिते॥ २.८.१२६५ ॥
स्निग्धम्. (3) - चिक्कण (वि), मसृण (वि), स्निग्ध (वि)ग्राहितहिङ्ग्वादिगन्धव्यञ्जनादिः. (2) - भावित (वि), वासित (वि)
पौलिः. (3) - आपक्व (नपुं), पौलि (पुं), अभ्यूष (पुं)भृष्टव्रीह्यादिः. (1) - लाज (पुं-बहु)अखण्डतण्डुलाः. (1) - अक्षत (पुं-बहु)
आपक्कं पौलिरभ्यूषो लाजाः पुंभूम्नि चाऽक्षताः॥ २.८.१२६६ ॥
पौलिः. (3) - आपक्व (नपुं), पौलि (पुं), अभ्यूष (पुं)भृष्टव्रीह्यादिः. (1) - लाज (पुं-बहु)अखण्डतण्डुलाः. (1) - अक्षत (पुं-बहु)
पृथुकः. (2) - पृथुक (पुं), चिपिटक (पुं)भर्जितयवः. (2) - धाना (स्त्री), भृष्टयव (पुं)
पृथकः स्याच्चिपिटको धाना भृष्टयवे स्त्रियः॥ २.८.१२६७ ॥
पृथुकः. (2) - पृथुक (पुं), चिपिटक (पुं)भर्जितयवः. (2) - धाना (स्त्री), भृष्टयव (पुं)
अपूपः. (3) - पूप (पुं), अपूप (पुं), पिष्टक (पुं)दधिमिश्रसक्तुः. (2) - करम्भ (पुं), दधिसक्तु (पुं)
पूपोऽपूपः पिष्टकः स्यात्करम्भो दधिसक्तवः॥ २.८.१२६८ ॥
अपूपः. (3) - पूप (पुं), अपूप (पुं), पिष्टक (पुं)दधिमिश्रसक्तुः. (2) - करम्भ (पुं), दधिसक्तु (पुं)
सिद्धान्नम्. (6) - भिस्सा (स्त्री), भक्त (नपुं), अन्ध (पुं), अन्न (नपुं), ओदन (पुं-नपुं), दीदिवि (पुं)
भिस्सा स्त्री भक्तमन्धोऽन्नमोदनोऽस्त्री स दीदिविः॥ २.८.१२६९ ॥
सिद्धान्नम्. (6) - भिस्सा (स्त्री), भक्त (नपुं), अन्ध (पुं), अन्न (नपुं), ओदन (पुं-नपुं), दीदिवि (पुं)
दग्धोदनः. (2) - भिस्सटा (स्त्री), दग्धिका (स्त्री)सर्वेषाम् रसानामग्रम्. (1) - मण्ड (पुं-नपुं)
भिस्सटा दग्धिका सर्वरसाऽग्रे मण्डमस्त्रियाम्॥ २.८.१२७० ॥
दग्धोदनः. (2) - भिस्सटा (स्त्री), दग्धिका (स्त्री)सर्वेषाम् रसानामग्रम्. (1) - मण्ड (पुं-नपुं)
भक्तोद्भवमण्डः. (3) - मासर (पुं), आचाम (पुं), निस्राव (पुं)
मासराऽऽचामनिस्रावा मण्डे भक्तसमुद्भवे॥ २.८.१२७१ ॥
भक्तोद्भवमण्डः. (3) - मासर (पुं), आचाम (पुं), निस्राव (पुं)
यवागू. (5) - यवागू (स्त्री), उष्णिका (स्त्री), श्राणा (स्त्री), विलेपी (स्त्री), तरला (स्त्री)
यवागूरुष्णिका श्राणा विलेपी तरला च सा॥ २.८.१२७२ ॥
यवागू. (5) - यवागू (स्त्री), उष्णिका (स्त्री), श्राणा (स्त्री), विलेपी (स्त्री), तरला (स्त्री)
तैलम्. (3) - म्रक्षण (नपुं), अभ्यञ्जन (नपुं), तैल (नपुं)तिलौदनः. (2) - कृसर (नपुं), तिलौदन (पुं)
म्रक्षणाऽभ्यञ्जने तैलं कृसरस्तु तिलौदनः॥ २.८.१२७३ ॥
तैलम्. (3) - म्रक्षण (नपुं), अभ्यञ्जन (नपुं), तैल (नपुं)तिलौदनः. (2) - कृसर (नपुं), तिलौदन (पुं)
गोरसम्. (1) - गव्य (वि)गोमयम्. (2) - गोविष् (पुं-नपुं), गोमय (पुं-नपुं)
गव्यं त्रिषु गवां सर्वं गोविड्गोमयस्त्रियाम्॥ २.८.१२७४ ॥
गोरसम्. (1) - गव्य (वि)गोमयम्. (2) - गोविष् (पुं-नपुं), गोमय (पुं-नपुं)
शुष्कगोमयम्. (1) - करीष (पुं-नपुं)दुग्धम्. (3) - दुग्ध (नपुं), क्षीर (नपुं), पयस् (नपुं)
तत्तु शुष्कं करीषोऽस्त्री दुग्धं क्षीरं पयस्समम्॥ २.८.१२७५ ॥
शुष्कगोमयम्. (1) - करीष (पुं-नपुं)दुग्धम्. (3) - दुग्ध (नपुं), क्षीर (नपुं), पयस् (नपुं)
घृतदध्यादिः. (1) - पयस्य (नपुं)शिथिलदधिः. (1) - द्रप्स (नपुं)
पयस्यमाज्यदध्याऽऽदि त्रप्स्यं दधि धनेतरत्॥ २.८.१२७६ ॥
घृतदध्यादिः. (1) - पयस्य (नपुं)शिथिलदधिः. (1) - द्रप्स (नपुं)
घृतम्. (4) - घृत (नपुं), आज्य (नपुं), हविस् (नपुं), सर्पिस् (नपुं)अकृताग्निसंयोगनवोद्धृतम्. (1) - नवनीत (नपुं)
घृतमाज्यं हविः सर्पिर्नवनीतं नवोद्घृतम्॥ २.८.१२७७ ॥
घृतम्. (4) - घृत (नपुं), आज्य (नपुं), हविस् (नपुं), सर्पिस् (नपुं)अकृताग्निसंयोगनवोद्धृतम्. (1) - नवनीत (नपुं)
एकरात्रपर्युषिताद्दध्नोत्पन्नघृतम्. (1) - हैयङ्गवीन (नपुं)
तत्तु हैयङ्गवीनं यत् ह्योघोदोहोद्भवं गृतम्॥ २.८.१२७८ ॥
एकरात्रपर्युषिताद्दध्नोत्पन्नघृतम्. (1) - हैयङ्गवीन (नपुं)
दण्डमथितगोरसमात्रम्. (4) - दण्डाहत (नपुं), कालशेय (नपुं), अरिष्ट (नपुं), गोरस (पुं)
दण्डाहतं कालशेयमरिष्टमपि गोरसः॥ २.८.१२७९ ॥
दण्डमथितगोरसमात्रम्. (4) - दण्डाहत (नपुं), कालशेय (नपुं), अरिष्ट (नपुं), गोरस (पुं)
पादांशजलघोलः. (1) - तक्र (नपुं)अर्धांशजलघोलः. (1) - उदश्वित् (नपुं)
तक्रं ह्युदश्विन् मथितं पादाम्ब्वर्धाम्बु निर्जलम्॥ २.८.१२८० ॥
पादांशजलघोलः. (1) - तक्र (नपुं)अर्धांशजलघोलः. (1) - उदश्वित् (नपुं)
वस्त्रनिःसृतदधिजलम्. (1) - मस्तु (नपुं)नवप्रसूतगोः क्षीरम्. (1) - पीयूष (नपुं)
मण्डम् दधिभवं मस्तु पीयूषोऽभिनवं पयः॥ २.८.१२८१ ॥
वस्त्रनिःसृतदधिजलम्. (1) - मस्तु (नपुं)नवप्रसूतगोः क्षीरम्. (1) - पीयूष (नपुं)
बुभुक्षा. (3) - अशनाया (स्त्री), बुभुक्षा (स्त्री), क्षुत् (स्त्री)ग्रासः. (2) - ग्रास (पुं), कवल (पुं)
अशनाया बुभुक्षा क्षुद् ग्रासस्तु कवलः पुमान्॥ २.८.१२८२ ॥
बुभुक्षा. (3) - अशनाया (स्त्री), बुभुक्षा (स्त्री), क्षुत् (स्त्री)ग्रासः. (2) - ग्रास (पुं), कवल (पुं)
सहपानम्. (2) - सपीति (स्त्री), तुल्यपान (नपुं)सहभोजनम्. (2) - सग्धि (स्त्री), सहभोजन (नपुं)
सपीतिः स्त्री तुल्यपानं सग्धिः स्त्री सहभोजनम्॥ २.८.१२८३ ॥
सहपानम्. (2) - सपीति (स्त्री), तुल्यपान (नपुं)सहभोजनम्. (2) - सग्धि (स्त्री), सहभोजन (नपुं)
पिपासा. (4) - उदन्या (स्त्री), पिपासा (स्त्री), तृष् (स्त्री), तर्ष (पुं)भोजनम्. (2) - जग्धि (स्त्री), भोजन (नपुं)
उदन्या तु पिपासा तृट् तर्पो जग्धिस्तु भोजनम्॥ २.८.१२८४ ॥
पिपासा. (4) - उदन्या (स्त्री), पिपासा (स्त्री), तृष् (स्त्री), तर्ष (पुं)भोजनम्. (2) - जग्धि (स्त्री), भोजन (नपुं)
भोजनम्. (5) - जेमन (नपुं), लेह (पुं), आहार (पुं), निघस (पुं), न्याद (पुं)
जेमनं लेह आहारो निघासो न्याद इत्यपि॥ २.८.१२८५ ॥
भोजनम्. (5) - जेमन (नपुं), लेह (पुं), आहार (पुं), निघस (पुं), न्याद (पुं)
तृप्तिः. (3) - सौहित्य (नपुं), तर्पण (नपुं), तृप्ति (स्त्री)भुक्तोच्चिष्टम्. (2) - फेला (स्त्री), भुक्तसमुज्झित (नपुं)
सौहित्यं तर्पणं तृप्तिः फेला भुक्तसमुज्झितम्॥ २.८.१२८६ ॥
तृप्तिः. (3) - सौहित्य (नपुं), तर्पण (नपुं), तृप्ति (स्त्री)भुक्तोच्चिष्टम्. (2) - फेला (स्त्री), भुक्तसमुज्झित (नपुं)
यथेप्सितम्. (6) - काम (नपुं), प्रकामम् (अव्य), पर्याप्त (नपुं), निकामम् (अव्य), इष्ट (नपुं), यथेप्सितम् (अव्य)
कामं प्रकामं पर्याप्तं निकामेष्टं यथेप्सितम्॥ २.८.१२८७ ॥
यथेप्सितम्. (6) - काम (नपुं), प्रकामम् (अव्य), पर्याप्त (नपुं), निकामम् (अव्य), इष्ट (नपुं), यथेप्सितम् (अव्य)
गोपालः. (6) - गोप (पुं), गोपाल (पुं), गोसङ्ख्य (पुं), गोधुक् (पुं), आभीर (पुं), वल्लव (पुं)
गोपे गोपाल गोसंख्य गोधुगाभीर वल्लवाः॥ २.८.१२८८ ॥
गोपालः. (6) - गोप (पुं), गोपाल (पुं), गोसङ्ख्य (पुं), गोधुक् (पुं), आभीर (पुं), वल्लव (पुं)
गोमहिष्यादिः. (1) - पादबन्धन (नपुं)गवां स्वामिः. (1) - गवीश्वर (पुं)
गोमहिष्याऽऽदिकं पादबन्धनं द्वौ गवीश्वरे॥ २.८.१२८९ ॥
गोमहिष्यादिः. (1) - पादबन्धन (नपुं)गवां स्वामिः. (1) - गवीश्वर (पुं)
गवां स्वामिः. (2) - गोमत् (पुं), गोमिन् (पुं)गोसङ्घातः. (2) - गोकुल (नपुं), गोधन (नपुं)
गोमान् गोमी गोकुलं तु गोधनं स्यात्गवां व्रजे॥ २.८.१२९० ॥
गवां स्वामिः. (2) - गोमत् (पुं), गोमिन् (पुं)गोसङ्घातः. (2) - गोकुल (नपुं), गोधन (नपुं)
पूर्वं गवां चरणस्थानम्. (1) - आशितङ्गवीन (वि)
त्रिष्वाशितंगवीनं तद्गावो यत्राऽशिताः पुरा॥ २.८.१२९१ ॥
पूर्वं गवां चरणस्थानम्. (1) - आशितङ्गवीन (वि)
वृषभः. (6) - उक्षन् (पुं), भद्र (पुं), बलीवर्द (पुं), ऋषभ (पुं), वृषभ (पुं), वृष (पुं)
उक्षा भद्रो बलीवर्द ऋषभो वृषभो वृषः॥ २.८.१२९२ ॥
वृषभः. (6) - उक्षन् (पुं), भद्र (पुं), बलीवर्द (पुं), ऋषभ (पुं), वृषभ (पुं), वृष (पुं)
वृषभः. (3) - अनडुह् (पुं), सौरभेय (पुं), गो (पुं)वृषभसङ्घः. (1) - औक्षक (नपुं)
अनड्वान् सौरभेयो गौरुक्ष्णां संहतिरौक्षकम्॥ २.८.१२९३ ॥
वृषभः. (3) - अनडुह् (पुं), सौरभेय (पुं), गो (पुं)वृषभसङ्घः. (1) - औक्षक (नपुं)
गोसमूहः. (2) - गव्या (स्त्री), गोत्रा (स्त्री)वत्ससमूहः. (1) - वात्सक (नपुं)
गव्या गोत्रा गवां वत्सधेन्वोर्वात्सकधैनुके॥ २.८.१२९४ ॥
गोसमूहः. (2) - गव्या (स्त्री), गोत्रा (स्त्री)वत्ससमूहः. (1) - वात्सक (नपुं)
महावृषभः. (1) - महोक्ष (पुं)वृद्धवृषभः. (2) - वृद्धोक्ष (पुं), जरद्गव (पुं)
उक्षा महान् महोक्षः स्याद्वृद्धोक्षस्तु जरद्गवः॥ २.८.१२९५ ॥
महावृषभः. (1) - महोक्ष (पुं)वृद्धवृषभः. (2) - वृद्धोक्ष (पुं), जरद्गव (पुं)
आरब्धयौवनवृषभः. (1) - जातोक्ष (पुं)सद्योजातवृषभवत्सः. (1) - तर्णक (पुं)
उत्पन्न उक्षा जातोक्षः सद्यो जातस्तु तर्णकः॥ २.८.१२९६ ॥
आरब्धयौवनवृषभः. (1) - जातोक्ष (पुं)सद्योजातवृषभवत्सः. (1) - तर्णक (पुं)
वृषभवत्सः. (2) - शकृत्करि (पुं), वत्स (पुं)स्पष्टतारुण्यवृषभः. (2) - दम्य (पुं), वत्सतर (पुं)
शकृत्करिस्तु वत्सस्याद् दम्यवत्सतरौ समौ॥ २.८.१२९७ ॥
वृषभवत्सः. (2) - शकृत्करि (पुं), वत्स (पुं)स्पष्टतारुण्यवृषभः. (2) - दम्य (पुं), वत्सतर (पुं)
तारुण्यप्राप्तवृषभः. (2) - आर्षभ्य (पुं), षण्डतायोग्य (पुं)साण्डवृषभः. (3) - षण्ड (पुं), गोपति (पुं), इट्चर (पुं)
आर्षभ्यः षण्डतायोग्यः षण्डो गोपतिरिट्चरः॥ २.८.१२९८ ॥
तारुण्यप्राप्तवृषभः. (2) - आर्षभ्य (पुं), षण्डतायोग्य (पुं)साण्डवृषभः. (3) - षण्ड (पुं), गोपति (पुं), इट्चर (पुं)
वृषभस्कन्धदेशः. (1) - वह (पुं)गलकम्बलः. (2) - सास्ना (स्त्री), गलकम्बल (पुं)
स्कन्धदेशे स्वस्य वहः सास्ना तु गलकम्बलः॥ २.८.१२९९ ॥
वृषभस्कन्धदेशः. (1) - वह (पुं)गलकम्बलः. (2) - सास्ना (स्त्री), गलकम्बल (पुं)
नासारज्जुयुक्तवृषभः. (2) - नस्तित (पुं), नस्योत (पुं)दमनार्थं कण्ठारोपितकाष्ठवाहः. (2) - प्रष्ठवाह् (पुं), युगपार्श्वग (पुं)
स्यान्नस्तितस्तु नस्योतः प्रष्ठवाड् युगपार्श्वगः॥ २.८.१३०० ॥
नासारज्जुयुक्तवृषभः. (2) - नस्तित (पुं), नस्योत (पुं)दमनार्थं कण्ठारोपितकाष्ठवाहः. (2) - प्रष्ठवाह् (पुं), युगपार्श्वग (पुं)
युगवाह्यवृषभः. (1) - युग्य (नपुं)युगेयुगवाह्यवृषभः. (1) - प्रासङ्ग्य (पुं)शकटवाह्यवृषभः. (1) - शाकट (पुं)
युगाऽऽदीनां तु वोढारो युग्यप्रासंग्यशाकटाः॥ २.८.१३०१ ॥
युगवाह्यवृषभः. (1) - युग्य (नपुं)युगेयुगवाह्यवृषभः. (1) - प्रासङ्ग्य (पुं)शकटवाह्यवृषभः. (1) - शाकट (पुं)
हलेन खनतीत्यादयः. (2) - हालिक (पुं), सैरिक (पुं)
खनति तेन तद्वोढाऽस्येदं हालिकसैरिकौ॥ २.८.१३०२ ॥
हलेन खनतीत्यादयः. (2) - हालिक (पुं), सैरिक (पुं)
धुरन्धरवृषभः. (5) - धुर्वह (पुं), धुर्य (पुं), धौरेय (पुं), धुरीण (पुं), सधुरन्धर (पुं)
धुर्वहे धुर्य धौरेय धुरीणाः सधुरन्धराः॥ २.८.१३०३ ॥
धुरन्धरवृषभः. (5) - धुर्वह (पुं), धुर्य (पुं), धौरेय (पुं), धुरीण (पुं), सधुरन्धर (पुं)
एकामेव धुरन्धरः. (3) - एकधुरीण (पुं), एकधुर (पुं), एकधुरावह (पुं)
उभावेकधुरीणैकधुरावेकधुरावहे॥ २.८.१३०४ ॥
एकामेव धुरन्धरः. (3) - एकधुरीण (पुं), एकधुर (पुं), एकधुरावह (पुं)
धुरीणश्रेष्ठः. (2) - सर्वधुरीण (पुं), सर्वधुरावह (पुं)
स तु सर्वधुरीणः स्याद्यो वै सर्वधुराऽऽवहः॥ २.८.१३०५ ॥
धुरीणश्रेष्ठः. (2) - सर्वधुरीण (पुं), सर्वधुरावह (पुं)
गौः. (6) - माहेयी (स्त्री), सौरभेयी (स्त्री), गो (पुं), उस्रा (स्त्री), मातृ (स्त्री), शृङ्गिणी (स्त्री)
माहेयी सौरभेयी गौरुस्रा माता च शृङ्गिणी॥ २.८.१३०६ ॥
गौः. (6) - माहेयी (स्त्री), सौरभेयी (स्त्री), गो (पुं), उस्रा (स्त्री), मातृ (स्त्री), शृङ्गिणी (स्त्री)
गौः. (3) - अर्जुनी (स्त्री), अघ्न्या (स्त्री), रोहिणी (स्त्री)श्रेष्ठा गौः. (1) - नैचिकी (स्त्री)
अर्जुन्यघ्न्या रोहिणी स्यादुत्तमा गोषु नौचिकी॥ २.८.१३०७ ॥
गौः. (3) - अर्जुनी (स्त्री), अघ्न्या (स्त्री), रोहिणी (स्त्री)श्रेष्ठा गौः. (1) - नैचिकी (स्त्री)
गोभेदः. (2) - शबली (स्त्री), धवला (स्त्री)
वर्णाऽऽदिभेदात्संज्ञाः स्युः शबलीधवलाऽऽदयः॥ २.८.१३०८ ॥
गोभेदः. (2) - शबली (स्त्री), धवला (स्त्री)
द्विवर्षा गौः. (1) - द्विहायनी (स्त्री)एकवर्षा गौः. (1) - एकहायनी (स्त्री)
द्विहायनी द्विवर्षा गौरेकाऽब्दा त्वेकहायनी॥ २.८.१३०९ ॥
द्विवर्षा गौः. (1) - द्विहायनी (स्त्री)एकवर्षा गौः. (1) - एकहायनी (स्त्री)
चतुर्वर्षा गौः. (1) - चतुर्हायणी (स्त्री)त्रिवर्षा गौः. (1) - त्रिहायणी (स्त्री)
चतुरब्दा चतुर्हाण्येवं त्र्यब्दा त्रिहायणी॥ २.८.१३१० ॥
चतुर्वर्षा गौः. (1) - चतुर्हायणी (स्त्री)त्रिवर्षा गौः. (1) - त्रिहायणी (स्त्री)
चतुर्वर्षा गौः. (1) - चतुर्हायणी (स्त्री)त्रिवर्षा गौः. (1) - त्रिहायणी (स्त्री)वन्ध्या गौः. (2) - वशा (स्त्री), वन्ध्या (स्त्री)अकस्मात् पतितगर्भा गौः. (2) - अवतोका (स्त्री), स्रवद्गर्भा (स्त्री)कृतमैथुना गौः. (1) - सन्धिनी (स्त्री)
वशा वन्ध्याऽवतोका तु स्रवद्गर्भाऽथ संधिनी॥ २.८.१३११ ॥
चतुर्वर्षा गौः. (1) - चतुर्हायणी (स्त्री)त्रिवर्षा गौः. (1) - त्रिहायणी (स्त्री)वन्ध्या गौः. (2) - वशा (स्त्री), वन्ध्या (स्त्री)अकस्मात् पतितगर्भा गौः. (2) - अवतोका (स्त्री), स्रवद्गर्भा (स्त्री)कृतमैथुना गौः. (1) - सन्धिनी (स्त्री)
वृषयोगेन गर्भपातिनी. (2) - वेहत् (स्त्री), गर्भोपघातिनी (स्त्री)
आक्रान्ता वृषभेणाथ वेहद् गर्भोपघातिनी॥ २.८.१३१२ ॥
वृषयोगेन गर्भपातिनी. (2) - वेहत् (स्त्री), गर्भोपघातिनी (स्त्री)
गर्भग्रहणयोग्या गौः. (1) - उपसर्या (स्त्री)प्रथमं गर्भं धृतवती गौः. (2) - प्रष्ठौही (स्त्री), बालगर्भिणी (स्त्री)
काल्योपसर्या प्रजने प्रष्ठौही बालगर्भिणी॥ २.८.१३१३ ॥
गर्भग्रहणयोग्या गौः. (1) - उपसर्या (स्त्री)प्रथमं गर्भं धृतवती गौः. (2) - प्रष्ठौही (स्त्री), बालगर्भिणी (स्त्री)
अकोपजा गौः. (2) - अचण्डी (स्त्री), सुकरा (स्त्री)बहुप्रसूता गौः. (2) - बहुसूति (स्त्री), परेष्टुका (स्त्री)
स्यादचण्डी तु सुकरा बहुसूतिः परेष्टुका॥ २.८.१३१४ ॥
अकोपजा गौः. (2) - अचण्डी (स्त्री), सुकरा (स्त्री)बहुप्रसूता गौः. (2) - बहुसूति (स्त्री), परेष्टुका (स्त्री)
दीर्घकालेन प्रसूता गौः. (2) - चिरप्रसूता (स्त्री), बष्कयणी (स्त्री)नूतनप्रसूता गौः. (2) - धेनु (स्त्री), नवसूतिका (स्त्री)
चिरप्रसूता बष्कयणी धेनुः स्यात्नवसूतिका॥ २.८.१३१५ ॥
दीर्घकालेन प्रसूता गौः. (2) - चिरप्रसूता (स्त्री), बष्कयणी (स्त्री)नूतनप्रसूता गौः. (2) - धेनु (स्त्री), नवसूतिका (स्त्री)
सुशीला गौः. (2) - सुव्रता (स्त्री), सुखसन्दोह्या (स्त्री)स्थूलस्तनी गौः. (2) - पीनोध्नी (स्त्री), पीवरस्तनी (स्त्री)
सुव्रता सुखसंदोह्या पीनोध्नी पीवरस्तनी॥ २.८.१३१६ ॥
सुशीला गौः. (2) - सुव्रता (स्त्री), सुखसन्दोह्या (स्त्री)स्थूलस्तनी गौः. (2) - पीनोध्नी (स्त्री), पीवरस्तनी (स्त्री)
द्रोणप्रिमितदुग्धमात्रा गौः. (2) - द्रोणक्षीरा (स्त्री), द्रोणदुग्धा (स्त्री)बन्धनस्थिता गौः. (1) - धेनुष्या (स्त्री)
द्रोणक्षीरा द्रोणदुग्धा धेनुष्या बन्धके स्थिता॥ २.८.१३१७ ॥
द्रोणप्रिमितदुग्धमात्रा गौः. (2) - द्रोणक्षीरा (स्त्री), द्रोणदुग्धा (स्त्री)बन्धनस्थिता गौः. (1) - धेनुष्या (स्त्री)
प्रतिवर्षं प्रसवित्री गौः. (1) - समांसमीना (स्त्री)
समांसमीना सा यैव प्रतिवर्षप्रसूतये॥ २.८.१३१८ ॥
प्रतिवर्षं प्रसवित्री गौः. (1) - समांसमीना (स्त्री)
क्षीरशयः. (2) - ऊधस् (नपुं), आपीन (नपुं)पशुबन्धनकाष्ठम्. (2) - शिवक (पुं), कीलक (पुं)
ऊधस्तु क्लीबमापीनं समौ शिवककीलकौ॥ २.८.१३१९ ॥
क्षीरशयः. (2) - ऊधस् (नपुं), आपीन (नपुं)पशुबन्धनकाष्ठम्. (2) - शिवक (पुं), कीलक (पुं)
दोहनकाले पादबन्धनरज्जुः. (2) - दामन् (स्त्री-नपुं), सन्दान (नपुं)पशुबन्धनरज्जुः. (2) - पशुरज्जु (स्त्री), दामनी (स्त्री)
न पुम्सि दाम संदानं पशुरज्जुस्तु दामनी॥ २.८.१३२० ॥
दोहनकाले पादबन्धनरज्जुः. (2) - दामन् (स्त्री-नपुं), सन्दान (नपुं)पशुबन्धनरज्जुः. (2) - पशुरज्जु (स्त्री), दामनी (स्त्री)
मन्थनदण्डः. (5) - वैशाख (पुं), मन्थ (पुं), मन्थान (पुं), मन्था (पुं), मन्थदण्डक (पुं)
वैशाखमन्थमन्थान मन्थानो मन्थदण्डके॥ २.८.१३२१ ॥
मन्थनदण्डः. (5) - वैशाख (पुं), मन्थ (पुं), मन्थान (पुं), मन्था (पुं), मन्थदण्डक (पुं)
मन्थदण्डदारककाष्ठम्. (2) - कुठर (पुं), दण्डविष्कम्भ (पुं)मन्थनपात्रम्. (2) - मन्थनी (स्त्री), गर्गरी (स्त्री)
कुठरो दण्डविष्कम्भो मन्थनी गर्गरी समे॥ २.८.१३२२ ॥
मन्थदण्डदारककाष्ठम्. (2) - कुठर (पुं), दण्डविष्कम्भ (पुं)मन्थनपात्रम्. (2) - मन्थनी (स्त्री), गर्गरी (स्त्री)
उष्ट्रः. (4) - उष्ट्र (पुं), क्रमेलक (पुं), मय (पुं), महाङ्ग (पुं)उष्ट्रशिशुः. (1) - करभ (पुं)
उष्ट्रे क्रमेलकमयमहाङ्गाः करभः शिशुः॥ २.८.१३२३ ॥
उष्ट्रः. (4) - उष्ट्र (पुं), क्रमेलक (पुं), मय (पुं), महाङ्ग (पुं)उष्ट्रशिशुः. (1) - करभ (पुं)
दारुविकारशृङ्खलाबद्धोष्ट्रशिशुः. (1) - शृङ्खलक (पुं)
करभाः स्युः शृङ्खलका दारवैः पादबन्धनैः॥ २.८.१३२४ ॥
दारुविकारशृङ्खलाबद्धोष्ट्रशिशुः. (1) - शृङ्खलक (पुं)
अजा. (2) - अजा (स्त्री), छागी (स्त्री)अजः. (5) - स्तभ (पुं), छाग (पुं), वस्त (पुं), छगलक (पुं), अज (पुं)
अजा च्छागी शुभच्छागबस्तच्छगलका अजे॥ २.८.१३२५ ॥
अजा. (2) - अजा (स्त्री), छागी (स्त्री)अजः. (5) - स्तभ (पुं), छाग (पुं), वस्त (पुं), छगलक (पुं), अज (पुं)
मेषः. (7) - मेढ्र (पुं), उरभ्र (पुं), उरण (पुं), ऊर्णायु (पुं), मेष (पुं), वृष्णि (पुं), एडक (पुं)
मेढ्रोरभ्रोरणोर्णायु मेष वृष्णय एडके॥ २.८.१३२६ ॥
मेषः. (7) - मेढ्र (पुं), उरभ्र (पुं), उरण (पुं), ऊर्णायु (पुं), मेष (पुं), वृष्णि (पुं), एडक (पुं)
उष्ट्रसमूहः. (1) - औष्ट्रक (नपुं)मेषसमूहः. (1) - औरभ्रक (नपुं)अजसमूहः. (1) - आजक (नपुं)
उष्ट्रोरभ्राऽजवृन्दे स्यादौष्ट्रकौरभ्रकाऽऽजकम्॥ २.८.१३२७ ॥
उष्ट्रसमूहः. (1) - औष्ट्रक (नपुं)मेषसमूहः. (1) - औरभ्रक (नपुं)अजसमूहः. (1) - आजक (नपुं)
गर्दभः. (5) - चक्रीवत् (पुं), वालेय (पुं), रासभ (पुं), गर्दभ (पुं), खर (पुं)
चक्रीवन्तस्तु वालेया रासभा गर्दभाः खराः॥ २.८.१३२८ ॥
गर्दभः. (5) - चक्रीवत् (पुं), वालेय (पुं), रासभ (पुं), गर्दभ (पुं), खर (पुं)
वणिक्. (5) - वैदेहक (पुं), सार्थवाह (पुं), नैगम (पुं), वाणिज (पुं), वणिज् (पुं)
वैदेहकः सार्थवाहो नैगमो वाणिजो वणिक्॥ २.८.१३२९ ॥
वणिक्. (5) - वैदेहक (पुं), सार्थवाह (पुं), नैगम (पुं), वाणिज (पुं), वणिज् (पुं)
वणिक्. (3) - पण्याजीव (पुं), आपणिक (पुं), क्रयविक्रयक (पुं)
पण्याजीवो ह्यापणिकः क्रयविक्रयिकश्च सः॥ २.८.१३३० ॥
वणिक्. (3) - पण्याजीव (पुं), आपणिक (पुं), क्रयविक्रयक (पुं)
वस्त्रपात्रादिदत्वा तन्मूल्यं गृहीतः. (2) - विक्रेतृ (पुं), विक्रयिक (पुं)मूल्येन वस्त्रादि गृहीतः. (2) - क्रायक (पुं), क्रयिक (पुं)
विक्रेता स्याद्विक्रयिकः क्रायिकक्रयिकौ समौ॥ २.८.१३३१ ॥
वस्त्रपात्रादिदत्वा तन्मूल्यं गृहीतः. (2) - विक्रेतृ (पुं), विक्रयिक (पुं)मूल्येन वस्त्रादि गृहीतः. (2) - क्रायक (पुं), क्रयिक (पुं)
वणिक्कर्मः. (2) - वाणिज्य (नपुं), वणिज्या (स्त्री)विक्रेयवस्तूनां मूल्यम्. (3) - मूल्य (नपुं), वस्न (पुं), अवक्रय (पुं)
वाणिज्यं तु वणिज्या स्यान् मूल्यं वस्नोऽप्यवक्रयः॥ २.८.१३३२ ॥
वणिक्कर्मः. (2) - वाणिज्य (नपुं), वणिज्या (स्त्री)विक्रेयवस्तूनां मूल्यम्. (3) - मूल्य (नपुं), वस्न (पुं), अवक्रय (पुं)
मूलधनम्. (3) - नीवी (स्त्री), परिपण (पुं), मूलधन (नपुं)अधिकफलम्. (3) - लाभ (पुं), अधिक (वि), फल (नपुं)
नीवी परिपणो मूलधनं लाभोऽधिकं फलम्॥ २.८.१३३३ ॥
मूलधनम्. (3) - नीवी (स्त्री), परिपण (पुं), मूलधन (नपुं)अधिकफलम्. (3) - लाभ (पुं), अधिक (वि), फल (नपुं)
परिवर्तनम्. (4) - परिदान (नपुं), परीवर्त (पुं), नैमेय (पुं), नियम (पुं)
परिदानं परीवर्तो नैमेयनियमावपि॥ २.८.१३३४ ॥
परिवर्तनम्. (4) - परिदान (नपुं), परीवर्त (पुं), नैमेय (पुं), नियम (पुं)
निक्षेपः. (2) - उपनिधि (पुं), न्यास (पुं)स्वामिने निक्षेपार्पणम्. (1) - प्रतिदान (नपुं)
पुमानुपनिधिर्न्यासः प्रतिदानं तदर्पणम्॥ २.८.१३३५ ॥
निक्षेपः. (2) - उपनिधि (पुं), न्यास (पुं)स्वामिने निक्षेपार्पणम्. (1) - प्रतिदान (नपुं)
क्रये प्रसारितं द्रव्यम्. (1) - क्रय्य (वि)क्रेतव्यमात्रके द्रव्यम्. (1) - क्रेय (वि)
क्रये प्रसारितं क्रय्यं क्रेयं क्रेतव्यमात्रके॥ २.८.१३३६ ॥
क्रये प्रसारितं द्रव्यम्. (1) - क्रय्य (वि)क्रेतव्यमात्रके द्रव्यम्. (1) - क्रेय (वि)
विक्रयक्रियाकर्मः. (3) - विक्रेय (वि), पणितव्य (वि), पण्य (वि)
विक्रेयं पणितव्यं च पण्यं क्रय्याऽऽदयस्त्रिषु॥ २.८.१३३७ ॥
विक्रयक्रियाकर्मः. (3) - विक्रेय (वि), पणितव्य (वि), पण्य (वि)
सत्यङ्कारः. (3) - सत्यापन (नपुं), सत्यङ्कार (पुं), सत्याकृति (स्त्री)
क्लीबे सत्यापनं सत्यङ्कारः सत्याकृतिः स्त्रियाम्॥ २.८.१३३८ ॥
सत्यङ्कारः. (3) - सत्यापन (नपुं), सत्यङ्कार (पुं), सत्याकृति (स्त्री)
विक्रयः. (2) - विपण (पुं), विक्रय (पुं)
विपणो विक्रयः संख्याः संख्येये ह्यादश त्रिषु॥ २.८.१३३९ ॥
विक्रयः. (2) - विपण (पुं), विक्रय (पुं)
मानार्थः. (3) - यौतव (नपुं), द्रुवय (नपुं), पाय्य (नपुं)
विंशत्याऽऽद्याः सदैकत्वे सर्वाः संख्येयसंख्ययोः॥ २.८.१३४० ॥
मानार्थः. (3) - यौतव (नपुं), द्रुवय (नपुं), पाय्य (नपुं)
माननाम. (1) - आद्यमाषक (पुं)
संख्याऽर्थे द्विबहुत्वे स्तस्तासु चाऽऽनवतेः स्त्रियः॥ २.८.१३४१ ॥
माननाम. (1) - आद्यमाषक (पुं)
षोडशमाषः. (2) - अक्ष (पुं), कर्ष (पुं-नपुं)कर्षचतुष्टयम्. (1) - पल (नपुं)
पङ्क्तेः शतसहस्राऽऽदि क्रमाद्दशगुणोत्तरम्॥ २.८.१३४२ ॥
षोडशमाषः. (2) - अक्ष (पुं), कर्ष (पुं-नपुं)कर्षचतुष्टयम्. (1) - पल (नपुं)
हेम्नो़क्षमानः. (2) - सुवर्ण (पुं-नपुं), विस्त (पुं-नपुं)सुवर्णस्याक्षपलः. (1) - कुरुविस्त (पुं)
यौतवं द्रुवयं पाय्यमिति मानाऽर्थकं त्रयम्॥ २.८.१३४३ ॥
हेम्नो़क्षमानः. (2) - सुवर्ण (पुं-नपुं), विस्त (पुं-नपुं)सुवर्णस्याक्षपलः. (1) - कुरुविस्त (पुं)
पलशतम्. (1) - तुला (स्त्री)विंशतितुला. (1) - भार (पुं)
मानं तुलाङ्गुलिप्रस्थैर्गुञ्जाः पञ्जाऽऽद्यमाषकः॥ २.८.१३४४ ॥
पलशतम्. (1) - तुला (स्त्री)विंशतितुला. (1) - भार (पुं)
आचितभारः. (1) - शाकटभार (वि)दशभाराः. (1) - आचित (पुं-नपुं)
ते षोडशाऽक्षः कर्षोऽस्त्री पलं कर्षचतुष्टयम्॥ २.८.१३४५ ॥
आचितभारः. (1) - शाकटभार (वि)दशभाराः. (1) - आचित (पुं-नपुं)
रजतरूप्यकम्. (2) - कार्षापण (पुं), कार्षिक (पुं)ताम्रकृतकार्षापणः. (1) - पण (पुं)
सुवर्णबिस्तौ हेम्नोऽक्षे कुरुबिस्तस्तु तत्पले॥ २.८.१३४६ ॥
रजतरूप्यकम्. (2) - कार्षापण (पुं), कार्षिक (पुं)ताम्रकृतकार्षापणः. (1) - पण (पुं)
परिमाणः. (5) - आढक (पुं-नपुं), द्रोण (पुं), खारी (स्त्री), वाह (पुं), निकुञ्चक (पुं)
तुला स्त्रियां पलशतं भारः स्याद्विंशतिस्तुलाः॥ २.८.१३४७ ॥
परिमाणः. (5) - आढक (पुं-नपुं), द्रोण (पुं), खारी (स्त्री), वाह (पुं), निकुञ्चक (पुं)
परिमाणः. (2) - कुडव (पुं), प्रस्थ (पुं)
आचितो दश भाराः स्युः शाकटो भार आचितः॥ २.८.१३४८ ॥
परिमाणः. (2) - कुडव (पुं), प्रस्थ (पुं)
तुरीयोभागः. (1) - पाद (पुं)विभागः. (3) - अंश (पुं), भाग (पुं), वण्टक (पुं)
कार्षापणः कार्षिकः स्यात् कार्षिके ताम्रिके पणः॥ २.८.१३४९ ॥
तुरीयोभागः. (1) - पाद (पुं)विभागः. (3) - अंश (पुं), भाग (पुं), वण्टक (पुं)
द्रव्यम्. (7) - द्रव्य (नपुं), वित्त (नपुं), स्वापतेय (नपुं), रिक्थ (नपुं), ऋक्थ (नपुं), धन (नपुं), वसु (नपुं)
अस्त्रियामाढकद्रोणौ खारी वाहो निकुञ्चकः॥ २.८.१३५० ॥
द्रव्यम्. (7) - द्रव्य (नपुं), वित्त (नपुं), स्वापतेय (नपुं), रिक्थ (नपुं), ऋक्थ (नपुं), धन (नपुं), वसु (नपुं)
द्रव्यम्. (6) - हिरण्य (नपुं), द्रविण (नपुं), द्युम्न (नपुं), अर्थ (पुं), रै (पुं), विभव (पुं)
कुडवः प्रस्थ इत्याऽऽद्याः परिमाणाऽर्थकाः पृथक्॥ २.८.१३५१ ॥
द्रव्यम्. (6) - हिरण्य (नपुं), द्रविण (नपुं), द्युम्न (नपुं), अर्थ (पुं), रै (पुं), विभव (पुं)
घटिताघटितहेमरूप्यकम्. (2) - कोश (पुं), हिरण्य (नपुं)
पादस्तुरीयो भागः स्यादंशभागौ तु वण्टके॥ २.८.१३५२ ॥
घटिताघटितहेमरूप्यकम्. (2) - कोश (पुं), हिरण्य (नपुं)
ताम्रादिधातोर्रूप्यकम्. (1) - कुप्य (नपुं)आहतरूप्यकहेमादिः. (1) - रूप्य (नपुं)
द्रव्यं वित्तं स्वापतेयं रिक्थमृक्थं धनं वसु॥ २.८.१३५३ ॥
ताम्रादिधातोर्रूप्यकम्. (1) - कुप्य (नपुं)आहतरूप्यकहेमादिः. (1) - रूप्य (नपुं)
मरतकमणिः. (4) - गारुत्मत (नपुं), मरकत (नपुं), अश्मगर्भ (पुं), हरिन्मणि (पुं)
हिरण्यं द्रविणं द्युम्नमर्थरैविभवा अपि॥ २.८.१३५४ ॥
मरतकमणिः. (4) - गारुत्मत (नपुं), मरकत (नपुं), अश्मगर्भ (पुं), हरिन्मणि (पुं)
पद्मरागमणिः. (3) - शोणरत्न (नपुं), लोहितक (पुं), पद्मराग (पुं)मौक्तिकम्. (1) - मौक्तिक (नपुं)
स्यात्कोशश्च हिरण्यं च हेमरूप्ये कृताऽकृते॥ २.८.१३५५ ॥
पद्मरागमणिः. (3) - शोणरत्न (नपुं), लोहितक (पुं), पद्मराग (पुं)मौक्तिकम्. (1) - मौक्तिक (नपुं)
मौक्तिकम्. (1) - मुक्ता (स्त्री)प्रवालमणिः. (2) - विद्रुम (पुं), प्रवाल (पुं-नपुं)
ताभ्यां यदन्यत् तत्कुप्यं रूप्यं तद् द्वयमाहतम्॥ २.८.१३५६ ॥
मौक्तिकम्. (1) - मुक्ता (स्त्री)प्रवालमणिः. (2) - विद्रुम (पुं), प्रवाल (पुं-नपुं)
रत्नम्. (2) - रत्न (नपुं), मणि (स्त्री-पुं)
गारुत्मतं मरकतमश्मगर्भो हरिन्मणिः॥ २.८.१३५७ ॥
रत्नम्. (2) - रत्न (नपुं), मणि (स्त्री-पुं)
सुवर्णम्. (6) - स्वर्ण (नपुं), सुवर्ण (नपुं), कनक (नपुं), हिरण्य (नपुं), हेमन् (नपुं), हाटक (नपुं)
शोणरत्नं लोहितकः पद्मरागोऽथ मौक्तिकम्॥ २.८.१३५८ ॥
सुवर्णम्. (6) - स्वर्ण (नपुं), सुवर्ण (नपुं), कनक (नपुं), हिरण्य (नपुं), हेमन् (नपुं), हाटक (नपुं)
सुवर्णम्. (5) - तपनीय (नपुं), शातकुम्भ (नपुं), गाङ्गेय (नपुं), भर्मन् (नपुं), कर्बुर (नपुं)
मुक्ताऽथ विद्रुमः पुंसि प्रवालं पुन्नपुंसकम्॥ २.८.१३५९ ॥
सुवर्णम्. (5) - तपनीय (नपुं), शातकुम्भ (नपुं), गाङ्गेय (नपुं), भर्मन् (नपुं), कर्बुर (नपुं)
सुवर्णम्. (4) - चामीकर (नपुं), जातरूप (नपुं), महारजत (नपुं), काञ्चन (नपुं)
रत्नं मणिर्द्वयोरश्मजातौ मुक्ताऽऽदिकेऽपि च॥ २.८.१३६० ॥
सुवर्णम्. (4) - चामीकर (नपुं), जातरूप (नपुं), महारजत (नपुं), काञ्चन (नपुं)
सुवर्णम्. (4) - रुक्म (नपुं), कार्तस्वर (नपुं), जाम्बूनद (नपुं), अष्टापद (पुं-नपुं)
स्वर्णं सुवर्णं कनकं हिरण्यं हेमकाटकम्॥ २.८.१३६१ ॥
सुवर्णम्. (4) - रुक्म (नपुं), कार्तस्वर (नपुं), जाम्बूनद (नपुं), अष्टापद (पुं-नपुं)
अलङ्कारस्वर्णम्. (1) - श्रृङ्गीकनक (नपुं)
तपनीयं शातकुम्भं गाङ्गेयं भर्म कर्वुरम्॥ २.८.१३६२ ॥
अलङ्कारस्वर्णम्. (1) - श्रृङ्गीकनक (नपुं)
रजतम्. (5) - दुर्वर्ण (नपुं), रजत (नपुं), रूप्य (नपुं), खर्जूर (नपुं), श्वेत (नपुं)
चामीकरं जातरूपं महारजतकाञ्चने॥ २.८.१३६३ ॥
रजतम्. (5) - दुर्वर्ण (नपुं), रजत (नपुं), रूप्य (नपुं), खर्जूर (नपुं), श्वेत (नपुं)
पित्तलम्. (2) - रीति (स्त्री), आरकूट (पुं-नपुं)ताम्रम्. (1) - ताम्रक (नपुं)
रुक्मं कार्तस्वरं जाम्बूनदमष्टापदोऽस्त्रियाम्॥ २.८.१३६४ ॥
पित्तलम्. (2) - रीति (स्त्री), आरकूट (पुं-नपुं)ताम्रम्. (1) - ताम्रक (नपुं)
ताम्रम्. (5) - शुल्ब (नपुं), म्लेच्छमुख (नपुं), द्व्यष्ट (नपुं), वरिष्ठ (नपुं), उदुम्बर (नपुं)
अलङ्कारसुवर्णं यच्छृङ्गीकनकमित्यदः॥ २.८.१३६५ ॥
ताम्रम्. (5) - शुल्ब (नपुं), म्लेच्छमुख (नपुं), द्व्यष्ट (नपुं), वरिष्ठ (नपुं), उदुम्बर (नपुं)
लोहः. (6) - लोह (पुं-नपुं), शस्त्रक (नपुं), तीक्ष्ण (नपुं), पिण्ड (नपुं), कालायस (नपुं), अयस् (नपुं)
दुर्वर्णं रजतं रूप्यं खर्जूरं श्वेतमित्यपि॥ २.८.१३६६ ॥
लोहः. (6) - लोह (पुं-नपुं), शस्त्रक (नपुं), तीक्ष्ण (नपुं), पिण्ड (नपुं), कालायस (नपुं), अयस् (नपुं)
लोहः. (1) - अश्मसार (पुं-नपुं)लोहमलम्. (2) - मण्डूर (नपुं), सिंहाण (नपुं)
रीतिः स्त्रियामारकूटो न स्त्रियामथ ताम्रकम्॥ २.८.१३६७ ॥
लोहः. (1) - अश्मसार (पुं-नपुं)लोहमलम्. (2) - मण्डूर (नपुं), सिंहाण (नपुं)
सर्वधातवः. (2) - तैजस (नपुं), लोह (नपुं)अयोविकारः. (1) - कुशी (स्त्री)
शुल्बं म्लेच्छमुखं द्व्यष्टवरिष्टोदुम्बराणि च॥ २.८.१३६८ ॥
सर्वधातवः. (2) - तैजस (नपुं), लोह (नपुं)अयोविकारः. (1) - कुशी (स्त्री)
काचः. (2) - क्षार (पुं), काच (पुं)पारदः. (4) - चपल (पुं), रस (पुं), सूत (पुं), पारद (पुं)
लोहोऽस्त्री शस्त्रकं तीक्ष्णं पिण्डं कालायसाऽयसी॥ २.८.१३६९ ॥
काचः. (2) - क्षार (पुं), काच (पुं)पारदः. (4) - चपल (पुं), रस (पुं), सूत (पुं), पारद (पुं)
महिषशृङ्गम्. (1) - गवल (नपुं)अभ्रकम्. (3) - अभ्रक (नपुं), गिरिज (नपुं), अमल (नपुं)
अश्मसारोऽथ मण्डूरं सिंहाणमपि तन्मले॥ २.८.१३७० ॥
महिषशृङ्गम्. (1) - गवल (नपुं)अभ्रकम्. (3) - अभ्रक (नपुं), गिरिज (नपुं), अमल (नपुं)
सौवीराञ्जनम्. (4) - स्रोतोञ्जन (नपुं), सौवीर (नपुं), कापोताञ्जन (नपुं), यामुन (नपुं)
सर्वं च तैजसं लौहं विकारस्त्वयसः कुशी॥ २.८.१३७१ ॥
सौवीराञ्जनम्. (4) - स्रोतोञ्जन (नपुं), सौवीर (नपुं), कापोताञ्जन (नपुं), यामुन (नपुं)
तुत्थाञ्जनम्. (4) - तुत्थाञ्जन (नपुं), शिखिग्रीव (नपुं), वितुन्नक (नपुं), मयूरक (नपुं)
क्षारः काचोऽथ चपलो रसः सूतश्च पारदे॥ २.८.१३७२ ॥
तुत्थाञ्जनम्. (4) - तुत्थाञ्जन (नपुं), शिखिग्रीव (नपुं), वितुन्नक (नपुं), मयूरक (नपुं)
आवर्तननिष्पन्नरसाञ्जनम्. (3) - कर्परी (स्त्री), दार्विका (स्त्री), तुत्थ (नपुं)रसाञ्जनम्. (1) - रसाञ्जन (नपुं)
गवलं माहिषं शृङ्गमभ्रकं गिरिजाऽमले॥ २.८.१३७३ ॥
आवर्तननिष्पन्नरसाञ्जनम्. (3) - कर्परी (स्त्री), दार्विका (स्त्री), तुत्थ (नपुं)रसाञ्जनम्. (1) - रसाञ्जन (नपुं)
रसाञ्जनम्. (2) - रसगर्भ (नपुं), तार्क्ष्यशैल (नपुं)गन्धकः. (2) - गन्धाश्मन् (पुं), गन्धक (पुं)
स्रोतोञ्जनं तु मौवीरं कापोताञ्जनयामुने॥ २.८.१३७४ ॥
रसाञ्जनम्. (2) - रसगर्भ (नपुं), तार्क्ष्यशैल (नपुं)गन्धकः. (2) - गन्धाश्मन् (पुं), गन्धक (पुं)
गन्धकः. (1) - सौगन्धिक (पुं)तुत्थविशेषः. (3) - चक्षुष्या (स्त्री), कुलाली (स्त्री), कुलत्थिका (स्त्री)
तुत्थाञ्जनं शिखिग्रीवं वितुन्नकमयूरके॥ २.८.१३७५ ॥
गन्धकः. (1) - सौगन्धिक (पुं)तुत्थविशेषः. (3) - चक्षुष्या (स्त्री), कुलाली (स्त्री), कुलत्थिका (स्त्री)
सन्तप्तपित्तलादुत्पन्नद्रव्यम्. (4) - रीतिपुष्प (नपुं), पुष्पकेतु (नपुं), पौष्पक (नपुं), कुसुमाञ्जन (नपुं)
कर्परी दाविंकाक्कातोद्भवं तुत्थं रसाञ्जनम्॥ २.८.१३७६ ॥
सन्तप्तपित्तलादुत्पन्नद्रव्यम्. (4) - रीतिपुष्प (नपुं), पुष्पकेतु (नपुं), पौष्पक (नपुं), कुसुमाञ्जन (नपुं)
हरितालम्. (5) - पिञ्जर (नपुं), पीतन (नपुं), ताल (नपुं), आल (नपुं), हरितालक (नपुं)
रसगर्भं तार्क्ष्यशैलं गन्धाश्मनि तु गन्धिकः॥ २.८.१३७७ ॥
हरितालम्. (5) - पिञ्जर (नपुं), पीतन (नपुं), ताल (नपुं), आल (नपुं), हरितालक (नपुं)
शिलाजतुः. (5) - गैरेय (नपुं), अर्थ्य (नपुं), गिरिज (नपुं), अश्मज (नपुं), शिलाजतु (नपुं)
सौगन्धिकश्च चक्षुष्याकुलाल्यौ तु कुलत्थिका॥ २.८.१३७८ ॥
शिलाजतुः. (5) - गैरेय (नपुं), अर्थ्य (नपुं), गिरिज (नपुं), अश्मज (नपुं), शिलाजतु (नपुं)
गन्धरसः. (6) - बोल (पुं), गन्धरस (पुं), प्राण (पुं), पिण्ड (पुं), गोप (पुं), रस (पुं)
रीतिपुष्पं पुष्पके तु पुष्पकं कुसुमाञ्जनम्॥ २.८.१३७९ ॥
गन्धरसः. (6) - बोल (पुं), गन्धरस (पुं), प्राण (पुं), पिण्ड (पुं), गोप (पुं), रस (पुं)
समुद्रफेनः. (3) - हिण्डीर (पुं), अब्धिकफ (पुं), फेन (पुं)सिन्दूरम्. (2) - सिन्दूर (नपुं), नागसम्भव (नपुं)
पिञ्जरं पीतनं तालमालं च हरितालके॥ २.८.१३८० ॥
समुद्रफेनः. (3) - हिण्डीर (पुं), अब्धिकफ (पुं), फेन (पुं)सिन्दूरम्. (2) - सिन्दूर (नपुं), नागसम्भव (नपुं)
सीसकम्. (4) - नाग (पुं), सीसक (नपुं), योगेष्ट (नपुं), वप्र (नपुं)वङ्गम्. (2) - त्रपु (नपुं), पिच्चट (नपुं)
गैरेयमर्थ्यं गिरिजमश्मजं च शिलाजतु॥ २.८.१३८१ ॥
सीसकम्. (4) - नाग (पुं), सीसक (नपुं), योगेष्ट (नपुं), वप्र (नपुं)वङ्गम्. (2) - त्रपु (नपुं), पिच्चट (नपुं)
वङ्गम्. (2) - रङ्ग (नपुं), वङ्ग (नपुं)कार्पासः. (2) - पिचु (पुं), तूल (पुं)कुसुम्भम्. (1) - कमलोत्तर (नपुं)
वोलगन्धरसप्राणपिण्डगोपरसाः समाः॥ २.८.१३८२ ॥
वङ्गम्. (2) - रङ्ग (नपुं), वङ्ग (नपुं)कार्पासः. (2) - पिचु (पुं), तूल (पुं)कुसुम्भम्. (1) - कमलोत्तर (नपुं)
कुसुम्भम्. (3) - कुसुम्भ (नपुं), वह्निशिख (नपुं), महारजन (नपुं)
डिण्डीरोऽब्धिकफः फेनः सिन्दूरं नागसंभवम्॥ २.८.१३८३ ॥
कुसुम्भम्. (3) - कुसुम्भ (नपुं), वह्निशिख (नपुं), महारजन (नपुं)
कम्बलः. (2) - मेषकम्बल (पुं), ऊर्णायु (पुं)शशलोमः. (2) - शशोर्ण (नपुं), शशलोमन् (नपुं)
नागसीसकयोगेष्टवप्राणि त्रिषु पिञ्चटम्॥ २.८.१३८४ ॥
कम्बलः. (2) - मेषकम्बल (पुं), ऊर्णायु (पुं)शशलोमः. (2) - शशोर्ण (नपुं), शशलोमन् (नपुं)
पुष्पमधुः. (3) - मधु (पुं), क्षौद्र (नपुं), माक्षिक (नपुं)मधूच्छिष्टम्. (2) - मधूच्छिष्ट (नपुं), सिक्थक (नपुं)
रङ्गवङ्गे अथ पिचुस्तूलोऽथ कमलोत्तरम्॥ २.८.१३८५ ॥
पुष्पमधुः. (3) - मधु (पुं), क्षौद्र (नपुं), माक्षिक (नपुं)मधूच्छिष्टम्. (2) - मधूच्छिष्ट (नपुं), सिक्थक (नपुं)
मनःशिला. (4) - मनःशिला (स्त्री), मनोगुप्ता (स्त्री), मनोह्वा (स्त्री), नागजिह्विका (स्त्री)
स्यात्कुसुम्भं वह्निशिखं महारजनमित्यपि॥ २.८.१३८६ ॥
मनःशिला. (4) - मनःशिला (स्त्री), मनोगुप्ता (स्त्री), मनोह्वा (स्त्री), नागजिह्विका (स्त्री)
मनःशिला. (3) - नैपाली (स्त्री), कुनटी (स्त्री), गोला (स्त्री)यवक्षारः. (2) - यवक्षार (पुं), यवाग्रज (पुं)
मेषकम्बल ऊर्णायुः शशोर्णं शशलोमनि॥ २.८.१३८७ ॥
मनःशिला. (3) - नैपाली (स्त्री), कुनटी (स्त्री), गोला (स्त्री)यवक्षारः. (2) - यवक्षार (पुं), यवाग्रज (पुं)
यवक्षारः. (1) - पाक्य (पुं)स्वर्जिकाक्षारः. (3) - स्वर्जिकाक्षार (पुं), कापोत (नपुं), सुखवर्चक (पुं)
मधु क्षौद्रं माक्षिकाऽऽदि मधूच्छिष्टं तु सिक्थकम्॥ २.८.१३८८ ॥
यवक्षारः. (1) - पाक्य (पुं)स्वर्जिकाक्षारः. (3) - स्वर्जिकाक्षार (पुं), कापोत (नपुं), सुखवर्चक (पुं)
स्वर्जिकाक्षारः. (2) - सौवर्चल (नपुं), रुचक (नपुं)वेणुजन्यौषधिविशेषः. (2) - त्वक्क्षीरी (स्त्री), वंशरोचना (स्त्री)
मनःशिला मनोगुप्ता मनोह्वा नागजिह्विका॥ २.८.१३८९ ॥
स्वर्जिकाक्षारः. (2) - सौवर्चल (नपुं), रुचक (नपुं)वेणुजन्यौषधिविशेषः. (2) - त्वक्क्षीरी (स्त्री), वंशरोचना (स्त्री)
शोभाञ्जनबीजम्. (2) - शिग्रुज (नपुं), श्वेतमरिच (नपुं)इक्षुमूलम्. (1) - मोरट (नपुं)
नैपाली कुनटी गोला यवक्षारो यवाग्रजः॥ २.८.१३९० ॥
शोभाञ्जनबीजम्. (2) - शिग्रुज (नपुं), श्वेतमरिच (नपुं)इक्षुमूलम्. (1) - मोरट (नपुं)
पिप्पलीमूलम्. (3) - ग्रन्थिक (नपुं), पिप्पलीमूल (नपुं), चटकाशिरस् (नपुं)
पाक्योऽथ सर्जिकाक्षारः कापोतः सुखवर्चकः॥ २.८.१३९१ ॥
पिप्पलीमूलम्. (3) - ग्रन्थिक (नपुं), पिप्पलीमूल (नपुं), चटकाशिरस् (नपुं)
भूतकेशः. (2) - गोलोमी (स्त्री), भूतकेश (पुं)रक्तचन्दनः. (2) - पत्राङ्ग (नपुं), रक्तचन्दन (नपुं)
सौवर्चलं स्याद्रुचकं त्वक्क्षीरी वंशरोचना॥ २.८.१३९२ ॥
भूतकेशः. (2) - गोलोमी (स्त्री), भूतकेश (पुं)रक्तचन्दनः. (2) - पत्राङ्ग (नपुं), रक्तचन्दन (नपुं)
शुण्ठीपिप्पलिमरीचिकानां समाहारः. (3) - त्रिकटु (नपुं), त्र्यूषण (नपुं), व्योष (नपुं)हरीतक्यामलकविभीतक्यां समाहारः. (2) - त्रिफला (स्त्री), फलत्रिक (नपुं)
शिग्रुजं श्वेतमारिचं मोरटं मूलमैक्षवम्॥ २.८.१३९३ ॥
शुण्ठीपिप्पलिमरीचिकानां समाहारः. (3) - त्रिकटु (नपुं), त्र्यूषण (नपुं), व्योष (नपुं)हरीतक्यामलकविभीतक्यां समाहारः. (2) - त्रिफला (स्त्री), फलत्रिक (नपुं)
ग्रन्थिकं पिप्पलीमूलं चटिकाशिर इत्यपि॥ २.८.१३९४ ॥
गोलोमी भूतकेशो ना पत्राङ्गं रक्तचन्दनम्॥ २.८.१३९५ ॥
त्रिकटु त्र्यूपणं व्योपं त्रिफला तु फलत्रिकम्॥ २.८.१३९६ ॥
इति वैश्यवर्गः

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